Author Topic: Dr Lalit Mohan Pant, World's Fastest Surgeon from Khantoli, Uttarakhand डॉ ललित  (Read 18849 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ये उसी का निज़ाम है जो तुझे मेरे करीब किया .....

by Lalit Mohan Pant (Notes) on Monday, May 6, 2013 at 7:14pm

ये उसी का निज़ाम है जो तुझे मेरे करीब किया
न रहूँ अँधेरों में यूँ   उजाला मुझे  नसीब किया .

मेरी महफ़िल में तेरी आमद कार आमद हो गई 
जब  किसी को नवाज़ा  किसी को ग़रीब  किया . ...कार आमद =सफल

तेरा शुकराना तेरी खिदमत मेरी हैसियत में नहीं
बदले में रहमतों के मैंने तेरे जिम्मे सलीब किया .

कैसे जानूं तेरा चेहरा इन हजारों हजार चेहरों में
दोपहर है एक सहरा की हाल कैसा अजीब किया .   

हारने लगता हूँ तो तुझ पे बढ़ती है अकीदत मेरी
साथ तेरा है जानता हूँ क्यों तूने मुझे फ़रीद किया ....फ़रीद =अकेला , बेमिसाल

-ललित मोहन पन्त
06.05.2013
19.13 शाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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From Lalit Mohan Pant
 
खैर मना क़त्ल तेरा यार कर गये ,
वो तडपना तेरा उनसे देखा नहीं गया .
क्यों सोज मनाता है तू अपने यार का
वो भी तेरा क़त्ल करके देखा नहीं गया .
जिसे यार कह दिया वो इतना अज़ीज है
उसे गिरते हुए नज़र से देखा नहीं गया ....ललित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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माँ तू निराश न हो  ......by Lalit Mohan Pant (Notes) on Thursday, May 16, 2013 at 1:48am(मूक /बधिर/अबलाओं  के शोषण पर अन्तर्मन का ज्वार )
 
वो चीखें जो
पाषाणों के अट्टहास में खो गईं
एक मूक /बधिर/अबला /की
जो न उत्तराँचल की थी/न पूर्वांचल  की
न थी दक्षिण की  /न पश्चिम की 
तुम आत्मा थी
इस देश की
असहाय/विस्मृत /बदहवास
अपनी पथभ्रष्ट
संतानों से प्रताड़ित
मनुष्यत्व खो चुके
नराधम  प्राणियों की
विवश धात्री
जिसके लिये /समर्पण व अर्चना विहीन
जयजयकार के कर्कश स्वर
गुँजा रहे हैं
आसमान को
तुम्हारा मूक होना
तुम्हारा बधिर होना
खो देना /अपने होशोहवास
तुम्हें आत्महंता होने से
भले ही बचा ले
पर तुम्हारा अदृश्य /अश्रव्य /आर्तनाद
ललकारता है
हमारे ज़मीर को/
आदर्शों /अतीत को
तुम्हारी सिंह गर्जना
तुम भूल चुकी हो ना !
इसीलिए गीदड़ों की/ बन आई है
चारों तरफ/धुँध ही धुँध /छाई है
माँ तू निराश न हो
हम समेटेंगे /सूर्य किरणों को
बटोरेंगे /टिमटिमाते दियों को
और प्रगट होंगे
प्रकाश पुंज बनकर
एक दिन
तब देखना /अपनी संतानों को
अन्धकार खदेड़ते हुये
मैं जानता हूँ
तब तेरे होंठों से /शब्द फूटेंगे
कान सुनेंगे /हमारा संगीत
हम तुझे फिर श्रृंगारित करेंगे
तुम मूक/ बधिर /अबला/ नहीं हो
आत्मा हो इस देश की
माता हो .......
 
-ललित मोहन पन्त
15.08.06
4.45 pm   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मेरे तईं तो तेरे सवालों का बोझ था .....
by Lalit Mohan Pant (Notes) on Monday, May 13, 2013 at 11:54pm

जिसका था इंतज़ार, ये वो सहर न थी

नज़रों के सामने था, तेरी नज़र न थी .

 

मेरे तईं तो तेरे ,सवालों का बोझ था

दुहरी हुई कमर थी, कोई कसर न थी .

