Author Topic: Reconsidering Delimitation - उत्तराखंड में परिसीमन पर फिर से हो विचार  (Read 18604 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Mahar Ji,

This is highly irregular.. Govt should short the Legislative Assembly Seats like this.


नये परिसीमन के लागू होने से पर्वतीय जनपदों के निम्न विधान सभा क्षेत्र कम हो जायेंगे
१- जिला चमोली से एक सीट (नन्दप्रयाग)
२- पौड़ी गढ़्वाल से दो सीटें (१- धूमाकोट २- बीरोंखाल)
३- पिथौरागढ़ से एक सीट (कनालीछीना)
४- बागेश्वर से एक सीट (कांडा)
५- अल्मोड़ा से एक सीट (भिकियासैंण)
पर्वतीय जनपदों से कुल ६ (छ्ह) सीटें कम होंगी, जो मैदानी जनपदों में जोड़ी जायेंगी निम्नानुसार-
१- देहरादून जनपद में एक सीट
२- हरिद्वार जनपद में दो सीट
३- नैनीताल जनपद में एक सीट
४- उधम सिंह नगर जनपद में दो सीट

शेष टिहरी, चम्पावत, रुद्रप्रयाग तथा उत्तरकाशी जनपदों में विधान सभा क्षेत्र यथावत रखे गये हैं।


पंकज सिंह महर

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परिसीमन के लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों जिम्मेदार: लोकवाहिनी Jan 24, 03:05 am

अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड लोकवाहिनी के केन्द्रीय अध्यक्ष ने नए परिसीमन के लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय दलों को बराबर का दोषी करार दिया है। वाहिनी के अध्यक्ष डा.शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा यह परिसीमन पहाड़ की पहचान को मिटाने वाला साबित होगा। इसके लिए उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा क्षेत्रीय दल भी कम जिम्मेदार नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार सत्ता की चमक से वह भाजपा का पिछलग्गू बन गया है, उससे उत्तराखण्ड हित की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

डा.बिष्ट ने कहा है कि उत्तराखण्ड क्रांतिदल जिस पर व्यापक जनता ने विश्वास किया है, उसने वह सारा विश्वास भाजपा की गोद में बैठकर खो दिया है। अपनी किरकिरी बचाने के उक्रांद परिसीमन के लिए अब भले ही कितने बड़े आंदोलन की बात कहे, लोग उनके आंदोलन से जुड़ने वाले नहीं है। उन्होंने कहा है कि उत्तराखण्ड की पहाड़ी पहचान को नष्ट करने में सबसे बड़ी भूमिका उक्रांद ने निभाई है।

डा.बिष्ट का कहना है कि भाजपा के आला लीडरान ने उत्तराखण्ड राज्य के प्रमुख विरोधियों के दबाव में आकर हरिद्वार को उत्तराखण्ड से मिलाया। उनका कहना है कि हरिद्वार का उत्तराखण्ड में मिलना हितकर नहीं हुआ है। डा.बिष्ट ने तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश राज्यों में शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके विरोध के चलते वहां परिसीमन नहीं हो सका। वहीं दूसरी ओर जनसंख्या का बहाना बनाकर उत्तराखण्ड में नया परिसीमन लागू कर दिया गया।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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m
परिसीमन के लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों जिम्मेदार: लोकवाहिनी Jan 24, 03:05 am

अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड लोकवाहिनी के केन्द्रीय अध्यक्ष ने नए परिसीमन के लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय दलों को बराबर का दोषी करार दिया है। वाहिनी के अध्यक्ष डा.शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा यह परिसीमन पहाड़ की पहचान को मिटाने वाला साबित होगा। इसके लिए उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा क्षेत्रीय दल भी कम जिम्मेदार नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार सत्ता की चमक से वह भाजपा का पिछलग्गू बन गया है, उससे उत्तराखण्ड हित की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

डा.बिष्ट ने कहा है कि उत्तराखण्ड क्रांतिदल जिस पर व्यापक जनता ने विश्वास किया है, उसने वह सारा विश्वास भाजपा की गोद में बैठकर खो दिया है। अपनी किरकिरी बचाने के उक्रांद परिसीमन के लिए अब भले ही कितने बड़े आंदोलन की बात कहे, लोग उनके आंदोलन से जुड़ने वाले नहीं है। उन्होंने कहा है कि उत्तराखण्ड की पहाड़ी पहचान को नष्ट करने में सबसे बड़ी भूमिका उक्रांद ने निभाई है।

