Author Topic: Dr Lalit Mohan Pant, World's Fastest Surgeon from Khantoli, Uttarakhand डॉ ललित  (Read 17352 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ओ मेरी अबाबील !
March 3, 2014 at 12:26am

ओ मेरी अबाबील !
मैं आत्मा हूँ
अजर अमर
तो फिर क्यों घेर लेता है ?
अवसाद मुझे
और /घनीभूत हो कर
बर्फ की तरह
क्यों जकड लेता है ?
आहत " मैं "
इस देह में
मन ब्रह्माण्ड रचता है
और मैं /जान कर भी
भटक जाता हूँ अनंत में  … 
प्यास और मरीचिका
नियति और विश्वास
अंत तक
क्यों नहीं छोड़ते साथ ???
 
 
-ललित मोहन पन्त

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ग़ज़ल
March 7, 2014 at 4:15pm
 
 
बेतहासा धौंकती साँसें सभी थमने लगीं
मंजिलों पर आँधियाँ भी बर्फ सी जमने लगीं . 
 
 
जब इबादत में ख़लल करने लगे तेरे ख़याल
मंदिरों की घंटियाँ क्यों खुद ब खुद बजने लगीं   .
 
 
हार कर भी जीतना मुमकिन नहीं तेरे बिना
रोकती थीं जो दिवारें सब तरफ ढहने लगीं  .
 
 
दौड़ता था सिर्फ खूँ अब तक इन रगों में जहाँ
ज़िंदगी के साथ खुशियाँ प्यार से बहने लगीं  .
 
 
भींच कर तूने मुझे जब भर लिया आगोश में
नेमतें दुनिया कि सारी धूल सी लगने लगीं  .
 
 
पतझड़ों ने जब मुझे जो कर दिया बेज़ार सा
फागुनी हो कर फ़िजायें साथ में रहने लगीं  .   
 
 
-ललित मोहन पन्त
16 . 51 शाम
7. 03 . 2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Lalit Mohan Pant
 
शून्य की परिधि के पार …

कितना रीता पन

कितना शून्य भर दिया है

तूने आज

मेरे आसपास

स्वयं के अस्तित्व के लिये   

 

तू जानता है

मैं अब आसमान ताकता हुआ   

पुकारूँगा तुझे /कातर स्वरों से

 

किन्तु /अनेक अवलंब आशाओं के

अभी भी खींच रहे हैं /मुझे

इस जीवन की ओर

इस शून्य की परिधि के पार …


इस रीते शून्य में

छटपटाने की विवशता

बिना प्राण वायु के/ जीवन की तरह 

वेदना की पराकाष्ठा से

जब चीख का भी दम घुट जाता है

तब  भी /वृहत शून्य में प्रक्षेपित हो कर

ग्रहों और नक्षत्रों के बीच /भटकने

तेरा ओर -छोर पाने

तेरा अक्स तलाशने

तेरी दिव्य ज्योति में

समाहित होने की कल्पना

नहीं कर पाता मैं..

 

एक बार   …. सिर्फ़ एक बार  …

मेरे प्राण

परिधियों /विवशता /छटपटाहट से

मुक्त हो कर

आकंठ डूबना चाहते हैं

संकुचित शून्य की /परिधि के साथ

अपनी सम्पूर्णता के लिये

 

तुम जन्म दाता  हो  !

सम्पूर्ण हो !!

फिर भी

मुझे शून्य में

विवश क्यों छोड़ते हो ???

 

 

-ललित मोहन पन्त

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मेरे अजन्मे सिद्धार्थ !

September 23, 2013 at 12:03am

मेरे गर्भ में

एक भ्रूण की तरह

पलते रहे हो तुम

मेरी धमनियों और शिराओं से

जुड़ते रहे हो तुम

मेरे अजन्मे सिद्धार्थ !

भ्रूण तो /एक निश्चित काल अवधि में

जन्म लेता ही है

अपना आकार लेकर

रचयिता भी तो रचता है

अपना सर्वस्व  देकर

लेकिन

अभी तक तुम

न कोई आकार ले सके हो

और न ही जन्म

कब से पिड़ा रहे हो

मेरे भीतर

शरीर के सारे गह्वरों में

उदर से दिलो -दिमाग तक

मेरी समस्त मानसिक यंत्रणाओं/

प्रताड़नाओं से 

क्या भयभीत हो ???

