Author Topic: Religious Chants & Facts -धार्मिक तथ्य एव मंत्र आदि  (Read 34410 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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1 सूत्र! जो बेहद आसान बना देता है सफलता व तरक्की की राह

कामयाबी व तरक्की की चाहत किसे नहीं होती? चूंकि तरक्की के रास्ते ही कामयाबी का ऊँचा मक़ाम पाना संभव है। इसलिए हर व्यक्ति द्वारा आगे बढऩे की कवायद अलग-अलग तरीकों से की जाती है। जिससे कुछ लोगों को कामयाबी आसानी से नसीब होती दिखाई देती है, तो कुछ लोगों के लिए सफलता की डगर बेहद कठिन भी होती है।

सवाल यह उठता है कि सफलता की राह सरल या कठिन बनाने में कौन-सी बातें निर्णायक हो जाती है? असल में इसके लिए चाहत ही काफी नहीं होती बल्कि सबसे अहम बात है सही सोच और सही दिशा में की गई कोशिश। जिनके साथ स्थिति, हालात और सुविधाएं कामयाबी में सहारा बन जाती हैं।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में तरक्की की सीढिय़ों पर चढऩे के लिए ही ऐसे सरल सूत्रों को बताया गया है, जो व्यावहारिक और सांसारिक जीवन के लिए भी सटीक बैठते हैं। जानें वेदों में बताए इन बेहतरीन सूत्रों को -

वेदों में लिखा है -

आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम।

इस एक वेद सूत्र का सरल शब्दों में निचोड़ यही है कि -

- आगे बढऩे के लिए हमेशा सफल, विद्वान और बुद्धिमानों को प्रेरणा बनाकर कोशिश करें।

- हमेशा दिमाग में आगे बढऩे या बड़े लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सिलसिलेवार  छोटे-छोटे लक्ष्य को बनाना और पाना बेहतर तरीका है।

- यही नहीं अपने बराबर वालों से आगे बढऩा बेहतर होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी को कमतर जताकर या बताकर आगे बढ़े। बल्कि इस बात का ज्ञान के नजरिए से मतलब है कि कुशल लोगों से प्रतियोगिता कर उनसे कुछ सीखकर आप भी बेहतर बन अच्छे नतीजे पा सकते हैं।

- दूसरी बात कि नासमझ, अज्ञानी लोगों से बराबरी या तुलना कर तरक्की की कोई कोशिश न करें। क्योंकि उनको ज्ञान देना खुद का समय और ऊर्जा बर्बाद करना होता है। जिससे आप अपने मकसद से भी भटक सकते हैं।

http://religion.bhaskar.com/article/dharm-1-formula-for-get-success-and-progress-easily-2749213.html?LHS-

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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संकट, विपत्ति, आफत, पीड़ा रूपी दु:खों से हर व्यक्ति बचना चाहता है। लेकिन सांसारिक नजरिए से सुख-दु:ख जीवन का हिस्सा है। इसलिए इनसे इंसान को दो-चार होना ही पड़ता है।

धार्मिक मान्यता है कि शनि दोष यानी शनि के कोप से ऐसे ही अचानक दु:खों का सामना हो सकता है। ऐसे ही दु:खों से बचने या दूर करने के लिए शनिवार के दिन शनि दर्शन, जूते-चप्पलों को छोडऩा, वस्त्रों का त्याग या शनि के दान का महत्व बताया गया है।

ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक शनि ग्रह के बुरे असर साढ़े साती, शनि की महादशा या राशि परिवर्तन में अधिक दिखाई देते हैं। शनि की ऐसी टेढ़ी चाल और तिरछी नजर किसी भी व्यक्ति के जीवन में उथल-पुचल मचाने वाली मानी जाती है।

यही कारण है कि शनि की इन दशाओं के साथ-साथ खासतौर पर शनिवार के दिन शनि भक्ति, उपासना और मंत्र जप प्रभावी माने जाते हैं। जिनसे हर तरह की परिशानियों का सिलसिल थम जाता है। जानते हैं ऐसे ही शनि की सामान्य पूजा के बाद बोले जाने वाला विशेष संकटमोचक मंत्र -

- शनिवार के दिन स्नान कर शनि की लोहे की मूर्ति को तिल को तेल चढ़ाएं। साथ ही गंध, अक्षत के साथ खासतौर पर नीले लाजवंती के फूल अर्पित करें।

- इस पूजा के बाद शनि गायत्री मंत्र के अचूक संकटनाशक मंत्र का यथाशक्ति अधिक से अधिक बार जप करें -

ऊँ भगभवाय विद्महे,

मृत्युरूपाय धीमहि, 

तन्नो सौरी: प्रचोदयात।। 

- मंत्र जप के बाद तिल के तेल से दीप जला शनि आरती कर बोल, मन या व्यवहार से हुए दोषों की क्षमा मांग दु:ख-पीड़ा के अंत की प्रार्थना करें।