 

कतरे अश्क के भी , अब खारे कहाँ रहे

खाली हुये समंदर, तुझको खबर न थी .

 

सहरा से कई बार ,गुजरा था कारवां

मजबूरियों में कोई ,गुजर बसर न थी .

 

गर्दिशों ने हमको ,कमतर समझ लिया

था तूफ़ान बाजुओं में, कोई लहर न थी.

 

माहौल अहदे हाज़िर ,क्यों ख्वाब है बुरा

हैवानियत को जाने, क्यों थोड़ी सबर न थी .

 

-ललित मोहन पन्त

13.05.2013

23.50

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ये सिम्त मोहब्बत की मेरा नसीब है ..........by Lalit Mohan Pant (Notes) on Thursday, May 23, 2013 at 5:34pmये सिम्त मोहब्बत की मेरा नसीब है
वो पाक -मुक़द्दस अब मेरा हबीब है .   
 
कहने का सलीका  सीखा नहीं कभी
कहते हैं वो बात जो दिल के करीब है .
 
वो शख्स जिसे यकीं नहीं है जर्फ़ पर
सर पे हो ताज फिर भी सबसे गरीब है।
 
मुश्किलों की रहगुजर से गुरेजाँ नहीं मुझे
ढो रहा हूँ कबसे जो काँधे पे सलीब है।
 
उसने तो बक्श दी थी दुनिया औ कायनात
जर्रा भी नहीं तू , और हाथों में ज़रीब है .
 
सिम्त =दिशा , मोती , माणिक
मुक़द्दस =पाकीजा ,पवित्र
हबीब =प्यारा
जर्फ़ =योग्यता , ताकत
गुरेजाँ =बचना , परहेज
ज़रीब =जमीन नापने की पटवारियों की कड़ी वाली चेन 
 
-ललित मोहन पन्त
23.05.2013
17.30 शाम

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Lalit Mohan Pant ये सिम्त मोहब्बत की मेरा नसीब है ..........
 
 ये सिम्त मोहब्बत की मेरा नसीब है
 वो पाक -मुक़द्दस अब मेरा हबीब है .
 
 कहने का सलीका सीखा नहीं कभी
 कहते हैं वो बात जो दिल के करीब है .
 
 वो शख्स जिसे यकीं नहीं है जर्फ़ पर
 सर पे हो ताज फिर भी सबसे गरीब है।
 
 मुश्किलों की रहगुजर से गुरेजाँ नहीं मुझे
 ढो रहा हूँ कबसे जो काँधे पे सलीब है।
 
 उसने तो बक्श दी थी दुनिया औ कायनात
 जर्रा भी नहीं तू , और हाथों में ज़रीब है .
 
 सिम्त =दिशा , मोती , माणिक
 मुक़द्दस =पाकीजा ,पवित्र
 हबीब =प्यारा
 जर्फ़ =योग्यता , ताकत
 गुरेजाँ =बचना , परहेज
 ज़रीब =जमीन नापने की पटवारियों की कड़ी वाली चेन
 
 -ललित मोहन पन्त
 23.05.2013
 17.30 शाम

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Lalit Mohan Pant चल दिये जिस ओर तुम उस ओर मैखाने चले ...........
 
 अब कहाँ तुम मौज से साहिल से टकराने चले
 चल दिये जिस ओर तुम उस ओर मैखाने चले .
 
 कबसे दहकती आग तुम सीने में छुपाये थे हुये
 हम ले दिये को हाथ में तूफाँ को समझाने चले।
 
 बदले ज़माने इस जमीं पर  तेग जब तेरी चली
 क्यों आँधियों को लोग जाने आज बहकाने चले .
 
 कुछ इस कदर हैं हो गए ज़िन्दगी में मायूस से
 कुछ न कर पाये तो बस तख्तियाँ लहराने चले .
 
 तेरे हकों को  लूट कर  अब जश्न मनते हैं यहाँ 
 क्या पता क्या बिक गया और कब नजराने चले।
 
 नींद में सोई है जबसे तेरी जवानी और ज़मीर .
 सुना है मुर्दों के घर से तहखाने के तहखाने चले .
 
