Author Topic: CONDOLENCE - शोक संदेश  (Read 48387 times)

खीमसिंह रावत

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Re: CONDOLENCE - शोक संदेश
« Reply #160 on: February 13, 2012, 08:00:31 AM »
  :(
ॐ शांति शांति ..............

शक्ति दे सहन करने की,   दुःख की घडी में |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Merapahad Community pays tribute to great poet of Uttarakhand Sher Da.
May God his soul rest in peace!


शेरदा के काव्य पर आखिरी बात

Story Update : Monday, May 21, 2012     1:18 AM 
     

  [/t][/t]   राजीव पांडे
शेरदा आज हमारे बीच नहीं रहे। ये शेरदा अनपढ़ का आखिरी साक्षात्कार जो कुछ दिन पहले अमर उजाला ने उनके आवास पर लिया था।

नेफा और लदद्खा से काव्य जीवन की शुरूआत करने वाले शेरदा अनपढ़ कुमाऊं के महान कवि गूमानी और गौर्दा की पंरपरा के थे। 1939 में गौर्दा के जाने के बाद कुमाउंनी काव्य में जो शून्य उभरा था उसे अकेले शेरदा अनपढ़ ने भरा था। अब उनके आगे इस परंपरा का कोई दूसरा लोक कवि नजर नहीं आता।
शेरदा की कविताओं की काव्यात्मकता, छंद, लय और तुक उन्हें अन्य से विशिष्ट बनाती है। गूमानी की तरह शेरदा की कविताओं में लोक की पीड़ा है तो गौर्दा की तरह का राष्टप्रेम भी है। उनके बिना कुमाउंनी काव्य की चर्चा हमेशा अधूरी रहेगी। उनके काव्य के कई आयाम हैं। शेरदा लोक से सीखकर लोक के लिए लिखने वाले कवि थे। सामाजिक विसंगतियां उनकी कविताओं के केन्द्र में रहीं। कुमाउंनी कविता की उनकी पहली लघु पुस्तिका ‘दीदी-बैणी’ इसका मजबूत हस्ताक्षर है। शेरदा की कविताओें में जीवन का संघर्ष और उनकी मर्मस्पर्शी गाथाएं हैं तो हास-परिहास का गजब मेल भी उनकी कविताओं में मौजूद है।

गुच्ची खेलनै बचपन बिती
अलमाड़ गौं माल में
बुढ़ापा हल्द्वाणि कटौ
जवानी नैनीताल में

ये शेरदा का परिचय देने का अंदाज है। गुच्ची खेलते हुए अल्मोड़ा के गांव मॉल में उनका बचपन बीता। 86 साल के शेरदा अभी हल्द्वानी में रहते हैं। जवानी का एक बड़ा हिस्सा नैनीताल में बीता था। इस उम्र में भी उनकी वैचारिक ऊर्जा का कोई सानी नहीं है। उस दिन जब मैं करीब 11 बजे शेरदा से मिलने पहुंचा तो वह सुबह-सुबह देहरादून से लौटे थे। रातभर सफर के बाद चेहरे पर चमक देखकर मैंने पूछ ही लिया इतनी ताकत कहां से जुटाते हैं तो शेरदा बोले,

अब शरीर पंचर हैगो
चिमाड़ पड़ि गेईं गाल में
शेरदा सवा शेर छि
फसि गो बडुवाका जाल में

उनकी इन चार लाइनों में कमजोर काया के कारण पिछले दस वर्षों में नया कुछ न लिख पाने की टीस है। गालों में पड़ी झुरियों पर हाथ फेरते हुए कहते हैं, अब शरीर पंचर हो गया है। कभी शेरदा सवा शेर था और आज मकड़ी के जाल में फंसा है। अलग राज्य बनने के बाद शेरदा ने कुछ लिखा ही नहीं। नये राज्य के हालातोें पर बात करनी चाही तो अपनी चार पंक्तियों में सारी पीड़ा कह दी,

नैं नौकरी नैं चाकरी
नैं देई-द्वार घर
ओ शेरदा
यौ मुलुक छु त्योर

न नौैकरी, न चाकरी, न घर-द्वार ओ शेरदा ये देश है तेरा। ये है शेरदा की ऊपर दी गई चार पंक्तियों का अर्थ। जो आज राज्य की सबसे बड़ी समस्या और उत्तराखंड पर लगे पलायन के कलंक का प्रमुख कारण है। शेरदा की बड़ी खासियत यही है कि राज्य की हर उस समस्या को जिसे आवाज की आवश्यकता थी उन्होंने कविता में ऐसे पिरोया जैसे वह उनकी अपनी पीड़ा हो। ये शेरदा को लोक के और करीब लाने के साथ ही कई भाषाओं में कविता करने वाले पहले कुमाउंनी कवि गूमानी और बाद में गौर्दा के समांतर लाकर खड़ा करती है। लेकिन शेरदा के पूरे जीवन का संघर्ष और घोर गैर साहित्यक माहौल में उनकी प्रतिभा का इस तरह उभरना उन्हें अन्य कवियों से बहुत आगे ले जाता है।

