Author Topic: Tribute to Great Poet and Our Beloved Girda आखिर गिरदा चले गये.. श्रद्धांजली  (Read 25888 times)

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

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तू मरा नहीं अमर है
जन जन के दिलो में है
इतिहास के पन्नो में है
उत्तराखंड आन्दोलन में है
साहित्य की विधाओ में है
कवी की कविताओ में है
गीत में है संगीत में है
मानव के हर रूप में है
गिर्दा तू मरा नहीं अमर
है

जनकवि, प्रेरणास्रोत, मार्गदर्शक परम पूज्य गिर्दा को भावभीनी श्रद्धांजलि
 

lpsemwal

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Uttrakhand ke janmans me apni smriti sadaib rakhne wale GIRDA ki Atma ko Shanti prapt ho. 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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KITANE JHATKE JHELE HAIN, ISE BHEE JHEL LOONGA, BHULA" - Girda
« Reply #52 on: August 23, 2010, 08:18:52 PM »
FromChandan Dangi <cdangi2001@yahoo.com>
Dear friends,
 GIRDA has left for the heavenly abode on Aug 22, 2010. He   will be remembered for his creative works in the fields of poetry,   lyrics, songs and his devotion to the society. He lived a joyful life   with his friends around him. He never talked of physical pains. Even   when Kamal Karnatak and I met him on Saturday the 21st of Aug. 2010 at   the ICU, STH Haldwani, he said" KITANE JHATKE JHELE HAIN, ISE BHEE JHEL LOONGA, BHULA", that was my last meeting with Girda.
 
Girda as a person is a very big loss to one and all.   Whoever heard him over phone and through the inspiring and soothing   songs, know his personality. His imagination ran beyond all cross   borders and he always thought of human values. He was worried for the   falling values at the same time.
 
A true leader of common person since Uttarakhand separate   State activism and other movements, he was a decisive factor keeping the   movement on, in spite of atrocities of police and Govt. He kept   motivating, not provocting the activists till we got a new State.
 
In GIRDA we have lost a special humane. But, GIRDA will   live through in his songs and creative works. The need of the hour is to   think and act, as to how we can fulfill the unfinished tasks that Girda   had thought, imagined and written.
 
In my opinion, we need to collect all the recordings that   his friends shot at different occasions. We need to document him to   preserve his vision for the generations to come. During my interactions,   since the sad news of his demise, I know, Indrajeet Pant, Piram, Sekhar   Da, Dan Sb, Sanjay Joshi, Hem Pant, Vijay, and many other friends have   30 minutes to hours of recordings with them.
 
We should think of GIRDA MEMORIALS, that could be in   different forms, from setting up a Library in the University to   displaying his different works. We should bring out a SMARIKA, since   lots of messages have already been received. It is to be complied and   circulated among his large followers and admirers.
 
GIRDA SAMAGRA is being brought out by PAHAR. We need to publish it at the earliest.
 
Some of the poems could be included in School and   University books. A lot of his young scholar friends would like to write   thesis on Girda. 
 
Girda was a true FAKKAR. Yet, he gave more than some one   could expect and get from him. He lived a selfless life and never worked   for awards. In his struggle for others, his own family was deprived of.   Yet, the basic needs and for the higher education of his son, there are   several considerations being talked about, We should be sensitive, seek   consents and consult the family members. We should do m\our best to   show our solidarity in this time of great loss to the family.
 
I will be very glad to coordinate with Bhabhi Ji, Piram and Tumhi.
 
Chandan Dangi

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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from   Udaya Pant <uspant@yahoo.com>

May God Rest the departed Soul in peace. Girda is gone; but his "GARAJ' shall remain in our fond memories of life. I havent heard another person with simultaneous exact rythm and word in reciting the 'Jan Kavita' with his signature 'garaj', in my life.
 
Girda! Thou shall reamin in our memories, thoughts, deeds and actions!
 
Heartfellt condolences!
 
