Author Topic: Folk Songs Of Uttarakhand : उत्तराखण्ड के लोक गीत  (Read 44083 times)

पंकज सिंह महर

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लोक गीत किसी भी सभ्यता या संस्कृति के दर्पण होते हैं, उत्तराखण्ड में भी लोक गीतों का पुरातन इतिहास रहा है। यहां पर लोक गीत मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं- १- ऋतुरैंण २- बैर (जागर)

ऋतुरैंण में विशेषतः ऋतुओं का ही वर्णन होता है, ऋतुओं के साथ-साथ प्रकृति और उससे मानव जीवन के जुड़ाव का वर्णन इसमें होता है। उत्तराखण्डी जनमानस में ऋतु एक मौसम न होकर सखा (मित्र) है और उसकी उपयोगिता के लिये इन गीतों के माध्यम से उसे धन्यवाद दिया जाता है, प्रेम प्रदर्शित किया जाता है और उसका गुणगान किया जाता है। इन गीतों में जाहिर रुप से श्रृंगार रस की प्रचुरता रहती है।

बैर गायन, उत्तराखण्डी लोक गीतो का वीर रस से सराबोर रुप है। इन गीतों में उत्तराखण्ड के वीर भड़ों, पैकों, राजाओं का गुणगान किया जाता है। जागर शैली का गायन भी इसी श्रेणी में आता है।

समय के साथ-साथ लोकगीतों में प्रणय रस के गीतों का भी आगमन हो चुका है, लेकिन उत्तराखण्डी लोक गीतों में प्रणय गीतों की कमी थी, विरह गीत ही अधिकतर सुनने को मिलते थे, क्योंकि संसाधन विहीन इस राज्य में रोजी-रोटी के लिये पलायन हमेशा से एक मजबूरी रहा है।

पंकज सिंह महर

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इस टापिक में हम उत्तराखण्ड के कुछ प्राचीन लोकगीत (दादी-नानी से सुने) प्रस्तुत करेंगे।


’उत्तराखण्ड की सुन्दरता का वर्णित गीत’

स्वर्ग उत्तराखण्ड भूमि हिमालय स्वर्ग जैसू, फूल ब्रह्मी कमला-२
स्वर्ग उत्तराखण्ड भूमि हिमालय स्वर्ग जैसू, फूल ब्रह्मी कमला-२
गंगा हिमालय कू दर्शन छः भारी, िमालय बद्री-केदार ब्रह्मी कमला-२
ये हिमालय डांडी-कांठी हिमालय देवदार ब्रहमी कमला।
गंगा-जमुना की शोभा मेरी-२
हिमालय गौमुख कू पाणी ब्रह्मी कमला।
भोला-भाला लोग रैंढ़ा, हिमाल्य यूं कैलाशू माजी ब्रह्मी कमला।
रंग-बिरंगा फूल खिल्यां छन, हिमालय बर्फीली चट्टान ब्रह्मी कमला।
बादलों की ओर बणी छः, हिमालय बर्फीली हवान ब्रहमी कमला।
सन्त मुनियों कू पावन धाम, हिमालय तपस्या की भूमि ब्रह्मी कमला।
देश-देश का भक्त लोग, हिमालय तीर्थ औंदा भूमि ब्रह्मी कमला।
भादौं की फूलोरी केदान पत्ती, हिमालय चमकीलू छः धाम ब्रह्मी कमला।
गंगा-जमुना केदारनाथ, बद्री कू धाम ब्रह्मी कमला॥

पंकज सिंह महर

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उत्तराखण्ड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में गाया जाने वाला गीत, जिसमें पहाड़ की सुन्दरता का वर्णन है-


हम छौं गढ़वाली, हमारु गढ़वाल, यू छः हमारु घर-बार,
यू छः हमारी जनमभूमि, यू छः हमारु घरबार।
सिरवाणी यैंच बद्री-केदारनाथ, यरव सी निकलदी गंगा की धार,
य छः हमारी जन्म भूमि, यू छः हामरु पहाड़।
सेरा खेतूमा नाज की दाणी, चूड़ी दाथूड़ी बजली छम-छम,
हम छौं गढ़वाली, हमारु गढ़वाल, यू छः हमारु पहाड़।
यू छ हमारी जन्म भूमि, यू छू हमारु घरबार,
गांधी जी कू यू छः यू प्यारु देश, चरखा कातिक देंदा उपदेश।
यू छू हमारु श्रूंगार, यू छः हमारी जन्म भूमि, यू छः हमारी घरबार॥

पंकज सिंह महर

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यू ठण्डू पाणी मेरा पहाड़, स्वामी नी जावा परदेश,
केला कुलई छः मेरा पहाड़, स्वामी नी जावा परदेश।
देवतौं की भूमि मेरा पहाड़, स्वामी नी जावा परदेश,
हरी-भरी सारी, मेरा पहाड़, स्वामी नी जावा परदेश।
ऊँचा हिमालय मेरा पहाड़, स्वामी नी जावा परदेश,
घणा देवदारु मेरा पहाड़, स्वामी नी जावा परदेश।
हिसर, किन्गोड़, काफल, मेरा पहाड़, स्वामी नी जावा परदेश,
यू ठण्डू पाणी मेरा पहाड़, स्वामी नी जावा परदेश॥

