Author Topic: Rajula Historical film on Uttarkahand releasing on 18 Oct 2013 -राजुला फिल्म  (Read 7590 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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हिटो दीदी हिटो भुला
 हिटो दीदी हिटो भुला
 हिट भै बहणा
 हिट भै बहणा
 म्यार पहाडा हो हो...
 म्यार पहाडा
 
 उकालू सौँणा
 म्यार पहाडा
 म्यार पहाडा
 म्यार पहाडा
 म्यार पहाडा
 
 बालापन थे याद कारा
 घुघती को त्योहारा
 हर मेड नगडी की बीसेती बहारा
 ननछन की याद करो
 घुघती को त्योहारा
 हर महीना लगद यख कैथीग बहारा.
 झौडा,चाँछडी, नच चौँफला
 झौडा,चाँछडी, नच चौँफला
 सतपुली कु सैँणा
 
 हिँसार,किँगोड, कफल, बुराँश, का फुल
 कै बैर प्रदेश तुम किले गैँछा भुल
 किले गवा भुल,
 
 हिटो पहाडा..आ आ आ आ......
 
 हिटो पहाडा, म्यार पहाडा
 हमारु पहाडा, हिटो भैजी
 हिटो दाज्यु भेँटी औला
 अपुणु पहाडा,
 
 हिटो दीदी हिटो भुला
 हिटो दीदी हिटो भुला
 हिट भै बहणा
 हिट भै बहणा
 म्यार पहाडा हो हो...
 म्यार पहाडा
 
 उकालू सौँणा
 म्यार पहाडा
 म्यार पहाडा
 म्यार पहाडा
 म्यार पहाडा
 म्यार पहाडा
 म्यार पहाडा.
 
 YE GANA ANE WALI nayi uttarakhandi(garhwali+kumaoni) film RAJULA ka hai ye film 18 october ko releases HOGi FILM JARUR DEKH

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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OptionsSunil Negi s ON Rajula
 Yesterday I got the opportunity to see the newly made film on 35mm digital set up by a most committed artist, intellectual, film and theater personality Manoj Chandola at prestigious India Islamic Centre situated at Lodhi Road, who have put in his best cumulative efforts from story writing to finally making of the film, including the very important gradient money investment in billions to ensure that the film hits the box office and even if it dosen't earn enough, at least the culture, age old traditions, scenic beauty, greenery and the most lovable and extraordinary landscapes of Uttarakhand are accepted in all humility by the people, film lovers, Uttarakhandies around the world and of course the film makers who go to Switzerland to do the needful quiet bereft of the idea that UK is the best location at par or even more then the former. The feature film of more than two and a half hours was exhibited in India Islamic Centre yesterday evening inaugurated by the Union Minister for Water Resources, Govt. of India and other dignitaries was in fact quite interesting and technically strong having 80 percent of dialogues in Hindi and only 20 percent in Garhwali and Kumaoni mix. The script of the film is primarily based on the 700 years' old real happening, love story of famous Rajula Malushahi during the Katyuri rule in Kumaon Division of Uttarakhand when the Prince from the Royal family falls in love with a simple, modest and poor girl . The story runs parallel to the present day love story of the hero and heroine of the film who proposes to make a documentary on Rajula Malushahi and while researching his project falls in love with the heroine of the film on the same pattern and inspired by the 700 years' old love story. There have been quite interesting scenes of conservative beliefs in the film which also highlight the traditional Thakur Brahman conflict and other social issues, particularly the social taboos and orthodox conventions of the hills and try to awaken people against these social evils. The film carries an interesting story line and if seen in theaters will make you feel quite entertain g and comfortable. Its rather more educative, interesting and significant for the present days young generation who are completely unaware about and devoid of the traditions, folk lore, stories, past happenings and history of our healthy culture. I would definitely like to congratulate Manoj Chandola for this wonderful attempt and also for his bravery and courage for taking this huge risk by investing his billions of Rupees in an Uttarakhandi film, particularly when UK films do not invite crowd or audience and run the immense risk of liquidation or bankruptcy. I also pat him for having purchased few halls initially for a billion rupees as the film theeat owners were not prepared to take his film for the risk of not drawing crowds. I salute him and pray to Almighty to make his and his committed teams endeavor a great success. Ameen.By Sunil Negi