Source - http://religion.bhaskar.com/article/ups-all-problems-remove-by-this-effective-shani-mantra-2745693.html?LHS-

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ज्ञान या विद्या, धन अर्जन के भी योग्य बनाने वाली मानी गई है। क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि विद्या से विनम्र और उदार बनाती है। वहीं विन्रमता, योग्यता बढ़ाने की राह आसान बनाती है। जिससे धन के साथ सारे सुख प्राप्त होते हैं। किंतु इसके लिए मन-मस्तिष्क से ऊर्जावान, दृढ़ और एकाग्र होना जरूरी होता है।

आज शुक्रवार को देवी उपासना के विशेष दिन के साथ पंचमी तिथि का योग बना है, जो विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना की शुभ तिथि मानी जाती है। ऐसे शुभ योग में खासतौर पर याददाश्त या मानसिक क्षमता मजबूत बनाने के लिये माता सरस्वती का विशेष मंत्र  बोलना बहुत ही शुभ फल देने वाला माना गया है।

- माता सरस्वती की प्रतिमा को सफेद चंदन, अक्षत, सफेद फूल व दूध से बनी खीर या प्रसाद अर्पित कर पूजा करें। धूप व दीप जलाकर नीचे लिखा सरस्वती मंत्र बोल मन-मस्तिष्क को शांत, सबल बनाने की कामना करें -

सरस्वती महाभागे विद्ये कमल लोचने।

विद्यारूपे विशालाक्षी विद्या देहि नमोस्तुते।।


http://religion.bhaskar.com/article/ups-chant-sarswati-mantra-today-for-get-mental-strength-2741835.html?LHS-

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शुक्रवार को यह यह दुर्गा मंत्र बोल पूरी करें हर मुराद

गृहस्थ जीवन की खुशहाली में धन और संतान अहम कारण माने जाते हैं। शास्त्रों के मुताबिक चार पुरुषार्थों में धन और काम भी अहम माने गए हैं। जहां धन जरूरतों को पूरा करता है वहीं संतान इंसान को कर्म और कर्तव्यों से जोड़कर सुखों को देने वाली होती है।

आज के दौर में जबकि पुत्री या पुत्र में भेद करना बेमानी है। फिर भी हर गृहस्थ सुयोग्य पुत्र की कामना रखता है। सांसारिक जीवन की इन कामनाओं को पूरा करने के लिए शास्त्रों में भगवती दुर्गा की उपासना का महत्व बताया गया है।

 भगवती उपासना के लिए बताए गए एक विशेष मंत्र के ध्यान से धन, पुत्र सहित यश, सम्मान भी मिलता है। जानते हैं भगवती दुर्गा के उपासना की सामान्य विधि और मंत्र -

- धन व पुत्र कामना से प्रतिदिन, विशेष तौर पर शुक्रवार को स्नान के बाद पति-पत्नी दोनों देवालय में देवी दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर की पूजा गंध, अक्षत, लाल वस्त्र के साथ विशेष तौर पर दूर्वा और सरसों के फूल चढ़ाएं। भोग लगाकर धूप व आरती करें।

- पूजा के बाद भगवती दुर्गा के इस मंत्र का पूरी आस्था से यथाशक्ति जप करें -

रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि में।

पुत्रान्देहि श्रियं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे।।

इस मंत्र को सरल शब्दों में बोलकर भी प्रार्थना की जा सकती है। अर्थ है - हे मां दुर्गा, आप मुझे रूप, यश और ऐश्वर्य प्रदान करें। आप मेरे लिये पुत्र दें, लक्ष्मी दें और सभी इच्छाओं को पूरा करें।

http://religion.bhaskar.com/article/ups-chant-this-durga-mantra-for-fulfiill-all-desire-2738001.html?LHS-

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कामयाबी हो या दौलत, हर चाह पूरी करे सिर्फ 1 अक्षर के ये 3 गणेश मंत्र

जीवन में अनेक अवसरों पर शरीर में पैदा रोग, धन का अभाव या फिर गलत सोच-विचार यानी बुद्धि दोष बड़ी मुश्किलों का कारण बन जाते हैं। इस तरह की रुकावटों से बचने या पार पाने के लिए जरूरी है कि हर इंसान दिनचर्या में नियम-संयम के अलावा मन-मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए स्वयं को अच्छे लोगों, काम, पुस्तकों और माहौल से जोड़े, जिससे मिला बुद्धि और ज्ञान बल संकटों से निपटने में असरदार साबित होता है।