 

-ललित मोहन पन्त

२००१

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सावन ,सुराज ,स्वतंत्रता और सपने ….
August 4, 2013 at 3:21am

सावन जो कभी दो टकिया की नौकरी के सामने लाखों का होता था …  काले मेघ जो कालिदास की नायिका का दूत बन विरह की पीड़ा का बोझ नहीं उठा पाते थे   …. खेत जो आसमान को ताकते- ताकते बिवाई की तरह फट जाते थे   …. किसान जिसकी धडकनें बदलियों के मूड पर पर घटती बढती थी  …. धरती ,चर- अचर धानी चुनरी ओढ़ कर आनंद की छटायें बिखेरते थे …एहसास क्यों बदलते जा रहे हैं ...?   क्या समय ,उम्र , और माहौल 'है' को "था "में बदल रहे हैं  … शायद  … अनुभूतियों  के स्तर पर सब कुछ सापेक्ष है  … सबकी अपनी अपनी  … पर बहुत कुछ तेजी से बदल रहा है  …. मानता हूँ यही प्रकृति का नियम है पर दिशा -दशा देवाधीन हो गई है   … और हम संघर्ष रत होकर भी क्यों इतने लाचार  …?

देवता जो हमसे ऊपर हैं   …हमारे रक्षक हैं  … जिनका हमारे जीवन पर नियंत्रण है   … हमसे बलिष्ठ हैं  … हमने जब यह महसूस किया तब से आज तक उनके आगे नतमस्तक हैं ,इस झूठी दिलासा के साथ कि कभी वे हमें उठा कर गले लगायेंगे   …. यह जानते हुये भी कि उनका अस्तित्व सिर्फ तभी तक है, जब तक हम नतमस्तक हैं   …. कभी इन्हीं देवताओं  के वीर्य से नये  देवता जन्म लेते हैं और हमारी आत्मायें उनकी जय-जय कार से फूली नहीं समातीं   ….

कहने को स्वराज और स्वतंत्रता की ६७ वीं वर्ष गाँठ की परम्परा का निर्वाह होगा   … झंडे वही फहरायेंगे ,हम सिर्फ तालियाँ बजायेंगे …..

कुछ पेट थोड़े रुपयों में भरेंगे  …कुछ खूब खा कर भी भूखे रहेंगे  … कमी उनकी भी नहीं है जो मुफ्त रामरोटी से जीवन गुजार देते हैं। झंडे फहराने वाले स्वराज ,सुराज और स्वतंत्रता की दुहाई देते रहेंगे  … जिनकी शहादतों पर पैर रख कर सत्ता उस ओर से इस ओर आई उन्हें अब भूलना होगा ,क्योंकि वह अब पुरानी बात हो गई है और नए शहीदों ,नायकों और देवताओं के लिए भी तो जगह बनानी है ना  …आखिर कब तक लकीरों को पीटते रहेंगे  …?

शिक्षा और चिकित्सा व्यापारियों को सौंप कर हम इनमें  शुचिता और समर्पण की अपेक्षा करते हैं  …. आँखों के सामने बहते काले धन की नदियों में हमें बाढ़ नहीं दिखाई देती पर लोटे से छलके पानी से हम गीले हो रहे हैं   ….

आत्मकेंद्रित प्रवृत्तियों  और स्वहित तक सीमित इकाइयों के समाज में कानून और और तंत्र  की लाचारी हाथ बाँधे खड़ी है और नासमझ भीड़ को रिझा रही है जबकि लुटेरे उद्धारक के बाने में "सब कुछ"लूट रहे हैं और हम उनकी शरण में हैं  … इस प्रजातंत्र में हम तंत्र की प्रजा हो गये  हैं  …. सामाजिक हितों से हमारे हित टकराने लगे हैं   … इसीलिए शायद हम खुद नहीं चाहते कि  व्यवस्था बदले  …

घोंघे की तरह अपनी खोल में छुपे हुये हम जिस संकट के टल जाने उम्मीद में हैं  … यह बताने कि, वह भी हर वक़्त हमारी ताक में है और हमारे जमीरों को जगाने कोई अवतार , क्या फिर आयेगा ? आखिर  हम  …. कब  … आज़ाद होंगे  …????????

