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Do you feel that the Capital of Uttarakhand should be shifted Gairsain ?

Yes
97 (70.8%)
No
26 (19%)
Yes But at later stage
9 (6.6%)
Can't say
5 (3.6%)

Total Members Voted: 136

Voting closes: March 21, 2024, 12:04:57 PM

Author Topic: Should Gairsain Be Capital? - क्या उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण होनी चाहिए?  (Read 172683 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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बागेश्वर : गैरसैण में राजधानी का शिलान्यास करने के बाद कांग्रेस द्वारा बागनाथ से जागनाथ तक निकाली जा रही आभार रैली के बाद गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने की सुगबुगाहट हो रही है। रैली में विस अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल सहित मौजूद जनप्रतिनिधियों ने भी यही संकेत दिये कि गैरसैण को जल्दी ही स्थायी राजधानी का दर्जा मिलेगा। रैली के बाद जागरण ने कुछ राज्य आंदोनलकारियों से बातचीत की तो सभी ने गैरसैण को ही स्थायी राजधानी बनाने की मांग की। फोटो 15 परिचय- गुसाई सिंह दफौटी  उत्तराखंड राज्य के निर्माण के साथ ही गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग के लिए भी जनता ने बड़ी लड़ाई लड़ी है। कुर्बानियां दी हैं। राज्य गठन के दौरान ही यदि तत्कालीन केंद्र सरकार ने स्थायी राजधानी भी गैरसैण घोषित कर दी होती हो आज जनता में निराशा नहीं होती साथ ही एक नये आंदोलन की सुगबुगाहट नहीं होती। कांग्रेस यदि ईमानदारी से गैरसैण राजधानी के प्रयास कर रही है तो यह सराहनीय है।  गुसाई सिंह दफौटी, राज्य आंदोलनकारी फाटो 16 हीराबल्लभ भट्ट  गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने के पक्ष में राज्य की 65 प्रतिशत जनता ने अपना मत दिया है। उसके बाद भी आज तक की सरकारों ने गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने का साहस नहीं जुटाया है। कांग्रेस ने शिलान्यास तो कर दिया है लेकिन स्थायी राजधानी बनेगी या नहीं यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। यदि गैरसैण स्थायी राजधानी बनती है तो यह लाखों उत्तराखंडियों सहित शहीदों का सम्मान होगा।      हीराबल्लभ भट्ट, राज्य आंदोलनकारी फोटो 17 परिचय- महेश परिहार  गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने के लिए राज्य की जनता ने शहादत दी है। विगत 12 साल से सरकारों ने इस मुद्दे को नेपथ्य में डालने के सिवाय कुछ नहीं किया। इस बार गैरसैण में शिलान्यास करने के बाद जनता में उम्मीद जगी है लेकिन कांग्रेस की रैली की सार्थकता तभी है जब वह गैरसैण में स्थायी राजधानी बनाये। तभी वह आभार रैली की हकदार है। महेश परिहार, राज्य आंदोलनकारी फोटो 18 परिचय- जगत सिंह खेतवाल  जनता ने पृथक राज्य के साथ ही गैरसैण स्थायी राजधानी भी मांगी थी लेकिन दुर्भाग्य है कि जनता को राज्य तो मिल गया लेकिन स्थायी राजधानी आज तक नहीं मिल सकी है। राज्य की अधिकतर जनता गैरसैण को ही स्थायी राजधानी बनाने की मांग करती है। गैरसैण में शिलान्यास कर कांग्रेस ने सराहनीय कार्य किया है लेकिन इस कार्य में कांग्रेस यदि ईमानदारी बरतेगी तभी गैरसैण को स्थायी राजधानी का दर्जा मिल सकेगा तथा तभी वह आभार की हकदार होगी।  - जगत सिंह खेतवाल, राज्य आंदोलनकारी

http://www.jagran.com/uttarakhand/bageshwar-10148285.html

विनोद सिंह गढ़िया

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[justify]दो विधानभवन नहीं बनेंगे, गैरसैंण ही सही