बुद्धि और ज्ञान बल के जरिए जीवन को साधने और सफलता के रास्ते तय करने के लिए ही शास्त्रों में बुद्धिदाता व विघ्रहर्ता श्री गणेश के स्मरण का महत्व बताया गया है। श्री गणेश उपासना के लिए ही विशेष दिनों में हर माह की चतुर्थी तिथि बहुत ही मंगलकारी मानी गई है। जिनमें माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी यानी संकट चौथ या चतुर्थी (12 जनवरी) शास्त्रों में बड़ी ही संकटमोचक बताई गई है।

जानिए इस शुभ तिथि पर तन, मन या धन से सुख-सफलता की चाह पूरी करने के लिए 3 ऐसे ही मात्र 1 अक्षरी आसान किंतु अचूक गणेश मंत्र -

- संकट चतुर्थी पर प्रात: स्नान के बाद तीर्थ किनारें की मिट्टी या पवित्र स्थान की मिट्टी से बने श्री गणेश या सिंदूर चढ़ी गणेश प्रतिमा की श्रद्धा और आस्था के साथ गंध, चंदन, सिंदूर, फूल, जनेऊ, दूर्वा और 5, 21 या यथाशक्ति लड्डुओं का भोग लगाकर पूजा करें।

- पूजा के बाद नीचे लिखे विशेष गणेश मंत्र के अलावा 1 अक्षरी 3 गणेश मंत्रों का पीले आसन पर बैठ रुद्राक्ष की माला से कम से कम 108 बार संकटमोचन व धन-धान्य की कामना से कर श्री गणेश आरती करें -

गणेश मंत्र -

ॐ महोल्काय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।

एकाक्षरी गणेश मंत्र -

- गं

- ग्लौं

- गौं



http://religion.bhaskar.com/article/ups-chant-this-1-words-3-ganesh-mantra-for-fulfill-desire-of-success-and-wealth-2737698.html?LHS-

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awan Kumar Mehta shared Hanuman Fan Club's photo.Wall Photos नीलांजन समाभासं रवि पुत्रां यमाग्रजं।
 छाया मार्तण्डसंभूतं तं नामामि शनैश्चरम्॥
 
 Om Neelaanjan, Samabhaasam,
 Raviputram, Yamaagrajam!
 Chhaya martand, Sambhutam,
 Tam namami shaneshcharam!!
 