विनोद सिंह गढ़िया

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[justify]फिल्‍म-समीक्षा

सिनेमाघरों में पहुंची ‘राजुला-मालुशाही’ की अमर प्रेम कहानी



स्टार: 2
निर्देशक: नितिन तिवारी
निर्माता: मनोज चंदोला ( हिमाद्री प्रोडक्शन प्रा. लि.)
कलाकार: करण शर्मा, आशिमा चंदोला, हेमंत पांडे, अनिल घिल्डियाल, विष्णु गुरंग
संगीत: सुधीर और मिलिंद
गायन: जावेद अली, मोना भट्ट, तरुण धींगरा और वीरेन्द्र नेगी

‘राजुला’ छोटे बजट की फिल्म है. उत्तराखंड की लोकगाथा/कथा ‘राजुला-मालूशाही’ पर आधारित है यह फ़िल्म ‘दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव’ में ‘ऑडियंस चॉइस’ अवार्ड से भी सम्मानित हो चुकी है. पीवीआर सिनेमा के डायरेक्ट कट के तहत 18 अक्टूबर को भारत के कई सिनेमाघरों में इसे रिलीज किया गया है.

कहानी:
15वीं शताब्ती में उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में रंगीलो बैराठ के कत्यूर वंश के राजा मालूशाही और जौहार के भोट व्यापारी सुनपति शौक की बेटी राजुला की प्रेम कहानी पर रवि (करण शर्मा) एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाना चाहता है. एक एनजीओ में काम करने वाली भावना (आशिमा चंदोला) उसकी मदद करती है. रवि का मामा (हेमंत पांडे) उसे घरवालों के विरोध के बावजूद ननिहाल बुलाता है. गांव के बुजुर्ग के जागर और न्योली लोकगीत की पृष्ठभूमि में राजुला और मालू की प्रेम कहानी के साथ-साथ रवि और भावना की प्रेम कहानी भी आगे बढती है.

पटकथा, कलाकार और निर्देशन:
ऐतिहासिक प्रेम कहानी के साथ अधिक छेड़छाड़ न करते हुए पटकथा पर निर्देशक ने दर्शकों पर अपनी पकड़ मजबूत रखी है. कई टीवी धारावाहिकों में काम कर चुके करण शर्मा ने रवि और मालू के चरित्र को बखूबी निभाया. मगर अभिनेत्री आशिमा के अभिनय में विविधता का अभाव झलकता है. ऑफिस-ऑफिस फेम ‘पांडेजी’ हेमंत पांडे ने मामा का किरदार स्थानीय पुट डालकर महीनता से अदा किया. अनिल घिल्डियाल ने बड़े मामा की नकारात्मक भूमिका को अच्छा निभाया है. सुनपति शौक के रोल में नेपाली अभिनेता विष्णु गुरंग में अपनी छाप छोड़ी है.

क्या है खास:
फिल्म की पहाड़ी लोकेशन बहुत ही खूबसूरत है. पिथौरागढ़, केदारनाथ (आपदा से पूर्व), बद्रीनाथ, जागेश्वर और मुनस्यारी शूटिंग स्थल हैं. संगीत साधारण मगर कुछ लोकगीत कर्णप्रिय हैं. हीर-रांझा, सोनी-मेहवाल जैसी प्रेम कहानियों के शौकीन दर्शकों के लिए ‘राजुला-मालूशाही’ की कहानी ‘राजुला’ जिज्ञासा और कौतुक भरी होगी. पूर्वी दिल्ली में पीवीआर ईडीएम, दक्षिणी दिल्ली में पीवीआर साकेत और फरीदाबाद में पीवीआर क्राउन प्लाजा में दर्शक पोपकोर्न के साथ पहाड़ घूमने का मजा ले सकते हैं.


