Author Topic: प्रसिद्ध उत्तराखंडी महिलाये एवम उनकी उपलब्धिया !!! FAMOUS UTTARAKHANDI WOMEN !!!  (Read 57216 times)

suchira

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Full name : Hemlata Kala
Born : August 15, 1975,
Major teams : India Women, Railways Women
Also known as Chachu
Batting style : Right-hand bat
Bowling style : Right-arm medium

suchira

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Driving well with the full face of the bat, Hemlata Kala has shored up many an innings for India. When she first comes to the wicket she prefers to get her eye in by playing the ball into the gaps and rotating the strike. However, once set, Kala unveils a dazzling array of strokes. Unafraid to use her feet to the spinners, Kala likes to dominate the bowling. Built powerfully, she has the ability to hit the ball a long way and more often than not ends up scoring at a brisk pace. She is one of India's senior members of the squad picked to tour Ireland and England in July and August. She made her debut in 1999 against England and although she was dropped for the tour of New Zealand and Australia in 2006 she is now back and is hoping to make a bang. Although a little slow in the field, Kala possesses a safe pair of hands, and she plays her domestic cricket for North Central Railway.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Suchira Ji,

I belive both of them  would have paternal connection with Uttarakhand.

Full name : Hemlata Kala
Born : August 15, 1975, Agra, Uttar Pradesh
Major teams : India Women, Railways Women
Also known as Chachu
Batting style : Right-hand bat
Bowling style : Right-arm medium

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Brown’s gift: UK Govt to fund women empowerment programme for 7 years
« Reply #33 on: January 21, 2008, 11:30:06 AM »
Brown’s gift: UK Govt to fund women empowerment programme for 7 years
 
Posted online: Monday , January 21, 2008 at 10:54:07
Updated: Sunday , January 20, 2008 at 11:10:02 Print Email To Editor Post Comments

New Delhi, January 20 The Mahila Samakhya Programme, which works for empowerment of rural women across India, received a major boost on Sunday. British Prime Minister Gordon Brown announced that his government’s Department For International Development (DFID) would fund it for the next seven years, releasing £825 million over the next three years.
At Vishwa Yuvak Kendra, Chanakyapuri, Brown and his wife Sarah met women from nine states that are supported by the programme. The British PM congratulated them for “inspiring women throughout the world”. He said these women were the “driving force for the future”, changing the face of Indian society by taking up jobs that are considered a male bastion.

Since its inception in 1989, the Mahila Samakhya Programme — an initiative led by the Ministry of Human Resource Development — has empowered Indian women through employment and education about their rights.

Geeta Gairola, the state project director of the programme in Uttarakhand, has been part of the organisation since ’89. “The first step was to teach women that they had a strong role to play in our patriarchal society,” she said. Gairola has seen positive results — notably increased female literacy and growing female representation at panchayat level.

Ganga Devi, 60, is one of the three women who sit in the panchayat of Sara village in Uttarakhand. After being elected in 1996, one of her first jobs was to solve the village’s water problems. “This is what I had promised during my campaign. We got together and held strikes outside the Public Works Department. After eight long years without regular water, our demands were finally accepted.”

For Rajeshwari, a teacher at the adult literacy centre in Idukki, Kerala, and member of an adolescent empowerment group, the programme has “transformed” her life. “This has given me the opportunity to represent the aspirations of other Adivasi girls like me.”

In Karnataka, the Mahila Samakhya Programme has 60,000 members and is spread over 2,400 villages. Suchitra Vedant, project director for the state, said with the DFID funds they will be able to expand their work, including more districts and blocks.

Of the £825 million to be released over the next three years , £500 million has been earmarked for education and healthcare. Plans already in the pipeline include building 3 lakh more classrooms and training for an equal number of teachers. Nearly four million children are expected to benefit from the fund. In a final note, Brown said: “I hope every girl in India will have the opportunity to go to school by 2011.”


http://www.expressindia.com/latest-news/Browns-gift-UK-Govt-to-fund-women-empowerment-programme-for-7-years/263605/

