Author Topic: Industrial Policy For Hills - पहाङी जिलों के लिये औद्योगिक नीति  (Read 5658 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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गौचर औद्योगिक मेले को देंगे भव्य स्वरूप: भटगाईं



एसडीएम आशीष भटगाई ने कहा कि प्रसिद्ध गौचर औद्योगिक मेले को इस बार भव्य रूप में आयोजित किये जाने के प्रयास जारी है। श्री भटगाई यहां आयोजित मेला समिति की तैयारी की समीक्षा बैठक ले रहे थे।

उन्होंने कहा कि मेले में निखार लाये जाने के लिए तमाम प्रस्तावों, विभागीय अधिकारियों व नामीगिरामी सांस्कृतिक संस्थाओं को आमंत्रित किया गया है।
मेले की छवि धूमिल न हो इसके लिए प्रशासन के साथ जनप्रतिनिधियों व जनता को सहयोग देना होगा। राइंका गौचर के सभागार में आयोजित तैयारी बैठक में यातायात, अनुशासन, शांति, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, स्वास्थ्य, पेयजल, विद्युत, मंच संचालन, प्रचार-प्रसार समिति की व्यवस्थाओं पर चर्चा करते हुए समिति संयोजकों व सदस्यों के विचार आमंत्रित किये गये।# बैठक में सदस्य कर्नल राजेन्द्र सिंह नेगी ने क्रास कंट्री रेस के प्रचार, सिताब सिंह कंडारी ने राईफल शूटिंग व्यवस्था, प्रकाश शैली ने अनुशासन, विजय प्रसाद डिमरी, डा.मोहन मिश्रा ने मेले में समाचार संकलन के लिए पत्रकारों को उचित व्यवस्था दिये जाने, नवीन टाकूली ने यातायात, बृजेन्द्र बिष्ट, ताजवर भंडारी, दलवीर कनवासी व गजेन्द्र नयाल ने कार्यक्रमों में प्रतिभाग करने वाले स्कूली बच्चों को प्रोत्साहन राशि के साथ प्रशस्ति पत्र देने,

 रंगकर्मी प्रदीप चौहान ने मेले में उत्तराखंड की संस्कृति पर आधारित शिक्षाप्रद कार्यक्रम रखे जाने, वरिष्ठ भाजपा नेता सुदर्शन भंडारी ने मंच संचालन में महिलाओं को प्रतिनिधित्व दिये जाने की बात कही। बैठक में कापरेटिव बैंक के निदेशक अनूप नेगी, गजेन्द्र नयाल, रणवीर चौधरी, आशीष जोशी, सुनील कुमार, प्रकाश शैली ने सुझाव रखते हुए मेले को भव्य बनाने को कहा।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5866214.html

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दम तोड़ गई उद्योगों को बढ़ाने की योजना

उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में रोजगार उपलब्ध कराने व उद्योगों को बढ़ावा देने की योजनाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। तीन दशक पूर्व कर्णप्रयाग में इसके तहत स्थापित एग्रो परिसर देखरेख के अभाव में खंडहर में तब्दील हो गया है। खास बात यह है कि अविभाजित यूपी के दौरान बना यह परिसर उत्तर प्रदेश सरकार की बेरुखी का शिकार तो हुआ ही, उत्तराखंड बनने के बाद भी यहां के नीति- नियंताओं ने इसकी सुध लेने की जहमत तक नहीं उठाई।

वर्ष 1974 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे बदरी- केदार विधानसभा के विधायक नरेन्द्र सिंह भंडारी ने पहाड़ी क्षेत्रों में एग्रो फैक्ट्री के माध्यम से स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए इस फैक्ट्री की नींव रखी थी। 24 नाली छह मुट्ठी भूमि में स्थापित इस फैक्ट्री के बेहतर काम को देखते हुए 10 अप्रैल 1976 को पर्वतीय विकास मंत्री श्री भडारी ने यहां मशीनी कार्यशाला का भी उद्घाटन किया गया।

 इसके बाद फैक्ट्री का कारोबार दिनों-दिन बढ़ता चला गया और यहां डेढ़ दर्जन स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला। ग्यारह वर्षो तक ठीक चलने के बाद वर्ष 1985 से फैक्ट्री में काम ढीला पड़ने लगा और नीति नियंताओं की बेरुखी के चलते वर्ष 1991 तक यह पूर्ण रूप से बंद हो गया। फैक्ट्री बंद होने के बाद संचालकों ने अब इसे वेडिंग प्वाइंट का रूप दे दिया है।

