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उत्तराखंड मे बन रहे हाड्रो प्रोजेक्ट वरदान या अभिशाप ?

अभिशाप
21 (56.8%)
वरदान
10 (27%)
कह नहीं सकते
6 (16.2%)

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Voting closes: October 10, 2037, 04:59:09 PM

Author Topic: Hydro Projects In Uttarakhand - उत्तराखंड मे बन रहे हाड्रो प्रोजेक्ट  (Read 33591 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड मे बन रहे हाड्रो प्रोजेक्ट वरदान या अभिशाप ?

दोस्तो,

जैसे की न्यूज़ पेपर और आदि समाचार माध्यम से पता चल रहा है की उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों मे कई हाड्रो प्रोजेक्टओ का काम चल रहा है ! कई जगहों पर इसका विरोध भी हो रहा है!

Do you these projects are boon in development of view Uttarahand or as a threat etc.

M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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There are many projects coming up in UK and people are protesting for it also.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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As I mentioned earlier, there several power projects under construction in hill areas. But in some places villagers are protesting for these dams as they think that most of the parts of Uttarakhand state are in High Earth Quake Zone and in case of any earthquake, there would be a double loss.
There are several power projects which Uttarakhand Govt is itself making on many rivers of UK. However, some private firms have also shown keen interest in making the power projects in UK.
For development point of view, coming up of these hydro projects is somewhere a new hope for people of UK but the other aspect of people protest is also a matter of concern. Somewhere

हेम पन्त

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Amid mounting protests against hydel projects on Bhagirathi river in Uttarakhand, twenty women social activists were held on Wednesday for allegedly trying to disrupt a rally of Chief Minister BC Khanduri in the hill town of Uttarkashi.


Police said the women activists, holding banners and black flags, barged into a public meeting, which was being addressed by Khanduri at Ramlila ground in Uttarkashi town.

They said they rounded up all the activists, who were shouting slogans against Khanduri and calling for ban on all the major hydel projects on the Bhagirathi, a move, which they claimed, would wipe out the identity of the holy river.

A top social activist GD Agarwal said he would stage a fast unto death from June 13 with other activists like Govindacharya, Rajendra Singh lending their support to the cause.

Meanwhile, Khanduri, who kicked off the civil works for the 480 MW Pala Maneri hydroelectric project on Bhagirathi, said he was ready to hold talks with social activists over the environmental issues.

He also said the power was the basic necessity of the state and his government would take all the steps to make Uttarakhand an energy state.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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I would say Govt must ensure the safety and other genuine issues of publice are not compromised.

Amid mounting protests against hydel projects on Bhagirathi river in Uttarakhand, twenty women social activists were held on Wednesday for allegedly trying to disrupt a rally of Chief Minister BC Khanduri in the hill town of Uttarkashi.


Police said the women activists, holding banners and black flags, barged into a public meeting, which was being addressed by Khanduri at Ramlila ground in Uttarkashi town.

They said they rounded up all the activists, who were shouting slogans against Khanduri and calling for ban on all the major hydel projects on the Bhagirathi, a move, which they claimed, would wipe out the identity of the holy river.

A top social activist GD Agarwal said he would stage a fast unto death from June 13 with other activists like Govindacharya, Rajendra Singh lending their support to the cause.

Meanwhile, Khanduri, who kicked off the civil works for the 480 MW Pala Maneri hydroelectric project on Bhagirathi, said he was ready to hold talks with social activists over the environmental issues.

He also said the power was the basic necessity of the state and his government would take all the steps to make Uttarakhand an energy state.

हेम पन्त

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Gandhian to go on fast at Uttarkashi town to save Bhagirathi
« Reply #5 on: June 13, 2008, 12:27:45 PM »
Dehradun (PTI): The campaign to save Bhagirathi river is likely to get momentum when noted environmentalist and Gandhian G D Agrawal, begins his fast-unto-death from Friday at Uttarkashi town of Uttarakhand to protest against a series of hydel projects being constructed on the river.

To lend their support to Agrawal (76), other environmentalists and social activists like Rajendra Singh, Govindacharya, Sunita Narayan, Vandana Shiva, M C Mehta are also likely to join his endavour to save Bhagirathi, a major tributary of the Ganges.

Agrawal is of the view that Bhagirathi river will lose its identity once Uttarakhand government constructs a series of hydel projects on it. Agrawal's fast will coincide with "Ganga dussehra", a Hindu festival tomorrow.

