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Custom of Sacrificing Animals,In Uttarakhand,(उत्तराखंड में पशुबलि की प्रथा)

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, October 28, 2009, 07:18:01 AM

उत्तराखंड में पशुबलि की प्रथा बंद होनी चाहिए !

हाँ
53 (69.7%)
नहीं
15 (19.7%)
50-50
4 (5.3%)
मालूम नहीं
4 (5.3%)

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Devbhoomi,Uttarakhand

हेम दाजू मैं आपकी बात से सहमत हूँ लेकिन क्या ये बलि प्रथा चलती रहनी चाहिए, मुझे लगता है अब पशुओं की बलि चढ़ाना भी एक अंध विस्वास  ही हैंमोर ज्यादा तर उत्तराखंड के गाँवों मैं ये प्रथाएं लोग आज भी मानते हैं और बेजुबान जान्बरों की हत्याएं करते आ रहे हैं !

हेम पन्त

निरीह पशुओं का बलि के नाम पर हत्या करना घृणित कार्य है, समाज में जागरूकता फैलाकर इस कुप्रथा को धीरे-धीरे समाप्त किया जाना जरूरी है. इस प्रथा के पीछे धार्मिक भावनाएं जुड़ी हैं इसलिये किसी कानून के अन्तर्गत इन पर प्रतिबन्ध लगाने की बजाय लोगों को यह बात समझानी पड़ेगी कि देवताओं को बिना पशुओं की बलि दिये भी प्रसन्न किया जा सकता है.


हेम पन्त

पौड़ी जिले के खैरलिंग मन्दिर में प्रतिवर्ष पशुबलि दी जाती है लेकिन अब कुछ संस्थाएम इस प्रथा का विरोध कर रही हैं. सम्बन्धित खबर "नैनीताल समाचार" की साइट पर जाकर पढें-

www.nainitalsamachar.in/animal-sacrifice-in-khairling-fair-of-uttarakhand/

Devbhoomi,Uttarakhand


                                       हिंदू धर्म में पशुबलि मान्य नहीं
                                   =====================

पौड़ी गढ़वाल)। भाजपा सांसद व 'पीपुल्स फॉर एनीमल्स' की संस्थापक मेनका  गांधी ने कहा कि हिंदू धर्म के किसी भी ग्रंथ में पशुबलि को मान्यता नहीं  दी गई है। यदि हिंदू व्यक्ति पशु बलि देता हैं तो वह धर्म के विरूद्ध  होगा।

बूंखाल (पौड़ी) से दिल्ली वापस लौटते हुए कोटद्वार में रात्रि विश्राम  को पहुंची भाजपा सांसद मेनका गांधी ने कहा कि कतिपय हिंदू संगठन उनका  विरोध कर रहे हैं, लेकिन इन संगठनों को शायद यह जानकारी नहीं कि मात्र  हिंदू धर्म ही एक ऐसा धर्म हैं, जहां पशुबलि का मान्यता नहीं है। उन्होंने  कहा कि उत्तारांखड देवभूमि है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस पावन  भूमि में आज भी पशुबलि प्रथा है।

उन्होंने कहा कि बूंखाल से उन्होंने  उत्ताराखंड में पशुबलि रोकने की मुहिम शुरू की है व अगले चरण में वे  कुमाऊं का भ्रमण कर वहां भी लोगों को जागरूक करने का प्रयास करेंगी। गांधी  ने कहा कि बल प्रयोग से पशुबलि नहीं रुक सकती।

जरूरत है तो लोगों को  पशुबलि रोकने के लिए जागरूक करने की। वन अधिनियमों के कारण लटकी विकास  योजनाओं के मामले में उन्होंने कहा कि वन्य जीवों के प्राकृतिकवास में  दखलअंदाजी ठीक नहीं। उन्होंने इस संदर्भ में अन्य विकल्प तलाशने की जरूरत  पर भी जोर दिया।

Jagran news

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



कई जगहों पर पशु बलि के खिलाफ लोग आवाज भी उठा रहे रहे और लोग जागरूक भी हो रहे है!

जागरूकता ही सही निदान है इस समस्या का!

