Author Topic: FREEDOM FIGHTER OF UTTARAKHAND - उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी  (Read 74628 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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FREEDOM FIGHTER OF UTTARAKHAND -Kalu Singh Mahara
« Reply #100 on: August 14, 2011, 01:54:29 PM »
Kalu Singh Mahara
Kalu Singh Mahara was a Kumauni leader during Indian Rebellion of 1857. He is known as the first freedom fighter from Kumaun, then in the United Province.[1]
Kalu Mahara was the leader of the Vishung Patti of Kumaun, Karnakarayat in present. This region is situated near Lohaghat, in district Champawat of Uttarakhand.

The Rebellion He received a cryptic letter from Audh, inviting the Kumauni people and other hill people to join the Rebellion against the British. The government of Awadh proposed that after regaining the power from the British, the hill area will be returned to Kumauni people and the Tarai (plain area) will be taken by Oudh. Kalu Mahara organised the local people against British empire.
Skirmishes all across the area of Kali Kumaun, Sui, Gumdesh and the adjoining areas , now in the Champawat district, frustrated the British. His militiamen composed mainly of riflemen Bandukchi ambushed and harassed the British forces on several occasions

Support Kalu Mahara received the support of many other leaders of the Champawat region including Anand Singh Phartyal, Bishan Singh Kharayat and many others.They led the anti-British Militia then active in the Kali Kumaun region of Kumaun. The rebellion failed as Delhi and Awadh fell to the British
Arrest Kalu mehra, Anand Singh Phartyal and Bishan Singh Kharayat were arrested at Annakhera. Kalu Mahara was executed along with the others.
 Legacy He is still revered as the first freedom fighter in Kumaon and is remembered on the day of his birth by the people of Champawat and Kumaon for his ultimate sacrifice.


Source - Wikipeida.com


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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More About Kaalu Mahra.

Kalu Mahra had led a group of mutineers during the 1857 uprising in the Kumoan region. “Keeping Kalu Mahara’s contribution in the First War of Independence, I have spared time from my tight schedule for the function,” said Rawat.

Mahara was born in 1831 at Thuawa-Mahra village of Kali Kumoan. “He came in contact with Nawab of Rohilkhand Khan Bhahadur Khan, who was an emissary of the Begum of Awadh in that uprising. He was initiated to join revolutionaries under the condition that after the revolution became successful, the region of Kumaon would go to the Nawab of Rohilkhand and hilly terrains would remain with Kalu Mahara,” noted BD Pandey in his book on the history of Kumoan.

“The Almora Gazetteer mentions that in January 1858, people of Kali Kumoan had joined the rebel camp and to prevent its spread to other hill areas, Hennery Ramsay the then Commissioner of Kumoan deputed Colvin, the assistant commissioner of Kumoan at that time,” said Dr Sekhar Pathak, a historian and retired professor of history from Kumoan University.

Devendra Oli, a scholar researching on Kalu Mahar’s contribution during 1857 uprising, saidt after the agreement with the Nawab of Rohilkhand, Kalu Mahra organised the revolutionary in the Kumoan region and attacked barracks of British soldiers at Lohaghat and later in Almora.

“The British fearing Kalu Mahar’s army, sent off their families to Nainital and then after arranging extra strength from surrounding towns attacked and defeated the unskilled army of Mahara,” said Dr Pathak.

Kalu Mahara, along with his close companions Bishan Singh Karayat and Anand Singh Pharayal, was arrested and their properties gutted by the British, but according to Devendra Oli, Mahara was released form Almora jail after the people of Kali Kumoan surrounded the jail and died his natural death in 1905, at Khatkutum near Mayawati where an ashram had already been established by Swami Vivekanand in 1897.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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स्वतंत्रता सेनानी भवानी दत्त जोशी: जिन्हें हम भूल गये
By कौस्तुभानन्द पंत on August 1, 2009

बनारस विश्वविद्यालय से बी. एस-सी. करने के बाद मैं 1955 में एक दिन यों ही अल्मोड़ा की माल रोड में घूम रहा था तो एम्बेसडर होटल के नीचे जिला सूचना केन्द्र से एक सौम्य सुदर्शन व्यक्ति भीतर से निकले। वास्कट तथा सफेद टोपी पहने वे बड़े ही प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी लगे थे। परंतु उस समय मुझे पता नहीं था कि वे कौन थे। दो साल बाद जब मैं गर्मियों की छुट्टियों में घर की ओर जा रहा था तो ताऊ जी के बड़े पुत्र बिशन दा के घर पर लखनऊ में वही सज्जन मिल गये। तब भाभी जी ने बताया कि भुवन (असली नाम भवानी दत्त जोशी) उनकी दीदी के पुत्र थे। भवानीदत्त जी अल्मोड़े जिले के सूचना अधिकारी थे। सन् 1961 में भाभी जी के प्रयास से मेरी शादी भाभी जी की भतीजी से हो गई और तब से भुवनदा या भवानीदत्त जी से लखनऊ मेरी ससुराल या भाभी जी के निवास अथवा अल्मोड़ा में यदाकदा मुलाकात होती रहती थी।

