Author Topic: Religious Chants & Facts -धार्मिक तथ्य एव मंत्र आदि  (Read 36936 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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वंदे मातृ संस्कृति ‎:: श्रावण और शिवोपासना ::
 
 शताश्वमेधेनकृतेनपुण्यं
 गोकोटिभि:स्वर्ण सहस्त्रदानात्।
 
 नृणांभवेत्सूतकदर्शनेन
 
 यत्सर्वतीर्थेषुकृताभिषेकात्॥
 
 सैकडों अश्वमेध यज्ञ करने अथवा करोडों गौओंके दान करने और हजारों मन सोने का दान करने तथा सभी तीर्थोमें स्नान-पूजा करने से जो पुण्य फल प्राप्त होता है, वहीं पुण्य फल मनुष्य को केवल पारद के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।
 
 ॐनम: शिवाय
 
 श्रावण का महीना एवं देवाधिदेव महादेव का दर्शन पूजन रुद्राभिषेक इनमें नैसर्गिक अन्योन्याश्रित संबंध है। बोल बम करता हुआ कांवरियोंका समूह नास्तिकोंके मन में भी आस्था का संचार करता है। विशेषकर सोमवार के दिन भगवान शिव का पूजन। प्रश्न उठता है कि शिव की अर्चना के लिए श्रावण मास ही क्यों? इस प्रश्न के उत्तर में ऋग्वेद कहता है-
 
 संवत्सरंशशमानाब्रह्मणाव्रतचारिण:।
 
 वाचंपर्जन्यानिन्वितांप्रमण्डूकाअवादिषु॥
 
 (सप्तम मंडल 763का प्रथम श्लोक)
 
 अर्थात् वृष्टिकालमें ब्राह्मण वेद पाठ का व्रत करते हैं और उस समय में प्राय: उन सूक्तोंको पढते हैं, जो तृप्तिदायक हैं। इसका यह भी अर्थ है कि वर्षा ऋतु के मंडन करनेवाले जीव वर्षा ऋतु में इस प्रकार ध्वनि करते हैं, मानो एक वर्ष के अंतराल में उन्होंने मौन व्रत धारण रखा हो और इस ऋतु में बोलना प्रारंभ कर दिया हो। इस मंत्र में परमात्मा ने यह उपदेश दिया है कि जिस प्रकार क्षुद्र जंतु भी वर्षा काल में आह्लादजनकध्वनि करते हैं अथवा परमात्मा का यशोगान करते हैं, तुम भी उसी प्रकार परमात्मा का यशोगान करो।
 
 गोमायुरदादबमायुरदात्पृष्नरदाद्धरितोनो वसूनि।
 
 गवां मंडूकादक्ष: शतानिसहस्त्रसावेप्रतिरंतआयु:॥
 
 अर्थात् अनंत प्रकार की औषधियां, जिसमें उत्पन्न होती हैं, उस वर्षा काल अथवा श्रावण मास को सहस्त्रासापकहते हैं। उस काल में परमात्मा हमको अनंत प्रकार का शिक्षा-लाभ कराएं और हमारे ऐश्वर्य और आयु को बढाएं। शिव पूजन से संतान, धन-धान्य, ज्ञान और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। शिव को जलधारा प्रिय है। विशेष कर सोमवार को अनजाने में भी किया गया शिवव्रतमोक्ष को देनेवालाहोता है। अनजाने में शिवरात्रि व्रत करने से एक भील पर भगवान शंकर की कृपा हुई। एक दिन एक भील के मातापिताएवं पत्नी भूख से पीडित होकर उससे याचना की-हे वनचर, हमें कुछ खाने को दो। इस प्रकार की याचना सुनकर वह भील मृगों के शिकार के लिए वन में निकल गया। वह सारे वन में घूमने लगा। दैवयोग से उसे उस दिन कुछ भी नहीं मिला तथा सूर्यास्त हो गया। उसने मन में यह निश्चय किया कि बिना कुछ लिए घर जाना बेकार है। वह शिकार की प्रतीक्षा में भूखा-प्यासा वहीं वन में ठहर गया। रात्रि के प्रथम प्रहर में वह एक बिल्व वृक्ष पर चढकर जलाशय के समीप बैठा था। एक प्यासी हिरणीवहां आ गई। उसे देखकर व्याध को बडा हर्ष हुआ। तुरंत उसने अपने धनुष पर एक वाण संधान किया। उसके हाथ के धक्के से थोडा सा जल तथा बिल्वपत्रनीचे गिर पडा। उस वृक्ष के नीचे शिवलिंगथा। उक्त जल और बिल्वपत्रसे प्रथम प्रहर में ही शिव की पूजा संपन्न हो गई। उस पूजा के महात्म्यसे उस व्याध का सारा पातक तत्काल नष्ट हो गया। तब जो मनुष्य पूरी चेतना में जानबूझ कर पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ भगवान शिव की पूजा जल, अक्षत, चंदन, फूल, बिल्वपत्रआदि से करेगा, उस पर भला शिव की विशेष अनुकंपा कैसे नहीं होगी. — with Shashi Kant Yadav and 22 others.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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||महा मृत्‍युंजय मंत्र ||
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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l ॐ नमः शिवाय ll
 