 उल्लेखनीय है कि इस परिसर को वर्ष 2004 में राज्य मंडी परिसर को इस उम्मीद से सौंपा गया था कि बंजर पड़े उद्योग को पुनर्जीवित कर बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा, लेकिन इसका भी खास असर नहीं हुआ। आज आलम यह है कि एग्रो परिसर खंडहर में तब्दील होता जा रहा है।दूसरी ओर, स्थानीय लोगों का कहना है कि जनपद का केंद्र बिंदु होने के कारण एग्रो परिसर को नगदी फसल के क्रय केन्द्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

काश्तकारों की तैयार फल, सब्जी सहित राजमा, चौलाई, आलू आदि नगदी फसल इस केन्द्र पर सरकारी व विभिन्न गैर सरकारी संगठनों द्वारा खरीदी जाएं, जिससे काश्तकारों को उपज का वास्तविक मूल्य मिल सके। वर्तमान में उद्योग परिसर की देखभाल कर रहे विभागीय कर्मचारी चतुरा प्रसाद थपलियाल ने बताया कि शुरुआती दौर में यहां कृषि यंत्रों का निर्माण व लकड़ी की चिराई कर फर्नीचर आदि तैयार किए जाते थे।

यहीं काम करते हुए अपने दाएं हाथ की एक अंगुली गंवा चुके थपलियाल के चेहरे की लकीरें बंजर पड़े इस उद्योग की पीड़ा बयां करती हैं। उनका कहना है कि देखरेख के अभाव में उद्योग की भूमि पर अब अतिक्रमणकारियो ने भी हाथ बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने बताया कि इसकी सूचना समय-समय पर विभागीय अधिकारियों व स्थानीय प्रशासन को दी जा रहीं है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही। ऐसे में अतिक्रमण करने वालों के हौसले बुलंद हैं।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5868844.html

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औध्योगिक अवस्थापना सुविधाएँ

 १-राज्य में एकल खिड़की सुविधा उपलब्ध कराना जिसे स्विकिरती की औपचारिकताओं में लगने वाले समय की बचत की जा सके तथा निवेशको हेतु मैत्रिपूरण वातावरण तैयार किया जा सके !

२-औधोगिक इकाइयों एवं अवस्थापना परियोजनाओं हेतु त्वरित गति से भूमि उपलब्ध कराना !

३-उद्योगों को उच्च गुन्वाताता वाली विश्वसनीय निर्बाधित एवं उचित मूल्य पर ऊर्जा उपलब्ध कराना !

४-श्रम कानूनों व इसकी प्रकिर्या को वर्तमान समय की आवश्यकतानुसार सरल तथा सुसंगत बनाना जिसमें शर्मिकों को राज्य की आर्थिक सम्पन्नता में उचित भागीदारी प्राप्त हो सके !

५-नए उद्योगों की स्थापना अथवा स्थापित उद्योगों के विस्तारीकरण एवं आधुनिकीकरण हेतु करी क्रय किये जाने वाले सयंत्रों एवं मशीनों पर प्रवेश कर में छूट !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड को अभी भी नई औद्योगिक नीति का इंतजार[/t][/t]
शिशिर प्रशांत / देहरादून May 03, 2011[/t][/t]
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पिछले साल उत्तराखंड की औद्योगिक नीति की अवधि समाप्त हो गई है, लेकिन सरकार अभी भी नई नीति पेश करने की जल्दबाजी में नहीं है।

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड ने 2003 में औद्योगिक नीति बनाई थी। इसमें औद्योगिक पैकेज के अलावा केंद्र सरकार की ओर से करों में छूट भी दी गई थी। इसमें उत्पाद शुल्क में संपूर्ण छूट दी गई थी, जिसकी अवधि पिछले साल खत्म हो गई।

उसके बाद से सरकार ने बदले हुए आर्थिक परिदृश्य को देखते हुए नई औद्योगिक नीति बनाने की दिशा में कोई ठोस काम नहीं किया। केंद्रीय उत्पाद शुल्क में छूट की वजह से पिछले 5-7 साल के दौरान राज्य की औद्योगिक वृद्धि दर अच्छी रही है।

