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उत्तराखंड मे बन रहे हाड्रो प्रोजेक्ट वरदान या अभिशाप ?

अभिशाप
21 (56.8%)
वरदान
10 (27%)
कह नहीं सकते
6 (16.2%)

Total Members Voted: 37

Voting closes: October 10, 2037, 04:59:09 PM

Author Topic: Hydro Projects In Uttarakhand - उत्तराखंड मे बन रहे हाड्रो प्रोजेक्ट  (Read 33592 times)

Anil Arya / अनिल आर्य

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जमरानी बांध की एक और बाधा दूर
हल्द्वानी। जमरानी बांध परियोजना की एक बड़ी बाधा दूर होने से अब बांध निर्माण की उम्मीदें जगी हैं। केंद्रीय जल आयोग ने परियोजना की हाईड्रोलॉजी को मंजूरी दे दी है। अब इसी आधार पर बांध का डिजाइन बनाने का काम शुरू हो जाएगा। डिजाइन को मंजूरी मिलने के बाद परियोजना की अंतिम डीपीआर तैयार की जाएगी। इस बीच, वन भूमि की मंजूरी के लिए भी विभाग ने प्रयास तेज कर दिए हैं। इसी माह में लैंड केस तैयार कर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के लिए भेज दिया जाएगा।
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Anil Arya / अनिल आर्य

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कोटेश्वर बांध से उत्पादन शुरू
नई टिहरी। कोटेश्वर बांध परियोजना में निरतंर 72 घंटे का सफल परीक्षण के बाद पहले चरण में एक सौ मेगवाट की एक टरबाइन से ही विद्युत उत्पादन शुरू किया गया है। इस परियोजना की शेष तीन टरबाइनों से भी जल्द विद्युत उत्पादन शुरू होगा।
कोटेश्वर बांध परियोजना के उपमहाप्रबंधक कार्मिक एवं प्रशासन एके श्रीवास्तव ने बताया कि 72 घंटे का सफल परीक्षण होने के बाद अब पहली टरबाइन से विद्युत उत्पादन शुरू हो गया है। इस परियोजना में सौ-सौ मेगावाट विद्युत जरनेट करने वाली चार टरबाइनें लगाई गई हैं। यहां से बिजली नेशनल ग्रिड को भेजी जा रही है। इसके लिए पहले ही लाइन नेशनल ग्रिड से जोड़ दी गई थी। अब शेष तीनों टरबाइनों में से एक अप्रैल में, दूसरी सितंबर और आखिरी इकाई को फरवरी 2012 में ग्रिड से जोड़ दिया जाएगा। टिहरी एवं कोटेश्वर बांध परियोजना के दो चरण पूरा होने के बाद टिहरी पंप स्टोरेज प्लांट का काम भी प्रगति पर है। इससे एक हजार मेगावाट बिजली पैदा होगी। इस परियोजना के पूर्ण होने के बाद जहां 6200 मिलियन यूनिट बिजली पैदा होगी, वहीं 2.70 लाख हेक्टेयर भूमि की अतिरिक्त सिंचाई भी होगी। मौजूदा सिंचाई सुविधा के सुदृढ़ीकरण होने से 6.04 लाख हेक्टेयर भूमि को लाभ होगा। साथ ही दिल्ली के लिए 162 मिलियन गैलन प्रतिदिन पानी की आपूर्ति भी हो सकेगी। यूपी के विभिन्न शहरों एवं गांवों के लिए भी 108 गैलन पीने के पानी की व्यवस्था होने से 30 लाख लोगों की जरूरतों को भी पूरा किया जा सकेगा। डीजीएम श्रीवास्तव ने बताया कि बांध प्रभावित क्षेत्रों में नागरिक सुविधाओं के साथ ही अन्य गतिविधियों के लिए भी टीएचडीसी अपने सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत लगातार काम कर रहा है।
सौ-सौ मेगावाट की तीन टरबाइनों से भी जल्द उत्पादन
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धौलीगंगा पावर प्लांट का निरीक्षण
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एनएचपीसी के प्रतिपालक एमके रैना ने धौली गंगा परियोजना का निरीक्षण किया। इस मौके पर क्षेत्र में प्रस्तावित सोबला और गोरीगंगा फेज थ्री के साइटों का भी निरीक्षण किया।