 भगवान शिव (महादेव) के 108 नाम
 
 001) शिव - कल्याण स्वरूप
 002) महेश्वर - माया के अधीश्वर
 003) शम्भू - आनंद स्स्वरूप वाले
 004) पिनाकी - पिनाक धनुष धारण करने वाले
 005) शशिशेखर - सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
 006) वामदेव - अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
 007) विरूपाक्ष - भौंडी आँख वाले
 008) कपर्दी - जटाजूट धारण करने वाले
 009) नीललोहित - नीले और लाल रंग वाले
 010) शंकर - सबका कल्याण करने वाले
 011) शूलपाणी - हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
 012) खटवांगी - खटिया का एक पाया रखने वाले
 013) विष्णुवल्लभ - भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
 014) शिपिविष्ट - सितुहा में प्रवेश करने वाले
 015) अंबिकानाथ - भगवति के पति
 016) श्रीकण्ठ - सुंदर कण्ठ वाले
 017) भक्तवत्सल - भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
 018) भव - संसार के रूप में प्रकट होने वाले
 019) शर्व - कष्टों को नष्ट करने वाले
 020) त्रिलोकेश - तीनों लोकों के स्वामी
 021) शितिकण्ठ - सफेद कण्ठ वाले
 022) शिवाप्रिय - पार्वती के प्रिय
 023) उग्र - अत्यंत उग्र रूप वाले
 024) कपाली - कपाल धारण करने  वाले
 025) कामारी - कामदेव के शत्रु
 026) अंधकारसुरसूदन - अंधक दैत्य को मारने वाले
 027) गंगाधर - गंगा जी को धारण करने वाले
 028) ललाटाक्ष - ललाट में आँख वाले
 029) कालकाल - काल के भी काल
 030) कृपानिधि - करूणा की खान
 031) भीम - भयंकर रूप वाले
 032) परशुहस्त - हाथ में फरसा धारण करने वाले
 033) मृगपाणी - हाथ में हिरण धारण करने वाले
 034) जटाधर - जटा रखने वाले
 035) कैलाशवासी - कैलाश के निवासी
 036) कवची - कवच धारण करने वाले
 037) कठोर - अत्यन्त मजबूत देह वाले
 038) त्रिपुरांतक - त्रिपुरासुर को मारने वाले
 039) वृषांक - बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
 040) वृषभारूढ़ - बैल की सवारी वाले
 041) भस्मोद्धूलितविग्रह - सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
 042) सामप्रिय - सामगान से प्रेम करने वाले
 043) स्वरमयी - सातों स्वरों में
 निवास करने वाले
 044) त्रयीमूर्ति - वेदरूपी विग्रह करने वाले
 045) अनीश्वर - जिसका और कोई
 मालिक नहीं है
 046) सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाले
 047) परमात्मा -
 सबका अपना आपा
 048) सोमसूर्याग्निलोचन - चंद्र,
 सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
 049) हवि - आहूति रूपी द्रव्य वाले
 050) यज्ञमय - यज्ञस्वरूप वाले
 051) सोम - उमा के सहित रूप वाले