पत्नी से ज्ञात हुआ कि वे पक्के कांग्रेसी, गांधीवादी हैं और स्वतंत्रता सेनानी रह चुके हैं। चरखा कातना और उसी के सूत के कपड़े बनवा कर पहनना उन्हें अच्छा लगता है। उनके बेटे और अन्य परिचितों के द्वारा जो सूचना मुझे मिल पाई उसी के आधार पर आगे भवानीदत्त जी के जीवन पर जो कुछ पा सका वह आगे दिया जा रहा है।

भवानीदत्त जी जन्म संभवतः सन् 1904 में हुआ था। वे अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना के पास दिगौली गाँव में मनोरथ जोशी के घर पैदा हुए थे। उनके बाल्यकाल में ही उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा उनके नाना शंभुदत्त जोशी के संरक्षण में अल्मोड़ा में हुई थी। वहीं से सन 1921 में उन्होंने रामजे कॉलेज, जो उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अधीन था, से इंटर साइंस की परीक्षा पास की थी।

सन् 1921 में अल्मोड़ा सहित सम्पूर्ण कुमाऊँ में कुली उतार और कुली बर्दायश के विरुद्ध भारी आंदोलन हुआ था। विक्टर मोहन जोशी, बद्रीदत्त पांडे, हरगोविन्द पंत आदि कांग्रेसी बागेश्वर में इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। भवानी दत्त जी भी तभी से कांग्रेस और सविनय अवज्ञा आंदोलन को सहयोग देने लगे थे। उनके नानाजी डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर थे और उनके लिये भवानीदत्त जैसे पढ़े-लिखे युवक को सरकारी नौकरी दिलाना कुछ भी कठिन न था। किंतु सन 1929 में महात्मा गांधी के नैनीताल, अल्मोड़ा, कौसानी और बागेश्वर आगमन के बाद वे पूरी तरह कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लेने लगे और समाजसेवा, सविनय अवज्ञा आंदोलन, सत्य, अहिंसा, चरखा चलाना, खादी पहनना आदि में प्रवृत्त होकर पूरी लगन से आंदोलन को समर्पित हो गये। इस समय उनके ऊपर पत्नी, माँ, दो छोटे भाइयों और तीन बहनों का भार था। उनकी डाँवाडोल स्थिति को पटरी पर लाने के लिये उनके नाना ने फिर से उनको नौकरी पर लगाने के लिये बहुत कोशिश की पर किसी भी तरह उनको राजी न कर पाने के कारण हार कर अपने ही प्रयास से उनके लिये अल्मोड़े की बाजार में एक किराने की दुकान खुलवा दी थी। पर उनके जैसा सरल और दुनियादारी से अनभिज्ञ आदमी कितने दिन तक दुकान चला सकता था ? उनके परिचित, यार-दोस्त और सम्बन्धी सामान उधार ले जाते तो मना करने में इन्हें बहुत ही संकोच होता था। उधार चुकाना लोग न जानते थे, वसूली करना इन्हें न आता था। दूसरे या तीसरे साल में ही दुकान पर ताला लग गया। व्यवसाय से छुट्टी पा जाने के बाद ये कैलास-मानसरोवर की यात्रा पर चले गये।

अछूतोद्धार में उनका सराहनीय योगदान रहा था और इस कारण उनको सामाजिक बहिष्कार का भी शिकार होना पड़ा था। यह बहिष्कार अल्मोड़े के रूढ़िवादी संकीर्ण समाज के बीच उनके परिवार के लिये बड़ा ही दुःखदायी रहा था। चर्खे पर सूत या ऊन की कताई करने, सत्य और अहिंसा के धर्म का पालन करते हुए पूरी ईमानदारी और धर्मपरायणता से वे परिवार के साथ कष्टों को साहसपूर्वक झेलते रहे। उनके मामा जगन्नाथ जोशी और मामी ने उनकी सदा यथाशक्ति सहायता की। महात्मा गांधी जी द्वारा उन्हें भेजे गये एक पोस्टकार्ड से ज्ञात होता है कि अछूतोद्धार और चर्खे के काम में वे कितना अधिक व्यस्त रहने लगे थे।