 

-ललित मोहन पन्त

३. ३३ प्रातः

०४। ०७। २०१३

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Lalit Mohan Pant
 
आज शाम शल्य चिकित्सकों की वार्षिक सभा के दौरान एक वरिष्ठ चिकित्सक दूसरे से अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे थे … मैंने सुना वे कह रहे थे कि - उसे तो मैंने श्राप दिया है … मेरे कान खड़े हो गए और मैंने रोकते हुए उनसे पूछा -क्या उनका श्राप वाकई लगता है … उन्होंने तपाक से कहा क्यों नहीं ??? उन्होंने समझाया देखो! हम भगवान की कोर्ट में वकील हैं … मनुष्यों को भगवान उनके कर्मों के जो दंड देता है उसे कम करवाते हैं … किसी की मौत की सजा जिंदगी में … किसी की साल दो साल की बीमारी , चन्द दिनों में … किसी की मौत उसके उसके सड़े हुए हाथ या पाँव विच्छेदित कर …. किसी का अंधापन उसका मोतियाबिद निकाल कर आदि आदि तरीकों से उसकी सजाएं कम करवा कर उसे जीवन दान देते हैं … और यही मनुष्य जब डाक्टरों को कष्ट पहुंचाता है …. धोखा करता है …मानसिक त्रास देता है तो डॉक्टरों की दिल से निकली हुई बद्दुआ में बताओ भगवान् किसका साथ देगा ??? और जज और वकील का रिश्ता तो जगजाहिर है … भाया ! डॉक्टरों का श्राप तो २०० परसेंट लगता है देख लेना कभी आजमा कर ……
मैं याद करने की कोशिश कर रहा हूँ अपने ३३ साल के चिकित्सकीय जीवन में कभी अपना बुरा चाहने वाले के लिए भी दिल से बद्दुआ निकली हो …

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Lalit Mohan Pant
March 8 near Indore
इस ग़ज़ल को आज के सन्दर्भ में पढ़ने की गुज़ारिश …

ग़ज़ल

बेतहासा धौंकती साँसें सभी थमने लगीं
मंजिलों पर आँधियाँ भी बर्फ सी जमने लगीं .

जब इबादत में ख़लल करने लगे तेरे ख़याल
मंदिरों की घंटियाँ क्यों खुद ब खुद बजने लगीं .

हार कर भी जीतना मुमकिन नहीं तेरे बिना
रोकती थीं जो दिवारें सब तरफ ढहने लगीं .

दौड़ता था सिर्फ खूँ अब तक इन रगों में जहाँ
ज़िंदगी के साथ खुशियाँ प्यार से बहने लगीं .

भींच कर तूने मुझे जब भर लिया आगोश में
नेमतें दुनिया कि सारी धूल सी लगने लगीं .

पतझड़ों ने जब मुझे जो कर दिया बेज़ार सा
फागुनी हो कर फ़िजायें साथ में रहने लगीं .

-ललित मोहन पन्त

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Lalit Mohan Pant

एक चतुष्पदी माँ शिशु के लिये -
मात्रा भार 2112 ,2112 ,121
अंकुर कोमल धरती विशाल
स्नेहसिक्त कुदरत का कमाल
माँ शिशु ममता सबका प्यार
है भविष्य कर इसकी सँभाल।
-ललित मोहन पन्त

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एक चतुष्पदी माँ शिशु के लिये -
April 4, 2014 at 7:19pm

अंकुर कोमल धरती विशाल

स्नेहसिक्त कुदरत का कमाल

माँ शिशु ममता सबका प्यार   

है भविष्य कर इसकी सँभाल।

 

-ललित मोहन पन्त

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शून्य की परिधि के पार …
March 28, 2014 at 1:25am

कितना रीता पन

कितना शून्य भर दिया है

तूने आज

मेरे आसपास

स्वयं के अस्तित्व के लिये   

 

तू जानता है

मैं अब आसमान ताकता हुआ   

पुकारूँगा तुझे /कातर स्वरों से

 

किन्तु /अनेक अवलंब आशाओं के

अभी भी खींच रहे हैं /मुझे

इस जीवन की ओर

इस शून्य की परिधि के पार …


इस रीते शून्य में

छटपटाने की विवशता

बिना प्राण वायु के/ जीवन की तरह 

वेदना की पराकाष्ठा से

जब चीख का भी दम घुट जाता है

तब  भी /वृहत शून्य में प्रक्षेपित हो कर

ग्रहों और नक्षत्रों के बीच /भटकने

तेरा ओर -छोर पाने

तेरा अक्स तलाशने

तेरी दिव्य ज्योति में

समाहित होने की कल्पना

नहीं कर पाता मैं..

 

एक बार   …. सिर्फ़ एक बार  …

मेरे प्राण

परिधियों /विवशता /छटपटाहट से

मुक्त हो कर

आकंठ डूबना चाहते हैं

संकुचित शून्य की /परिधि के साथ

अपनी सम्पूर्णता के लिये

 

तुम जन्म दाता  हो  !

सम्पूर्ण हो !!

फिर भी

मुझे शून्य में

विवश क्यों छोड़ते हो ???

 

 

-ललित मोहन पन्त

 

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