अल्मोड़ा के सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि गैरसैंण पर्वतीय राज्य का प्रतीक और आत्मा है और यहीं राज्य की स्थायी राजधानी बननी चाहिए। देश में सभी पर्वतीय राज्यों की राजधानी पहाड़ी स्थानों पर ही है। उन्होंने कहा कि पहले कदम के तौर पर गैरसैंण में विधानभवन का शिलान्यास हो चुका है इसलिए अब स्थायी राजधानी भी गैरसैंण में ही बनेगी। टम्टा ने कहा कि देहरादून में विधान भवन मंजूर नहीं है और राज्य में दो विधान भवनों का निर्माण नहीं किया जाएगा।
अमर उजाला से खास बातचीत में सांसद टम्टा ने कहा कि अभी तक राज्य की स्थायी राजधानी तय नहीं की गई है। राज्य सरकार ने अच्छा कदम उठाते हुए गैरसैंण में विधान भवन का शिलान्यास कर दिया है। यहां हर साल विधानसभा का एक सत्र करने का भी निर्णय हुआ है। गैरसैंण में विधान भवन बनने पर आम जनता ने जिस तरह खुशी जाहिर की है।

उससे आगे इस काम को आगे बढ़ाने में और मदद मिलेगी। टम्टा ने कहा कि राज्य में दो राजधानी नहीं बन सकती। अब गैरसैंण में विधानभवन का शिलान्यास हो चुका है इसलिए वहीं स्थायी राजधानी बनाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। राज्य आंदोलनकारियों की भी यही भावना रही है।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि देहरादून में नया विधानभवन नहीं बनेगा। सरकार ने इसे मंजूरी भी नहीं दी है। सांसद टम्टा ने कहा कि केंद्र सरकार ने हिमालयी राज्यों के लिए योजना आयोग में अलग सेल गठित किया है। कहा हिमालयी क्षेत्र की कृषि, उद्यान आदि के लिए भी अलग नीतियां बननी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्र में राजधानी बनने से यहां के लिए अलग नीतियां बनाने में बल मिलेगा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि तराई क्षेत्र की कृषि भूमि का उपयोग गैर कृषि के लिए कतई नहीं होना चाहिए। पर्वतीय और तराई क्षेत्र के लिए अलग कृषि और औद्योगिक नीतियां बनाई जानी जरूरी हैं। पहाड़ में राजधानी बनने से यहां की कृषि, बागवानी, पर्यटन के साथ ही संस्कृति आदि को ध्यान में रखकर विकास संभव होगा। इससे माफिया तंत्र पर भी कहीं न कहीं लगाम लगेगी।

साभार : अमर उजाला
[/justify]

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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From - चन्द्रशेखर करगेती
बजा डाला नेताओं ने गैरसैंण का गेम !
 
 क्या अब यह मान लिया जाना चाहिए कि गैरसैंण, सत्ता तथा विपक्ष में बैठे राजनेताओं के गले की हड्डी है ? राज्य के राजनेताओं से यह संवेदनशील मासला न निगलते बनता है ना ही उगलते l यही कारण है कि राज्य के दोनों बड़े राजनैतिक दल, कांग्रेस और भाजपा का गैरसैंण को लेकर रुख कोई साफ़ नहीं है, और वर्तमान कांग्रेस सरकार के लगुवे-भगुवे रहे बसपा और क्षेत्रीय दल उक्रांद की तो बात करना ही बेमानी है !
 