डा.बिष्ट का कहना है कि भाजपा के आला लीडरान ने उत्तराखण्ड राज्य के प्रमुख विरोधियों के दबाव में आकर हरिद्वार को उत्तराखण्ड से मिलाया। उनका कहना है कि हरिद्वार का उत्तराखण्ड में मिलना हितकर नहीं हुआ है। डा.बिष्ट ने तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश राज्यों में शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके विरोध के चलते वहां परिसीमन नहीं हो सका। वहीं दूसरी ओर जनसंख्या का बहाना बनाकर उत्तराखण्ड में नया परिसीमन लागू कर दिया गया।


Mahar Ji,

I have actually not completly understood on this.. I don't know whether the ruling party has proposed for this or there is any instructions from Centre.

If Govt has been proposed this, i feel this is quite objecationable.


परिसीमन के लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों जिम्मेदार: लोकवाहिनी Jan 24, 03:05 am

अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड लोकवाहिनी के केन्द्रीय अध्यक्ष ने नए परिसीमन के लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय दलों को बराबर का दोषी करार दिया है। वाहिनी के अध्यक्ष डा.शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा यह परिसीमन पहाड़ की पहचान को मिटाने वाला साबित होगा। इसके लिए उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा क्षेत्रीय दल भी कम जिम्मेदार नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार सत्ता की चमक से वह भाजपा का पिछलग्गू बन गया है, उससे उत्तराखण्ड हित की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

डा.बिष्ट ने कहा है कि उत्तराखण्ड क्रांतिदल जिस पर व्यापक जनता ने विश्वास किया है, उसने वह सारा विश्वास भाजपा की गोद में बैठकर खो दिया है। अपनी किरकिरी बचाने के उक्रांद परिसीमन के लिए अब भले ही कितने बड़े आंदोलन की बात कहे, लोग उनके आंदोलन से जुड़ने वाले नहीं है। उन्होंने कहा है कि उत्तराखण्ड की पहाड़ी पहचान को नष्ट करने में सबसे बड़ी भूमिका उक्रांद ने निभाई है।

डा.बिष्ट का कहना है कि भाजपा के आला लीडरान ने उत्तराखण्ड राज्य के प्रमुख विरोधियों के दबाव में आकर हरिद्वार को उत्तराखण्ड से मिलाया। उनका कहना है कि हरिद्वार का उत्तराखण्ड में मिलना हितकर नहीं हुआ है। डा.बिष्ट ने तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश राज्यों में शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके विरोध के चलते वहां परिसीमन नहीं हो सका। वहीं दूसरी ओर जनसंख्या का बहाना बनाकर उत्तराखण्ड में नया परिसीमन लागू कर दिया गया।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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पंकज सिंह महर