 Oh, Blue-bodied, looking like shadow of the sky, son of the Lord Sun, the younger brother of Lord Yama (the God of death), you are the son of mother Chhaya, I bow my head to you, Lord Shani!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 पञ्चैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं, कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – इन्द्रों द्वारा जिनकी पूजा की गई, ऐसे अरिहन्त भगवान, सिद्ध पद के स्वामी ऐसे सिद्ध भगवान, जिन शासन को प्रकाशित करने वाले ऐसे आचार्य, जैन सिद्धांत को सुव्यवस्थित पढ़ाने वाले ऐसे उपाध्याय, रत्नत्रय के आराधक ऐसे साधु, ये पाँचों मरमेष्ठी प्रतिदिन हमारे पापों को नष्ट करें और हमें सुखी करे |1| श्रीमन्नम्र – सुरासुरेन्द्र – मुकुट – प्रद्योत – रत्नप्रभा-
 भास्वत्पादनखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवः स्थायिनः|
 ये सर्वे जिन-सिद्ध-सूर्यनुगतास्ते पाठकाः साधवः
 स्तुत्या योगीजनैश्च पञ्चगुरवः कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – शोभायुक्त और नमस्कार करते हुए देवेन्द्रों और असुरेन्द्रो के मुकुटों के चमकदार रत्नों की कान्ति से जिनके श्री चरणों के नखरुपी चन्द्रमा की ज्योति स्फुरायमान हो रही है, और जो प्रवचन रुप सागर की वृद्धि करने के लिए स्थायी चन्द्रमा हैं एवं योगीजन जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये पांचों परमेष्ठी हमारे पापों को क्षय करें और हमें सुखी करें |2| सम्यग्दर्शन-बोध-व्रत्तममलं, रत्नत्रयं पावनं,
 मुक्ति श्रीनगराधिनाथ – जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रदः|
 धर्म सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं, चैत्यालयं श्रयालयं,
 प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी, कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – निर्मल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये पवित्र रत्नत्रय हैं| श्रीसम्पन्न मुक्तिनगर के स्वामी भगवान् जिनदेव ने इसे अपवर्ग (मोक्ष) को देने वाला कहा है| इस त्रयी के साथ धर्म सूक्तिसुधा (जिनागम), समस्त जिन-प्रतिमा और लक्ष्मी का आकारभूत जिनालय मिलकर चार प्रकार का धर्म कहा गया है वह हमारे पापों का क्षय करें और हमें सुखी करे |3| नाभेयादिजिनाः प्रशस्त-वदनाः ख्याताश्चतुर्विंशतिः,
 श्रीमन्तो भरतेश्वर-प्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश|
 ये विष्णु-प्रतिविष्णु-लांगलधराः सप्तोत्तराविंशतिः,
 त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्टि-पुरुषाः कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – तीनों लोकों में विख्यात और बाह्य तथा अभ्यन्तर लक्ष्मी सम्पन्न ऋषभनाथ भगवान आदि 24 तीर्थंकर, श्रीमान् भरतेश्वर आदि 12 चक्रवर्ती, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण और 9 बलभद्र, ये 63 शलाका महापुरुष हमारे पापों का क्षय करें और हमें सुखी करे |4| ये सर्वौषध-ऋद्धयः सुतपसो वृद्धिंगताः पञ्च ये,
 ये चाष्टाँग-महानिमित्तकुशलाः येऽष्टाविधाश्चारणाः|
 पञ्चज्ञानधरास्त्रयोऽपि बलिनो ये बुद्धिऋद्धिश्वराः,
 सप्तैते सकलार्चिता मुनिवराः कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – सभी औषधि ऋद्धिधारी, उत्तम तप से वृद्धिगत पांच, अष्टांग महानिमित्तज्ञानी, आठ प्रकार की चारण ऋद्धि के धारी, पांच प्रकार की ज्ञान ऋद्धियों के धारी, तीन प्रकार की बल ऋद्धियों के धारी, बुद्धि ऋद्धिधारी ऐसे सातों प्रकारों के जगत पूज्य गणनायक मुनिवर हमारा मंगल करे |5| ज्योतिर्व्यन्तर-भावनामरग्रहे मेरौ कुलाद्रौ स्थिताः,
 जम्बूशाल्मलि-चैत्य-शखिषु तथा वक्षार-रुप्याद्रिषु|
 इक्ष्वाकार-गिरौ च कुण्डलादि द्वीपे च नन्दीश्वरे,
 शैले ये मनुजोत्तरे जिन-ग्रहाः कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – ज्योतिषी, व्यंतर, भवनवासी और वैमानिकों केआवासों के, मेरुओं, कुलाचकों, जम्बू वृक्षों औरशाल्मलि वृक्षों, वक्षारों विजयार्धपर्वतों,इक्ष्वाकार पर्वतों, कुण्डलवर (तथा रुचिक वर), नन्दीश्वर द्वीप, और मानुषोत्तर पर्वत के सभी अकृत्रिम जिन चैत्यालय हमारे पापों काक्षयकरेंऔरहमें सुखी बनावें |6| कैलाशे वृषभस्य निर्व्रतिमही वीरस्य पावापुरे|
 चम्पायां वसुपूज्यसुज्जिनपतेः सम्मेदशैलेऽर्हताम्|
 शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्यार्हतः,
 निर्वाणावनयः प्रसिद्धविभवाः कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – भगवान ऋषभदेव की निर्वाणभूमि – कैलाश पर्वत, महावीर स्वामी कीपावापुर, वासुपूज्य स्वामी (राजा वसुपूज्य के पुत्र) की चम्पापुरी, नेमिनाथ स्वामी की ऊर्जयन्त पर्वत शिखर, और शेष बीस तीर्थंकरों की श्री सम्मेदशिखर पर्वत, जिनका अतिशय और वैभव विख्यात है ऐसी ये सभी निर्वाण भूमियाँ हमें निष्पाप बनावें और हमें सुखी करें |7| यो गर्भावतरोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्सवो,
 यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवो यः केवलज्ञानभाक्|
 यः कैवल्यपुर-प्रवेश-महिमा सम्पदितः स्वर्गिभिः
 कल्याणानि च तानि पंच सततं कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – तीर्थंकरों के गर्भकल्याणक, जन्माभिषेक कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और कैवल्यपुर प्रवेश (निर्वाण) कल्याणक के देवों द्वारा सम्पादित महोत्सव हमें सर्वदा मांगलिक रहें |8| सर्पो हारलता भवत्यसिलता सत्पुष्पदामायते,
 सम्पद्येत रसायनं विषमपि प्रीतिं विधत्ते रिपुः|
 देवाः यान्ति वशं प्रसन्नमनसः किं वा बहु ब्रूमहे,
 धर्मादेव नभोऽपि वर्षति नगैः कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ – धर्म के प्रभाव से सर्प माला बन जाता है, तलवार फूलों के समान कोमल बन जाती है, विष अमृत बन जाता है, शत्रु प्रेम करने वाला मित्र बन जाता है और देवता प्रसन्न मन से धर्मात्मा के वश में हो जाते हैं| अधिक क्या कहें, धर्म से ही आकाश से रत्नों की वर्षा होने लगती है| वही धर्म हम सबका कल्याणकरे |9| इत्थं श्रीजिन-मंगलाष्टकमिदं सौभाग्य-सम्पत्करम्,
 कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थंकराणामुषः|
 ये श्र्रण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैः धर्मार्थ-कामाविन्ताः,
 लक्ष्मीराश्रयते व्यपाय-रहिता निर्वाण-लक्ष्मीरपि|| अर्थ – सोभाग्यसम्पत्ति को प्रदान करने वाले इस श्री जिनेन्द्र मंगलाष्टक को जो सुधी तीर्थंकरों के पंच कल्याणक के महोत्सवों के अवसर पर तथा प्रभातकाल में भावपूर्वक सुनते और पढ़ते हैं, वे सज्जन धर्म, अर्थ और काम से समन्वित लक्ष्मी के आश्रय बनते हैं और पश्चात् अविनश्वर मुक्तिलक्ष्मी को भी प्राप्त करते हैं |10|

