Author Topic: BHARAT RATNA-SHREE GOVIND BALLAB PANT-भारत रत्न श्री गोविन्द वल्लभ पन्त,  (Read 46105 times)

विनोद सिंह गढ़िया

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[justify]भारत के स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्णिम कहानी आज भी लोगों के दिलों में क्रांति की अलख जलाती है. इस स्वतंत्रता की कहानी में कई ऐसे नायक भी थे जिन्होंने चुपचाप अपने काम को पूरा किया. ऐसे लोगों के कार्य ही इन्हें लोकप्रियता दिलाते हैं. आजादी की लड़ाई में एक ऐसे ही सिपाही थे भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत.

उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत को राजनीतिक रूप से पिछड़े माने जाने वाले पहाड़ी इलाकों को देश के राजनीतिक मानचित्र पर जगह दिलाने का श्रेय जाता है.


गोविन्द बल्लभ पंत जी की वकालत के बारे में कई किस्से मशहूर थे. उनका मुकदमा लड़ने का ढंग निराला था, जो मुवक्किल अपने मुकदमों के बारे में सही जानकारी नहीं देते थे, पंत जी उनका मुकदमा नहीं लेते थे.


10 सितम्बर, 1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित खूंट गाव में जन्में गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1905 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और 1909 में उन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की. काकोरी मुकद्दमें ने एक वकील के तौर पर उन्हें पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई.


गोविंद बल्लभ पंत जी महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को देश की जनशक्ति में आत्मिक ऊर्जा का स्त्रोत मानते रहे. गोविंद बल्लभ पंत जी ने देश के राजनेताओं का ध्यान अपनी पारदर्शी कार्यशैली से आकर्षित किया. भारत के गृहमंत्री के रूप में वह आज भी प्रशासकों के आदर्श हैं. पंत जी चिंतक, विचारक, मनीषी, दूरदृष्टा और समाजसुधारक थे. उन्होंने साहित्य के माध्यम से समाज की अंतर्वेदना को जनमानस में पहुंचाया. उनका लेखन राष्ट्रीय अस्मिता के पा‌र्श्व चिन्हांकन द्वारा लोगों के समक्ष विविध आकार ग्रहण करने में सफल हुआ.


उनके निबंध भारतीय दर्शन के प्रतिबिंब हैं. उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए अपनी लेखनी उठाई. प्रबुद्ध वर्ग के मार्गदर्शक पंत जी ने सभी मंचों से मानवतावादी निष्कर्षों को प्रसारित किया. राष्ट्रीय चेतना के प्रबल समर्थक पंत जी ने गरीबों के दर्द को बांटा और आर्थिक विषमता मिटाने के अथक प्रयास किए.


वर्ष 1937 में पंत जी संयुक्त प्रांत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और 1946 में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने. 10 जनवरी, 1955 को उन्होंने भारत के गृह मंत्री का पद संभाला.


सन 1957 में गणतन्त्र दिवस पर महान देशभक्त, कुशल प्रशासक, सफल वक्ता, तर्क के धनी एवं उदारमना पन्त जी को भारत की सर्वोच्च उपाधि ‘भारतरत्न’ से विभूषित किया गया.


हिन्दी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने में भी गोविंद वल्लभ पंत जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा. सात मार्च, 1961 को गोविंद बल्लभ पंत का निधन हो गया.


साभार : जागरण जंक्शन

विनोद सिंह गढ़िया

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[justify]आज उत्तराखण्ड के लाल भारत रत्न पं. गोविन्द बल्लभ पन्त जी की जयन्ती है।
इस अवसर पर 'मेरा पहाड़ डॉट कॉम' नेटवर्क एवं समस्त उत्तराखण्डवासी उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।



Govind_Ballabh_Pant

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dwarika Pande
 

पूज्यनीय श्रद्धेय पिताश्री जन्म शताब्दी बर्ष श्रद्धा सुमन (भाग २)
श्री गोविंद बल्लभ पाँन्डे
( जनवरी ७,१९१६ अप्रैल २९,१९८६ )

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यादें भाग १ की कुछ :

शतक,
शत नत मस्तक,
पितर
बाबूजी,
पिताजी
पापा डैडी,
तुम सतोगुण धर्म,
तरोताज़ा ।

निराकार
परमपिता
पौरूष
स्वतः खेल,
प्रकृति स्वरूप
साकार प्रत्यक्ष
पितृ देव
कराते मेल ।

मित्रों !
पता हो
पिता क्या है ?
स्मृति पटल पर,
याद आये पिता अपना !

