Author Topic: Today's Thought - पहाड़ के मुहावरों/कथाओं एवं लोक गीतों पर आधारित: आज का विचार  (Read 32539 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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अपणि-बोली-भाषा का बगैर न त अपणि उन्नति हवै कद और न ही समाज की। जु समाज अपणि-बोली भाषा-अर-रिती-रिवाज से शर्म करदू ऊ वैकू पतन कू सबसे बडू कारण छ।

पंकज सिंह महर

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ना भाबर, ना सैंण, राजधानी सिर्फ गैरसैंण...!

पंकज सिंह महर

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गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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"तेरी हाथो घर की लाज, मेरी हाथ देश कि
दिना रिये राजी खुशी, अपुन घर की"

बाटा घाटा मे, ओह सुवा झन रोये तो झन

Oh Meri Kamala to Rooye Naa..


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Mata mainawati, Teri Pita Ji Hemant ki Ji.
Jai Bhola..


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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आज का विचार नरेंदर सिह नेगी के माया को मुडारो एल्बम से

देव भूमि को नू (नाम) बदली
बिजली भूमि करा देली
उत्तराखंड की धरती कै
डाम ले डामाली दी

इस गाने मे बताया गया जी जिस दंग उत्तराखंड पर जगह डाम बन रहे है उससे यहाँ के जनता को किस प्रकार का खतरा है !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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आज का विचार यह मुहावरे के रूप में

" पितरो करी नातर कै लागो "

मतलब :  पितरो का किया पुण्य, उनके आने वाली कई पीड़ीयो के फलदायक होती है !

हलिया

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ना भाबर, ना सैंण, राजधानी सिर्फ गैरसैंण...!

हेम पन्त

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ये Repeat हो गया... लेकिन बहुत अच्छी सीख है, जितनी बार मिले उतनी ही अच्छी बात है.



आज का विचार यह मुहावरे के रूप में

" पितरो करी नातर कै लागो "

मतलब :  पितरो का किया पुण्य, उनके आने वाली कई पीड़ीयो के फलदायक होती है !


पितर कि कमै, नातर लिजि..

बुजुर्गों/पुरखों द्वारा किये गये अच्छे-बुरे कर्मों का फल उनकी आने वाली पीढी को मिलता है

Lalit Mohan Pandey

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ऊना रया जाना रया, ये पहाड़का गुन गाना रया
(जाते हुए मुसाफिरू को देखकर पहाड़ की एक महिला के मुह से निकलते हुए बोल) 

 

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