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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें ॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।

हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥

शुक्लवर्ण वाली,संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अंधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूं ॥2॥

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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श्री साईबाबा के 108 नामावली । 1. ॐ श्री साई नाथाय नमः 2. ॐ श्री साई लक्ष्मीनारायनाय नमः 3. ॐ श्री साई कृष्णरामशिव मारुत्यादिरुपाय नमः 4. ॐ श्री साई शेषशायिने नमः 5. ॐ श्री साई गोदावरीतट शीलधीवासिने नमः 6. ॐ श्री साई भक्तहृदालयाय नमः 7. ॐ श्री साईं सर्वहन्नीललाय नमः 8. ॐ श्री साई भूतवासाय नमः 9. ॐ श्री साई भूतभविष्यदभाववार्जिताय नमः 10. ॐ श्री साई कालातीताय नमः 11. ॐ श्री साई कालाय नमः 12. ॐ श्री साई कालकालाय नमः 13. ॐ श्री साई कालदर्पदमनाय नमः 14. ॐ श्री साई मृत्युंजय नमः 15. ॐ श्री साई अमर्त्याय नमः 16. ॐ श्री साई मत्यभयप्रदाय नमः 17. ॐ श्री साई जीवाधाराय नमः 18. ॐ श्री साई सर्वाधाराय नमः 19. ॐ श्री साई भक्तावनसमर्थाय नमः 20. ॐ श्री साई भक्तावन प्रतिज्ञान नमः 21. ॐ श्री साई अन्नवस्त्रदाय नमः 22. ॐ श्री साई आरोग्यक्षेमदाय नमः 23. ॐ श्री साई धनमांगल्यप्रदाय नमः 24. ॐ श्री साई रिद्धिसिद्धिदाय नमः 25. ॐ श्री साई पुत्रमित्रकलबन्धुदाय नमः 26. ॐ श्री साई योगक्षेमवहाय नमः 27. ॐ श्री साई आपद् बान्धवाय नमः 28. ॐ श्री साई मार्गबन्धवे नमः 29. ॐ श्री साई भुक्तिमुक्ति स्वर्गापवर्गदाय नमः 30. ॐ श्री साई प्रियाय नमः 31. ॐ श्री साई प्रीति वर्धनाय नमः 32. ॐ श्री साई अंतर्यामिने नमः 33. ॐ श्री साई सच्चिदात्मने नमः 34. ॐ श्री साई नित्यानंदाय नमः 35. ॐ श्री साई परमसुखदाय नमः 36. ॐ श्री साई परमेश्वराय नमः 37. ॐ श्री साई परब्रह्मणे नमः 38. ॐ श्री साई परमात्मने नमः 39. ॐ श्री साई ज्ञानस्वरूपिणे नमः 40. ॐ श्री साई जगतपित्रे नमः 41. ॐ श्री साई भक्तानां मातृधातृपितामहाय नमः 42. ॐ श्री साई भक्ताभयप्रदाय नमः 43. ॐ श्री साई भक्तपराधीनाय नमः 44. ॐ श्री साई भक्तानुग्रहकातराय नमः 45. ॐ श्री साई शरणागतवत्सलाय नमः 46. ॐ श्री साई भक्तिशक्तिप्रदाय नमः 47. ॐ श्री साई ज्ञानवैराग्यदाय नमः 48. ॐ श्री साई प्रेमप्रदाय नमः 49. ॐ श्री साई संशय ह्रदय दौर्बल्य पापकर्म नमः 50. ॐ श्री साई ह्रदयग्रंथिभेदकाय नमः 51. ॐ श्री साई कर्मध्वंसिने नमः 52. ॐ श्री साई शुद्ध सत्वस्थिताय नमः 53. ॐ श्री साई गुणातीत गुणात्मने नमः 54. ॐ श्री साई अनंत कल्याणगुणाय नमः 55. ॐ श्री साई अमितपराक्रमाय नमः 56. ॐ श्री साई जयिने नमः 57. ॐ श्री साई दुर्धर्षाक्षोभ्याय नमः 58. ॐ श्री साई अपराजिताय नमः 59. ॐ श्री साई त्रिलोकेशु अविघातगतये नमः 60. ॐ श्री साईं अशक्यरहिताय नमः 61. ॐ श्री साईं सर्वशक्तिमुर्तये नमः 62. ॐ श्री साईं सुरूपसुन्दराय नमः 63. ॐ श्री साईं सुलोचनाय नमः 64. ॐ श्री साईं बहुरूपविश्वमुर्तये नमः 65. ॐ श्री साईं अरूपाव्यक्ताय नमः 66. ॐ श्री साईं अचिन्त्याय नमः 67. ॐ श्री साईं सूक्ष्माय नमः 68. ॐ श्री साईं सर्वन्तार्यामिने नमः 69. ॐ श्री साईं मनोवागतीताय नमः 70. ॐ श्री साईं प्रेममूर्तये नमः 71. ॐ श्री साईं सुलभदुर्लभाय नमः 72. ॐ श्री साईं असहायसहायाय नमः 73. ॐ श्री साईं अनाथनाथदीनबन्धवे नमः 74. ॐ श्री साईं सर्वभारभ्रुते नमः 75. ॐ श्री साईं अकर्मानेककर्मसुकर्मिने नमः 76. ॐ श्री साईं पुण्यश्रवणकीर्तनाय नमः 77. ॐ श्री साईं तीर्थाय नमः 78. ॐ श्री साईं वासुदेवाय नमः 79. ॐ श्री साईं सतांगतये नमः 80. ॐ श्री साईं सत्परायनाय नमः 81. ॐ श्री साईं लोकनाथाय नमः 82. ॐ श्री साईं पावनान्घाय नमः 83. ॐ श्री साईं अमृतांशवे नमः 84. ॐ श्री साईं भास्करप्रभाय नमः 85. ॐ श्री साईं ब्रह्मचर्य तपश्चर्यादि सुव्रताय नमः 86. ॐ श्री साईं सत्यधर्मंपरायनाय नमः 87. ॐ श्री साईं सिद्धेश्वराय नमः 88. ॐ श्री साईं सिद्धसंकल्पाय नमः 89. ॐ श्री साईं योगेश्वराय नमः 90. ॐ श्री साईं भगवते नमः 91. ॐ श्री साईं भक्तवत्सलाय नमः 92. ॐ श्री साईं सत्पुरुषाय नमः 93. ॐ श्री साईं पुरुषोत्तमाय नमः 94. ॐ श्री साईं सत्यतत्त्वबोधकाय नमः 95. ॐ श्री साईं कामदिषड्वैरिध्वंसिने नमः 96. ॐ श्री साईं अभेदानंदानुभवप्रदाय नमः 97. ॐ श्री साईं समसर्वमतसमताय नमः 98. ॐ श्री साईं दक्षिणामूर्तये नमः 99. ॐ श्री साईं वेन्कतेशरमनाय नमः 100. ॐ श्री साईं अदभुतानन्तचर्याय नमः 101. ॐ श्री साईं प्रपन्नार्तिहराय नमः 102. ॐ श्री साईं संसारसर्वदुःखक्षयकराय नमः 103. ॐ श्री साईं सर्ववित्सर्वतोमुखाय नमः 104. ॐ श्री साईं सर्वान्तर्बहि: स्थिताय नमः 105. ॐ श्री साईं सर्वमंगलकराय नमः 106. ॐ श्री साईं सर्वाभीष्टप्रदाय नमः 107. ॐ श्री साईं समरससनमार्गस्थापनाय नमः 108. ॐ श्री साईं समर्थ सदगुरु साईनाथाय नमः । श्री सदगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभम भवतु । Selection of 101 Shirdi Sai Baba Sayings '1) Why fear when I am here? 2) I am formless and everywhere. 