Source :  http://aajtak.intoday.in/story/rajula-a-film-about-the-strength-of-woman-releasing-pvr-directors-rare-1-744884.html
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विनोद सिंह गढ़िया

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फिल्म समीक्षा

'राजूला' - लीक से हटकर नया प्रयोग
समीक्षक - डा. राजेश्वर उनियाल


[justify]निर्माता प्रियंका चंदोला व रमा उप्रेती, निर्देशक श्री नितिन तिवारी तथा श्री मनोज चंदोला व श्री मुकेश खुगशाल जी की टीम ने उत्तराखण्डी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में लीक से हटकर काम किया है एवं एक संदेश भी दिया है कि अगर हम चाहें तो साफ-सुथरी और अच्छी फिल्म भी बना सकते हैं । इस हेतु हम उनकी प्रशंसा करते हैं । इसी के साथ बहुत समय बाद उत्ताराखण्डे की ऐसी कोई फिल्मी बनी है, जो कि समीक्षा करने के योग्य‍ है- इस हेतु भी निर्माता-निर्देशक बधाई के पात्र हैं । परन्तु जिस प्रकार से बिना मालूशाही के राजूला शब्द अधूरा लगता है, ठीक उसी तरह से हिमाद्री प्रोडक्शन की राजूला फिल्म, अधूरी कहानी के साथ प्रदर्शित की गई अधूरी फिल्म् लगती है । अच्छी पटकथा के अभाव में हम एक अच्छीख फिल्म देखने से वंचित रह गए हैं । राजूला मालूशाही उत्तराखण्ड के लोक-जीवन की ठीक वैसी ही प्रेम कहानी है, जैसा कि पंजाब के लिए लैला-मजनू, हीर-रांझा या सोहिणी-महिवाल है । राजूला नाम सुनते ही हर उत्तराखण्डी के मन में प्रेम-रण की अनेकों लोक कथाओं व गाथाओं की अनुभूति होने लगती है । परन्तु इस राजूला फिल्म को देखकर दर्शकों को अंत तक पता नहीं चलता है कि आखिर निर्माता-निर्देशक दिखाना क्या चाहते हैं । फिल्मल का नायक रवि राजूला पर फिल्म बनाने हेतु उत्तराखण्ड आता है । वह हर उस स्थान पर जाना चाहता है जहां राजूला मालूशाही का प्यार पनपा था । इसी दौरान उसकी मुलाकात एक लड़की से हो जाती है, जिनकी प्रेमकथा राजूला-मालूशाही की प्रेमगाथा को ओवरटेक कर जाती है । इसी के साथ जागर दिखाने के बहाने नायक के मां-बाप की बासी कहानी भी परोसी गई है । लेकिन पुरातात्विक विषयों पर डाक्यु्मेंटरी फिल्म बनाने और किसी लोकगाथा या ऐतिहासिक प्रेम-प्रसंग पर फिल्म बनाने में जो अंतर होता है, वह अंतर इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक शायद समझ नहीं पाए । फिल्मे में तीन कहानियों का एक साथ और समान रूप से चलने के कारण यह पता ही नहीं चल रहा था कि मुख्य कहानी कौन सी है । अब फिल्म का शीर्षक यदि राजूला है तो स्वाभाविक है कि मुख्य कहानी राजूला-मालुशाही की ही होनी चाहिए थी, जो कि इस फिल्म में गौंण सी हो गई है । अगर इस फिल्म में गाने नहीं होते तो इसे डाक्यूमेंटरी फिल्म ही कहा जाता । फिल्मि में कई जानकारियां संवाद की जगह कामेंटरी के माध्य म से दी गई है, जैसे कि नाटकों में सूत्रधार होते हैं । अच्छाध होता कि पटकथाकार इन जानकारियों