कई औद्योगिक संगठनों के साथ ही राज्य की राज्यपाल माग्र्रेट अल्वा ने राज्य सरकार को बदले हुए माहौल के मुताबिक नई औद्योगिक नीति पेश करने की सलाह दी। इंडस्ट्रीज एसोसिएशन आफ उत्तराखंड (आईएयू) के अध्यक्ष पंकज गुप्ता ने कहा, 'पिछले कुछ साल से राज्य में औद्योगिक वृद्धि की रफ्तार अच्छी रही है। इसे बरकरार रखने के लिए सरकार को निश्चित रूप से एक कार्य योजना पेश करनी चाहिए।'

हालांकि इस बीच राज्य सरकार ने औद्योगिक प्रगति की रफ्तार को गति देने की कोशिश के रूप में 2008 में उद्योगों को कई तरह की छूट देने की पेशकश की। हालांकि इसका कोई खास असर नहीं हुआ। प्रमुख कंपनियों ने पहाड़ी राज्य में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। ऐसे में जानकारों ने सलाह दी है कि 2008 की हिल डेवलपमेंट पॉलिसी पर सरकार को फिर से विचार करना चाहिए।

यहां तक कि पंत नगर जैसे औद्योगिक इलाकों में भी औद्योगिक विकास में ठहराव है और कई प्लॉट खाली पड़े हैं। स्टेट इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन आफ उत्तराखंड लिमिटेड (सिडकुल) के एक अधिकारी ने कहा, 'हमारे औद्योगिक इलाकों में अभी भी खाली प्लॉट पड़े हैं, जिनके लिए खरीदार नहीं मिल रहे हैं।'

2009 के बाद से पहाड़ी राज्य में निवेश करने में उद्योग दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का कहना है कि 56,000 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्ताव सिर्फ इसलिए रुका हुआ है, क्योंकि उत्पाद शुल्क में छूट की अवधि पूरी हो चुकी है। पिछले 1 साल से सरकार देखो और इंतजार करो की नीति अपना रही है। लेकिन केंद्र की ओर से कोई सकारात्मक संकेत न मिलने की वजह से सरकार नई औद्योगिक नीति पर विचार कर रही है। नई औद्योगिक नीति के बारे में पूछे जाने पर राज्य के उद्योग मंत्री बंशीधर भगत ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, 'अब देखते हैं कि किस तरह इसे किया जाता है।'
 
 
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=46676

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड की नयी औद्योगिक नीति
                                                                                   -प्रस्तावक:  डा .बलबीर सिंह रावत