 052) पंचवक्त्र - पांच मुख वाले
 053) सदाशिव - नित्य कल्याण रूप
 वाले
 054) विश्वेश्वर - सारे विश्व के
 ईश्वर
 055) वीरभद्र - बहादुर होते हुए
 भी शांत रूप वाले
 056) गणनाथ - गणों के स्वामी
 057) प्रजापति - प्रजाओं
 का पालन करने वाले
 058) हिरण्यरेता - स्वर्ण तेज वाले
 059) दुर्धुर्ष - किसी से नहीं दबने
 वाले
 060) गिरीश - पहाड़ों के मालिक
 061) गिरिश - कैलाश पर्वत पर
 सोने वाले
 062) अनघ - पापरहित
 063) भुजंगभूषण - साँप के आभूषण वाले
 064) भर्ग - पापों को भूंज देने वाले
 065) गिरिधन्वा - मेरू पर्वत
 को धनुष बनाने वाले
 066) गिरिप्रिय - पर्वत प्रेमी
 067) कृत्तिवासा - गजचर्म पहनने
 वाले
 068) पुराराति - पुरों का नाश करने वाले
 069) भगवान् - सर्वसमर्थ
 षड्ऐश्वर्य संपन्न
 070) प्रमथाधिप - प्रमथगणों के
 अधिपति
 071) मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाले
 072) सूक्ष्मतनु - सूक्ष्म शरीर वाले
 073) जगद्व्यापी - जगत् में व्याप्त
 होकर रहने वाले
 074) जगद्गुरू - जगत् के गुरू
 075) व्योमकेश - आकाश रूपी बाल
 वाले
 076) महासेनजनक - कार्तिकेय के
 पिता
 077) चारुविक्रम - सुन्दर पराक्रम
 वाले
 078) रूद्र - भक्तों के दुख देखकर
 रोने वाले
 079) भूतपति - भूतप्रेत
 या पंचभूतों के स्वामी
 080) स्थाणु - स्पंदन रहित कूटस्थ
 रूप वाले
 081) अहिर्बुध्न्य - कुण्डलिनी को धारण करने वाले
 082) अष्टमूर्ति - आठ रूप वाले
 083) हरि - विष्णुस्वरूप
 084) दिगम्बर - नग्न,
 आकाशरूपी वस्त्र वाले
 085) अनेकात्मा - अनेक रूप धारण
 करने वाले
 086) सात्त्विक - सत्व गुण वाले
 087) शुद्धविग्रह - शुद्धमूर्ति वाले
 088) शाश्वत - नित्य रहने वाले
 089) खण्डपरशु - टूटा हुआ
 फरसा धारण करने वाले
 090) अज - जन्म रहित
 091) पाशविमोचन - बंधन से छुड़ाने
 वाले
 092) मृड - सुखस्वरूप वाले
 093) पशुपति - पशुओं के मालिक
 094) देव - स्वयं प्रकाश रूप
 095) महादेव - देवों के भी देव
 096) अव्यय - खर्च होने पर भी न
 घटने वाले
 097) पूषदन्तभित् - पूषा के दांत
 उखाड़ने वाले
 098) अव्यग्र - कभी भी व्यथित न
 होने वाले
 099) दक्षाध्वरहर - दक्ष के यज्ञ
 को नष्ट करने वाले
 100) हर - पापों व तापों को हरने
 वाले
 101) भगनेत्रभिद् - भग
 देवता की आंख फोड़ने वाले
 102) अव्यक्त - इंद्रियों के सामने
 प्रकट न होने वाले
 103) सहस्राक्ष - अनंत आँख वाले
 104) सहस्रपाद - अनंत पैर वाले
 105) अपवर्गप्रद - कैवल्य मोक्ष
 देने वाले
 106) अनंत - देशकालवस्तुरूपी
 परिछेद से रहित
 107) तारक - सबको तारने वाला
 108) परमेश्वर - सबसे परे ईश्वर
 