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परिसीमन का विरोध करते लोग

पंकज सिंह महर

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साथियो,
        उत्तराखण्ड में विधान सभा क्षेत्रों का परिसीमन २००१ में वर्ष १९७१ की जनगणना के आधार पर किया गया था। इसी परिसीमन में उत्तराखण्ड के साथ न्याय नहीं हो पा रहा था, रुद्रप्रयाग और चम्पावत जैसे दुर्गम इलाकों में १ लाख १४ हजार की आबादी पर विधान सभा क्षेत्र बनाये गये, वहीं देहरादून में ४९ हजार की आबादी पर एक विधायक बना दिया गया। हरिद्वार जनपद में जहां हर १६ किलोमीटर पर एक विधायक है वहीं पर्वतीय जनपदों में १३५ किलोमीटर पर एक विधायक है। हरिद्वार का विधायक एक ही दिन में अपने क्षेत्र का दो बार भ्रमण कर सकता है, वहीं धार्चूला का विधायक जिसका क्षेत्र जौलजीबी से शुरू होकर चीन बार्डर तक है, उसे १३५ किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। जिसमें ४० किलोमीटर ही सड़क मार्ग है, शेष ९५ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। १० हजार फीट की ऊंचाई पर चीन सीमा से लगी जोहार, व्यांस और दारमा वैली की ४०० किलोमीटर की दूरी तय कर पाना क्या किसी चुनौती से कम है, आज फिर से परिसीमन करके उस क्षेत्र को और बढा दिया जायेगा।
         मैदानी जिले में २६१ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक विधायक है, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में इससे १० गुना करीब २६४८ वर्ग किलोमीटर पर एक विधायक है। साफ है कि पहाड़ों की विषम भौगोलिक स्थिति और वहां पर संचार, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, उसके आधार पर यह परिसीमन कैसे हमें मान्य हो सकता है। विधायक निधि को ही देखा जाय तो वर्तमान में जो परिसीमन लागू किया जा रहा है, उससे ही पर्वतीय क्षेत्रों का प्रतिवर्ष ९.०० करोड़ रूपया विधायक निधि का ही कम हो गया है। आंकड़ों को देखा जाय तो मैदानी क्षेत्रों में जनसंख्या के प्रतिशत में लगातार वृद्दि हुई और पर्वतीय क्षेत्रों में यह आंकड़ा लगातार घट रहा है, रोजगार के लिये पलायन करना हमारी मजबूरी है।
          संविधान के अनुच्छेद ८१ एव ८२ में प्रावधान है कि प्रत्येक जनगणना के बाद विधान सभा और लोक सभा क्षेत्रों का परिसीमन किया जाय तथा ८४ वें संशोधन के अनुसार में १९७१ की जनगणना के आधार पर हुये परिसीमन को २००१ तक व १९९१ की जनसंख्या के आधार पर हुये परिसीमन को २०२६ तक परिसीमित मान लिया गया। संविधान के ८४ वें सशोधन में यह व्यवस्था की गई थी कि राज्य के निर्वाचन क्षेत्रों को १९७१ की जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन सीटों का आवंटन किया जायेगा और इसके बाद २००१ की जनगणना के आधार पर फिर समायोजित किया जायेगा। इस प्रकार प्रस्तावित परिसीमन दो वर्षो १९७१ और २००१ की जनसंख्या के आधार पर किया गया था, न कि २००१ की गणना पर। इसमें यह भी व्यवस्था थी कि जिन राज्योम में १९७१ की जनगणना के चाधार पर परिसीमन हो गया है, वहां २०२६ तक परिसीमन की आवश्यकता नहीं है। चूंकि उत्तराखण्ड में १९७१ की गणना के आधार पर परिसीमन किया जा चुका था, तो इसे इस परिसीमन से अलग रखा जाना चाहिये था।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Uttarakhand sore with delimitation

Swati R Sharma
DEHRADUN, Jan. 29: The redefining of Assembly and Lok Sabha constituencies in the recent delimitation process has affected the political fate of many Uttarakhand stalwarts.
From state Congress president Mr Yashpal Arya to its former chief Mr Harish Rawat and state BJP president Mr Bachi Singh Rawat to chief minister Maj-Gen BC Khanduri, all of them would have to redefine their individual political work areas.
With this delimitation, six Assembly constituencies of Dhumakot, Kanalichina, Bironkhal, Kanda, Bhikiasain and Nandprayag of Almora, Pauri, Bageshwar, Chamoli and Pithoragarh districts would cease to exist.
An equal number of new constituencies would be added to the plain districts of Hardwar, Nainital, Dehradun and US Nagar. The Lok Sabha constituencies have also undergone a drastic change.The situation has put at stake the political fate of many senior leaders of the hill state.
The Dhumakot Assembly seat is being represented by Maj-Gen Khanduri. For another stint at the Assembly, the chief minister would have to look for another seat.
Same would be the case with the senior Uttarakhand Kranti Dal leader Mr Kashi Singh Aery , who would have to look for another seat after losing the Kanalichina seat from where he had been contesting.
Former state minister Mrs Amrita Rawat had been representing the Bironkhal seat in the Assembly for the second time. It is called her husband, Mr Harish Rawat’s citadel. But she would also have to look for another seat and generate a new mass following.
Mr Arya would also be in trouble. He contests elections from the Mukteshwar seat, which is reserved but after the delimitation, the seat would lose the reserved status. Mr Arya may not be able to get an easy win. The Almora Lok Sabha seat represented by Mr Bachi Singh Rawat for three consecutive times would be a reserved seat. This seat is also the political battlefield of Congress leader Mr Harish Rawat who had represented it thrice. The arch rivals would have to scout around for another constituency after the delimitation.The Hardwar Lok Sabha seat, at present reserved, would be a general seat and put at stake the political claim of the Samajwadi Party state president Mr Amrish Kumar.
The delimitation is affecting almost every leading political party. From time to time, the UKD and the Congress have opposed it. Even the BJP is unhappy and the chief minister had said that he would pursue the case with the Centre and request it to maintain status quo.


