Author Topic: उत्तराखंड मूल के निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म "मिस टनकपुर हाज़िर हो" -26 Jun 15  (Read 5188 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Vinod Kapri India 

कुछ इंसान बहुत बड़े होते हैं। और कुछ महान होते हैं।
राजू हिरानी उनमें से एक है। कल मेरे साथ जो हुआ , वो अविश्वसनीय है !!!
राजू सर दो हफ़्ते के लिए भारत से बाहर हैं और ‪#‎MissTanakpur‬ के रिलीज से ठीक पहले उन्होंने एक वीडियो मैसेज भेजा है What's app के ज़रिए !! फिल्म के समर्थन में !!!
सच कहूँ ..इस वीडियो को पहली बार देखते हुए मेरे आँसू निकल पड़े। यक़ीन नहीं होता कि कोई इतना out of the way जाकर ऐसा करेगा..ख़ासतौर पर वीडियो भेजेगा !!! मुझे बताया गया है कि राजू जी ने आज तक किसी फिल्म के लिए ऐसा नहीं किया है।
एक महान फ़िल्मकार के इस प्यार के लिए मैं निशब्द हूँ।
Love you so so so much SIR !!!

Pls watch film on 26th June.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Today is the release Date of Miss Tanakpur Hazir ho.


Best wishes to Vinod Kapri ji.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Miss Tanakpur Haazir Ho: Making sense of the bizarre
 Set in what we casually call the cow belt of the country, a village headman accuses a young boy of *ually assaulting his buffalo, who has just won an animal fashion contest in the village fare. Picked from the crime pages of the vernacular dailies, debutant Vinod Kapri has come up with a social satire that is more ribald than refined. On the surface it seems like Kapri has a fascination for faecal matter but as we culture it, it turns out to be a scatological comment on the putrid thought process, the misogyny that pervades our socio-political system and the callousness of the judicial process at the ground level.

Kapri has an astute observation of the place and the people he is talking about. The colour is not limited to the hair of a corrupt police man. It is there in the dialect and the dialectics of the narrative and Kapri has picked a cast that imbibes the turn of phrase with all its risqué possibilities but don’t let the crudeness come in the way of the mechanics of satire.

Those who are familiar with the tradition of satire in Hindi literature can inhale the scent of the writing of Kashinath Singh, Manohar Shyam Joshi, K.P. Saxena and Sir Lal Shukla in the morbid humour that Kapri has conjured up. The buffalo becomes a metaphor for the state of women in the hinterland where deep-seated patriarchy sees them only as an object. For most men in the film Miss Tanakpur is just a machine which delivers 20 litres of milk in a day. When she gets hurt she is put on sale. Maya’s state is not too different from her. In fact the film shows that it is easier for the animal to break free than the woman.

Annu Kapoor is once again in form as the over-the-top aging Pradhan Sualal who has not been able to satisfy his young wife Maya (Hrishitaa Bhatt). A local village boy Arjun (Rahul Bagga) understands the emotional and physical needs of Maya but when Sualal comes to know about the relation, he decides to humiliate Arjun and his family with the help of his henchman Bhima (Ravi Kishan) and the village priest Shukla (Sanjay Mishra). As expected the law also develops week knees in front of money power and the cop (Om Puri) constructs a false case against Arjun. In the beginning it seems a like an exaggerated version of single column story, ballooned by some desi gags, but as the narrative takes shape the sinister designs behind the comic front generate an uneasy feeling.

From religious manipulation to gender politics to caste dominance, it reminds of the bizarre forms unbridled power can take. And Arjun’s parents and grandmother reflect the helplessness in face of this brute collation of political and money power without getting melodramatic.

Its dystopic feel reminds of Manish Jha’s “Matrubhumi”.