प्रतिपालक एमके रैना दो दिवसीय भ्रमण कार्यक्रम के तहत यहां पहुंचे थे। उन्होंने धौलीगंगा पावर प्लांट के डैम, पावर हाउस सहित मुख्य कार्यालय का निरीक्षण करते हुए अधिकारियों से प्रगति की रिपोर्ट मांगी। इस अवसर पर उन्होंने एनएचपीसी द्वारा इस क्षेत्र में प्रस्तावित धौलीगंगा फेज टू और गोरीगंगा फेज थ्री के साइटों का भी निरीक्षण कर इस संबंध में सरकार स्तर पर वार्ता करने की बातें कहीं। अपने इस कार्यक्रम के तहत उन्होंने एनएचपीसी द्वारा कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत चल रहे सिलाई प्रशिक्षण एवं साक्षरता अभियान का भी अवलोकन किया। श्री रैना ने प्रशिक्षण ले रही महिलाओं से वार्ता कर कार्यक्रम के बारे में राय जानी। इस अवसर पर उन्होंने धौलीगंगा परियोजना के अधिकारियों को इस कार्यक्रम के तहत महिलाओं को और अधिक प्रोत्साहित करने के निर्देश दिये।

बाद में परियोजना के प्रशासनिक कार्यालय में महिलाओं और कर्मचारियों द्वारा स्वरचित पुस्तिका का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रभाषा के उत्थान हेतु किए गए इस प्रयास की सराहना की। भ्रमण कार्यक्रम के तहत विभिन्न कर्मचारी यूनियन के प्रतिनिधियों से वार्तालाप किया। इस कार्यक्रम के दौरान उनके साथ मुख्य अभियंता सिविल आशीष कुमार चौकसा, महाप्रबंधक एस कालगांवकर आदि अधिकारी थे।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7539876.html