पंकज सिंह महर

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मधु ढौढि़याल: समाज सेविका (मध्य प्रदेश)
उत्तराखण्ड की रहने वाली मधु ढौढि़याल का बचपन से ही एक सपना था कि वह गरीब बच्चों के लिये कुछ कर सके। तो बच्चे बीच में ही अपनी पढाई छोडकर काम करने में लग जाते हैं, उन्हें दोबारा शिक्षा प्रदान करवा कर उन्हें इस समाज में जीने के काबिल बना सकें। मध्य प्रदेश में अपनी पढाई पूरी करने के बाद इन्होंने अपने सपने को पूरा करने की सोची और इनके इस सपने को पंख दिये, इनके पति हरीश ढौढि़याल ने। मधु बताती हैं कि मेरे पति ही मेरे मार्गदर्शक हैं, उन्होंने ही मुझे समाज के प्रति कार्य करने में योगदान दिया। श्री हरिहर स्वालंबन ट्रस्ट से जुड़ी मधु ढौढि़याल बाल मजदूरी, गरीब बच्चे जो बीच में ही शिक्षा छोड़ देते हैं, उनके लिये कार्य कर रहीं हैं। मंगोलपुरी एक्स ब्लाक बस्ती विकास केन्द्र है जो कि एमसीडी की तरफ से मिला है, वहां पर सिलाई, कढ़ाई, शिक्षा, टेलरिंग, जूट का काम, पेंटिग्स आदि का काम बच्चों को सिखाया जाता है। लोकल लेवल पर इन्हें बहुत से पुरस्कार मिल चुके हैं, मधु चाहती हैं कि लोग आगे आंयें और बच्चों की मदद करें। इनका मानना है कि अगर आप स्वालंबी हैं तो आपके साथ सभी लोग जुड़ना पसंद करेंगे। मधु का कहना है कि आज की नारी अपने आप में हर तरह से पूर्ण और सक्षम है और पुरानी जंजीरों को तोड़कर आगे बढ़ रही है।


उक्त समाचार गृहलक्ष्मी के अप्रैल, २००८ के अंक में प्रकाशित हुआ है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सुरली लाल को प्रथम हथकरघा पुरस्कारMay 10, 12:05 am

उत्तरकाशी। उद्योग विभाग की ओर से आयोजित जनपद स्तरीय हथकरघा -हस्तशिल्प पुरस्कार वितरण में बतौर मुख्य अतिथि नगर पालिका अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि जनपद में हथकरघा हस्तशिल्प के क्षेत्र में अपार संभावनाएं है। इनके माध्यम से बेरोजगारों को स्वरोजगार से जोड़ने के साथ ही पंरपरागत कलाओं को भी जीवित रखा जा सकता हैै।

इस अवसर पर हथकरघा में उत्कृष्ट उत्पाद तैयार करने पर बीरपुर ड़ुण्डा के सुरली लाल को प्रथम पुरस्कार तथा चंद्र मणी ग्राम गजोली को प्रथम चंद्र लाल गुदिंयाट गांव ,श्रीमती नरोत्तमा बीर पुर डुण्डा को द्वितीय पुरस्कार से पालिका अध्यक्ष ने सम्मानित किया। इस अवसर पर सतीश सेमवाल,विजय पाल,जेपी कंसवाल,आशाराम जगूड़ी,अरविंद उपस्थित रहे। संचालन एन एस पडियार ने किया।

Meena Pandey

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कत्थक नृत्यांगना श्रीमती दीपा जोशी ने केन्द्र संगीत नाटक अकादेमी द्वारा शिमला मे आयोजित नृत्य महोत्सव मे उत्तरांचल का सफलता पूर्वक प्रतिनिधित्व किया. दीपा ने भात्खंडे संगीत महाविधालय से नृत्य की शिक्षा ली. उनकी  गुरु प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना डा. पूर्णिमा पाण्डेय है. दीपा वर्त्तमान मे नृत्य पर शोध कर रही है. वह गीत एवं नाट्य प्रभाग भारत सरकार की कर्मचारी है.और नैनीताल मे निवास कर रही है. दीपा समय समय पर कई प्रस्तुतिया देश भर मे दे चुकी है. इन्होने कत्थक पर कुछ किताबे भी लिखी है जो नए संगीत प्रमियों के लिए काफी उपयोगी हुई है. दीपा कत्थक के अलावा तबला वो गायन मे भी प्रवीण है. शिमला मे सफल प्रस्तुति के लिए उन्हें बधाई!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Meena Ji,

Thanx.. This is definitly a remarkable achievement.

