Author Topic: Dr Lalit Mohan Pant, World's Fastest Surgeon from Khantoli, Uttarakhand डॉ ललित  (Read 17352 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Lalit Mohan Pant
April 18 2014
यह मानव स्वभाव है कि वह अपने माता- पिता , अग्रज ,वरिष्ठ से लेकर भगवान को खुश करने का प्रयास निरंतर करता रहता है। जब जब सहायता की जरूरत होती है उनसे अपेक्षा भी करता है और जब सहायता नहीं मिलती तो विश्वास की डोर टूट जाती है और यहाँ से शुरू होता है दिखावा … प्रदर्शन … तुष्टिकरण … और अपने हितों को बचाते हुये समय काटने का सिलसिला … अब और अच्छा हो गया वास्तविक दुनिया वाले काल्पनिक दुनिया में भी आसानी से आ जा सकते हैं …. क्या देखना चाहते हैं उसे गढ़ना और दिखाना और उसे विश्वसनीय बना देना कितना आसान हो गया है … जो एक विश्वास और संकल्प लेकर चलता है उसकी दृढ़ता या लचीलापन तय करता है कि उसकी उम्र क्या होगी …. ?आखिर पराकाष्ठाओं की चुनौतियाँ स्वीकार करना भी तो हमारा स्वभाव है …

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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चलो यूँ ही समझा लें मन को …
April 18, 2014 at 1:48am

 

मैं गिड़गिड़ाता रहा हूँ रात दिन तुम सबके सामने जितने भी सम्बन्ध हो कल आज और कल के इस उम्मीद के साथ /कि तुम थोड़ा पिघलोगे भले ही अनिच्छा से मेरा मान रखोगे यह भ्रम /जीवन भर साथ चलता रहा है इसीलिये सब सहा है यह सुनते ही तुम मेरे विरोध में खड़े हो जाओगे और शायद फिर मुझे गिड़गिड़ाता पाओगे मैं अपना वक्तव्य बदलता हूँ और इसे सार्वभौम /करता हूँ फिर तुम्हारी और अपनी

ओर से कहता हूँ मैं मुझे लगता है अनुभव हूँ एक उम्र का संभवतः हो सकता हूँ दिशा सूचक /भले या बुरे का माना कि सब कुछ आपेक्षिक है हर व्यक्ति के लिये माना कि मेरा सच /तुम्हारा नहीं मेरा गंतव्य तुम्हारा मंतव्य नहीं तुम उगते सूर्य हो /ज्ञान हो प्रतिस्पर्धा हो /तर्क हो /अनूठे हो इमोशंस /सेंटीमेंट्स /पेट्रिओटिज्म इन निरर्थक शब्दों का ढोना तुम्हें गवारा नहीं इन सबका रोना मर्यादा /विनय/सामाजिकता /शिष्टाचार कहाँ है अब नये समाज का आधार ? कोई नहीं होता ख़ास सबके सब बिंदास … संबंधों के बीच गिड़गिड़ाना परिस्थितियों का हृदय शूल सा पिड़ाना क्या जीवन की निरंतरता के पड़ाव होते होंगे ?जब सारा जग हँसता है तब कुछ तो रोते होंगे … चलो यूँ ही समझा लें मन को …

-ललित मोहन पन्त

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Lalit Mohan Pant
April 18 near Indore 
चलो यूँ ही समझा लें मन को …

