Author Topic: Meaning Of Lyrics Of Songs - उत्तराखंडी लोक गीतों के भावार्थ  (Read 12601 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सण सण सण मण सौंणाक ,
रिमा झिमा दयो लागो दणाक |
घनघोर बादली घमकी |
गोरी बांकी बिजुली चमकी |
तलि सारी मलि सारी हरिया |
नदी नौला चुपटौला भरिया|
कां देखीनो यो ऋतु यो मास ?
चारै दिन रंगीलो चौमास |
डीना काना झुरि गेछ हौली |
साँस पड़ी सासु नि ऐ कौली |
कसी काटूं पालुरी को घास |
नी थामिनी हियै को निसास |
जै कारण रंग छियो राज |
कैंथैं कूं मैं ऊ घरै नै आज |
कां छै भागी , आगरा कि दिल्ली ?
आजि तक कुसलै नि मिली |
घन तेरी बैरूंण पराणी|
जोग्यानी सूं चीठी लै हराणी |
बजी जाली माया को लपोड़ |
झुरी खांछ जोड़ी को बिछोड |
भगवान कै आला उ दिना |
बिछुडिया मिलुंला जै दिना ||
भावार्थ :
जल धाराओं की कल - कल , छल -छल ध्वनि में सावन का संगीत सुनाई देता है |
कभी रिमझिम वर्षा हो रही है तो कभी मूसलाधार |
घने बादल उमड़ - घुमड़ कर चले आ रहे हैं |
गोरी , बांकी , चपला चमक रही है |
नीचे - ऊपर के सब खेतों में हरियाली छाई है |
नदी - नाले और तलैया भरे हुए हैं |
वर्षा ऋतु के समान ऋतु और सावन के समान माह और कहाँ दिखता है |
यह रंगीला चार्तुमास चार दिन का है |
पर्वत और वनों में कोहरा छाया है |
संध्या हो आई है | अब सास कहेंगी कि बहु इतनी देर तक वन से नहीं लौटी |
कैसे काटूं मैं अब यह घास ?
मन की आकुलता तो थामे नहीं थमती |
जिसकी बदौलत सारा सुख - चैन था ,
किससे कहूँ मैं कि आज तो वह घर से दूर है |
कहाँ , किस सुदूर प्रदेश में जा बसे हो , प्रिय ?
तुम जाने आगरा हो या दिल्ली |
आज तक तुम्हारा कुशल - समाचार तक न मिला |
तुम्हारा निष्ठुर मन भी धन्य है |
मुझ जोगन के लिए तुम्हारा एक पत्र भी दुर्लभ हो गया |
प्रेम के इस जंजाल को भी क्या कहें |
प्रिय से बिछोह किस तरह मन - प्राण कचोट देता है |
हे भगवान , क्या कभी वह दिन भी आएगा ,
जिस दिन दो बिछुड़े हुए प्राणी फिर मिलेंगे ||
(कुमांऊँ का लोक - साहित्य )

Prayag Joshi Nainital

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा |
डाली में कफुवा वासो , खेत फुली दैणा |
कावा जो कणाण , आजि रते वयांण |
खुट को तल मेरी आज जो खजांण |
इजु मेरी भाई भेजली भिटौली दीणा |
रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा |
वीको बाटो मैं चैंरुलो |
दिन भरी देली मे भै रुंलो |
वैली रात देखछ मै लै स्वीणा |
आगन बटी कुनै ऊँनौछीयो -
कां हुनेली हो मेरी वैणा ?
रितु रैणा , ऐ गे रितु रैणा |
रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा ||
भावार्थ :-
रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती |
डाल पर "कफुवा " पक्षी कुजने लगा | खेतों मे सरसों फूलने लगी |
आज तडके ही जब कौआ घर के आगे बोलने लगा |
जब मेरे तलवे खुजलाने लगे , तो मैं समझ गई कि -
माँ अब भाई को मेरे पास भिटौली देने के लिए भेजेगी |
रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती |
मैं अपने भाई की राह देखती रहूंगी |
दिन भर दरवाजे मे बैठी उसकी प्रतीक्षा करुँगी |
कल रात मैंने स्वप्न देखा था |
मेरा भाई आंगन से ही यह कहता आ रहा था -
कहाँ होगी मेरी बहिन ?|
रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती ||
( कुमांऊँ का लोक साहित्य )

 

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