Udaya Pant
IMF  Advisor to Ministry of Finance
Government of Nepal, Kathmandu

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Remembrance -

Girda with Famous Actor Deepak Dobral in his upcoming film "Daye and Baye". In this film Girda has played a Head Master Role.



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Famous Journalist and Editor of Janpaksh Magazine Charu Tiwari Ji giving tribute to Girda.




Chandan Singh Dangi Ji.. Giving Tribute to Girda.



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Hazro logo ne Girda ko Shradhanjali Dee



Devbhoomi,Uttarakhand

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गिर्दा को भाऊ- भीनी सर्धांजलि ,गिर्दा आप हर उत्तराखंडी के दिल अपनी छाप छोड़कर जा रहे हो ,आप अमर हो
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                जनकवि गिर्दा पंचतत्व में विलीन

प्रसिद्ध जनकवि एवं रंगकर्मी गिरीश तिवारी 'गिर्दा' सोमवार को पंचतत्व  में विलीन हो गए। उनकी शवयात्रा में जनसैलाब उमड़ पड़ा। सैकड़ों लोगों ने  गिर्दा के लिखे जनगीतों के साथ शव यात्रा निकाली। समीपवर्ती पाइंस श्मशान  घाट पर उनके पुत्र प्रेम व तुहिनांशु तिवारी ने चिता को मुखागिन् दी।    जनकवि गिर्दा के कैलाखान स्थित आवास पर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित  करने के लिए सुबह से ही विभिन्न राजनैतिक संगठनों से जुड़े लोगों,  रंगकर्मियों, पत्रकारों, साहित्यकारों, शिक्षकों, व्यापारियों तथा  प्रशासनिक अधिकारियों समेत विभिन्न जन संगठनों से जुड़े लोगों का जुटने का  सिलसिला शुरू हो गया था। प्रात: दस बजे कैलाखान से उनकी शवयात्रा शुरू  हुई। इस दौरान माहौल काफी गमगीन हो उठा। वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें नम  हो गई। गिर्दा की शवयात्रा जनगीतों के साथ शुरू हुई। शव यात्रा में शामिल  जन आंदोलनों से जुड़े लोग गिर्दा द्वारा रचित गीतों को स्वर दे रहे थे। यह  सिलसिला पाइंस श्मशान घाट तक अनवरत चलता रहा। श्मशान घाट में मुख्यमंत्री  की ओर से विधायक खड़क सिंह बोहरा, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्या तथा  जिलाधिकारी शैलेश बगौली ने गिर्दा के पार्थिव शरीर पर पुष्प चक्र अर्पित  किए। पुलिस प्रशासन की ओर से आरआई प्रेम सिंह राणा ने पुष्पांजलि अर्पित  की। श्मशान घाट पर गिर्दा के पुत्रों प्रेम व तुहिनांशु तिवारी ने उनकी  चिता को मुखागिन् दी। इस दौरान विभिन्न जनांदोलनों से जुड़े गिर्दा के  साथियों ने उन्हे नम आंखों से अंतिम विदाई दी।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6670046.html


       

sanjupahari

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श्रध्दा सुमन
गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’
9 सितम्बर 1945 - 22 अगस्त 2010

दुनिया से जानेवाले जाने चले जाते हैं कहाँ.. कैसे ढूंढें कोई उनको...नहीं क़दमों के भी निशाँ ..




यूँ तो प्रत्येक  उत्तराखंड प्रेमी की  ' गिर्दा' से जूडी कुछ यादें होंगी  परन्तु हर व्यक्ति विशेष की स्वयं से जूडी यादें सर्वदा विक्षिप्त होती हैं..
 