 अभी पिछले कुछ दिनों से काँग्रेस-भाजपा के कुछ बड़े मौक़ा परस्त नेता गाहे बगाहे गैरसैंण को राज्य की राजधानी बनाने का राग अलापे हुए हैं, तो कुछ गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी का झुनझुना थमाकर देहरादून को ही राज्य की स्थायी राजधानी बनाए रखने की मंशा पाले हुए हैं l कुछ नेताओं ने इसे बैनर पोस्टरों में स्थान देकर श्रेय लेने का ऐसा रास्ता खोज निकला है कि जैसे गैरसैंण को राज्य की राजधानी बनाए जाने का सुझाव एकमात्र उन्ही के द्वारा दिया गया हो, वे अपने बयानों में ऐसा जताना चाह रहें हैं कि इससे पहले तो गैरसैंण को राज्य की प्रस्तावित राजधानी के नाम पर कोई जानता ही नहीं था ?
 
 राज्य बनने के बारह साल बाद भी अगर गैरसैंण को राज्य की स्थाई राजधानी बनाए जाने का मुद्दा ज़िंदा रखा है तो उसका श्रेय इन मौक़ा परस्त राजनेताओं को नहीं जाता जैसा कि वे आजकल राज्य भर में जनता के बीच प्रचारित कर रहें, बल्कि इसके वास्तविक श्रेय के हकदार अगर कोई हैं तो ठेठ पहाड़ के वे युवा हैं, जो अब तक की राज्य सरकारों की पलायनवादी नीतियों के कारण देश के अन्य शहरों में रोजगार के लिए ख़ाक छानने को मजबूर हैं l ये लोग भले ही अपने पेट की खातिर राज्य से मजबूरीवश पलायन कर गये हों लेकिन यह इन युवाओं का अपनी माटी से लगाव और उनके जज्बे का परिणाम है जो निरंतर इस मुद्दे को लेकर संघर्षरत रहें हैं और अपने सीमीत संसाधनों और राजनैतिक दलों द्वारा हासिये पर धकेले गए राज्य की पहचान और अस्मिता से जुड़े इस भावनात्मक मुद्दे पर निरंतर रूप से अपने रोजगार से कुछ समय निकालकर विभिन्न यात्राओं के माध्यम से गैरसैंण आते-जाते रहें हैं और वहाँ के लोगो से मिलते भी रहें हैं l इन युवाओं नें अपने प्रयासों इस मुद्दे को विभिन्न समाचार पत्रों और सोसीयल साईटों पर चर्चा में रखा है l इस मुद्दे को ज्वलंत रखने का श्रेय उत्तराखण्ड क्रान्ति दल को भी नहीं जाता जिसने यह मुद्दा राज्य आंदोलन के दौरान उठाया था, जो राज्य बनने के बाद सत्ता भोगी हो कांग्रेस-भाजपा की राज्य सरकारों में शामिल हो गया और इसकी पूरी कीमत भी वसूल चूका है और कभी भी दिल से उसने सरकार में रहकर गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने की मांग मुखर नहीं की और ना ही इस दिशा में कोई सद्प्रयास ही किया !
 
 हाल ही में कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा गैरसैंण राजधानी की ताजा वकालत पर राज्य निवासियों के लिए इतराने जैसी कोई बात नहीं है l ये इनकी अपनी पार्टी के आंतरिक उठापटक का मामला भर है l  इस मुद्दे को इस प्रकार से समझने में आसानी होगी कि कांग्रेस पार्टी के भीतर इस मुद्दे को वर्ष 2012  में सर्वप्रथम गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज नें निरंतर हवा दी, लेकिन जब श्रेय लेने की बारी आयी तो उन्हें दरकिनार कर दिया, जैसा की पोस्ट के साथ लगाए गए पोस्टर की फोटो से भी स्पष्ट है, इनमें से कुछ नेता तो ऐसे भी है जो पिछले बाहर साल से किसी न किसी रूप में विधानसभा के सदस्य भी रहें है लेकिन उनकी जबान कभी गैरसैंण को लेकर हिली भी नहीं होगी इस बात करना तो दूर की बात है l राज्य के ताजा घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि गैरसैंण मुद्दे पर कभी गढवाल के कांग्रेस नेता अपने ही दल के क्षत्रपों को पटकनी देने के लिए इस मुद्दे पर बयानबाजी करते रहें तो अब बाजी कुमाऊं के नेताओं के हाथ में हैं  l  आखिर गैरसैंण कुमाऊं-गढवाल के बीच में जो है, और शायद इसी कारण से यह राजनेताओं की एक दूसरे को पटकनी देने की कुटिल मंशा पर राजनीति की चक्की में भी पिस रहा है ! गैरसैंण पर जनता को लोलीपोप देने का यह खेल आगे भी जारी रहेगा l  हमें इन सत्तालोलुप राजनेताओं और इनके दलों से इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए, जो लोग गैरसैंण की बात करते हुए बाबा मोहन उत्तराखंडी जैसे अपना जीवन बलिदान करने वाले निस्वार्थ लोगों को भूल जाते है, आभार रैली के उक्त पोस्टर में मुस्कान बिखेरने वाले राजनेताओं में से किसी भी एक राजनेता ने तब भी  उनके बलिदान पर एक शब्द नहीं बोला था, इसीलिये हमें आज भी इनकी कुटिल मुस्कानों में उस बलिदानी के प्राण हर लेनें की साजिस नजर आनी चाहिए l   
 
 यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष में बैठे राष्ट्रीय दलों के गैरसैंण समर्थक होने का स्वांग करने वाले ये राजनेता सचमुच में ही अगर राज्य की स्थायी राजधानी गैरसैंण में ही बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले इनके द्वारा अपने ही दलों के भीतर से ही गैरसैंण के मुद्दे पर आधिकारिक मुहर क्यों नहीं लगवाई जाती ? यह कवायद शायद इसलिए भी नहीं होती क्योंकि गैरसैंण का मुद्दा कभी इन पार्टियों के लिए अहम रहा ही नहीं ?
 
 यह हम आप सभी जानते है, कि सन 2014 के  लोकसभा चुनाव नजदीक है, और चुनाव की पूर्व बेला पर इस प्रकार के भावनात्मक मुद्दे पर एक एक भारतीय मतदाता को जितना जिस प्रकार से ठगा जा सकता उतना और कभी नहीं, ये राजनेता इस बात का इन्तजार करते हैं कि बस एक बार भावना की भांग जनता के दिमाग में चढ जाए, उसके बाद तूती तो इन्ही की बोलती है ! राज्य की राजनीति में गैरसैंण राजधानी का मुद्दा भी इससे अछूता नहीं है, अभी कई और आभार रैलियाँ होनी बाकी है l यह आभार रैली कोई अंतिम नहीं थी, इसके लिए राज्य की जनता को समय के साथ इन्तजार करना चाहिए, अभी आगे बहुत सी रैलियां और कुटिल चेहरे सामने आनी बाकी है l

dsbhandari

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Friends,

It seems the first part of the battle is over with the inauguration of Vidhan Sabha building at Gairsain. We have to prepare ourselves for another struggle to make Gairsain, the permanent capital of our state. We have to make sure that the government is not allowed to make Vidhan Sabha at Dehradun, the 'Nakli Rajdhani' at all.

regards

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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I second your views bhandari ji.

This is only eyewash as of now. We need to fight for Gairsain to be made permanent Capital of Uttarakhand.

Friends,

It seems the first part of the battle is over with the inauguration of Vidhan Sabha building at Gairsain. We have to prepare ourselves for another struggle to make Gairsain, the permanent capital of our state. We have to make sure that the government is not allowed to make Vidhan Sabha at Dehradun, the 'Nakli Rajdhani' at all.