3) I am in everything and beyond. I fill all space. 4) All that you see taken together is Myself. 5) I do not shake or move. 6) If one devotes their entire time to me and rests in me, need fear nothing for body and soul. 7) If one sees me and me alone and listens to my Leelas and is devoted to me alone, they will reach God. 8) My business is to give blessings. 9) I get angry with none. Will a mother get angry with her children? Will the ocean send back the waters to the several rivers? 10) I will take you to the end. 11) Surrender completely to God. 12) If you make me the sole object of your thoughts and aims, you will gain the supreme goal. 13) Trust in the Guru fully. That is the only sadhana. 14) I am the slave of my devotee. 15) Stay by me and keep quiet. I will do the rest. 16) What is our duty? To behave properly. That is enough. 17) My eye is ever on those who love me. 18) Whatever you do, wherever you may be, always bear this in mind: I am always aware of everything you do. 19) I will not allow my devotees to come to harm. 20) If a devotee is about to fall, I stretch out my hands to support him or her. 21) I think of my people day and night. I say their names over and over. 22) My treasury is open but no one brings carts to take from it. I say, “Dig!” but no one bothers. 23) My people do not come to me of their own accord; it is I who seek and bring them to me. 24) All that is seen is my form: ant, fly, prince, and pauper. 25) However distant my people may be, I draw them to me just as we pull a bird to us with a string tied to its foot. 26) I love devotion. 27) This body is just my house. My guru has long ago taken me away from it. 28) Those who think that Baba is only in Shirdi have totally failed to know me. 29) Without my grace, not even a leaf can move. 30) I look on all with an equal eye. 31) I cannot do anything without God’s permission. 32) God has agents everywhere and their powers are vast. 33) I have to take care of my children day and night and give an account to God of every paisa. The wise are cheerful and content with their lot in life. 34) If you are wealthy, be humble. Plants bend when they bear fruit. 35) Spend money in charity; be generous and munificent but not extravagant. 36) Get on with your worldly activities cheerfully, but do not forget God. 37) Do not kick against the pricks of life. 38) Whatever creature comes to you, human or otherwise, treat it with consideration. 39) Do not be obsessed by the importance of wealth. 40) See the divine in the human being. 41) Do not bark at people and don’t be aggressive, but put up with others’complaints. 42) There is a wall of separation between oneself and others and between you and me. Destroy this wall! 43) Give food to the hungry, water to the thirsty, and clothes to the naked. Then God will be pleased. 44) Saburi (patience) ferries you across to the distant goal. 45) The four sadhanas and the six Sastras are not necessary. Just has complete trust in your guru: it is enough. 46) Meditate on me either with form or without form, that is pure bliss. 47) God is not so far away. He is not in the heavens above, nor in hell below. He is always near you. 48) If anyone gets angry with another, they wound me to the quick. 49) If you cannot endure abuse from another, just say a simple word or two, or else leave. 50) What do we lose by another’s good fortune? Let us celebrate with them, or strive to emulate them. 51) That should be our desire and determination. 52) I stay by the side of whoever repeats my name. 53) If formless meditation is difficult, then think of my form just as you see it here. With such meditation, the difference between subject and object is lost and the mind dissolves in unity. 54) If anyone offends you do not return tit for tat. 55) I am the slave of those who hunger and thirst after me and treat everything else as unimportant. 56) Whoever makes me the sole object of their love, merges in me like a river in the ocean. 57) Look to me and I will look to you. 58) What God gives is never exhausted, what man gives never lasts. 