Agrawal's move came following a series of protests by local people who are on the verge of being uprooted at several places following the construction of these dams. The dams include Pala Maneri (480 MW), Maneri Bhali Phase-II (304 MW), Lohari Nagpala (600 MW), Koteshwar (400 MW), Bhairon Ghati(381 MW) and Jad Ganga (200 MW).


हेम पन्त

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घनसाली (उत्तरकाशी)। घुत्तू भिलंग में निर्माणधीन लघु जलविद्युत परियोजना के विरोध के स्वर दबने के बजाए और मुखर होने लगे है। वीना गांव के बाद अब देवलिंग के ग्रामीणों ने परियोजना के खिलाफ विरोध का झडा उठा लिया है।

तीन दिन तक परियोजना प्रभावित वीना गांव के ग्रामीणों ने विरोध में कार्य बंद कर धरना, प्रदर्शन किया था। प्रशासन, ग्रामीणों व कंपनी के मध्य गत दिवस समझौता हो गया था। प्रशासन व कंपनी राहत की सांस ले भी नहीं पाई थी, कि अब देवलिंग गांव के ग्रामीण मुखर होने लगे है। जिलाधिकारी को प्रेषित ज्ञापन में ग्रामीणों ने अवगत कराया कि कंपनी द्वारा बनाई जा रही टनलों में भारी ब्लास्टिंग से पूरे गांव के मकानों में दरारें आ गयी तथा प्राकृतिक जल स्रोत भी सूख गये हैं। वहीं पशुओं के लिए घास पत्ती की खत्म हो गयी है, जबकि खेतों की नमी खत्म होने के कारण फसल भी नही हो पा रही है। प्राकृतिक जल स्रोतों का पानी टनलों के रास्ते बाहर आ रहा है। देवलिंग के प्रभावित ग्रामीण सूरत सिंह रौतेला, सुशीला देवी, केदार सिंह, सरदार सिंह आदि ने कहा कि कंपनी इकरारनामें के अनुसार कार्य नही कर रही है। गांव के नीचे बनाई जा रही टनल में लगातार ब्लास्टिंग होने से गांव थर-थर्रा जाता है। गांव के सभी भवनों में दरारें भी आ गयी है। आस पास के सभी पेयजल स्रोत भी सूख गये हैं। जिससे ग्रामीणों की परेशानियां बढ़ गई है। उन्होने उन्होने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर गांव के सभी मकानों का बीमा, पेयजल योजनाओं का निर्माण तथा गांव के गरीब बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध नही कराया गया तो ग्रामीण परियोजना का कार्य ठप्प करके परियोजना स्थल पर आमरण अनशन पर बैठ जायेंगे।

राजेश जोशी/rajesh.joshee

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सभी जल विद्युत् परियोजनाओं पर जनता के हित का कार्य कम और राजनीति अधिक हो रही है|  इसमें राजनेता ही नही तथाकथित पर्यावरणविद भी शामिल हैं, आन्दोलन करने वाले ये लोग तब कहाँ सो जाते है जब परियोजना की DPR बन रही होती है|  यह तभी सक्रिय होते हैं जब काम या तो आधा या पुरा हो चुका होता है, क्योंकी तब तक यह ठेकेदारों और निर्माण कंपनी से रकम ऐंठ चुके होते हैं|  फ़िर इनको अपने जनता के प्रति दायित्व का बोध होता है और ये आमरण अनशन या ऐसा ही कोई ढोंग शुरू कर देते हैं|   यह सब कोई अन्तराष्ट्रीय या राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने का एक अच्छा प्लेटफोर्म बन जाता है| आप ऐसे कितने पर्यावरणविदों का नाम ले सकते हैं जिनके कार्यों से जनता का सचमुच भला हुआ हो|  आम जनता जो इनके पीछे खड़ी होकर इनको प्रसिद्धि दिलाती हैं  बेचारी वही की वही रहती है|  राजनेताओं के चरित्र के बारे में कुछ कहना व्यर्थ है आम जनता सब कुछ जानती है पर मजबूर है कि निजी स्वार्थ वश इनको फ़िर भी झेल रही है, दूसरा कोई विकल्प जो नही है|
टेहरी बाँध इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जो खरबों रुपया खर्च होने, लाखो लोगों के विस्थापित होने तहत कई आन्दोलनों को झेलने के बावजूद आज तक अपनी पूरी क्षमता से उद्पादन नही कर पाया है|  निर्माण कार्य लटकने से परियोजना की लागत बढ़ जाती है जिससे गरीब जनता के अल्वावा किसी का नुक्सान नही होता क्योंकि निर्माता कंपनी, अधिकारी तथा ठेकेदार तो फ़िर भी कमाई कर लेते है|  आम जनता को जागरूक होकर निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सर्वहिताय के उद्देश्य से ही आन्दोलन करना चाहिए|  नकी किसी धार्मिक संगठन या राजनेता, पर्यावरणविद, ठेकदार, प्राइवेट कम्पनी के कहे अनुसार|   आप ने डॉ गोविन्द अगरवाल जी के अनशन का परिणाम तो देख ही लिया कि किस प्रकार जो जनता उनके समर्थन में साथ बैठी थी वह पाला बदल कर उनके विरोध में ऐसे खड़ी हो गयी कि डॉ. साहब को उत्तरकाशी में अपना अनशन छोड़कर भागना पड़ा|  यह सब ठेकेदारों और निर्माण कंपनियों के धन बल का ही परिणाम था या सचमुच जनता का विरोध इसका उत्तर तो शायद वहां पर मोजूद लोग ही दे पाएं|