राजेश जोशी/rajesh.joshee

पशु बलि प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति का अंग रही है, इसको बंद करवाना मुझे कोई जरुरी नही लगता है|  हमारे समाज में जब इंसानों के साथ कई तरह के जुल्म इंसान द्वारा किये जा रहे हैं तो ऐसे में केवल पशु बलि को मुद्दा बनाना एक ढोंगबाजी और सस्ती लोक्प्रियता प्राप्त करने  के जरिये के अलावा कुछ नहीं है| 
अगर गलत है तो यह की किसी को पशु बलि के लिए मजबूर किया जाये।  अगर कोई अपनी खुशी से मन्दिर में पशु बलि देता है तो इसमें क्या बुराई है।  अपने आप को पशु संरक्षण का मसीहा समझने वाली श्रीमति मेनका गांधी जी क्या जामा मस्जिद  के बाहर लगने वाले पक्षियों के बाजार को बंद करवा पाई? उनके संगठन के लोग खुले आम सीधे साधे लोगों को डरा धमकाकर उनसे वसूली करते हैं या बस अखबार में फ़ोटो खींचवाने के जुगाड़ में लगे रहते हैं। 
क्या मन्दिर में पशु बलि ना होने से बाजार में मांस की बिक्री बन्द हो जायेगी?
क्या बकरा ईद पर कुर्बानी रूक जायेगी?
क्या लोग मांस खाना छोड़ देंगे? 
जब कोई कुछ छोड़्ने को तैयार नही तो हम अपनी परंपरा क्यों त्यागें?
केवल इन ढोगी समाज सुधारकों की वजह से?
अगर कुछ करना है तो लोगों को मांसाहार से शाकाहार के लिए प्रेरित किया जाये।  नाकि इन ढोंगियों के साथ होकर इनके पुरस्कार लेने के जुगाड़ में इनका साथ दिया जाये। 
अगर सब शाकाहारी हो जायेंगे तो यह समस्या अपने आप हल हो जायेगी। 
अन्त में मैं यह भी बता देना चाहता हूं कि मैं खुद शाकाहारी हूं पर मुझे मन्दिरों में दी जाने वाली पशु बलि में कोइ बुराई नजर नही आती है।

सत्यदेव सिंह नेगी

मै जोशी जी से पूर्णतः सहमत हूँ
हिन्दू धर्म में नास्तिकों के लिए भी जगह है और इसी जगह का कई सरफिरे फायदा उठाते रहते हैं किसी भी फोरम में कुछ भी लिख कर. अगर किसी भी तरह की बलि
के लोग खिलाफ हैं तो मच्छर मक्खी क्यों मारते हैं  कोकरोच क्यों मारते हैं चूहे क्यों मारते हैं
अपनी बात के जरिये प्रसिद्धि पाने के एक सस्ता हत्कंडा मात्र है ये
जय उत्तराखंड
जय भारत
Quote from: राजेश जोशी/rajesh.joshee on August 07, 2010, 02:27:24 PM
पशु बलि प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति का अंग रही है, इसको बंद करवाना मुझे कोई जरुरी नही लगता है|  हमारे समाज में जब इंसानों के साथ कई तरह के जुल्म इंसान द्वारा किये जा रहे हैं तो ऐसे में केवल पशु बलि को मुद्दा बनाना एक ढोंगबाजी और सस्ती लोक्प्रियता प्राप्त करने  के जरिये के अलावा कुछ नहीं है| 
अगर गलत है तो यह की किसी को पशु बलि के लिए मजबूर किया जाये।  अगर कोई अपनी खुशी से मन्दिर में पशु बलि देता है तो इसमें क्या बुराई है।  अपने आप को पशु संरक्षण का मसीहा समझने वाली श्रीमति मेनका गांधी जी क्या जामा मस्जिद  के बाहर लगने वाले पक्षियों के बाजार को बंद करवा पाई? उनके संगठन के लोग खुले आम सीधे साधे लोगों को डरा धमकाकर उनसे वसूली करते हैं या बस अखबार में फ़ोटो खींचवाने के जुगाड़ में लगे रहते हैं। 
क्या मन्दिर में पशु बलि ना होने से बाजार में मांस की बिक्री बन्द हो जायेगी?
क्या बकरा ईद पर कुर्बानी रूक जायेगी?
क्या लोग मांस खाना छोड़ देंगे? 
जब कोई कुछ छोड़्ने को तैयार नही तो हम अपनी परंपरा क्यों त्यागें?
केवल इन ढोगी समाज सुधारकों की वजह से?
अगर कुछ करना है तो लोगों को मांसाहार से शाकाहार के लिए प्रेरित किया जाये।  नाकि इन ढोंगियों के साथ होकर इनके पुरस्कार लेने के जुगाड़ में इनका साथ दिया जाये। 
अगर सब शाकाहारी हो जायेंगे तो यह समस्या अपने आप हल हो जायेगी। 
अन्त में मैं यह भी बता देना चाहता हूं कि मैं खुद शाकाहारी हूं पर मुझे मन्दिरों में दी जाने वाली पशु बलि में कोइ बुराई नजर नही आती है।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Joshi ji,

In my opinion, everybody has different views on this issue. Some are in favour and some against of this system. Religious points of if we see this, people give "Bali" of animals get their wishes fulfilled from God and Goddess. In another words, we can say that we kill animals at sacred places just to make God and Goddess happy so that we get blessing from them for prosperity and happiness in our life.