हेम पन्त

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Mrs Amrita Rawat is wife of Satpal Maharaj not Harish Rawat's - Reporter has to work hard on her GK
Uttarakhand sore with delimitation

Swati R Sharma
DEHRADUN, Jan. 29: The redefining of Assembly and Lok Sabha constituencies in the recent delimitation process has affected the political fate of many Uttarakhand stalwarts.
From state Congress president Mr Yashpal Arya to its former chief Mr Harish Rawat and state BJP president Mr Bachi Singh Rawat to chief minister Maj-Gen BC Khanduri, all of them would have to redefine their individual political work areas.
With this delimitation, six Assembly constituencies of Dhumakot, Kanalichina, Bironkhal, Kanda, Bhikiasain and Nandprayag of Almora, Pauri, Bageshwar, Chamoli and Pithoragarh districts would cease to exist.
An equal number of new constituencies would be added to the plain districts of Hardwar, Nainital, Dehradun and US Nagar. The Lok Sabha constituencies have also undergone a drastic change.The situation has put at stake the political fate of many senior leaders of the hill state.
The Dhumakot Assembly seat is being represented by Maj-Gen Khanduri. For another stint at the Assembly, the chief minister would have to look for another seat.
Same would be the case with the senior Uttarakhand Kranti Dal leader Mr Kashi Singh Aery , who would have to look for another seat after losing the Kanalichina seat from where he had been contesting.
Former state minister Mrs Amrita Rawat had been representing the Bironkhal seat in the Assembly for the second time. It is called her husband, Mr Harish Rawat’s citadel. But she would also have to look for another seat and generate a new mass following.**
Mr Arya would also be in trouble. He contests elections from the Mukteshwar seat, which is reserved but after the delimitation, the seat would lose the reserved status. Mr Arya may not be able to get an easy win. The Almora Lok Sabha seat represented by Mr Bachi Singh Rawat for three consecutive times would be a reserved seat. This seat is also the political battlefield of Congress leader Mr Harish Rawat who had represented it thrice. The arch rivals would have to scout around for another constituency after the delimitation.The Hardwar Lok Sabha seat, at present reserved, would be a general seat and put at stake the political claim of the Samajwadi Party state president Mr Amrish Kumar.
The delimitation is affecting almost every leading political party. From time to time, the UKD and the Congress have opposed it. Even the BJP is unhappy and the chief minister had said that he would pursue the case with the Centre and request it to maintain status quo.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Sahi pakda hem da aapne..Even i could not notice this.


Mrs Amrita Rawat is wife of Satpal Maharaj not Harish Rawat's - Reporter has to work hard on her GK
Uttarakhand sore with delimitation

Swati R Sharma
DEHRADUN, Jan. 29: The redefining of Assembly and Lok Sabha constituencies in the recent delimitation process has affected the political fate of many Uttarakhand stalwarts.
From state Congress president Mr Yashpal Arya to its former chief Mr Harish Rawat and state BJP president Mr Bachi Singh Rawat to chief minister Maj-Gen BC Khanduri, all of them would have to redefine their individual political work areas.
With this delimitation, six Assembly constituencies of Dhumakot, Kanalichina, Bironkhal, Kanda, Bhikiasain and Nandprayag of Almora, Pauri, Bageshwar, Chamoli and Pithoragarh districts would cease to exist.
An equal number of new constituencies would be added to the plain districts of Hardwar, Nainital, Dehradun and US Nagar. The Lok Sabha constituencies have also undergone a drastic change.The situation has put at stake the political fate of many senior leaders of the hill state.
The Dhumakot Assembly seat is being represented by Maj-Gen Khanduri. For another stint at the Assembly, the chief minister would have to look for another seat.
Same would be the case with the senior Uttarakhand Kranti Dal leader Mr Kashi Singh Aery , who would have to look for another seat after losing the Kanalichina seat from where he had been contesting.
Former state minister Mrs Amrita Rawat had been representing the Bironkhal seat in the Assembly for the second time. It is called her husband, Mr Harish Rawat’s citadel. But she would also have to look for another seat and generate a new mass following.**
Mr Arya would also be in trouble. He contests elections from the Mukteshwar seat, which is reserved but after the delimitation, the seat would lose the reserved status. Mr Arya may not be able to get an easy win. The Almora Lok Sabha seat represented by Mr Bachi Singh Rawat for three consecutive times would be a reserved seat. This seat is also the political battlefield of Congress leader Mr Harish Rawat who had represented it thrice. The arch rivals would have to scout around for another constituency after the delimitation.The Hardwar Lok Sabha seat, at present reserved, would be a general seat and put at stake the political claim of the Samajwadi Party state president Mr Amrish Kumar.
The delimitation is affecting almost every leading political party. From time to time, the UKD and the Congress have opposed it. Even the BJP is unhappy and the chief minister had said that he would pursue the case with the Centre and request it to maintain status quo.