Unlike Jha, Kapri, who comes from a journalistic background, has picked from rich sources, but he has not been able to weave the influences into a cogent whole. Of and on it seems the narrative takes a detour to satisfy the Bhimas and the Sualals and their wannabe followers in the audience. Every now and then you feel that he is getting carried away and is falling into a claptrap or the rancid pit he is making fun of but then as things threaten to go bawdy, Kapri changes track. As his humour starts acquiring darker shades, the film develops an edge that cuts through the conscience and the shock value no longer remains superficial. And after a point one tends to agree with Annu Kapoor’s punchline. Don’t take it otherwise!

http://www.thehindu.com/features/cinema/cinema-reviews/miss-tanakpur-haazir-ho-making-sense-of-the-bizarre/article7358155.ece

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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टनकपुर की गाड़ी चल पड़ी
Posted On June - 27 - 2015
शूटिंग से पहले/मिस टनकपुर हाजिर हो

केवल तिवारी
पत्रकार से फिल्मकार बने विनाेद कापड़ी ने मिस टनकपुर हाजिर हो बनाने के संबंध में अपने अनुभव साझा किये। उन्होंने बताया कि काफी कुछ तैयारी होने के बाद एक दिन फोन आया। विनय तिवारी जी का। शायद 20-21 सितंबर होगी। मुंबई जाने से सिर्फ़ 10 दिन पहले। विनोद ने बताया कि विनय जी फिल्म के प्रोड्यूसर थे। लखनऊ के रहने वाले जिंदादिल इंसान। इससे बडा ज़िंदादिल कोई क्या होगा जो एक बिलकुल नए डायरेक्टर पर 5 करोड़ दाँव पर लगाने को तैयार हो जाए। और वो भी उन हालात में, जब उनकी 10 करोड़ से भी ज़्यादा की लागत से बनी पहली फ़िल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ रिलीज ना हो पाई हो। पर ज़िद और जुनून के पक्के थे विनय जी। वो अकसर बोलते भी थे कि “मैं मुंबई फ़िल्म बनाने आया था और फ़िल्म बना कर ही लखनऊ जाऊँगा। मुझे भी अपने दोस्तों और परिवार को जवाब देना है। मिस टनकपुर मैं सिर्फ़ आपके जुनून और फ़िल्म की कहानी की वजह से बना रहा हूँ। कमाल की हिम्मत है यार। क्या भरोसा है यार। मैने मन ही मन सोचा।

एक ट्रेनी पर इतना भरोसा
अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहते हैं, एक ट्रेनी डायरेक्टर पर 5 करोड़ का दाँव! इतना ही नहीं उन्होंने बतौर डायरेक्टर एक सम्मानजनक फ़ीस का भी ऑफ़र दिया। और कांट्रेक्ट तैयार करवा दिया। पर मैने उनसे स्पष्ट कह दिया कि सब कुछ मंज़ूर है लेकिन फ़ीस बिलकुल भी नहीं। ये क्या कम बड़ी बात है कि आप एक बिलकुल नौसिखिए से फ़िल्म करवा रहे हैं। वो बहुत ज़िद करते रहे तो मैने बस इतना कहा कि जो आपने मेरे लिए सोचा है, वो फ़िल्म में लगा दीजिए। सच कहूँ मेरे लिए तब भी और आज भी ये बहुत बड़ी बात थी कि जो इंसान खुद पहली फ़िल्म की वजह से तीन साल से परेशान रहा हो वो बिलकुल नए डायरेक्टर पर भरोसा कर रहा हो।
ख़ैर शूटिंग शुरू होने से क़रीब 35 दिन पहले इन्हीं विनय जी का फोन आया कि यार विनोद जी, मोहल्ला अस्सी का कुछ हो नहीं पाया अब तक, सीरियल में सारा पैसा लग गया है। टनकपुर के लिए पैसा है तो सही, पर बहुत कम रह गया है। 5 में से मैं फ़िलहाल आधा ही कर पाऊँगा। शूटिंग 25 अक्टूबर से नहीं हो पाएगी। क्या आप तीन चार महीने शूटिंग टाल नहीं सकते ?? तब तक कुछ इंतज़ाम हो जाएगा। सुनते ही मैं सन्न रह गया। पर मैं जानता था कि विनय जी जो भी बोल रहे हैं बिलकुल सही बोल रहे हैं। वो वाक़ई हालात में फँस गए थे।
कुछ देर मैं सन्नाटे में रहा। फिर सारे दोस्तों, जानने वालों को फोन खड़खड़ाना शुरू किया। सारी बात बताई कि फ़िल्म कहाँ तक पहुँच गई है? ज़्यादातर ने कन्नी काट ली। बात भी सही थी। इतने कम वक़्त में इतनी बड़ी रक़म कोई कैसे लगा सकता था। कुछ ने इच्छा ज़ाहिर की। फ़िल्म की कहानी सुनी। पर रक़म बहुत बड़ी थी। सबसे पहले दिल्ली के गौरव गुप्ता से मिला। उनका अपना अच्छा काम है। वो बोले कि वो और उनका परिवार फ़िल्मों के सख़्त ख़िलाफ़ है पर आपकी और कहानी की नियत देखकर मन कर रहा है कि फ़िल्म बनाई जाए। कुछ वक़्त दीजिए। मुझे लगा कि मुझे टाल दिया गया है।