Anil Arya / अनिल आर्य

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फाटा-ब्यूंगगाड़ जल
बिजली प्रोजेक्ट के
पास जमीन में दरार
फाटा/रुद्रप्रयाग। केदारघाटी में मंदाकिनी नदी में निर्माणाधीन फाटा-ब्यूंगगाड़ जल विद्युत परियोजना के एडिट-2 के ऊपर जमीन में काफी चौड़ी और गहरी दरार पड़ गई है। जमीन में दरार आने से शेरसी गांव का मुख्य पैदल मार्ग बंद हो गया है। इससे स्थानीय लोगों को काफी दिक्कतें हो रही हैं और वह भयभीत भी हैं। आक्रोशित ग्रामीणों ने बृहस्पतिवार को फाटा-ब्यूंगगाड़ जल विद्युत परियोजना के एडिट-2 में काम रुकवा दिया। आरोप है कि परियोजना के लिए सुरंग बनाने के लिए भारी मात्रा में विस्फोटकों का प्रयोग किया जा रहा है, जिसकी वजह से जमीन में दरार आई है। हालांकि, कंपनी ने इस आरोप को खारिज कर दिया है। उसका कहना है कि साइट में दो माह से ब्लास्टिंग बंद है।
फाटा-ब्यूंगगाड़ जल विद्युत परियोजना पहले से ही ग्रामीणों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। भवनों में दरारें पड़ने पर पूर्व में भी कई बार इस परियोजना का काम बंद कराया जा चुका है। पूर्व ब्लॉक प्रमुख जयनारायण नौटियाल ने बताया कि एजेंसी द्वारा सुरंग निर्माण के लिए भारी मात्रा में विस्फोटकों का प्रयोग किया जा रहा है। इससे शेरसी गांव के पैदल मार्ग में बुधवार को एडिट-2 के ऊपर लगभग दो मीटर चौड़ी और करीब 60 मीटर गहरी दरार आ गई। आक्रोशित ग्रामीणों ने बृहस्पतिवार को एडिट-2 में काम बंद करवा दिया। ग्रामीण विद्यादत्त नौटियाल, हरेंद्र रावत, माधुरी देवी, सुदामा देवी और लक्ष्मी चंद्र ने आरोप लगाया कि गांव में नुकसान होने के बावजूद टनल निर्माण जारी है। उन्होंने शासन-प्रशासन से एजेंसी के कार्यों की जांच की मांग की है। परियोजना निर्माण से जुड़ी लैंको इनर्जीज लिमिटेड के महाप्रबंधक अनिल गुप्ता ने आरोपों को सिरे से नकार दिया।
उन्होंने बताया कि साइट में दो माह से ब्लास्टिंग बंद है। संभव है विगत दिनों आए भूकंप से दरार आई हो। अलबत्ता दरार को भर दिया गया है। साथ ही दरार पड़ने के कारणों की जांच भी की जा रही है।
बिजली परियोजना के एडिट-2 में ग्रामीणों ने काम रुकवाया
ग्रामीणों का आरोप सुरंग निर्माण के विस्फोट से दरकी जमीन
निर्माण कंपनी ने आरोपों को नकारा कहा-जांच कराई जा रही है
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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  विशालकाय बांध पहाड़वासियों के साथ छलावा     Jun 27, 07:17 pm   बताएं              श्रीनगर गढ़वाल, जागरण कार्यालय: गढ़वाल विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर के डीन सभागार में हिमालयी क्षेत्र की जलविद्युत परियोजनाओं का भविष्य और जमीनी हकीकत विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। बतौर मुख्य अतिथि पर्यावरणविद् प्रो. जीडी अग्रवाल ने कहा कि विकास के नाम पर ताबड़तोड़ बनाए जा रहे विशालकाय बांध पहाड़ों के हित में नहीं हैं। ऐसे बांधों को बनाकर सरकारें पहाड़वासियों के साथ छलावा कर रही हैं।
इस अवसर पर प्रो. अग्रवाल ने कहा कि यदि इसी प्रकार अंधाधुंध विकास जारी रहा तो बांधों के कारण होने वाली आपदाओं से पहाड़वासी हमेशा त्रस्त रहेंगे। कार्यशाला के विशिष्ट अतिथि और पूर्व मंत्री डॉ. मोहन सिंह गांववासी ने कहा कि बांधों के निर्माण से नदियों का प्राकृतिक स्वरूप भी उजड़ रहा है। उत्तराखंड में पर्यावरण असंतुलन का प्रभाव भी साफ दृष्टिगोचर होने लगा है। कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए भूगोल विभाग के अध्यक्ष प्रो. डीडी मैठाणी ने कहा कि हिमालय अत्यधिक संवेदनशील है। जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण से पूर्व हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण प्रभाव आंकलन वास्तविक रूप से किया जाना जरूरी है। कार्यशाला के मुख्य वक्ता डॉ. भरत झुनझुनवाला ने कहा कि परियोजनाओं के टनल के ऊपर बसे गांवों का भविष्य भी पूरी तरह से खतरे में है। पाला मनेरी जलविद्युत परियोजना के कारण सेंज गांव का एकमात्र प्राकृतिक पेयजल स्रोत भी सूख गया। कार्यशाला के संयोजक डॉ. अनिल गौतम ने कहा कि विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेजों के सिविल इंजीनियर छात्रों ने हिमालयी क्षेत्र में बन रहे बांधों का विस्तृत अध्ययन किया है। कार्यशाला में गढ़वाल विवि में भूगोल विभाग के डॉ. मोहन सिंह पंवार, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. अरविंद दरमोड़ा, आशाराम ममगांई, अनीता उनियाल, विनोद घिल्डियाल, अतर सिंह असवाल, डॉ. देवीराम, डॉ. जुबेर, भवानी रावत ने भी विचार व्यक्त किए।
नदियों में सुरंग आधारित डेम नहीं बने
प्रो. जीडी अग्रवाल ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि पहाड़ की नदियों में सुरंग आधारित डेम नहीं बने। नदियों पर बड़े बांध नहीं बनने चाहिए। लोहारी नागपाला की तर्ज पर अन्य परियोजनाएं भी निरस्त की जाएं। धारी देवी मंदिर को डूबाना नहीं चाहिए। इसके लिए धर्माचार्य आगे आएं।
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I think govt must keep public safety on top before giving final approval of any hydro project since most of the areas of Uttarakhand are in high earthquake zone.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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टिहरी बांध से 44 गांव मौत के मुहाने पर, प्रशासन नींद में
 
टिहरी। उत्तराखंड के टिहरी बांध बनने से सरकार को हर महीने करोड़ों रुपयों का मुनाफा हो रहा है। लेकिन इसके साथ एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि इलाके के लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। 44 गांव के लोग मौत के मुहाने पर खड़े हैं। विकास के नाम पर सड़कें बनाने का जो काम हो रहा है उससे लोगों और उनके पशुओं की जिंदगी हराम हो गई है। निर्माण काम के सरकारी ठेके जिन कंपनियों को दिए गए हैं वो अपना काम समय पर पूरा नहीं कर पा रही हैं।