मैं गिड़गिड़ाता रहा हूँ
रात दिन
तुम सबके सामने
जितने भी सम्बन्ध हो
कल आज और कल के
इस उम्मीद के साथ /कि
तुम थोड़ा पिघलोगे
भले ही अनिच्छा से
मेरा मान रखोगे
यह भ्रम /जीवन भर
साथ चलता रहा है
इसीलिये सब सहा है
यह सुनते ही तुम
मेरे विरोध में
खड़े हो जाओगे
और शायद फिर
मुझे गिड़गिड़ाता पाओगे
मैं अपना वक्तव्य बदलता हूँ
और इसे सार्वभौम /करता हूँ
फिर तुम्हारी और अपनी
ओर से कहता हूँ
मैं
मुझे लगता है अनुभव हूँ
एक उम्र का
संभवतः हो सकता हूँ
दिशा सूचक /भले या बुरे का
माना कि सब कुछ आपेक्षिक है
हर व्यक्ति के लिये
माना कि
मेरा सच /तुम्हारा नहीं
मेरा गंतव्य तुम्हारा मंतव्य नहीं
तुम उगते सूर्य हो /ज्ञान हो
प्रतिस्पर्धा हो /तर्क हो /अनूठे हो
इमोशंस /सेंटीमेंट्स /पेट्रिओटिज्म
इन निरर्थक शब्दों का ढोना
तुम्हें गवारा नहीं
इन सबका रोना
मर्यादा /विनय/सामाजिकता /शिष्टाचार
कहाँ है अब नये समाज का आधार ?
कोई नहीं होता ख़ास
सबके सब बिंदास …
संबंधों के बीच
गिड़गिड़ाना
परिस्थितियों का
हृदय शूल सा पिड़ाना
क्या जीवन की निरंतरता के
पड़ाव होते होंगे ?
जब सारा जग हँसता है
तब कुछ तो रोते होंगे …
चलो यूँ ही समझा लें मन को …

-ललित मोहन पन्त

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Lalit Mohan Pant
April 9
है बहाना आज फिर शुभकामनाओं के लिये
आँधियों की धूल में संभावनाओं के लिये

नींद क्यों आती नहीं ये ख्वाब हैं पसरे पड़े
हो गई बंजर जमीनें भावनाओं के लिये … शुभकामनायें

है बड़ा मुश्किल समझना जिंदगी की धार को
माँगते अधिकार हैं सब वर्जनाओं के लिये।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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एक चतुष्पदी माँ शिशु के लिये -
April 4, 2014 at 7:19pm

अंकुर कोमल धरती विशाल

स्नेहसिक्त कुदरत का कमाल

माँ शिशु ममता सबका प्यार   

है भविष्य कर इसकी सँभाल।

 

-ललित मोहन पन्त

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Lalit Mohan Pant
 
हम को है अधिकार कहो तुम
जनता की सरकार कहो तुम
मेरी मर्जी से दिल्ली में
लगता है दरबार कहो तुम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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एक अर्से के बाद …
April 27, 2014 at 10:34pm

एक अर्से के बाद

भीतर का ज्वालामुखी

बह जाना चाहता है /लावे की तरह

अंतर से कलम

और कलम से कागज़ तक

फैला हुआ लावा

कई समझौतों से गुजरता है

छोड़ कर मुहाने पर अपनी आग

तलहटी पर सिमटता है …

अर्से के बाद

हर बार इसी तरह

ज्वालामुखी फूटते हैं

कभी कलम से /तो कभी जुबाँ से

पर पिघला हुआ लावा

एक दिन जम जाता है

बर्फ से पाषाणों में

पिघलना /गरजना /उछलना /बहना

फिर जम जाना पाषाणों में

नियत है नियति से

या फिर विवशता ???

 

-ललित मोहन पन्त

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Lalit Mohan Pant
 
हम को है अधिकार कहो तुम
जनता की सरकार कहो तुम
मेरी मर्जी से दिल्ली में
लगता है दरबार कहो तुम

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Lalit Mohan Pant
 
आपने बेहतरीन नेता चुना
आपने बेहतरीन सरकार चुनी
पर क्या आपने छोटा परिवार चुना ?
नहीं !!!
आपने बेहतरीन बीज चुना
आपने बेहतरीन खेत-खाद चुना
पर क्या आपने पानी का स्त्रोत चुना ?
नहीं !!!

सबकी बेहतरी के लिये
सबसे बेहतर चुनाव
छोटा परिवार हो हर शहर हर गाँव …

अबकी बार NSV यार …

- डॉ ललित मोहन पन्त

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Lalit Mohan Pant
12 hrs · Indore

छूट गया पीछे अतीत
स्मृतियों में है व्यतीत

जीवन का यह भरम जाल
प्रीत कहाँ है कौन मीत

दीप जलें अंतस उजास
झर झर झरता हो सुगीत

घन गरजे बहती बयार
तन मन तर होता प्रतीत

देख रहे चलचित्र अवाक
हो तटस्थ दृग अभिनीत

अतिशय आशायें विश्वास
अवसर होंगे दास क्रीत

-ललित मोहन पन्त
००.०८
२५.०५.२०१४

 

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