Second ":Bali:" is given to get rid off from evil souls like Masan, Ghost etc. Once I asked a Pujari why we give a bali to Masan, replied that evil soul will happy to see the blood and will then leave person.

The matter is totally complicated. I have seen in many temples when "Bali:" is performed a curtain is hanged before the "Shakti". In ancient, it is said there was system of human bali also which later has changed in coconut, goat etc.

I do not support Bali Pratha but somehow we have to agree it as once I saw in the village that without giving Bali God will never be happy. But time is coming either God will change or human being mindset.   



दीपक पनेरू

भारतीय समाज एक आदर्श एवं अति सभ्य समाज के रूप मैं जाना जाता है, जहाँ पर माँ-बाप, भाई-बहिन एवं पड़ोशी को भगवान जैसा सम्मान दिया जाता है, यहाँ तक की जानवरों की भी पूजा की जाती है, आस्था भारतीय समाज का एक आधार रही है, चाहे वह राजा महाराजो का समय हो या फिर आज का युग. आस्था सब पर सदा से भारी रही है, इसी समाज में आस्था के चलते उत्तराखंड के चम्पावत जिले के देवीधुरा तथा गढ़वाल में बुखाल नामक स्थानों पर रक्षाबंधन के समय तथा उसके बाद बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है. जिसमें आस्था से लवरेज लोगो का हुजूम उमड़ता है साथ ही आस्था के नाम पर इन स्थानों में बेजुबान पशुओ की पशुबलि देने का रिवाज है, ये वही पशु होते है जिनके दूध, दही घी को हम अपने स्वास्थ्य के निर्माण हेतु प्रयोग में लाते है, आस्था हम पर ऐसी भारी पड़ती है कि हम इन बेजुबान पशुओं को अपने स्वार्थ पूर्ती हेतु भगवान के मंदिर में बलि चढाने से भी नहीं कतराते. यही नहीं इससे पहले जानवरों के साथ बहुत ही क्रूर व्यव्हार किया जाता है, जानवरों को बलि चढाने के लिए मंदिर स्थल में लाने से पहले लाठी डंडो से काफी पीटा जाता है (सुने हुए किस्सों के आधार पर) कि वे मंदिर स्थल तक पहुचने से पहले ही निष्प्राण हो जाते है, इसी भारत में कुछ जातियां गायों को माता कहकर पुकारती है तथा अपनी शुद्धि के लिए गौमूत्र का इस्तेमाल करती है, सरकार के द्वारा भी इन पशुओ के मल-मूत्र आदि से विभिन्न प्रकार कि दवाइयां बनाने का अस्वासन दे चुकी है यहाँ तक कि इस स्तर पर कार्य भी शुरू हो चुका है, लेकिन इस प्रकार के मेले (देवीधुरा तथा बुखाल) को रोकने में सरकार नाकाम रही है, ओ इसलिए ताकि इन राजनीतिज्ञों पर देवी माँ या भगवान का कोई प्रकोप न पड़े जाये. केंद्र में बैठी सरकार कहती है कि 2015 तक देश को विकशित देशों कि श्रेणी में लाकर खड़ा करेंगे, जो मुझे काफी असंभव दिखता है, भारत को विकशित देश बनने में अभी काफी वक़्त लगने वाला है, क्यूंकि (देवीधुरा तथा बुखाल) मेला तो विश्वप्रसिद्द है लेकिन इस प्रकार से पता नहीं कितनी जगहों पर और कितने जानवरों कि बलि दी जाती होगी. अगर यह सिलसिला इसी तरह से चलता रहा तो भारत में देवभूमि के नाम से प्रसिद्द ये उत्तराखंड राक्षशों कि भूमि कहलायेगा क्योकि पुराणों मे राक्षशों के नाम पर ही ऐसे क्रत्यों को लिखा, पड़ा और सुना गया है, इस सम्बन्ध में जब तक कोई समाज सुधारक, कोई स्वयं सेवी संगठन या हमारी सरकार कोई पहल नहीं करेगी इन बेजुबान पशुओं कि इसी तरह से निर्मम हत्या होती रहेगी और पवित्र देव भूमि अपवित्र होती रहेगी, ओ दिन दूर नहीं  होंगे जब फिर महिषासुर जैसे दानवों का जन्म इस भूमि पर होगा क्योकि गिद्ध वही जाते है जहा जानवर मरे होते है, जहा खाना होता है असुरों का खाना परोशकर हम   असुरों को दावत दे रहे है, जब जानवर खत्म हो जायेगे तब हमारी बारी होगी ये सुनने में अजीब लगता होगा. लेकिन ओ दिन दूर नहीं ...........