इस भारी परेशानी के माहौल में कुछ लोग हैं जो डट कर लड़ रहे हैं अपने अधिकारों के लिए। सिटीजन जर्नलिस्ट प्रेम दत्त जुयाल की रिपोर्ट हैरान करने वाली है। प्रेम टिहरी के ही जलवाल गांव का रहने वाला है। प्रेम के मुताबिक टिहरी झील के 840 मीटर के दायरे में आने वाले गांवों को सरकार ने यहां से कहीं और बसा दिया। लेकिन झील से 1218 मीटर तक के कई गांव ऐसे हैं जो भूधसाव का शिकार हो रहे हैं। घर-खेत सब खत्म हो रहे हैं। लोग हमेशा एक डर के साए में रहते हैं।

 टिहरी बांध से 44 गांव मौत के मुहाने पर, प्रशासन नींद मेंयहां के मदननेगी और जलवाल गांव को पिछले साल भारी बारिश की वजह से झील में जल भराव होने से काफी नुकसान हुआ था। इस खतरे का अंदेशा 1990 में ही हो गया था, इसकी जानकारी प्रशासन को दी गई थी कि यहां के गांव वालों को कहीं और बसाया जाए और आने-जाने की समस्याओं का समाधान किया जाए।

 
 
 
सिटीजन जर्नलिस्ट प्रेम की कई अपील के बाद सरकार ने कई गांवों का सर्वेक्षण किया। भू-वैज्ञानिकों के साथ-साथ रुड़की के वैज्ञानिकों और डिज़ास्टर मैनेजमेंट सेंटर की तरफ से भी से भू-परिक्षण कराया गया। वैज्ञानिकों की तीनों टीमों ने ये माना कि ये इलाका खतरे के निशान पर है। उन रिपोर्ट के आधार पर शासन ने डीम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई और डीएम ने शासन को पुनर्वास के लिए सहमति पत्र शासन को भेज दिया। लेकिन उसपर शासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। इस बीच टिहरी बांध की 3 और 4 नंबर सुरंग को बंद कर दिया गया और झील में पानी भरना शुरू हो गया। और गांव वालों को परेशानी होने लगी। जिसके प्रेम ने 2004 में नैनीताल हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। कोर्ट ने भी ये माना कि ये इलाका खतरे के निशान पर है और इन्हें कहीं और बसाया जाना चाहिए।

लेकिन शासन ने अपनी झूठी दलीलें देकर कोर्ट के फैसले पर चुप्पी लगा दी। 2005 में टिहरी झील की जब आखिरी दो सुरंगों टी-1 और टी-2 को बंद कर दिया गया जिसकी वजह से पानी का स्तर बढ़कर 790 मीटर पर चला गया जिससे 950 मीटर तक भू-धसाव शुरू हो गया। जिसकी सूचना एक बार फिर प्रशासन को दी गई। अपर सचिव ने गांवों का मुयाअना किया और चिंता जताई और साथ ही एक निरीक्षण कमेटी बनाई। लेकिन जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई। जिसके बाद फिर 2010 में भारी बारिश होने की वजह से झील में पानी का स्तर 832 मीटर तक आ गया। जिसकी वजह से कई गांव तबाह हो गए। कई लोग तो अपने गांवों को छोड़कर अपने दूसरों के यहां रहने को मजबूर हो गए हैं।

इस तबाही को देखते हुए शासन ने एक बार फिर एक्पर्ट कमेटी बनाई और नवंबर 2010 में जांच की गई। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में 44 गांवों को खतरे के निशान पर माना। लेकिन एक बार फिर उस रिपोर्ट को दरकिनार कर दिया गया। इस मामले को लेकर अधिकारी कितने गंभीर है ये जानने के लिए सिटीज़न जर्नलिस्ट की टीम ने पुर्नवास विभाग के अधिकारियों से बातचीत की। प्रेम को इस लड़ाई को लड़ते हुए 20 साल हो गए हैं। लेकिन वो हार नहीं माने हैं, उनका कहना है कि मेरी ये लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक सैकड़ों परिवारों को इंसाफ नहीं मिल जाता।
 
http://khabar.ibnlive.in.com/news/56295/8?from=hp

Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा

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The life of people in uttarakhand is really at stake. Though, it is true that Tehri Dam is generating electricity and contributing in nation’s progress but day by day the clouds of danger hovering over the heads of people there is a big question.

We should not put people life at danger just because of earning profit.


what is your views pleasse?