को अपने पात्रों से बुलवाता । तकनीकी पक्ष से फिल्म अच्छी है । पहाडों के सुंदर दृश्य सुंदरता के साथ दिखाए गए हैं । करण शर्मा ने नायक की भूमिका अच्छीर तरह निभाई पर वह मालूशाही में उतना प्रभाव नहीं छोड पाए । इसी तरह अच्छाम होता कि नायिकाएं भी दो होती, एक कहानी की अभिनेत्री और दूसरी राजुला । गीत-संगीत साधारण हैं, परन्तु जैसा कि आम उत्तराखण्डी फिल्मों में होता है कि जो निर्माता-निर्देशक होते हैं, अधिकतर लेखक, गीतकार व कई बार तो गायक व कलाकार तक भी वही होते हैं । उन्हें लगता है कि जब खर्चा हम कर रहे हैं, समय हम लगा रहे हैं तो गीत, संगीत, कहानी व अभिनय औरों से क्यों कराएं । हम हैं ना । हम नहीं तो हमारे परिवारजन, मित्रगण बस, ज्यादा दूर क्यों जाएं । यह फिल्म भी इसी गरिमा के साथ प्रदर्शित की गई लगती है । अगर निर्माता निर्देशक इस मोह-संवरण से बचते तो हमें अच्छे गीत व सटीक कहानी तथा पटकथा के साथ एक अच्छीे फिल्मप देखने को अवश्य मिलती । नए-नए प्रयोग करना अच्छी बात ही नहीं, बल्कि साहस की भी बात होती हैं । साहित्य में, गीत में, संगीत में व कहानी में नित नए प्रयोग होते रहते हैं । राजूला भी एक तरह से नए प्रयोग की फिल्म है । यह उत्तराखण्ड की पहली डिजिटल फिल्म है, जिसे कि पीवीआर में प्रदर्शित किया गया है । इस हेतु निर्माता-निर्देशक अवश्य ही बधाई के पात्र हैं । परंतु नए प्रयोग करते समय फिल्म निर्माताओं को यह जरूर देखना चाहिए कि वह इस फिल्म को किस वर्ग के लिए बना रहे हैं । अगर यह फिल्म राजूला पर ही केन्द्रित होती तो निश्चित रूप में यह राष्ट्रीय स्तर पर धमाल मचा सकती थी, पर राजूला नाम को भुनाते हुए एक साधारण प्रेम कहानी पर आधारित यह फिल्म केवल जागर, सुश्री मोना भट्ट की मधुर आवाज एवं श्री हेमंत पाण्डेय जी के किरदार के सहारे कितनी चल पाएगी एवं उनकी मेहनत कितना रंग लाती है, कहना मुश्किल है । फिल्मों में अवार्ड पाना और दर्शकों के बीच हिट होने में बहुत अंतर होता है। शायद इस बात को निर्माता-निर्देशक समझ नहीं पाए । हां, फिल्म हिन्दी में होने के कारण हो सकता है कि गैर उत्तराखण्डी और विशेषकर नए विषयों पर फिल्म बनाने वाले मुंबइया निर्माताओं को यह फिल्म अच्छी लगे और कल कहीं कोई राजूला मालूशाही पर भव्य फिल्म बना दे, तो उसका श्रेय निश्चित रूप से इस टीम को भी जाएगा । फिर भी मैं इतना अवश्यन कहूंगा कि जितनी मेहनत इस टीम ने फिल्मो के प्रमोशन व प्रचार-प्रसार में किया, अगर उसकी एक तिहाई मेहनत भी इसको बनाने से पहले इसकी कहानी पर की गई होती तो उत्तराखण्ड के दर्शकों को एक अच्छी फिल्म देखने को अवश्य मिलती । फिर भी पहाडों से दूर बसे पहाड़ीजन अगर जागर को अच्छी तरह से देखना चाहते हों तो राजूला अवश्य देखें ।

समीक्षक - डा. राजेश्वर उनियाल, मुंबई
E-Mail : uniyalrp@yahoo.com [/justify]


 

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