Author Topic: Narendra Singh Negi: Legend Singer Of Uttarakhand - नरेन्द्र सिंह नेगी  (Read 69663 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मेरा बचपन : नरेंद्र सिंह नेगी

पैतृक गांव पौड़ी (नान्दलस्यूं) में मेरा बचपन भी एक साधारण ग्रामीण परिवार में सुख-दुखों के बीच हंसते-खेलते बीता। पिता स्वर्गीय उमरावसिंह नेगी आजादी से पूर्व के नायब सुबेदार थे, किंतु उनकी पेंशन इतनी कम थी कि बड़े परिवार का भरण-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाता था। मां स्वर्गीय समुद्रा देवी एक ग्रामीण घरेलू महिला थीं और गाय-भैंस पालकर घर चलाने में पिता का हाथ बंटाती थीं। यूं तो गांव में हमारी खेती भी थी, किंतु पहाड़ की उखड़ खेती में पसीना अधिक और अनाज कम ही उगता था। मां को खेतों और जंगलों में खटते तथा आर्थिक तंगी से जूझते पिता के माथे की लकीरें मैंने अपनी उम्र से पहले ही पहचाननी शुरू कर दी थीं।

इसके बावजूद बचपन में माता-पिता और बहनों का भरपूर लाड़-प्यार मिलता रहा। पिता के पुत्र मोह की इन्तहां यह थी कि कक्षा 1-2 में स्‍कूल से घर आने के बाद वे मुझे बाकी बहनों से छिपकर एक दुकान से दूध-जलेबी खिलाते थे। इस पक्षपाती लाड़ का याद कर आज भी शर्मिंदा होता हूं। यह शायद बड़े परिवार के पिता की मजबूरी रही हो। बढ़ते परिवार और आर्थिक तंगी ने बचपन में ही मुझे अंतर्मुखी और गंभीर स्वभाव का बना दिया। मुझसे बड़ी दो बहनों को पिताजी पढ़ा नहीं पाये, इसका हमेशा दुख रहा, बाकी मैंने और मुझसे छोटे सभी भाई-बहनों (एक भाई व पांच बहनों) ने स्नातक तक शिक्षा पाई।

पौड़ी गांव में मेरे बचपन के साथी थे बिल्लू (वीरेन्द्र सिंह), राजू (राजेन्द्र सिंह), ज्ञानू (ज्ञान सिंह), कालू (धर्म सिंह) और मुझे नरू कहते थे। गांव में पटवारियों का चौक और पौड़ी बाजार में गांधी मैदान (अंग्रेजों का टैनिस कोर्ट) हमारे खेल के प्रिय मैदान और फुटबाल प्रिय खेल था। हम गांव के लड़के बाजारी लड़कों से किसी-न-किसी बात को लेकर अक्सर झगड़ते रहते थे। यह शायद गांव के शहरीकरण की खुंदक रही हो। मुझे याद है, बचपन में हम अपने भूम्याल कन्ड़ोलिया देवता के मंदिर से लोगों द्वारा भेंट चढ़ाये गये पैसे उठाया करते थे, तब देवताओं से ज्यादा पैसों की जरूरत हम बच्चों को थी। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही मैंने अपने कुछ साथियों के साथ कन्ड़ोलिया देवता पर भजनों की एक कैसेट निकालकर ब्याज चुकाने का प्रयास किया, मूल तो जीवन भर नहीं चुका पाऊंगा।

मेरे बचपन की एक मजे की बात यह रही कि कक्षा-1 से 4 तक मैं पौड़ी में लड़कियों के हाई स्‍कूल में पढ़ा, जहां मेरे तयेरे भाई स्वर्गीय अजीत सिंह नेगी संगीत टीचर थे। इस गर्ल्‍स स्‍कूल में मेरे साथ पौड़ी बाजार के तीन लड़के और थे- ईशमोहन, अजीत गोयल और सुधीर खण्डूड़ी। इससे पहले कि हम बच्चे लिंगभेद समझ पाते, कक्षा-चार पास करने के बाद प्रिंसिपल महोदया ने हमारे हाथों में अभिभावकों के नाम पत्र थमा दिये कि अब आपके लड़के बडे़ (जवान) हो गये हैं। इन्हें गर्ल्‍स स्‍कूल से हटाकर लड़कों के स्‍कूल में भर्ती करें। दर्जा-5 में मुझे वार मेमोरियल हाईस्‍कूल, लैन्सड़ौन भर्ती कर दिया गया, जहां मात्र एक साल ही पढ़ पाया। उन दिनों लैन्सडौन में नरभक्षी बाघ के आतंक और मां की जिद्द के कारण पिताजी मुझे वापस पौड़ी ले आये और मेसमोर इंटर कॉलेज, पौड़ी में कक्षा-6 में भर्ती करा दिया। फिर इंटर तक यहीं पढ़ा। पौड़ी की सुप्रसिद्ध रामलीला में संगीतकार भाई अजीतसिंह नेगी एवं मदनसिंह नेगी के प्रोत्साहित करने पर वानर से लेकर अहिल्या, भरत, शत्रुघन के पार्ट खेलना बचपन के यादगार क्षण हैं। एक बार पिताजी के साथ बैकुंठ चतुर्दशी मेले में श्रीनगर गया और मेले की भीड़ में खो गया, तब श्रीनगर में रातभर मेला चलता था। सारी रात एक पीपल के पेड़ के नीचे रोता रहा। भीड़ में ढूंढते-ढूंढते आखिर सुबह तक परेशान पिताजी वहां पहुंच ही गये।