किसी भी प्रदेश के विकास के लिए उद्द्योग और कृषि दो प्रमुख क्षेत्र हैं जिन को संतुलित महत्व देना आवश्यक है। उत्तराखंड के परिपेक्ष में औद्योगिक विकास ही वोह प्रयास  है जिस से अधिक आशा है और सही औद्योगीकरण से इस उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। उत्तराखंड ऐसा प्रदेश है जिसमें अधिकांस भाग पर्वतीय है . और पर्वतीय भाग में मैदानी उद्द्योग विकास नीति से सिडकुल और बड़े बड़े कल कारखाने नहीं लगाये जा सकते।  मैदानी भागो के उद्द्योग केवल नौकरी देते हैं, और वोह भी कानून के जोर से की एक निश्चित प्रतिशत जगहें उत्तराखंडियों को ही दी जांय। इस से पर्वतीय  क्षेत्रों से पलायन बढ़ता जा रहा है। कच्चा माल अधिकतर बाहर से आता है, उत्पादन कर केन्द्रीय सरकार ले जाती है। तो उत्तराखंड के हिस्से में क्या आता है? पर्वतीय क्षेत्रों में नाना प्रकार के कच्चे माल हैं, विशिष्ट प्रकार की कृषि और प्राकृतिक उपजें हैं,  असीमित मात्रा में काष्ट है, विश्व प्रसिद्ध मंदिर हैं, जलवायु है, अत्यंत प्रभावशाली और आकर्षक द्र्श्यावालियाँ हैं। स्वास्थ्य वर्धक आबोहवा है। लगनशील मानव संसाधन है , सड़कों का जाल है , बिजली बना सकने की असीमित संभावनाएं हैं।  और इन्ही के बूते पर  और इन्ही के गलत दोहन और पर्वतीय मानव संसाधन की अव्ह्व्लना के कारण पलायन करने की विवशता की मार न झेल पाने के कारण ही तो प्रथक राज्य का सफल आन्दोलन चला था। राज्य बन गया, 12 साल हो गए। पर्वतीय विकास में औद्योगिकीकरण को नकारा ही गया है क्यों हुआ ऐसा, क्यों हमारे अपने ही नेता , मंत्री  , सब वही देसी मॉडल के पीछे भाग रहे हैं? क्यों का उत्तर आप ढूँढिये । मेरे निम्न सुझाव है:- 1- हर ब्लोक स्तर पर , जहां सबसे सुगम और सुविधाजनक हो, एक औद्योगिक केंद्र बने जहा से घर घर तक कुटीर उद्द्योग के प्रशिक्षण, उत्पादन  और संकलन की व्यवस्था हो हो। 2- प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षक प्रशिक्षण केंद्र और , हो सके तो एक वोकेशनल हांई स्कूल भी हो जिसमे इच्छुक जूनियर हाई स्कूल पास विद्यार्थी पढ़ सकें,हो , यही पर महिला उद्योग प्रशिक्षण की सचल व्यवस्था भी हो जो उन्हें मशीनो से आकर्षक  डिजाइनों वाली बुनाई कढाई सिखा सके, स्थानीय कच्चे मालों से प्रयट्टकों के और अन्य बाजारों के लिए हाथों हाथ बिक सकने वाली वस्तुएं बना सकें। उद्देश्य होना चाहिए की प्रति परिवार सालाना आय 100,000 रुपये के स्तर से ऊपर जा सके।  तभी पलायन रुकेगा और राज्य बनाने का सपना पूरा होगा। 3- प्रशिक्षण, टेक्नोलोजी के लिए अवकास प्राप्त विशेषज्ञों की सेवा ली जा सकती है और  देश के नामी गरामी संस्थानों से सहभागिता की जा सकती है।  4- इसी प्रकार लघु उद्द्योग भी गाडी सड़कों के साथ साथ यथोचित स्थानों में , स्थानों की विशिष्टताओं के अनुरूप लगाए जा सकते हैं, जिनमे  हर वोह उद्द्योग लग सकता है जिसका कच्चा मॉल आस पास बहुलता में उपलब्ध है या कराया जा सकता है 5- जल विद्युत् के छोटे छोटे स्टेशन हर नदी पर, 3-4 गाँव के समूह के लिए , 10-10 या 15-15 किलोमीटर की दूरी पर लगाए जा सकते हैं, जिससे कुटीर  और लघु उद्द्योगों को पावर दी जा सकती है, यह 60% गाँव के लिए और 40% प्रदेश के लिए के नियम से होना चाहिए। 6- धार्मिक प्रयट्टन के साथ रास्ते के अन्य मंदिर, दर्शनीय स्थल, और सांस्कृतिक कार्यक्रम को भी जोड़ने से इस उद्द्योग को बढ़ावा मिल सकता है।7- अन्य प्रयट्टनो को मेलों, खेलकूद प्रतियोगिताओं, फेस्तीव्लों  और फल मौसम में "तोड़ो खरीदो" के तथा अन्य आकर्षणों से समर्द्ध किया जा सकता है। 8- काष्ठ उद्द्योग की अपार सम्भावनाये हैं, बशर्ते कि नयी औद्योगिक नीति में काष्ठ प्रसंस्करण से ले कर नौक्ड  डाउन रूप में बिभिन्न प्रकार के फर्नीचर बनाने के कारखाने, लकड़ी बहाव वाले नदी किनारों में लगाए जा सकें . यह बिलकुल नया क्षेत्र है उत्तराखंड के लिए और इसमें देहरादून के बन अनुसंधान संस्थान में एक वुड तेक्नोलोजी का , W. Tech डिग्री स्तर की पढाई का प्रबंध किया जा सकता है। और कई कोर्स चलाये जा सकते हैं। 9- आवश्यकता है गम्भीर्ता से पर्वतीय औद्योगिकीकरण की नीति बनाने की और उसमे सम्बंधित  बैज्ञानिको , विशेशाग्याओं की सलाहकार समितियां बना कर  उनसे मार्गदर्शन लेने की, अकेले राजनीतिज्ञ और नौकरशाह यह काम नही कर सकते क्योंकि वे किन्ही दुसरे क्षेत्रों के विशेषग्य है . 10- पर्वतीय औद्योगिकीकरण एक महा अभियान है और इसमें जिससे जितना योगदन हो सकता उसका स्वागत और समावेश होने से ही उद्द्येश्य  की पूर्ती होगी , केवल प्रतीतात्मक विकास का कुअसर सब जगह नजर आ रहा है। आगामी  5 सालों में नयी पर्वतीय विकास नीति का सुप्रभाव हर गाव मे नजर आएगा तो हे नीति को सफल माना जाएगा।              डा। बलबीर सिंह रावत।

 

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