पंकज सिंह महर

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Pioneer: Delimitation of seats a major issue

It may sound incredible but the delimitation of seats for future elections is turning into a major issue in the present poll. The recent notification of seats by the Delimitation Commission, which would come into force from the next Lok Sabha and the 2012 Assembly elections, threatens to end the dominance of the hills in the Uttarakhand Vidhan Sabha.

This change would be monumental as the BJP was punished in 2002 for foisting Nityanand Swami, a maidani (of the plains ), as the first Chief Minister of the hill State. Today the Uttarakhand Kranti Dal, which spearheaded the agitation for the creation of a separate hill State, stand to be marginalised.

The Uttarakhand area sent 22 MLAs to the Uttar Pradesh Assembly. In 2001 when the boundaries of the constituencies were redrawn, the 1971 census figures were considered. This gave the hills 57 of the 70 seats. The present delimitation has been done on the basis of the 2001 census. This seeks to give 30 seats to the plains and the terai region. What does it mean politically? Parties like the BSP, which had made inroads in 2002 winning five Assembly seats, would increase their presence. On the other hand, the Uttarakhand Kranti Dal could cease to exist with several hill constituencies including Kanalichhina, held by its president Kashi Singh Airy, set to be wiped off the political map.

The divide in Uttarakhand was always thought to be between the Garhwal and Kumaon regions. The Delimitation Commission would create a third distinct bloc, which given its relative affluence would marshal the politics of Uttarakhand. A survey published in a prominent daily from Dehradun mirrored the divide effectively by showing the regional differences in the preference for the Chief Minister. In the Garhwal region, BJP MP and former Union Minister BC Khanduri emerged as the favourite garnering 39.21% preferences compared to Uttarakhand Congress president Harish Rawat (21.19%) and incumbent Chief Minister ND Tiwari (14.49%).

In Kumaon, Rawat and State BJP president Bhagat Singh Koshiyari emerged as close contenders getting 36% and 33% preferences respectively. The performance of both Tiwari and Khanduri was abysmal in the region. In the plains, however, both performed creditably with Tiwari topping with 39.46% preferences compared to Khanduri’s 25%.

“The figures show that the insulation of the people of the isolated hill areas has increased. While Khanduri has acceptability in Garhwal for the several road projects he commissioned as a Minister in the NDA Government, Tiwari is held responsible for restricting development to the industrial estates of Hardwar and Uddham Singh Nagar,” says Hari Raj Singh, a consultant with a World Bank project. Development in Uttarakhand is seen not to have benefited the hill people. The entrepreneurs who were encouraged to set-up projects by State Industrial Development Corporation of Uttaranchal (SIDCUL) are seen as poachers of the State’s wealth. “Unfortunately, the word SIDCUL today has evil connotations,” adds Singh.

The BJP is quiet on the issue as of now. With the increase of seats in the plains they, however, have an opportunity. It would create a typical western UP kind of political equation given the large Muslim presence in Hardwar, Roorkee and the Kumaon terai areas of Uddham Singh Nagar district.

The BSP in 2002 encashed this Muslim presence by fielding candidates from the minority community. It is trying to repeat it this time around too. The BJP has emerged as their main challenger. It’s no surprise that Gujarat Chief Minister Narendra Modi has had the biggest draw in the political meetings in the Hardwar region. As for the Congress, its leaders are already talking in the terms of forming a coalition Government with BSP support, after the results are announced on February 28.

 

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