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गैरसैंण विधान भवन का डिजाइन तैयार

जागरण ब्यूरो, देहरादून: गैरसैंण में प्रस्तावित विधानसभा भवन, सचिवालय, मंत्री-विधायक आवास, सचिवालय ब्लॉक व अधिकारी आवास के डिजाइन कार्यदायी संस्था एनबीसीसी द्वारा तैयार कर लिए गए हैं। विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने इनके फाइनल डिजाइन तैयार कर एक सप्ताह के भीतर सभी भवनों का आगणन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
 शनिवार को एनबीसीसी के अधिकारियों ने विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के आवास पर इन डिजाइनों का प्रदर्शन किया। विधानसभा अध्यक्ष ने जल्द आगणन तैयार करने के निर्देश दिए, ताकि 13वें वित्त में स्वीकृत बजट के अतिरिक्त विधान भवन के लिए अतिरिक्त खर्च की मांग 14वें वित्त के लिए की जा सके। उन्होंने पेयजल, लोनिवि व अन्य संबंधित महकमों के अधिकारियों से चर्चा की। साथ ही, विधान भवन निर्माण का निर्माण जल्द प्रारंभ करने के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार कर मूलभूत व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के निर्देश दिए। बैठक में प्रमुख सचिव ओमप्रकाश, प्रमुख सचिव विधान सभा डीपी गैरोला, अपर सचिव विष्णुचक्र थपलियाल, एनबीसीसी के महाप्रबंधक राजेश अरोड़ा आदि उपस्थित थे।

gouri

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Shouldnt the focus be more on Development than "changing capital" of the state? Besides "Dehradun" is more well known and a commercial selling point.

Its a reminder of sorts "Name change of Mumbai" rather than focussing on the Growth of Mumbai, "Madras to Chennai".

The focus should ideally be in attracting MNC's to Uttarakhand and promoting Development of sorts like "Gujarat" "Haryana" "Bihar"....bettering infrastructure, promoting tourism, not just religious tourism but as a must-visit destination. Its beautiful than Switzerland/Kashmir....u name it.

The state needs Employment options, than having the younger work force moving to greener pastures.

Would suggest we have better things to focus on which are more realistic than "emotional" issues.

Regards,

Gouri

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Gouri ji.

Thanx for your detailed views on Gairsain issue.

If you go through the previous posts in this topic.. You will find the detailed views of people why the capital should be moved to Gairsain.

Shouldnt the focus be more on Development than "changing capital" of the state? Besides "Dehradun" is more well known and a commercial selling point.

Its a reminder of sorts "Name change of Mumbai" rather than focussing on the Growth of Mumbai, "Madras to Chennai".

The focus should ideally be in attracting MNC's to Uttarakhand and promoting Development of sorts like "Gujarat" "Haryana" "Bihar"....bettering infrastructure, promoting tourism, not just religious tourism but as a must-visit destination. Its beautiful than Switzerland/Kashmir....u name it.

The state needs Employment options, than having the younger work force moving to greener pastures.

Would suggest we have better things to focus on which are more realistic than "emotional" issues.

Regards,

Gouri

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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चन्द्रशेखर करगेतीabout an hour ago Allowed on Timeline
बल बधाई हो रे दून वालों, माई लॉर्ड बिज्जी भैजी ने आपकी इच्छा पूरी कर दी !
 
 वैसे भी हम गयाडूओं का गैरसैंण इस लायक है ही कहाँ, वो तो मुझ जैसे ग्याडू ज्यादा ही बुक्का फाड़ कर गैरसैंण-गैरसैंण रो रहे थे तो माई लॉर्ड बिज्जी भैजी ने नया नया राजपाट मिलने की खुशी में शिलान्यास की लोलीपॉप हम ग्याडूओं की और उछल दी, जो लोग शौक़ीन थे तब चूस चूस कर जश्न मना रहें थे, हम तो तब भी बुक्का फाड़ चिल्ला रहे थे ! अब गिरगिट की तरह रंग मत बदलना, कि ये तो केवल घोषणा ही है दून में काम शुरू नहीं होने देंगे,काम शुरू हो उससे पहले ही बिज्जी भैजी का पत्ता काट देंगे ?
 