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Joshi ji aapne bahut sahi baat kahi hai. Main aapki baaton se purnataya sahmat hun.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Joshi Ji,

I do endorse your views. Our state is called "Urja Pradesh" still there are a lot of villages where electrinity has not come.

People want to set up hydropject here and then sell the electricity in other areas after jeopordizing the life of people here.

सभी जल विद्युत् परियोजनाओं पर जनता के हित का कार्य कम और राजनीति अधिक हो रही है|  इसमें राजनेता ही नही तथाकथित पर्यावरणविद भी शामिल हैं, आन्दोलन करने वाले ये लोग तब कहाँ सो जाते है जब परियोजना की DPR बन रही होती है|  यह तभी सक्रिय होते हैं जब काम या तो आधा या पुरा हो चुका होता है, क्योंकी तब तक यह ठेकेदारों और निर्माण कंपनी से रकम ऐंठ चुके होते हैं|  फ़िर इनको अपने जनता के प्रति दायित्व का बोध होता है और ये आमरण अनशन या ऐसा ही कोई ढोंग शुरू कर देते हैं|   यह सब कोई अन्तराष्ट्रीय या राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने का एक अच्छा प्लेटफोर्म बन जाता है| आप ऐसे कितने पर्यावरणविदों का नाम ले सकते हैं जिनके कार्यों से जनता का सचमुच भला हुआ हो|  आम जनता जो इनके पीछे खड़ी होकर इनको प्रसिद्धि दिलाती हैं  बेचारी वही की वही रहती है|  राजनेताओं के चरित्र के बारे में कुछ कहना व्यर्थ है आम जनता सब कुछ जानती है पर मजबूर है कि निजी स्वार्थ वश इनको फ़िर भी झेल रही है, दूसरा कोई विकल्प जो नही है|
टेहरी बाँध इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जो खरबों रुपया खर्च होने, लाखो लोगों के विस्थापित होने तहत कई आन्दोलनों को झेलने के बावजूद आज तक अपनी पूरी क्षमता से उद्पादन नही कर पाया है|  निर्माण कार्य लटकने से परियोजना की लागत बढ़ जाती है जिससे गरीब जनता के अल्वावा किसी का नुक्सान नही होता क्योंकि निर्माता कंपनी, अधिकारी तथा ठेकेदार तो फ़िर भी कमाई कर लेते है|  आम जनता को जागरूक होकर निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सर्वहिताय के उद्देश्य से ही आन्दोलन करना चाहिए|  नकी किसी धार्मिक संगठन या राजनेता, पर्यावरणविद, ठेकदार, प्राइवेट कम्पनी के कहे अनुसार|   आप ने डॉ गोविन्द अगरवाल जी के अनशन का परिणाम तो देख ही लिया कि किस प्रकार जो जनता उनके समर्थन में साथ बैठी थी वह पाला बदल कर उनके विरोध में ऐसे खड़ी हो गयी कि डॉ. साहब को उत्तरकाशी में अपना अनशन छोड़कर भागना पड़ा|  यह सब ठेकेदारों और निर्माण कंपनियों के धन बल का ही परिणाम था या सचमुच जनता का विरोध इसका उत्तर तो शायद वहां पर मोजूद लोग ही दे पाएं|

 

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