 ll ॐ नमः शिवाय ll

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नम: कृष्णाय नीलाय शिति कण्ठ निभाय च.
नम: कालाग्नि रूपाय, कृत-अन्ताय च वै नम:..
नम: निर्मांस देहाय दीर्घ श्म्श्रु जटाय च.
नम: विशाल नेत्राय शुष्क उदर भायाकृते..
नम: पुष्कल गात्राय स्थूल रोम्णे अथ वै नम:.
नम: दीर्घाय शुष्काय काल्द्रंष्ट नम: अस्तु ते..
नमस्ते कोटरक्षाय ,दुर्निरीक्ष्याय वै नम:.
नम: घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने..
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुख नम: अस्तु ते.
सूर्य पुत्र नमस्ते अस्तु भास्करे अभयदाय च..
अधो द्रष्टे ! नमस्ते अस्तु संवर्तक नम: अस्तु ते.
नमो मन्द गते तुभ्यम नि: त्रिंशाय नम: अस्तु ते..
तपसा दग्ध देहाय नित्यं योग रताय च.
नम: नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:..
ज्ञान चक्षु: नमस्ते अस्तु कश्यप आत्मज सूनवे.
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत क्षणात..
देवासुर मनुष्या: च सिद्ध विद्याधरो-रगा:.
त्वया विलोकिता: सर्वै नाशम यान्ति समूलत:.
प्रसादं कुरु मे देव वराहो-अहम-उपागत:.
एवम स्तुत: तदा सौरि: ग्रहराज: महाबल:..
पदमपुराणानुसार यह महाराजा दसरथकृत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरुपम |
अजं निर्गुण निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम ||१||
निराकारओमकारमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम |
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम ||२ ||
तुषाराद्रीसंकाशगौरं गभीरं
मनोभूतकोटिप्रभा श्री शरीरम |
स्फुरन्मौलीकल्लोलिनी चारूगंगा
लसदभालबालेन्दु कंठे भुजंगा ||३||
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नानन् नीलकंठं दयालम|
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||४||
प्रचण्डं प्रकृषटं प्रगल्भं परेशं
अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशम |
त्रय:शूलनिर्मूलनं शूलपाणी
भजेहम भवानीपति भावगम्यम ||५||
कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी
सदा सज्जानानंददाता पुरारि:|
चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी:||६ ||
न यावद उमानाथ पादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम |
न तावत्सुखं शान्तिसंतापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ||७||
न जानामि योगं जपं नैव पूजा
नतोहम सदा सर्वदा शंभु तुभ्यम |
जराजन्म दुखौघतातप्यमान
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये |
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शंभु: प्रसीदति ||९||

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मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम |
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरण प्रपद्ये ||
आंजनेयमतिपाटलाननं कंजनाद्रिकमनीयविग्रहम |
पारिजाततरुमूलवासिनं भावयामि पवमाननन्दनम ||
यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकान्जलिम |
वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसांतकम् ||

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नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं
 विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरुपम |
 अजं निर्गुण निर्विकल्पं निरीहं
 चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम ||१||
 निराकारओमकारमूलं तुरीयं
 गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम |
 करालं महाकालकालं कृपालं
 गुणागारसंसारपारं नतोहम ||२ ||
 तुषाराद्रीसंकाशगौरं गभीरं
 मनोभूतकोटिप्रभा श्री शरीरम |
 स्फुरन्मौलीकल्लोलिनी चारूगंगा
 लसदभालबालेन्दु कंठे भुजंगा ||३||
 चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
 प्रसन्नानन् नीलकंठं दयालम|
 मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
 प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||४||
 प्रचण्डं प्रकृषटं प्रगल्भं परेशं
 अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशम |
 त्रय:शूलनिर्मूलनं शूलपाणी
 भजेहम भवानीपति भावगम्यम ||५||
 कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी
 सदा सज्जानानंददाता पुरारि:|
 चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी
 प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी:||६ ||
 न यावद उमानाथ पादारविन्दं
 भजन्तीह लोके परे वा नराणाम |
 न तावत्सुखं शान्तिसंतापनाशं
 प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ||७||
 न जानामि योगं जपं नैव पूजा
 नतोहम सदा सर्वदा शंभु तुभ्यम |
 जराजन्म दुखौघतातप्यमान
 प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||
 
 रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये |
 ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शंभु: प्रसीदति ||९||

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 शिव गण : भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।
 
 शिव गण :
 