आगे,
दुनियादारी
समझदारी
पिता की,
जरूर बतियाना ।

*********************
अंश आकृति
अपनी ही
समझ कर,
कृतिकृत्य
नवनित नित्य
सुधार कर,
निश्चिंतिं कितनी,
उभर कर,
उमर भर,
भूल नहीं पाता,
मैं कभी चाह कर ।

मित्र !
इत्र से,
पितृ के
आस्था संस्कार
छाये रहेंगे,
भाव में, कार्य में�, स्वभाव में�, बुद्धि में� बने रहेंगे ।
स्वधर्म,
फटकार दुलार,
याद प्यार,
दिलाते रहेंगे,
जब तब भावगंगा बहेगी,
हम और आप
बने रहेंगे ।

श्रृष्टा,
अभिभावक पालक भी,
�थोड़ा घोड़ा,
लट्टू टट्टू भी,
उमंग, उड़ती पतंग,
बाबूजी चले संग ।

अपने ही,
माँ पिता गाँव में�,
हम कितने खुश थे,
दिन में� दिन था,
रात में रात,
घुसे पड़े
रहते न थे ?
अपने ही घर में� पागल !
पा पानी,
ग गैस,
ल लाइट,

सबकुछ था न्यारा प्यारा,
निश्कपट पनघट,
झटपट खटखट नटखट,
सूरज उगता दिखता था,
गोधुली सरपट,
चटपट झुरमुट,
वो पनघट चक्की,
चोखा चौकी चुल्हा मीठा था ।

अब दिन को करते रात,
रात को दिन बाबूजी ।
कहानी भी,
रंगमंच भी,
हा हा ही ही,
कभी दूसरा
कभी खुद ही,
चक्रित घरघर ।

व्यवधान और गिद्ध,
फिर भी अपनी जिद्ध,
पवित्र मन,
वचन कर्म पथ दुग्ध,
न अवरुद्ध क्रुद्ध ,
सरल शुद्ध शीतल सिद्ध !

*********************े

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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भारत रत्न डॉ.गोविंद बल्लभ पंत की इस किताब से डर गए थे अंग्रेज
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भारत रत्न डॉ. गोविंद बल्लभ पंत ने न केवल राजनैतिक तरीकों से, बल्कि लेखन के जरिए भी आजादी की मुहिम में शामिल होने के लिए लोगों को प्रेरित किया।

जाने-माने इतिहासकार डॉ. अजय रावत बताते हैं कि उनकी किताब ‘फॉरेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ से अंग्रेज इतने भयभीत हो गए थे कि उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में इस किताब को 1980 में पुन: प्रकाशित किया गया।

कुमाऊं में अंग्रेजों के शासन से पहले गोरखाओं का शासन था, उनका प्रशासन और न्याय करने का तरीका बेहद क्रूर था। जब 1815 को अंग्रेजों का शासन कुमाऊं में शुरू हुआ, तो उन्होंने कई सामाजिक हित से जुड़े कार्य और व्यवस्थित तंत्र विकसित किए। डॉ. अजय रावत बताते हैं कि इसके चलते देश के अन्य हिस्सों की तुलना में यहां पर अंग्रेजों के प्रति नाराजगी कम थी।

ऐसे में लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ तैयार करने के लिए गोविंद बल्लभ पंत ने कमान संभाली। 1916 में कुमाऊं परिषद का गठन किया गया। इसके सांगठनिक सचिव पंत जी ही थे। अंग्रेजों ने फारेस्ट एक्ट बनाने के साथ ही आरक्षित, संरक्षित वन घोषित कर दिया।