भाई भवानीदास,

तुम्हारा खत पाकर मुझे आनन्द हुआ। जिसको सेवा का ही ध्यान है उसे ईश्वर ऐसा मौका दिया करता है। प्रभु दास के चर्खे पर हाथ जम जाने से अच्छा परिणाम आ जाये तो उस चर्खे के मार्फत बहोत कार्य हो सकेगा।

मोहनदास के आशीर्वाद 28.12.30
सन् 1940 में उनको कांग्रेस द्वारा संचालित ग्राम सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत विलेज ऑर्गेनाइजर या सुपरवाइजर का काम दिया गया और वे गाँवों में जाकर समाजसेवा का काम करने लगे। परिवार की देखभाल करने वाला कोई और न होने के कारण पंत जी ने इनको ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से हट कर काम करने को बाध्य किया था। सन् 1945 में वे दिल्ली क्लॉथ मिल में काम करने लगे थे। इनकी ईमानदारी और सत्यपरायणता देखते हुए बिरला की एक कम्पनी में ईंटों के भट्टों और कोयले, लोहे तथा सीमेंट का हिसाब-किताब देखने के काम पर नियुक्त कर दिया गया। वहीं से इन्होंने अपने एक छोटे भाई एवं छोटी बहन की शादी करवा दी और इन भाई को काम पर लगा कर व्यवस्थित भी कर दिया। 1946 में अपने एकमात्र पुत्र को छोड़कर इनकी पत्नी परलोक सिधार गई थी।

देश को आजादी मिलने के बाद मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने इन्हें प्रदेश में पहला जिला सूचना अधिकारी बनाकर नैनीताल में नियुक्ति करवा दी। फिर वे अल्मोड़ा तथा पौड़ी गढ़वाल में नियुक्त रहे। जिला सूचना अधिकारी रहते हुए उन्हें पूरे उत्तराखंड की यात्रा का अवसर मिला। मुनस्यारी, जौलजीवी, धारचूला, पिथौरागढ़, बद्रीनाथ, केदारनाथ जैसे स्थान तब तक मोटर सड़क से नहीं जुड़े थे और लम्बी यात्राओं में सात आठ दिन तक लग जाते थे। अतः उन्होंने अपने इकलौते बेटे को नैनीताल में रखवा दिया। वह मात्र 1956-57 में ही उनके साथ रह सका।

सोलह सालों की लम्बी अवधि तक निरंतर पैदल यात्रायें करते हुए उन्होंने जिले के लगभग हर गाँव तक पहुँच कर निःस्पृह भाव से काम किया, किन्तु उनकी सेवायें नियमित नहीं मानी गईं। 1961-62 में उन्हें उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा साक्षात्कार के निमित्त लखनऊ बुलाया गया था। आयोग ने उनको ‘सहायक’ सूचना अधिकारी के पद पर रेग्युलर करने की सिफारिश की। तब उन्होंने तत्काल त्यागपत्र दे डाला। साल भर बाद उनको फिर से जिला सूचना अधिकारी के पद पर वापस ले लिया गया। कुछ और दिनों तक वे इसी पद पर काम करते रहे किंतु सरकार द्वारा उनकी कर्तव्यनिष्ठा के प्रति दिखायी गयी उदासीनता से व्यथित होकर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया था। सेवाकाल यथेष्ट न होने के कारण उन्हें पेंशन पाने की सुविधा भी नहीं मिल पायी थी।

भवानीदत्त जोशी जी के स्वभाव, कार्यशैली, सरलता और ईमानदारी की विवेचना कर पाना कदाचित संभव नहीं हो पायेगा। वे ऐसे ही पुरुषों में से थे जो ईश्वर की कृपा पाते रहे, शांति से रहे और अपने आप में संतुष्ट भी। एक बार उन्हें 90,000 रुपयों का एक पे ऑर्डर प्राप्त हुआ। शायद कोई एरियर रहा होगा। उन्हें संदेह हुआ कि यह भुगतान ठीक नहीं है। वे विभाग के सेक्रेटरी के पास पहुँच गये और बताया कि यह भुगतान गलत हो रहा है। सेक्रेटरी ने कहा – जोशी जी मिल रहा है तो ले लीजिये। उन्होंने यह धन हल्द्वानी में मकान बनाने में लगा दिया था। किन्तु उनके नौकरी छोड़ देने के बाद में सन् 1984-85 के दौरान प्रदेश के ऑडिटर जनरल से उक्त रकम को वापस करने की माँग गई। तब उनके बेटे ने क्रमशः किश्तों में सारी रकम लौटाई।