गरीब घर में पैद हयूं
अफाम छि बौज्यू हिट दिं
तब पडौसियों क मकान में रूंछी
जर, जमीन बौज्यू कि बीमारी में
गिरवी पड़ि गे
इजाक ख्वार मुशीबत पड़ि गे
दुंग बोकि बेर पेट भरछीं
बौल-बुति करि बेर झुगलि ल्यू छी
दिन बार बितनैं गईं, दिन मांस काटीनैं गईं
और दुख दगाड़ हिटनै गईं

ये शेरदा के जीवन संघर्ष की गाथा है। गरीब घर में पैदा हुए। शेरदा कहते हैं कविता का पहला पाठ उन्होंने अपनी मां से ही सीखा। वह गीत गुनगुनाती थी और शेरदा उनके पीछे-पीछे गाते थे। मां की मदद के लिए पांच साल के शेरदा ने गांव में ही नौकरी की और इसके बाद अल्मोड़ा में एक अध्यापिका के घर पर उन्हें काम मिला। यहीं शेरदा को अक्षर ज्ञान भी हुआ। इसके बाद कुछ करने की तमन्ना में शेरदा को भी घर से दूर जाना पड़ा जो पहाड़ के हर युवा बेरोेजगार की कहानी है। इलाहाबाद, और आगरा में रहकर शेरदा ने होटलों में काम किया। इसके बाद,

एक दिन डोईनै-डोईनै
आगरा में भरती दफ्फतर पुजि गयूं
बौय कंपनी भरती हुनैछीं
मै लै ठाड़ है गयूं
चार फेल बतै बेर एएससी बौय कंपनी में
31 अगस्त 1950 में भरती है गयूं

एक दिन घूमते-घूमते शेरदा आगरा भर्ती दफ्फतर पहुंच गए। खुद को चौथी फेल बताकर सेना में भर्ती हुए। यहीं से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया। हालांकि इसके बाद मलेरिया और क्षय रोग से उन्हें संघर्ष करना पड़ा। क्षय रोग के इलाज के लिए उन्हें पूना के मिलिट्री हास्पिटल में भर्ती कराया गया। यहां ढाई साल तक उनका उपचार हुआ। इसी बीच 1962 में भारत-चीन युद्ध के घायल फौजियों के साथ रहने का मौका मिला। घायल जवानों का  दर्द ही शेरदा की पहली रचना ये कहानी है नेफा लद्दखा की बना। इसकी लघु पुस्तिका को छपवाकर शेरदा ने उन्हीं जवानों में चार आने में बांटा।  उनकी कुमाउंनी कविताओं की शुरूआत भी पूना में ही हुई। पूना के बाजार और कोठों में पहाड़ से भगाकर लाई गईं औरतों से मिल शेरदा विचलित हुए और उनकी पीड़ा को कविता में पिरोकर ‘दीदी-बैणी’ लिखी। इसे भी शेरदा ने स्वयं छपवाया और पीड़ितों में ही 60 पैसे में बेचा। इसके बाद शेरदा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1963 में सेना से घर आए।  अपने गांव माल आकर ‘हॅसणौ बाहर’ और ‘हमार मै-बाप’ कविता संग्रह छापे। अब तक चार लघु पुस्तिकाओं के साथ शेरदा के तीन कुमाउंनी कविता संग्रह आ चुके हैं। मेरि लटि पटि 1981। ये संग्रह पिछले तीन दशक से कुमाऊं विश्वविद्यालय के  स्नातकोत्तर पाठयक्रम में भी शामिल है। इसके अलावा जांठित घुडुर 1994, फचैक बालम सिंह जनौटी के साथ 1996 में । शेरदा ने कुमाउनी में काठौती में गंगा 1985 शीर्षक से एक गीत नृत्य नाटिका भी लिखी है। अब शेरदा आगे कुछ नहीं लिखना चाहते। पीड़ा इस बात की है कि लोगों को अपनी भाषा से प्रेम ही नहीं। बड़ी सादगी से कहते हैं कौन खरीदता है कुमाऊंनी में लिखाी किताबाें को। (Amar Ujala)

विनोद सिंह गढ़िया

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दै जसी गोरी उजई, और बिगोत जै चिटी।
हिसाऊ किल्मोड़ी कसि, मणि खट्ट मणि मीठी।
आँख की तारी कसि, आँख में ले रीटी।
ऊ देई फुलदेई हैजैं, जो देई तू हिटी।
हाथ पाटने हरै जाँछै, कि रूडी द्यो छै तू।
सूर सूरी बयाव जसी, ओ च्यापिणी कोछै तू ?