कत्थक नृत्यांगना श्रीमती दीपा जोशी ने केन्द्र संगीत नाटक अकादेमी द्वारा शिमला मे आयोजित नृत्य महोत्सव मे उत्तरांचल का सफलता पूर्वक प्रतिनिधित्व किया. दीपा ने भात्खंडे संगीत महाविधालय से नृत्य की शिक्षा ली. उनकी  गुरु प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना डा. पूर्णिमा पाण्डेय है. दीपा वर्त्तमान मे नृत्य पर शोध कर रही है. वह गीत एवं नाट्य प्रभाग भारत सरकार की कर्मचारी है.और नैनीताल मे निवास कर रही है. दीपा समय समय पर कई प्रस्तुतिया देश भर मे दे चुकी है. इन्होने कत्थक पर कुछ किताबे भी लिखी है जो नए संगीत प्रमियों के लिए काफी उपयोगी हुई है. दीपा कत्थक के अलावा तबला वो गायन मे भी प्रवीण है. शिमला मे सफल प्रस्तुति के लिए उन्हें बधाई!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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डा.विनीता को मिला उत्तरी ध्रुव जाने का गौरवJul 04, 02:00 am

नैनीताल। उत्तरी धु्रव में स्थित आर्कटिक क्षेत्र में वैज्ञानिक अध्ययन के लिए पहुंचे भारतीय वैज्ञानिक दल में शामिल होने का गौरव नैनीताल निवासी डा.विनीता फत्र्याल को भी हासिल हुआ है। उत्तरी धु्रव में भारत का स्थायी वैज्ञानिक केंद्र 'हिमाद्री' हाल ही में स्थापित किया गया है।

'हिमाद्री' का उद्घाटन विगत दिनों केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा न्योलसुड (नार्वे) में किया गया। इसी के साथ भारत उत्तरी धु्रव में स्थायी वैज्ञानिक केंद्र स्थापित करने वाला दुनिया का दसवां देश बन गया। इसी वैज्ञानिक केंद्र में डा.विनीता फत्र्याल शोध के लिए भारतीय दल के साथ उत्तरी धु्रव की जटिल यात्रा पर गयी है। इससे पूर्व डा.फत्र्याल भारत के 25वें अन्टार्टिका अभियान की सदस्यता के रूप में वर्ष 2005-06 में दक्षिणी धु्रव में शोध कर उत्तराखंड का नाम रोशन कर चुकी हैं। इस तरह अन्टार्टिका में भारतीय वैज्ञानिक केंद्र 'मैत्री' और उत्तरी धु्रव में स्थापित केंद्र 'हिमाद्री' में शोध का अवसर पाने वाली वह पहली भारतीय महिला बन गई है।

नैनीताल के सेंट मेरी कालेज में पढ़ने के बाद उन्होंने कुमाऊं विवि नैनीताल से भूविज्ञान से एमएससी तथा पीएचडी उपाधि हासिल की। इसके बाद उन्होंने जर्मनी के ट्यूबिंगन विवि में जर्मन एकेडमिक एक्सचेंज कार्यक्रम के तहत शोध अध्यता के रूप में कार्य किया। गत 8 वर्षो से डा.फत्र्याल बीरबल साहनी इंस्टीटयूट लखनऊ में बतौर साइंटिस्ट कार्यरत है। उनका शोध कार्य जलवायु परिवर्तन पर केन्द्रित है।

डा.फत्र्याल अपने शोध दल के साथ दक्षिणी धु्रव में क्वाटरनरी होने वाली पेलियोक्लाइमेटिक अध्ययन करने के उपरांत उत्तरी धु्रव का अध्ययन करने का प्रयास किया है। उल्लेखनीय है आइस ऐज के बारे में अभी भी पूर्ण वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। समुद्र विज्ञान तथा भूविज्ञान संबंधी अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि उत्तरी और दक्षिणी धु्रवों के बीच अ‌र्न्तसम्बन्धों के बारे में और अधिक जानकारियां जुटाने के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों की आवश्यकता है। उत्तरी ध्रव पर गए भारतीय शोध दल द्वारा किए जा रहे अध्ययनों से इस दिशा में महत्वपूर्ण सहायता मिल सकेगी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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High on sweet success Kala Bisht,
« Reply #39 on: January 03, 2009, 01:56:02 PM »
High on sweet success