59) Be contented and cheerful with what comes. 60) My devotees see everything as their Guru. 61) Poverty is the highest of riches and a thousand times superior to a king’s wealth. 62) Put full faith in God’s providence. 63) Whoever withdraws their heart from wife, child, and parents and loves me, is my real lover. 64) Distinguish right from wrong and be honest, upright and virtuous. 65) Do not be obsessed by egotism, imagining that you are the cause of action: everything is due to God. 66) If we see all actions as God’s doing, we will be unattached and free from karmic bondage. 67) Other people’s acts will affect just them. It is only your own deeds that will affect you. 68) Do not be idle: work, utter God’s name and read the scriptures. 69) If you avoid rivalry and dispute, God will protect you. 70) People abuse their own friends and family, but it is only after performing many meritorious acts that one gets a human birth. Why then come to Shirdi and slander people? 71) Speak the truth and truth alone. 72) No one wants to take from me what I give abundantly. 73) Do not fight with anyone, nor retaliate, nor slander anyone. 74) Harsh words cannot pierce your body. If anybody speaks ill of you, just continue on unperturbed. 75) Choose friends who will stick to you till the end, through thick and thin. 76) Meditate on what you read and think of God. 77) I give my devotees whatever they ask, until they ask for what I want to give. 78) You should not stay for even one second at a place where people are speaking disrespectfully of a saint. 79) If you do not want to part with what you have, do not lie and claim that you have nothing, but decline politely saying that circumstances or your own desires prevent you. 80) Let us be humble. 81) Satsang that is associating with the good is good. Dussaya, or associating with evil-minded people, is evil and must be avoided. 82) What you sow, you reap. What you give, you get. 83) Recognize the existence of the Moral Law as governing results. Then unswervingly follow this Law. 84) All gods are one. There is no difference between a Hindu and a Muslim. Mosque and temple are the same. 85) Fulfill any promises you have made. 86) Death and life are the manifestations of God’s activity. You cannot separate the two. God permeates all. 87) Mukti is impossible for those addicted to lust. 88) Gain and loss, birth and death are in the hands of God. 89) When you see with your inner eye. Then you realize that you are God and not different from Him. 90) Avoid unnecessary disputation.91) The giver gives, but really he is sowing the seed for later: the gift of a rich harvest. 92) Wealth is really a means to work out dharma. If one uses it merely for personal enjoyment, it is vainly spent. 93) To God be the praise. I am only the slave of God. 94) God will show His love. He is kind to all. 95) Whenever you undertake to do something, do it thoroughly or not at all. 96) One’s sin will not cease till one falls at the feet of Sadhus. 97) Be ashamed of your hatred. Give up hatred and be quiet. 98) The Moral Law is inexorable, so follow it, observe it, and you will reach your goal: God is the perfection of the Moral Law. 99) I am your servants’ servant. 100) Always think of God and you will see what He does. 101) Have faith and patience. Then I will be always with you wherever you are. । श्री सदगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभम भवतु ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Akshaya Tritiya विक्रम सम्वत् 2069 वैशाख शुक्ल तृतिया Akshaya Tritiya24th April 2012 “Akshaya” stands for something which never diminishes and “Tritiya” stands for third day. Akshaya Tritiya falls on the third day of the Vaisakh, the first month in the Hindu calendar. On this day the Sun and the Moon are at the height of their brightness.  Akshaya Tritiya is popularly known as Akshya Thiritiya, Akshaya Trutheeya, Akshaya Tritiiya , Akshaya Trithi and also called Akha Teej. The day is believed to bring good luck, eternal prosperity and success.  