चल निकली गाड़ी
पर मुझे एहसास नहीं था कि ये “कुछ वक़्त” सिर्फ़ दो घंटे का ही था। दो घंटे बाद ही गौरव का फोन आ गया कि भैया बताइए अब क्या करना है ? गौरव ने अच्छी रक़म का वादा किया और उसे पूरा किया। पैसे अभी भी कुछ कम पड रहे थे। दो और दोस्तों कृष्ण कुमार और उमेश कुमार से बात की। कृष्ण सीए हैं और उमेश सब जानते हैं पत्रकार। दोनो बेहद उत्साही। दोस्तों के लिए हमेशा तैयार। सुनते ही बोले कि आप शूटिंग शुरू करो भाई, जो भी कमी होगी देख ली जाएगी। विनय जी को खबर दी गई।
टनकपुर की गाड़ी एक बार फिर चल पड़ी थी। मुझे दिखने लगा था कि अब कम से कम शूटिंग तो शुरू हो ही जाएगी। बाक़ी का बाद में देखा जाएगा।
http://dainiktribuneonline.com/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Miss Tanakpur Haazir Ho
Thursday 25 June 23:49    0 Comments
Release Date :    6/26/2015 12:00:00 AM
Director :    Vinod Kapri
Genre :    Comedy
Miss Tanakpur Haazir Ho

Details :

Friday, 26th June 11:50 AM IST

 

 

 

 

 

MISS TANAKPUR HAAZIR HO Is Effective Yet Simple Social Satire



 

Pluses:

 

Annu Kapoor is too good, Ravi Kissen is hilarious, Om Puri is decent, Sanjay Mishra is outstanding and Rahul Bagga fits the bill, tight screenplay



Minuses:

 

dialogues are amateur, editing is uneven, background score is cliche

 

 

Critic Rating:

3.5/5

 

 

Business Rating:

1/5

 

 

Verdict:

 

Watch it for simplistic approach and effective message

 

 

Detailed Analysis:

 
 

 
In last few years films like 'Phas Gaye Re Obama', 'Dekh Tamasha Dekh' created some kind of wave in Bollywood where film makers are trying to raise social evils in a very effective humorous manner. 'Miss Tanakpur Haazir Ho' is one more such film.

 

 


Inspired by true events in Rajasthan, the film centers on a love story set in a village of Haryana. Sulaal Gandass (Annu Kapoor) is head of village and he has some real funny idiosyncrasies.
At the core of the film is a young villager Arjun (Rahul Bagga) who is falsely accused by the headman of *ually assaulting a buffalo and is ordered by a khap panchayat to marry the 'victim' by way of expiation. Then there are interesting characters like Cop Malang Singh (Om Puri). Just about everything is amiss in tension-ridden Tanakpur, beginning with its impotent and unscrupulous headman Sualal Gandaas (Annu Kapoor). The man's much younger wife, Maya (Hrishitaa Bhatt), is in a dangerous liaison with the village electrician Arjun (Rahul Bagga) and she loses no opportunity to invite him into her bedroom. Arjun is a morose drifter whose father has put his life's savings aside so that his son can become a policeman. The mukhiya throws his weight around with the help of a dumb henchman, Bheema (Ravi Kishen), who merrily rushes in where angels would fear to tread.



Also in the antagonist's camp is a mumbo-jumbo spouting tantric (Sanjai Mishra) who vows to help the bristling cuckold dispatch Arjun to his doom.That is where the buffalo comes in handy. The silent animal falls prey to the headman, his lackeys and police inspector Matang Singh (Om Puri), who is all too willing to be bribed to do the master's bidding.How this case brings forward evils of society, prevalent issues of rural life and judicial system form the rest of the story.