 १) शास्त्रों में भैरव के विभिन्न रुपों का उल्लेख मिलता
 है । तन्त्र में अष्ट भैरव तथा उनकी आठ शक्तियों का उल्लेख मिलता है । श्रीशंकराचार्य ने भी “प्रपञ्च-सार तन्त्र” में अष्ट-भैरवों के नाम लिखे हैं । सप्तविंशति रहस्य में सात भैरवों के नाम हैं । इसी ग्रन्थ में दस वीर-भैरवों का उल्लेख भी मिलता है । इसी में तीन वटुक-भैरवों का उल्लेख है । रुद्रायमल तन्त्र में 64 भैरवों के नामों का उल्लेख है । आगम रहस्य में दस बटुकों का विवरण है ।
 इनमें “बटुक-भैरव” सबसे सौम्य रुप है । “महा-काल-भैरव” मृत्यु के देवता हैं । “स्वर्णाकर्षण-भैरव” को धन-धान्य और सम्पत्ति का अधिष्ठाता माना जाता है, तगो “बाल-भैरव” की आराधना बालक के रुप में की जाती है । सद्-गृहस्थ प्रायः बटुक भैरव की उपासना ही हरते हैं, जबकि श्मशान साधक काल-भैरव की । इनके अतिरिक्त तन्त्र साधना में भैरव के ये आठ रुप भी अधिक लोकप्रिय हैं
 शिव गण २) वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया. देवसंहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से 'वीरभद्र' नामक गण उत्पन्न किया. देवसंहिता गोरख सिन्हा द्वारा मद्य काल में लिखा हुआ संस्कृत श्लोकों का एक संग्रह है जिसमे जाट जाति का जन्म, कर्म एवं जाटों की उत्पति का उल्लेख शिव और पार्वती के संवाद के रूप में किया गया है.
 
 वीरभद्र कि जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक मनोरंजक कथा कही जाती है. महादेवजी के श्वसुर राजा दक्ष ने यज्ञ रचा और अन्य प्रायः सभी देवताओं को तो यज्ञ में बुलाया पर न तो महादेवजी को ही बुलाया और न ही अपनी पुत्री सती को ही निमंत्रित किया. पिता का यज्ञ समझ कर सती बिना बुलाए ही पहुँच गयी, किंतु जब उसने वहां देखा कि न तो उनके पति का भाग ही निकाला गया है और न उसका ही सत्कार किया गया इसलिए उसने वहीं प्राणांत कर दिए. महादेवजी को जब यह समाचार मिला, तो उन्होंने दक्ष और उसके सलाहकारों को दंड देने के लिए अपनी जटा से 'वीरभद्र' नामक गण उत्पन्न किया. वीरभद्र ने अपने अन्य साथी गणों के साथ आकर दक्ष का सर काट लिया और उसके साथियों को भी पूरा दंड दिया. यह केवल किंवदंती ही नहीं बल्कि संस्कृत श्लोकों में इसकी पूरी रचना की गयी है जो देवसंहिता के नाम से जानी जाती है.
 
 ३) मणिभद्र वह भगवान शिव का परम भक्त था। शिवगणों में मुख्य मणिभद्र नामक गण उसका मित्र था। एक बार मणिभद्र ने राजा चंद्रसेन को एक अत्यंत तेजोमय 'चिंतामणि' प्रदान की और य कथा मिलाती है जब शिव त्रिपुर संगराम में इनकों उतपन किया!
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पंचमुखी हनुमान जी के चरणों में सादर नमन. हे हनुमान जी , हम पर अपनी दयादृष्टि यूँही बनाये रखना ...
 हनुमान जी के १०८ नाम -
 