 ग्याडूओं देखा नहीं अपने कमल भाई कितने समझदार है, मौके के अनुसार पाला बदल लेते है, वे बंदर बिल्ली का खेल अच्छे से जानते हैं, वे भी इस मामले में भैजी के ही साथ खड़े हैं, यह बात अलग है कि हम ग्याडूओं को गैरसैंण की लोलीपॉप चुसाने वाले लाल बुझक्कड़ आजकल अपने खोल से बाहर हो लिए हैं तो अपने भैजी ने उनका इलाज भी कर दिया l अब वह खोल से बाहर करवाए गए या गर्मी के मारे बाहर आये ये तो वही जाने, पर हम ग्याडू तो दो-दो गर्मियों से हलकान है !
 
 अब तो आभार रैली वाले भी नजर नहीं आ रहें हैं, दून वालो एक रैली तुम भी करवा दो दून में, हमारा क्या हम तो तब भी बुक्का फाड़ के रो रहें थे अब भी रो लें

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Cheating --- देहरादून रायपुर में नई विधानसभा व सचिवालय
We need Gairsain permanent capital of Uttarakhand -

चमोली जिले के गैरसैंण के साथ ही रायपुर (देहरादून) में भी नए विधानसभा भवन का निर्माण किया जाएगा। राज्य कैबिनेट की ओर से इस संबंध में अधिकृत की गई संसदीय कार्यमंत्री डा. इंदिरा हृदयेश ने रायपुर में विधान भवन निर्माण के मामले में विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल व नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट से भी सहमति प्राप्त कर ली है। उन्होंने कहा कि रायपुर में विधान भवन व सचिवालय के निर्माण का कार्य अगले तीन माह के भीतर प्रारंभ कर दिया जाएगा।

बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में संसदीय कार्यमंत्री डा. हृदयेश ने बताया कि गैरसैंण के भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन व अन्य भवनों के निर्माण के लिए 100 एकड़ भूमि का चयन किया गया है, जिसके निर्माण का जिम्मा एनबीसीसी को सौंपा गया है। उन्होंने बताया कि सरकार ने देहरादून के रायपुर क्षेत्र में भी नए विधान भवन के निर्माण का फैसला किया है और इसके लिए रायपुर में 30 एकड़ भूमि चिन्हित की गई है।

रायपुर में विधान भवन के साथ-साथ सचिवालय भवन का निर्माण भी किया जाना है। जरूरत पड़ने पर चिन्हित भूमि के आसपास और भूमि भी उपयोग में लाई जा सकती है। उन्होंने बताया कि कैबिनेट की ओर से उन्हें रायपुर में प्रस्तावित विधान भवन के संबंध में विधानसभा अध्यक्ष व नेता प्रतिपक्ष से वार्ता के लिए अधिकृत किया गया था। इस क्रम में हुई वार्ता के दौरान विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल व नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट भी रायपुर में जल्द विधान भवन का निर्माण प्रारंभ करने पर सहमति दे चुके हैं।

अब जल्द ही विधान भवन निर्माण के लिए आर्किटेक्ट व निर्माण एजेंसी का चयन किया जाएगा। साथ ही, तीन माह के भीतर रायपुर में विधान भवन का निर्माण प्रारंभ कर दिया जाएगा। विधान भवन निर्माण के लिए बजट के प्रश्न पर संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि 13वें वित्त आयोग का 88 करोड़ रुपये राज्य के पास मौजूद है। साथ ही, अतिरिक्त धन की जरूरत पड़ने पर केंद्र सरकार से भी वित्तीय मदद ली जाएगी।

इनसेट..

'विपक्ष की सहमति व असहमति का कोई प्रश्न नहीं है। राज्य की बेहतरी के लिए सरकार के हर कदम पर विपक्ष सहमत है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि दो-दो विधान भवन बनाने का आखिर क्या औचित्य है। सरकार को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि स्थायी राजधानी कहां बनेगी और कहां ग्रीष्मकालीन राजधानी होगी।'

-अजय भट्ट, नेता प्रतिपक्ष, उत्तराखंड

 

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