 

Performance wise Annu Kapoor  is good with electric act and he looks like a complete fit in the role. Sanjay Mishra once again proves his mettle with astounding act, Ravi Kissen is decent and so is Om Puri. Rahul Bagga looks good for most of the part but lacks finesse in his performance.




Film has such a thin plot which is usually a case with satirical films though dialogues disappoints but screenplay takes care of the proceedings exceedingly well. Film has uneven editing that at times one loses the flow of events in 1st half with too many sequences. Music is below par . Cinematography is first class and production design are good.

 

 


TV journalist turned director Vinod Kapri tries to deliver honest film but due to his broad strokes and Haryanvi language that desired magic did not come out. But still he delivers a film which is worth a watch purely because of interesting premise and good actors.




Film will release today and it will struggle due to unexciting promos and dry content. There is competition for the film from 'ABCD 2' though exceptional reviews and word of mouth can give it some push but still a box office success looks like a tough task.

 

 http://www.boxofficecapsule.com/review/Miss-Tanakpur-Haazir-Ho-289

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Miss Tanakpur Haazir Ho

The Story of ‪#‎MissTanakpur‬ :Raju Hirani’s take on “Miss Tanakpur”

Filmmaker Raju Hirani was utterly astonished to know that “Miss Tanakpur Hazir Ho” was shot in just 32 days. He said it just doesn’t look like work of a debutant director. Vinod Kapdi recounts the story of that heartening encounter: http://goo.gl/pA3pPj

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Mahi Singh Mehta
12 hrs ·

आज Vinod Kapri India जी फिल्म "मिस टनकपुर हाज़िर हो" देखने गया ! पहले सोचा अकेले जाउ फिल्म देखने लेकिन बाद में परिवार को भी ले गया नॉएडा spice सिनेमा में। सिर्फ फिल्म देखने हेतु ऑफिस से जल्दी निकल आया ! इस फिल्म के रिलीज़ का मुझे बेसब्री से इन्तेजार था लिहाजा ज्यादे इन्तेजार नहीं सका! अब फिल्म के बारे में बताऊ - फिल्म का पहला हाफ में काफी कॉमेडी है लोगो को हसने के लिए मजबूर करती है ऐसा लग रहा था फिल्म पूरी कॉमेडी होगी लेकिन दूसरा हाफ सामाजिक बुराइयो की पोल खोलती है चाहे वो पुलिस प्रशाशन का भ्रष्टाचार हो न्याय पालिका दबा के घूसखोरी। तीसरी तरफ लोक तंत्र नहीं अपने तत्र में विश्वाश न रखने वाले "खाप" पंचायतो के तालिबानी फरमानों के बारे में फिल्म जनता को आँख खोलने के लिए मजबूर करती है। जिस तरह कई बार न्यालयो में बिना ठोस सबूतो के झूठे मुकदमे दर्ज किये जाते है जिसके कारण निर्दोष लोगो के सीधी साधी जिंदगी नरक जाती है। अदालतों को भी फिल्म कुछ न कुछ सोचने के लिए मजबूर करेगी। गाव का भोला भाला जीवन और दृश्य लुभावने है। सभी पात्रो ने अपने अपने character के साथ न्याय किया है। मुझे अन्नू कपूर का अभिनय बेहद पसंद आया।

मसाला फिल्मो को पसंद करने वाले को शायद फिल्म बहुत ज्यादे पसंद न आये लेकिन सामाजिक मुद्दो पर संजीदा काफी पसंद कर रहे है। मेरी रेटिंग रेटिंग पूछी जाय तो 3 स्टार मिलेंगे। विनोद कापड़ी जी का निर्दशन में कही ऐसा नहीं लगा ये उनकी पहली फिल्म है बहुत अच्छा काम किया है उन्होंने । निश्चित रूप से फिल्म उनके लिए bollyhood में लम्बे करियर का दरवाजा खोलने वाली है। निसंकोच - थोड़ा तांत्रिक का रोल के बारे में असमंजस में हूँ। हलाकि मिश्रा जी ने बहुत अच्छा अभिनय किया है लेकिन मुझे लगता है १-२ बार ज्यादे दिखाया गया है। बाकी ठीक है। मित्रो आप भी जरूर देखे ! भरपूर मनोरंजन है फिल्म में !

 

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