 1. AUM Hanumatay Namaha
 2. AUM Shree Pradaayay Namaha
 3. AUM Vaaya Putraaya Namaha
 4. AUM Rudraayay Namaha
 5 AUM Ana-Gaayay Namaha
 6 AUM Aja-Raayay Namaha
 7 AUM Amrit-Yavay Namaha
 8 AUM Maarutaat-Majaayay Namaha
 9 AUM Vira-Viraayay Namaha
 10 AUM Grama-VaaSaayay Namaha
 11 AUM Janash-Radaayay Namaha
 12 AUM Dhana-Daayay Namaha
 13 AUM Akaa-YaaYay Namaha
 14 AUM Virayay Namaha
 15 AUM Nidhi-Patayay Namaha
 16 AUM Munayay Namaha
 17 AUM Vaag-Minay Namaha
 18 AUM Pingaak-Shaayay Namaha
 19 AUM Vara-Daayay Namaha
 20 AUM Sita Shoka-Vinaasha-Naayay Namaha
 21 AUM Rakta Vaasasay Namaha
 22 AUM Shivaayay Namaha
 23 AUM Shar-Vaayay Namaha
 24 AUM Paraayay Namaha
 25 AUM Avyak-Taayay Namaha
 26 AUM Vyakta-Avyak-Tayay Namaha
 27 AUM Rasaa-DhaRaayay Namaha
 28 AUM Ping-Keshaayay Namaha
 29 AUM Pinga-Romanay Namaha
 30 AUM Shruti-Gamyaayay Namaha
 31 AUM Sana-Tanaaya Namaha
 32 AUM Anaa-Daayay Namaha
 33 AUM Bhagawatay Namaha
 34 AUM Devaayay Namaha
 35 AUM Vishwa-Haytavay Namaha
 36 AUM Niraa-Shra-yaayay Namaha
 37 AUM Aarogya-Kartray Namaha
 38 AUM Vish-Vesh-aayay Namaha
 39 AUM Vishva-Naayak-aayay Namaha
 40 AUM Harish-Waraayay Namaha
 41 AUM Bhar-Gaayay Namaha
 42 AUM Raam-Aayay Namaha
 43 AUM Rav-Vayay Namaha
 44 AUM Visva Haraaya Namaha
 45 AUM Vish-Vaaya Namaha
 46 AUM Vishva Sevayaay Namaha
 47 AUM Vishva-Aatmanaay Namaha
 48 AUM Visha-Daayay Namaha
 49 AUM Vishva-Kaar-aayay Namaha
 50 AUM Raam-Bhaktaayay Namaha
 51 AUM Vishva-Murtaaya Namaha
 52 AUM Vishvam Bharaayay Namaha
 53 AUM Prakriti-Sthiraaya Namaha
 54 AUM Kalyaa-Naayay Namaha
 55 AUM Vishva-Chesha-Laayay Namaha
 56 AUM Avaya-Graayay Namaha
 57 AUM Anjani-Sunavay Namaha
 58 AUM Ajaayay Namaha
 59 AUM Sakhyay Namaha
 60 AUM Tatvagam-Yaayay Namaha
 61 AUM Vanay-Charaayay Namaha
 62 AUM Yunay Namaha
 63 AUM Vrid-Dhyayay Namaha
 64 AUM Baalaayay NamahaBaa
 65 AUM Tatvaayay Namaha
 66 AUM Jyesh-Taayay Namaha
 67 AUM Vidyaayay Namaha
 68 AUM Kapish-Shestray Namaha
 69 AUM Plavang-Gamayay Namaha
 70 AUM Kalaa-Dharaayay Namaha
 71 AUM Vishvaa-Dhyayaayay Namaha
 72 AUM Vishvaa-Gamyaayay Namaha
 73 AUM Graama Swantaayay Namaha
 74 AUM Ama-Laayay Namaha
 75 AUM Vyaapa-Kaayay Namaha
 76 AUM Praana-Vaayay Namaha
 77 AUM Omkar-Jamyaayay Namaha
 78 AUM Satyaayay Namaha
 79 AUM Avyaaya Namaha
 80 AUM Tapa-say Namaha
 81 AUM Jana Lokaayay Namaha
 82 AUM Mahaa Lokaayay Namaha
 83 AUM Swar-Lokaayay Namaha
 84 AUM Bhuvar-Lokaayay Namaha
 85 AUM Bhur-Lokaayay Namaha
 86 AUM Dharaa-Dharaayay Namaha
 87 AUM ShivaDharam, Pratish-taatray Namaha
 88 AUM Satyaayay Namaha
 89 AUM Purnaayay Namaha
 90 AUM Raksha-Praana, Haarakaayay Namaha
 91 AUM Jaanaki-Praandaatray Namaha
 92 AUM Sharanaagata-Vatsalaayay Namaha
 93 AUM Pandari-Kaakshaayaya Namaha
 94 AUM Raaksho-Dhanaayay Namaha
 95 AUM Dharaa-Dhipaayay Namaha
 96 AUM Purna Kamaayay Namaha
 97 AUM Gospadi-krita, Vaarish-aayay Namaha
 98 AUM Phaalgun-Priyaayay Namaha
 99 AUM Ramesh-Taatray Namaha
 100 AUM Rudra-Kar-Maayay Namo Namaha
 101 AUM Devay-So Namaha
 102 AUM Krish-Naayay Namaha
 103 AUM Raamdoo-Taayay Namaha
 104 AUM Shakti Raakshasaa, Maara-kaayay Namaha
 105 AUM Shakti Naytaayay Namaha
 106 AUM Drona Hartray Namaha
 107 AUM Divaakara, Sama-Prabhaayay Namaha
 108 AUM Pita-Vaasasay Namaha
 
 
 जय बजरंग बली.
 जय श्री राम.

 

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