इस हास्य कविता को तो आप शेरदा अनपढ़ जी की जुबानी से सुन चुके होंगे, लेकिन आज आपको सूचित करते हुए दुःख हो रहा है। आज हमारे बीच कुमाऊं के सुप्रसिद्ध हास्य कवि श्री शेर सिंह बिष्ट 'शेरदा अनपढ़' नहीं रहे।


03.10.1933-20.05.2012
मेरा पहाड़ फोरम की ओर से श्री शेरदा को भावभीनी श्रद्धांजलि। प्रभु दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें

Ajay Tripathi (Pahari Boy)

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Re: CONDOLENCE - शोक संदेश
« Reply #163 on: May 21, 2012, 03:50:57 AM »
It is very sad to hear this that Sri Sarda is no more, may god bless his soul

C.S.Mehta

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Re: CONDOLENCE - शोक संदेश
« Reply #164 on: May 21, 2012, 03:54:39 AM »
हे भगवान! शेरदा के आत्मा को शांति दे
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पंकज सिंह महर

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Re: CONDOLENCE - शोक संदेश
« Reply #165 on: May 21, 2012, 05:18:51 AM »
बखत...त्यरी बला ल्यूंहल,  शेर दा शायद इन्हीं पंक्तियों को गुनगुनाते हुये ब्रह्मलीन हुये होंगे, कुमाऊंनी भाषा के इस सशक्त हस्ताक्षर को मेरा पहाड़ परिवार की भावभीनी श्रद्धांजलि एवं नमन।


हुक्का बू

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Re: CONDOLENCE - शोक संदेश
« Reply #166 on: May 21, 2012, 05:44:45 AM »
गुच्ची खेलनै बचपन बीतौ,
अल्माड़ गौं माल में,
बुढ़ापा हल्द्वानी कटौ,
जवानी नैनीताल में,
अब शरीर पंचर हैगौ,
चिमड़ पड़ गयी गाल में,
शेर दा सवा सेर ही,
फंस गौ बडऩा जाल में।

इन शब्दों में शेर दा ने अपने जीवन को दर्शाया है, आज शेर दा हमारे बीच में नहीं रहे, लेकिन उनकी कवितायें और उनके गीत हमेशा हमारे मानस पटल पर अंकित रहेंगे, साथ ही उनके व्यंग्य हमेशा हमारे मन-मस्तिष्क को झंझोड़ते रहेंगे।

श्रद्धासुमन.......।


हेम पन्त

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Re: CONDOLENCE - शोक संदेश
« Reply #167 on: May 21, 2012, 05:47:37 AM »
शेरदा "अनपढ़" के शब्दों में ही उनको भावभीनी श्रद्धान्जली.. शेरदा तुम जरूर दयाप्ता क ठौर पुजिगे हनाला..

गुणों  में  सौ  गुण  भरिया, यो दुनि में गुनै  चैनी
जो फूलो में खुसबू हुनी, ऊ दयाप्त थें पूजी जानी

मनखी में गुण जै होला, दयाप्त समान होल
और दयाप्त जै भीमै होला, भीमै आसमान होल

रंग चड़ा ऊ लालो को, जो रंग में भिज गयी
मनख्या बाछ छी ऊ, दयाप्ता  ठौर पूज गयी

अड़्याट

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Re: CONDOLENCE - शोक संदेश
« Reply #168 on: May 21, 2012, 05:52:04 AM »
स्यैणी लटक रे मैत में,
होलि फटक रै चैत में,
कैक करुं मुखड़ि लाल,
कै कें लगु रंग गुलाल।

यह पहली कविता थी शेर दा की जो मैने सबसे पहले सुनी थी  और सुनते ही लगा कि, अरेऽऽऽ यह तो मेरी कविता है, मेरे ही भाव हैं। आज ऐसा कवि हमारे बीच से चला गया, जो कहीं दूर, हमसे दूर रहकर भी हमारे भावों को, हमारी भावनाओं को शब्द देता था।

एक और कविता जो हम सब के लिये प्रेरणादायी है और होनी चाहिये-
"गुणों में सौ गुण भरिया, म्यार पहाड़क नान्तिनों,
ये दुनि में गुणै चाईनी, म्यार पहाड्क नान्तिनों।"


हार्दिक श्रद्धांजलि।

Rajen

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Re: CONDOLENCE - शोक संदेश
« Reply #169 on: May 21, 2012, 08:03:12 AM »
सारी उम्र हंसाने वाला आज रुला गया रे. बहुत याद आओगे हो 'शेरदा' .

 

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