 -ललित मोहन पन्त
 03.06.2013
  वक़्त 13.39

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Lalit Mohan Pant
शुभ-कामना ...

क्या लिखूँ शुभ कामना में ,जिंदगी कैसी लिखूँ
दीर्घ हो जीवन लिखूँ या हर्ष मय जीवन लिखूँ
सब फलसफे जीवन के हैं भरमा रहे मुझको अभी
सोचता हूँ मेरी दुआ और 'वो' साथ हो तेरे लिखूँ .

-ललित मोहन पन्त
05.06.2013
समय 15.27

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Lalit Mohan Pant यह सिर्फ कविता नहीं है …जानता  हूँ इसे मेरी धृष्टता माना जायेगा …….
 
 मैं, छोड़ आया था ......
 
 मैं
 छोड़ आया था
 अपना छौना सा बचपन …. 
 पहाड़ों और घाटियों के सीने में
 छलाँगें भरते
 अपने नन्हे नन्हे पाँव …
 अनंत आकाश में
 बादलों से अठखेलियाँ करती
 अपनी निर्द्वन्द्व आकांक्षायें …
 सरहदों पर जाते
 रणदुन्दुभियाँ बजाते /विमान …
 आँगन के पत्थरों पर
 कदम ताल करते /जवानों के बूट … 
 और अपार साहस /दुःसाहस से
 अज्ञात दुश्मन को ललकारता
 सिर्फ एक मैली सी कमीज से
 ढँका मेरा नंगा बदन …
 
 मैं
 छोड़ आया था
 दादी के सीने से चिपटी
 जिन्दे भूतों और मरे पिशाचों
 के नृत्य की अँधेरी खौफनाक रात
 और उसकी अथाह ममता …
 उस पर चारों तरफ से
 आसमानी और
 अकाल मृत्यु से जी उठे
 देव भूमि के रक्षक
 उनके संघर्ष की कथायें
 पीढ़ियों से झेलते समय की व्यथायें ….
 
 मैं
 छोड़ आया था
 वो संकल्प
 जिसे दोहराते हुये /डरता हूँ
 अपनी नादानियों पर
 अफ़सोस किया करता हूँ  ….
 गाँव की  छुद्र नदी
 जिसके डर से
 मेरे बूढ़े दादा ने
 मेरा हाथ थाम कर
 पलायन किया था
 मुझे लेकर जिन सपनों को जिया था
 भले ही वो पूरे हुए हों
 या  मैंने कितने ही कीर्तिस्तंभ खड़े किये हों
 कहाँ किनारों की मर्यादा में रही .
 
 चल दिए थे हम
 अपनी जड़ों के साथ
 पहाड़ों के बंधन खोल कर
 हवाले कर उसे
 बौखलाये बादलों और ओछी धाराओं के …
 कैसे बचाते देवता/
 अलकनंदा /भागीरथी उस देव भूमि को
 वो भी तो ढूँढ रहे थे
 कहीं बची हुई /धँसी हुई /छुपी हुई
 जड़ों को
 आँखिर उनका अस्तित्व भी
 उन्ही जड़ों से है ना ?
 
 देवाधिदेव शिव जागे थे
 क्या तांडव किया था  ? या झलक थी प्रलय की ?
 अपनी आस्थाओं का अर्घ्य लिए मिट गये
 वो अनजान अनगिनत अभागे थे
 दृश्य बड़े हृदयविदारक थे
 विलाप करते
 दहाड़ें मारते /ईश्वर को कोसते …
 
 बढ़ता रहेगा जीवन और समय
 फिर आस्थाओं के द्वीप बनेंगे 
 दिये  की लौ फिर होगी तेज 
 विश्वास दृढ़ होंगे/ उत्सव होते रहेंगे
 भ्रष्ट  आस्थाओं का दंभ
 शोषण करता रहेगा समय और प्रकृति का …
 
 पर मुझे लौटना होगा
 पाषाण पूजने के लिए नहीं
 पूजने को जंगल/घाटी
 पहाड़ /नदी
 बचाने पीढ़ियाँ,पृथ्वी और सदी …….
 
 
 -ललित मोहन पन्त
 21.06.13
 03.12सुबह

 

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