पंकज सिंह महर

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गढ़वाल की सुन्दरता का वर्णन


मेरु गढ़वाल दीदौं, कन्य़ु भग्यान,
केला कुलई दीदौं बाब बग्वान।
डालियों का छैल दिदौं घुघुती कू छोल,
भालू हिलांस दिदौं का फूलों का झोल।
सेयुं गढ़वाल दिदा खड़े उढाल,
 धरती माकु तैं हाथ जोड़याल।
डांडी कांठयूं ऎगी सूरज भगवान,
औरु की चारु दीदा तू भी इन्सान।
गाड़ गढ़नीयों बीच गाड़ी खमणोट,
पुराडयों का बीच दीदा, दूड़यों कू छमणाट।
धणा गौं कू दीदा देन्टुलू प्रदान,
औरु की चारु दीदा, तू भी इन्सान।
घणा गैं कू दीदा सेन्टूलू प्रदान,
बेटियों का रुप्या खान्दा तब देंदा दान॥

पंकज सिंह महर

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बारहमासा गीत


आयो मैनो चैत को, हे ददियों, हे राम।
उठीक फुलारी झुसमुस, लगी गैन निज काम,
मैनो आयो वैसाख को, सुख की नी आस,
ग्यों जौ का पूलों मुड़े, कमर पड़ीगी झास।
आयो मैनो जेठ ही, मक्को हवेगी मौत,
स्वामी मेरा घर नी, समझी रयूं मैं मौत।
मास पैलो बसगाल को, आयो यो अषाड़,
मैं पापीण झुरि-झुरि मरयों, मास रयो न हाड़।
मास दुसरो बसगाल को, आयो स्यो सौण,
चिट्ठी नी पतरी ऊँकी कु जाणो कब घर औण।
मास आयो भादो को, डांडू कुरेड़ी लौखी,
तेरी खुद स्वामी, जिकुड़ी मा बिजुली सी चौंकी।
आयो मैनी असूज को, बादल गैन दुरु,
जोन काँठों मा औंदी, जिया लाग बुरु।
आई दिवाली कातिकी, चढे घर-घर टैकू,
यू दिन स्वामी का बिना ज्यू लगदू कैकू।
आयो मैनो मंगसीर को, हे बैठयों, हे राम,
स्वामी की खुद मा हाड़ रयो ना चाम।
पूष मासे की ठंड बड़ी घर-घर कंपादी गात,
कनि होली भग्यान सी पति जौंका सात।
लगी मैना माघ को गौं-गौं छन ब्यो,
ब्योली आँखी झुकैक ब्यौला से मिलदी स्यो।
फागुण मैना आये, हरी-भरी हवैन सारी,
भी झूरी-झूरी मरयों एकुला बांदर की चारी॥

पंकज सिंह महर

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बसन्त के महीने का ऋतु गीत


बसन्त बहार माजि, ढैडा़ फूल्याँ सार माजि,
सचि बैठी रीतू बौड़ी ऎगी।
पहाड़ों का धार माजि कोकिला पुकार माजि,
नाचण-नाचण होली लगी, नाचण लगी होली।
मन बापूरा उड़ी-उड़ी बैठयाँ होला डाला-डाला,
गुन-गुन की धुन सुणिक आज स्वामी आला।
चल खुटी मजदार माजि काली गंगपार माजि,
मन की उमंग बौड़ी ऎगी, सचि बैठा ॠतु बौड़ी ऎगी॥

पंकज सिंह महर

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घूघुती घुराण लगी (पक्षी पर आधारित ऋतु गीत)


घूघुती घूरौण गली, मेरा मैत की,
ऋतु बौड़ी-बौड़ी ऐगे चैत की।
डांडी-कांठयों कू हिम गलीगे होलू,
मेरा मैत कू बौण मौलीगे होलू।
कब मेरा मैती, औजी दिशा भेंट आला,
कब मेरा भाई-बैणीयों की राजी-खुशी ल्याला।
तिबारी में बैठ्या होला, बाबाजी उदास,
मांजी देखणी होली, लगी होली आस॥

पंकज सिंह महर

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सावन मास का ऋतु गीत


सुणा मेरा स्वामी जी, सावण आयो,
रूण झुण्य़ा बरखा, घनघोर लायो।
दौड़ी-दौड़ी कुयेड़ी, डांडों में आयो,
कुरेड़ी नी स्वामी, अंधियारो छायो।
कुरेड़ी देखीक, जिऊ खुदी आय,
कनु पापी आँखी, आँसू भरि लाय॥

पंकज सिंह महर

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करव होली मेरा डाँडी कांठी,
करव कुरेड़ी सौण की।
आलंद का बीच छानीम होली,
भैंसी ब्याई सौण की।
दूध टचाला और खीर पकाला,
गोंदकी खाला नोण की।
करव होली मेरा डांडी ओ कांठी,
करव कुरेड़ी सौण की।
सूरमा सितारु मैकू नी प्यारु,
प्यारु छ मैकू मेरु गढ़वाल,
करव होली मेरी डांडी अ कुरेड़ी सौण की।
रुम-झूम बरखा छूम-छूम होया,
खुद लगी च मैत की॥

 

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