पहाड़ के लोग वनों पर ही आश्रित थे, ऐसे में उनके हक-हकूक प्रभावित हो रहे थे। 1920 में जनता ने असहयोग आंदोलन के समय जंगलों में आग भी लगा दी थी। वनाधिकार कानून आदि से लोगों को किस तरह की परेशानी हो रही थी, इस पर गोविंद बल्लभ पंत ने 1922 में ‘फॉरेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ किताब लिखी।

यह किताब नैनीताल के ज्ञानोदय प्रकाशन से छापी गई। यह पुस्तक वन और पानी के अधिकार पर फोकस थी। डॉ. रावत का दावा है कि इस किताब से जनता में असंतोष बढ़ने का डर था, इसलिए अंग्रेजों ने उस किताब को बैन करने का फैसला किया। बाद में डा. रावत ने 1980 में ‘फारेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ का पुन: प्रकाशित कराया।

पर्वत पुत्र एवं भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत का जन्म अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में पंडित मनोरथ पंत के घर में हुआ। पंडित पंत के नाना बद्री दत्त जोशी अंग्रेज कमिश्नर हेनरी रैमजे के सलाहकार थे।

पंडित पंत अपने नाना के घर ही अधिक रहते थे और बचपन में ही उन्हें राजनीतिक परिवेश मिला। बचपन से ही वह धीर-गंभीर थे, इसलिए उन्हें घर पर सभी लोग धपुवा (निक नेम) कहा करते थे।

बता दें कि गोरखा शासन के बाद 1815 में अल्मोड़ा में अंग्रेजों का अधिकार हो गया था। 1856 में हेनरी रैमजे कुमाऊं कमिश्नर बने। पंडित गोविंद बल्लभ पंत के नाना बद्री दत्त जोशी हेनरी रैमजे के सलाहकार थे। पंडित पंत भी अधिकांश नाना के यहां रहते थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा रैमजे इंटर कॉलेज अल्मोड़ा में हुई।

उन्होंने 1903 में हाईस्कूल, 1905 में इंटर किया और इसके बाद इलाहाबाद के म्योर कालेज में प्रवेश लिया। वहां कानून की डिग्री लेने के बाद पंत जी अल्मोड़ा लौट आए। इस बीच इलाहाबाद में रहते हुए पंडित पंत जी पंडित मदनमोहन मालवीय, पंडित मोतीलाल नेहरू आदि के संपर्क में आए। लखनऊ में एक बैरिस्टर विष्णु नारायण धर 1911 में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे।

वह टीबी रोग से पीड़ित होने के कारण इलाज के लिए अल्मोड़ा आए। पंडित पंत अल्मोड़ा में उनसे राजनीतिक चर्चा करते थे। उनके संपर्क में रहने के बाद पंडित पंत का ध्यान राष्ट्रीय समस्याओं की तरफ गया और वह आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गए। इस बीच वकालत के सिलसिले में वह काशीपुर चले गए। 1916 में वह काशीपुर नोटिफाइड एरिया के अध्यक्ष बने।

उनके प्रयासों से 1916 में कुमाऊं परिषद की स्थापना हुई। 1916 में वह महात्मा गांधी, सरोजनी नायडू, पंडित जवाहर लाल नेहरू आदि के संपर्क में आए। आजादी के बाद वह उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। तब स्व. लालबहादुर शास्त्री उनके संसदीय सचिव भी रहे। 1957 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

पंडित पंत का सही जन्मदिन है 30 अगस्त
पंडित पंत का जन्म दरअसल 30 अगस्त 1887 को हुआ था। पर्वतीय परंपरा के अनुसार जन्मदिन तिथि के अनुसार ही मनाया जाता था। 1946 में लखनऊ में जब पहली बार पंडित पंत का जन्मदिन मनाया गया तब अनंत चतुर्दशी 10 सितंबर के दिन पड़ी थी। उसके बाद से 10 सितंबर को ही उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा चल पड़ी। (amar ujala)

 

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