 

Dehradun, January 2
Kala Bisht, a diminutive women farmer, has become a symbol of grit and determination for small farmers in nearby areas of the Dehradun valley for farming as well as entrepreneurial skills.
Kala Bisht gives tips on fruit preservation. Tribune photograph

The courage displayed by her not only helped her save her land but also show the way to thousands of other hill women. Five years ago there were few options for Kala woman who had two infant children. Her husband is an Class IV ad hoc employee of the forest department.Their only asset was two-and-a-half bighas of ancestral agriculture land in Ambiwala village not far from the Indian Military Academy (IMA) in the Doon valley.

She and her husband tilled the land and toiled hard to make both ends meet. “The land could not give us enough food to eat for a year,” she recalled.They even thought of exercising the option to sell their land to the land mafia since there was sharp appreciation in the land prices around Dehradun after it was made a capital town in 2000.

However, Kala decided to take the hard way and continue farming adopting a new strategy. Instead of rice and wheat crops, she decided to experiment with organic farming and diversify in other agricultural-related activities.

Getting technical help from Himalayan Environmental Studies and Conservation Organisation (HESCO), a non- government organisation, she started a fruit nursery, a bee-keeping unit and a vermi composting unit on her land. She also decided to go for fruit processing.

She decided to undergo basic training in fruit processing and preservation and started with mango pickles and papaya chutney. The products were sold in the local market and were much appreciated.

Buoyed by the initial success, Kala decided to switch over from traditional crops like wheat and maize to strawberry.

“It was tough convincing my in-laws to give up traditional crops as these provided food security to the family,” she recalled.” But the strawberry crop perished within days and I was unable to do anything,” Kala said. Then she decided to get more information and training on value additions to harness the potential of her crops. HESCO helped her in going to the Central Food Training Research Institute (CFTRI) in Mysore for training two years ago.

Since then Kala and her husband Trilok Singh have had never to look back. Kala prepares jams, jellies, fruit juices, pickles and chutneys from locally available fruit like the mango, guava, papaya, amla, and strawberry.

With active support from her husband, she has been able to find a market for the products. “At every fair and mela hosted by organisations like the ITBP, the forest department, the Indian Institute of Petroleum (IIP)etc we are able to sell our products and get orders,” said a proud Kala.

In the past two years, the young women entrepreneur had to take a bank loan of Rs 5 to set up a workshop and buy fruit-processing machinery. “I am not only repaying a loan instalment of Rs 10,000 per month but also paying salaries of Rs 5000 each to four employees assisting me,” said Kala.

She set up a shop and a workshop in her village and a nursery of plants in her strawberry fields. She has more than fifty boxes of honey bees to produce honey. “ The fruit nursery, honey and vermi composting have started paying me back,” she claimed.

More and more people are coming to her daily to either buy her products, plants or honey. Her most sought-after-product is “Bel (aegale marmelos) fruit juice.”

“Earlier, the villagers with one or two fruit trees had little option but now I buy fruits from nearby areas and pay them well too,” Kala said. She preserves fruit and fruit pulp and prepares the requisite quantity of jams, jellies and pickles on order. HESCO has also helped her in getting an FPO certification.

A successful farmer-cum-entrepreneur, Kala (35) visited Switzerland in July 2007 on the invitation of the people of the Angeden valley under the Alps-Himalaya exchange programme to learn better farm and fruit-processing techniques.

“The Swiss experience helped me in knowing better and latest techniques for fruit and vegetable preservation that I am trying to employ here,” she said. “I think economic empowerment of the rural poor is the biggest empowerment and the example of Kala Bisht shows that through value addition and science and technology (S&T) inputs and by tapping local resources and local market, a decentralised approach to development is possible,” Dr Anil Joshi of HESCO opined.

More and more women are flocking to Kala Bisht for training. “Two women after training have started their own fruit-processing units,” Kala informed.

Kala and her husband now plan a bigger workshop to expand business. Earning more than Rs 30,000 a month, she has inspired the hill women to utilise their fruit and farm products which otherwise go waste.



Kala Bisht at her fruit preservation workshop. Tribune photo: Vinod Pundir

http://www.tribuneindia.com/2009/20090103/dplus.htm

 

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