वे डॉ. राजेन्द्रप्रसाद, विनोबा भावे, पं गोविन्द बल्लभ पंत, लाल बहादुर शास्त्री, हेमवतीनन्दन बहुगुणा आदि के सम्पर्क में भी रहे। आजादी के बाद उन्होंने कुछ समय गांधी स्मारक निधि के कामों में भी हाथ बँटाया। उनकी नजर में कुछ अनियमिततायें आई और इसकी सूचना तत्कालीन राष्ट्रपति, जो गांधी स्मारक निधि के चेयरमैन भी थे, को देना जरूरी हो गया था। अपने दो साथियों के साथ राष्ट्रपति से मिलने दिल्ली गये थे। ये बतलाते थे कि दोनों साथी साहस खो बैठे और रास्ते से लौट गये थे। राजेन्द्र बाबू उस समय जमीन पर बैठे कर चर्खे पर सूत कात रहे थे। उन्होंने जोशी जी की सारी बातें ध्यान से सुनीं। जब लालबहादुर शास्त्री जी केन्द्र में बिना विभाग के मंत्री थे, तब जोशी जी ने शास्त्री जी से दिल्ली जाकर पहाड़ के विकास के संबंध में काफी बातें की थीं। इन बड़ी-बड़ी हस्तियों से मिल कर बेझिझक समस्याओं पर बातचीत करना उनकी निर्भीकता को ही दर्शाता है।

वे सुबह तीन साढ़े तीन बजे ही उठ जाते थे और शौच तथा स्नान के बाद पूजा, वन्दना और पूरी गीता का पाठ करते थे। यह नियम वे रेलमात्रा अथवा बस में यात्रा के समय भी पूरी तरह निभाते थे। पूजा के उपरांत हठयोग, आसन आदि करते और तब दस पन्द्रह मिनट तक चर्खे पर सूत कातते थे। अपना भोजन वे स्वयं बनाया करते थे। प्याज, लहसुन, चाय और माँस का सेवन उन्होंने कभी भी नहीं किया था। नौकरी से मुक्ति पा जाने के बाद वे अपने गुरु श्री श्री 1008 नानतिन बाबा के पास ही ज्यादा समय व्यतीत करते थे।

उनके निजी खर्चे कम ही होते थे, किन्तु दूसरों की सहायता और साधु-सन्तों की सेवा पर वे नियमित रूप से खर्च करते थे। काम छूटने के पश्चात ऐसा कर पाना कठिन हो गया था। एक बार सहारनपुर में उनके पुत्र ने उन्हें गांधी आश्रम से रजाई लेने के लिये 60 रु. दे दिये। कई दिन बीत जाने के बाद भी रजाई न आने पर बेटे ने पूछा तो उन्होंने बताया कि सारे रुपये उन्होंने हल्द्वानी के गांधी आश्रम को भेज दिये थे, जहाँ से उन्होंने एक कम्बल किसी बाबा के लिये उधार में खरीदा था। कुछ समय के लिये वे पनुवानौला के आगे आँवलघाट नामक जगह पर एक गुफा में एकांतवास के लिये चले गये थे। जब वे उपवास के कारण एकदम अशक्त हो गये तो निदान वहाँ से निकले। मगर पास ही सड़क पर बेहोश हो गये। कुछ महिलाओं ने उनकी सेवा की तथा उन्हें हल्द्वानी भिजवा दिया।

वे अकसर रामपुर के पास मिलक जाया करते थे, जहाँ पर नानतिन बाबा एक तालाब बनवा रहे थे। इसकी जिम्मेदारी जोशी जी को ही सौंपी गयी। सन् 1988 में मिलक में ही उनकी तबीयत बिगड़ गई। उनके पुत्र को सूचना मिली तो वे उन्हें घर ले आये। डॉक्टर ने प्रोस्टेट का कैंसर बताया। पर वे एक स्थान पर टिक ही नहीं पाते थे। इसी आवाजाही में वे दिवंगत हो गये।