12-13 साल की उम्र में सिनेमा देखने का शौक ऐसा चढ़ा कि पौड़ी में टिनशीट और तम्बू से बने सिनेमा हाल में हम बिना टिकट लिये चुपके से घुस आते थे और अक्सर पकड़े जाने पर पिट-पिटाकर बाहर कर दिये जाते थे। पौड़ी में उन दिनों टिंचरी शराब का बड़ा जोर था। टिंचरी की खाली बोतलें जमा कर सिनेमा के टिकट का जुगाड़ करते रहे। पिक्चर का नशा इस कदर बढ़ता गया कि एक दिन गांव के दोस्तों के साथ घर से छिपकर एक निर्माणाधीन भवन में पत्थर की रोड़ी तोडऩे चल दिया। उन दिनों एक कनस्तर रोड़ी तोडऩे पर ठेकेदार से आठ आने मिलते थे और सिनेमा का न्यूनतम टिकट छह आने का था। पता नहीं पिताजी को पहले ही दिन हमारी इस खून-पसीने की जायज कमाई का कैसे पता चला कि वहां पहुंचकर उन्होंने मुझे तो कम मारा पर बेचारे ठेकेदार की ऐसी-तैसी कर दी।

हिंदी फिल्मी गीतों के शौक के बावजूद अपने स्वभाव के चलते मैंने कभी स्‍कूल-कॉलेज के मंचों पर गाने नहीं गाये, किंतु बचपन में गांव में माता-पिता के साथ देखे-सुने घडेले, मण्डाण, थडिया चौंफुला गीतों की लोकधुनों का बाल मन-मस्तिष्‍क पर इतना गहरा असर रहा कि आगे चलकर लोकगीत-संगीत की राह पर चल पड़ा और ऐसा चला कि अभी तक गिरता-पड़ता चल ही रहा हूं।

#Harish gaur

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Narendra Singh Negi
2 hrs ·
एक कवी ,एक गीतकार , एक विचारक, एक समाज सुधारक , एक आलोचक कई लोगो के दिलो में राज करता जो एक ऐसे प्रदेश में रहते है जो कई भाषाओं में बंटा है ,कई संस्कृतियो से सजा है और भिन्न प्रकार की भोगोलिक परिस्थियों से बना है .
क्या गढ़वाल और क्या कुमाओं..क्या पहाड़ी और क्या मैदानी ..जहा देखो वहा सब लोग एक सुर से सुर मिलके सिर्फ यही कहते है की गीत हुए तो बस नेगीजी के.
उनके गीतो की कोई सीमा ही नहीं है ..बच्चो से लेकर बूढों तक उनके गीतों के दीवाने है. गढ़वाली डिस्को की धुनों में नाचने वाला युवा वर्ग भी उनके गीतों को संवेदनशीलता से सुनता है और प्रेरणा लेता है.
वेह अपने गीतों के माध्यम से कोई न कोई सन्देश छोड़ जाते है ,उनके गीतों में किसी न किसी व्यक्ति का दुःख या उसकी खुशी, उसके विचार छुपे होते है इसलिए उन्हें उत्तराखंड की आवाज़ कहा जाता है.
उन्होंने उत्तराखंड की हर समस्या को अपने गीतों के माध्यम से उठाया है .
फिर चाहे "टेहरी डूबन लग्यु च बेटा" गीत में टेहरी के लोगो का दुःख का वर्णन हो या फिर "सभी धाणी देहरादून , होणी खानी देहरादून " में पहाड़ो में रहने वाले लोगो का दर्द.
यही नहीं उन्होंने सामाजिक मुद्दों को भी अपनी कलम और आवाज़ से बड़ी निडरता से उठाया.
"न काटा तौ डाल्यु ..." सुन के न जाने कितनी महिलाओं को पेड़ो की रक्षा करने की प्रेरणा मिली होगी या फिर "निहोनु रे निहोनु" सुन के न जाने कितने उत्तराखंडियो ने मंदिरों में बेजुबान जानवरों की बलि लेना छोड़ दिया होगा .
अपने गीतों से उन्होंने हर वर्ग को कुछ न कुछ दिया है .
उनके गीत "ठंडो रे ठंडो मेरा पहाड़े की हवा ठंडी पाणी ठंडी" सुनके न जाने कितने ही दिल्ली, मुंबई ,जयपुर ,चंडीगढ़ में रहने वाले हर गर्मियों में उत्तराखंड की और खींचे चले आते है .
"तेरी पीड़ा मा द्वि आंशु" या "चुलू जगोंदी बगत आई " गीत तो आज भी हर उस उत्तराखंडी के मोबाइल में रात को चलता होगा जो अपनी अर्धांगिनी से किसी कारणवश दूर रहता है .
"रॉक एंड रोल बोड़ा रॉक एंड रोल " गीत उनका युवाओं में खासा चर्चित है जिसमे उन्होंने बड़ी ही खूबसूरती से हलके अंदाज़ में बड़ी गंभीर बात कह डाली जो की युवाओं का अपनी संस्कृति के प्रति घटता रुझान.
उन्होंने युवाओं के लिए अपने लिखने के अंदाज़ को भी बदल दिया , और नये कलेवर में "मेरी सुरमा सरेला" लेके आये जिसे युवा वर्ग ने खासा पसंद किया .
वो यही नहीं रुके उन्होंने उत्तराखंड के राजनितिक उठापठक को भी रेंखाकित किया और "नौछमी नरेना" और "अब कत्गा खेल्यो" जेसे गीतो से उत्तराखंड की सत्ता तक बदल देने में मेहेत्व्पूर्ण भूमिका अदा की.
उनके कई गीत प्रेरणा दायक है. हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए .
गढ़रत्न उत्तराखंडी लोकगायक श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी आपको आपके जन्मदिवस पर ढेर सारी बधाई .
एडमिन: अंकित नेगी ‪#‎anknegi‬

 

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