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देवलिंग व पिपलीगांव पर मंडराया खतरा
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घुत्तू में निर्माणाधीन लघु जल विद्युत परियोजना से प्रभावित गांव देवलिंग के ऊपर पहाड़ी में दरार आने से भारी भूस्खलन होने लगा है। गांव के दो परिवारों के मकान के पीछे भारी मलबा व पत्थर आने से अपने घर छोड़कर दूसरे के घर में शरण ले रखी है। वहीं जिला मुख्यालय के नजदीकी गांव पिपली के ग्रामीण भी लगातार बरसात के चलते दहशत में है। दोनों गांवों के लोगों ने शीघ्र ही विस्थापन की मांग की है।

घुत्तू में भिलंगना नदी पर निर्माणाधीन लघु जल विद्युत परियोजना से 24.5 मेगावाट का विद्युत उत्पादन किया जाना है। परियोजना के टनल निर्माण से उसके ऊपर बसा गांव देवलिंग पूरी तरह से प्रभावित हो गया है।

 गांव के आवासीय भवनों में दरारें जमीन धंसने जैसी घटनाएं लगातार हो रही हैं। खतरे को देखते हुए निर्माण कार्य कर रही कंपनी के खिलाफ ग्रामीणों ने न्यायालय में वाद दायर किया था जो अभी लंबित है। शुक्रवार रात्रि को गांव के जोत सिंह, सावन सिंह नेगी के दस आवासीय भवन के पीछे भारी मात्रा में भूस्खलन होने के कारण भवन पूरी तरह से खतरे की जद में आ गया है।

 प्रभावित परिवारों ने दूसरे घरों में शरण में ले रखी है। ग्रामीण सौकीन सिंह, सरदार सिंह आदि लोगों ने शीघ्र ही प्रशासन से गांव को पूर्ण विस्थापन की मांग की है तथा ऐसा न करने पर कंपनी तथा प्रशासन के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी है।

नई टिहरी : जिला मुख्यालय के नजदीकी गांव पंचायत पिपली में बरसात में शहर का पानी गांव के ऊपर गिरता है जिस कारण गांव को खतरा बना हुआ है। ग्रामीणों ने गांव का शीघ्र विस्थापन किए जाने की मांग की है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_8021557.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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   Can't say- It is a good news... people safety must be top priority. In uttarakhand, there are thousands of dams in progress at different places but eco system is also getting affected to this. landslides are taking place ...
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   World Bank to finance Uttarakhand hydro-power project 
New Delhi, Aug 11 (IANS) The Indian government Thursday entered into a loan agreement with World Bank for $648 million to build 444 mega-watt Vishnugad Pipalkoti hydro electric project in Uttarakhand.
"The Vishnugad Pipalkoti Project will help supply clean, carbon-friendly power to the northern grid at peak demand time and help reduce shortages in nine states," said Venu Rajamony, joint secretary in the finance ministry's economic affairs department.
The agreement which was signed between World Bank and state-run Tehri Hyrdro Development Corporation (THDC) is expected to generate an estimated 1,665 million kilowatt-hours of electricity each year to help relieve India's chronic power shortage.
"The electricity generated from the project will be supplied to the states of Punjab, Haryana, Rajasthan, Uttar Pradesh, Himachal Pradesh, Uttarakhand, Chandigarh, Delhi and Jammu and Kashmir," an official statement said.
According to the statement, the project will also help India reduce its greenhouse gas emissions by 1.6 million tons each year, when compared to a thermal plant of the same capacity.
"This project incorporates a number of special environmental and social safeguards such as maintenance of a high minimum flow standard in the Alaknanda (river) at all times to sustain the aquatic health of rivers," Rajamony said.
She further said that no houses or field will be lost due to submergence, and that there are robust plans for afforestation.
The project also gives provision of free electricity to affected households for 10 years and an allocation of one percent of revenues for local area development.
It also envisions a royalty of 12 percent of the power generated to Uttarakhand, which is estimated to be around Rs. 90 crore (around US$ 20 million) each year at expected tariffs.
The World Bank on its part said, that the project was cleared only after careful evaluation was conducted on any impact due to construction or operation of the dam.
"The project was cleared for construction only after the ministry of environment and forests studied the cumulative impacts of hydropower development on the Alaknanda basin," said Roberto Zagha, country director, World Bank.
The low-interest loan, from the International Bank for Reconstruction and Development (IBRD) under the World Bank, has a six-year grace period, and a maturity of 29 years

 
http://www.daijiworld.com/news/news_disp.asp?n_id=111780

 

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