Any activity, which commences on this day, is regarded to be very auspicious in every form. This day is so auspicious that any moment of the day can be considered to be beneficial for starting something new like a new business etc. According to Vedic Scholars, wedding can be conducted on any time of this day without in-depth study for a “shubha muhurat”. The Hindus all over the world keep this day in mind while undertaking new business ventures or planning for weddings or traveling to distant lands. There are several reasons behind the day to be regarded as auspicious, which takes us to the legends and myths related to this day. Another reason for the significance of this day is that the temples for the pilgrims of Badri Kedar Yatra or the Char Dham Yatra, opens on the Akshaya Tritiya Legends  According to Puranas, this day marks the beginning of Treta Yug The Treta Yuga is the second Yuga and is important for the births of Lord Vishnu’s incarnations in the form of Vamana, Parasurama and Lord Ram.  Akshaya Tritiya or Akaha Teej is the birthday of  Lord Parasurama, the sixth incarnation of  Lord Vishnu.  According to the legend, on this day Veda Vyasa, along with Lord Ganesha, began to write the great Hindu epic Mahabharata. There are two more legends associated with Mahabharata. Lord Krishna had given a bowl to Draupadi, known as Akshaya Patram, when the Pandavas were in exile. This bowl was believed to have given endless food to the Pandavas. This is the reason Goddess Laxmi is worshipped on this day and gold, silver or platinum ornaments are bought and worn in her honor to bring unending wealth to the household. This is also believed to be the day when Panadavas discovered weapons under the earth which made them victorious against the Kauravas. It is also believed that Mother Ganges descended to earth on this day. Celebrations  Akshaya Tritiya is considered to be the festival of auspicious beginnings. Devotees also buy ornaments of gold, diamond, silver or gold coins and golden dollars with depictions of various gods and goddesses. Many of them keep a day long fast to pay homage to the birth of Vasudeva along with Lord Kubera who is regarded to be the God of  Wealth. Moreover, a dip in the holy river Ganges becomes far more auspicious for individual. Donating money and offering barley in a sacred fire also forms a part of observing this ritual. In north India the day is celebrated as Akha Teej, the birth of Lord Parasurama, an incarnation of  Lord Vishnu. Early morning, a male member of the Jat family heads towards the field with his shovel and expects the presence of good omen indicating rain and crops. The birth of Lord Vishnu is the reason people buy and wear gold ornaments on this day because they believe that Lord Vishnu will protect them from stealth or any unfortunate events. Hindus prefer to buy new ornaments on this auspicious day. The jewelers also keep their shops open till late at night safe in the belief that their belongings are well protected. Pujas are held on this day, which starts from early morning and lasts till evening. One of the very significant parts of this ritual is a Mantra, which is chanted for 108 times continuously. This is done by keeping the photograph of Godess Lakshmi and Sudarshan Kubera Yantra in front. The mantra is:-  “Kubera Twam Danadeesam Gruha Te Kamala Sithta Tam Devem Prehayasu Twam Madgruhe te Namo Namah”.  Moreover, diya’s are lit up with pure ghee and a ‘tilak’ is put on the foreheads of the devotees made, of kumkum and turmeric.  Donations form an important part of the rituals of Akshaya Tritiya, which is said to give unending good results. A statement of Lord Krishna implies that donating money to those who need it makes a person stronger from within and ultimately liberated, as he develops the power to detach himself from the material aspects of life.  Chandan Yatra also starts on Akshaya Tritiya. This is the day when Chandan or Sandalwood Paste is applied on the body of Lord Jagannatha and then the Murti or the Idol is taken for a procession. According to the legends this is carried out because Lord Jagannatha gave such instructions to King Indrayumma. While applying Chandan the following mantra is chanted:  “Om gandhadvaram duradarsan nitya pustam karisinim    isvari'gum sarvabhutanam tvam ihopa hvaye sriyam”

 

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