गिर्दा से पहली मुलाकात का मौका मुझे वर्ष 2003 में दिल्ली में मिला, जब श्री नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ उनकी जुगलबंदी के कार्यक्रम के बाद मैं उन्हें उनके घर छोड़ने गया। उसके बाद उत्तराखंड से जुड़े और भी कई सांस्कृतिक कार्यकर्मों में उनसे मुलाकात हुई। उत्तराखंड और उत्तराखंड के विकास के प्रति उनका जोश देखते ही बनता था। मुझे आज भी याद है 25 नवम्बर 2006 का दिन जब क्रियेटिव उत्तराखंड-म्यर पहाड़ की टीम  नैनीताल, उत्तराखंड पहुंची और वहां उपस्थित महानुभावो में ' गिर्दा भी थे। पहाड़ और हिमालय के प्रति हमारे जुड़ाव को देखकर ' गिर्दा' गुनगुनाये थे...
 
दिल लगाने में वक्त लगता है…
डूब जाने में वक्त लगता है…
वक्त जाने में कुछ नहीं लगता…
वक्त आने में वक्त लगता है…

28 जुलाई 2007 में उत्तराखंड असोसिऐशन ऑफ़ नोर्थ अमेरिका (UANA) के  नवे  वार्षिक समारोह के अवसर पर एक बार फिर अमेरिका में उनसे साक्षात मुलाकात  हुई। यह मेरा सौभाग्य
था की उनके साथ एक ही मंच पर खड़ा रहकर मुझे हुडुक बजाने का अवसर मिला।




 





पर शायद मैं इतना खुशनसीब नहीं हूँ की उनके इस धरती से हमेशा के लिए  चले जाने से पहले उनसे आखिरी बार बात कर पाता.. उनके अस्वस्थ होने की खबर मुझे 20 अगस्त 2010 को मिल गयी थी..परन्तु किसी कारणवश उनसे उस दिन बात न हो सकी..  21 अगस्त 2010 की रात भी ये सोचकर सोया, की कल सुबह सबसे पहले गिर्दा के हाल समाचार पूछुंगा... पर वो कहावत की ' कल कभी नहीं आता' सच हो गयी... अगली सुबह का सूर्य अपने साथ उनके देवांगत होने की खबर लाया... और उनसे एक बार बात करने की इच्छा केवल इच्छा बन कर रह गयी।
 
गिर्दा के जाने से उत्तराखंड ने ना केवल एक निष्पक्ष और निस्वार्थी नागरिक खोया है, बल्कि आज की युवा पीढ़ी जो अपने पहाड़ के लिए कुछ करना चाहती है, उसने एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक भी खोया है। गिर्दा के यकायक चले जाने से उत्तराखंड नव-चेतना में जो शुन्य बन गया है.. उसे शायद ही कभी पूरा किया जा सकेगा. पर गिर्दा की निम्नलिखित पंक्तियों के साथ मैं यही आशा करता हूँ की एक दिन, वो दिन जरूर आएगा जिसकी चाह और राह में चलते हुए हमारे गिर्दा हमसे इतनी दूर चले गए की अब उनकी केवल यादें ही शेष हैं....
 
जेंता एक दिन त आलो ये दुनी में..
चाहे हम न ल्या सकूं, चाहे तुम नि ल्या सको..
जेंता क्वे ने क्वे तो ल्यालौ.. ये दुनी में..
जेंता एक दिन त आलो ये दुनी में..


कितना अच्छा हो...अगर हम और आप उनकी याद में केवल वक्त न बिताएं...बल्कि उन यादों में बसे उनके अधूरे सपनो को सच करने के लिए एक जुट होकर प्रयास करें... वही हमारी उनके प्रति सबसे बड़ी श्रधांजलि होगी।


गिर्दा आप कभी जा नहीं सकते क्यूंकि आप हमारी यादों और हमारे पहाड़ की बुनियादों में हमेशा जीवित रहेंगे...


 म्यर पहाड़ और अमेरिका में बसे सभी पहाड़ प्रेमियों  की ' गिर्दा' को भावभीनी श्रधांजलि..आपको संजुपहाडी और बिंदिया का शत शत नमन..

 

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