जीवन भर वे किसी भी तरह के प्रलोभन से दूर ही रहे। बुढ़ापे में आय का कोई साधन न रहने के कारण अवश्य उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को दी जाने वाली पेंशन की कोशिश की, पर बनारसीदास जी ने उनको पेंशन के बदले हल्द्वानी के पास ही दस एकड़ भूमि ले लेने की सलाह दी। उन्हें लगा कि शायद उनको बहलाने की कोशिश की जा रही है और उन्होंने इस मामले को बिल्कुल ही भुला दिया।

(Source - www.nainitalsamachar.in/tag/freedom-fighter/)


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स्वतंत्रता सेनानी भवानी दत्त जोशी: जिन्हें हम भूल गये
By कौस्तुभानन्द पंत on August 1, 2009

बनारस विश्वविद्यालय से बी. एस-सी. करने के बाद मैं 1955 में एक दिन यों ही अल्मोड़ा की माल रोड में घूम रहा था तो एम्बेसडर होटल के नीचे जिला सूचना केन्द्र से एक सौम्य सुदर्शन व्यक्ति भीतर से निकले। वास्कट तथा सफेद टोपी पहने वे बड़े ही प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी लगे थे। परंतु उस समय मुझे पता नहीं था कि वे कौन थे। दो साल बाद जब मैं गर्मियों की छुट्टियों में घर की ओर जा रहा था तो ताऊ जी के बड़े पुत्र बिशन दा के घर पर लखनऊ में वही सज्जन मिल गये। तब भाभी जी ने बताया कि भुवन (असली नाम भवानी दत्त जोशी) उनकी दीदी के पुत्र थे। भवानीदत्त जी अल्मोड़े जिले के सूचना अधिकारी थे। सन् 1961 में भाभी जी के प्रयास से मेरी शादी भाभी जी की भतीजी से हो गई और तब से भुवनदा या भवानीदत्त जी से लखनऊ मेरी ससुराल या भाभी जी के निवास अथवा अल्मोड़ा में यदाकदा मुलाकात होती रहती थी।

पत्नी से ज्ञात हुआ कि वे पक्के कांग्रेसी, गांधीवादी हैं और स्वतंत्रता सेनानी रह चुके हैं। चरखा कातना और उसी के सूत के कपड़े बनवा कर पहनना उन्हें अच्छा लगता है। उनके बेटे और अन्य परिचितों के द्वारा जो सूचना मुझे मिल पाई उसी के आधार पर आगे भवानीदत्त जी के जीवन पर जो कुछ पा सका वह आगे दिया जा रहा है।

भवानीदत्त जी जन्म संभवतः सन् 1904 में हुआ था। वे अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना के पास दिगौली गाँव में मनोरथ जोशी के घर पैदा हुए थे। उनके बाल्यकाल में ही उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा उनके नाना शंभुदत्त जोशी के संरक्षण में अल्मोड़ा में हुई थी। वहीं से सन 1921 में उन्होंने रामजे कॉलेज, जो उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अधीन था, से इंटर साइंस की परीक्षा पास की थी।

सन् 1921 में अल्मोड़ा सहित सम्पूर्ण कुमाऊँ में कुली उतार और कुली बर्दायश के विरुद्ध भारी आंदोलन हुआ था। विक्टर मोहन जोशी, बद्रीदत्त पांडे, हरगोविन्द पंत आदि कांग्रेसी बागेश्वर में इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। भवानी दत्त जी भी तभी से कांग्रेस और सविनय अवज्ञा आंदोलन को सहयोग देने लगे थे। उनके नानाजी डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर थे और उनके लिये भवानीदत्त जैसे पढ़े-लिखे युवक को सरकारी नौकरी दिलाना कुछ भी कठिन न था। किंतु सन 1929 में महात्मा गांधी के नैनीताल, अल्मोड़ा, कौसानी और बागेश्वर आगमन के बाद वे पूरी तरह कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लेने लगे और समाजसेवा, सविनय अवज्ञा आंदोलन, सत्य, अहिंसा, चरखा चलाना, खादी पहनना आदि में प्रवृत्त होकर पूरी लगन से आंदोलन को समर्पित हो गये। इस समय उनके ऊपर पत्नी, माँ, दो छोटे भाइयों और तीन बहनों का भार था। उनकी डाँवाडोल स्थिति को पटरी पर लाने के लिये उनके नाना ने फिर से उनको नौकरी पर लगाने के लिये बहुत कोशिश की पर किसी भी तरह उनको राजी न कर पाने के कारण हार कर अपने ही प्रयास से उनके लिये अल्मोड़े की बाजार में एक किराने की दुकान खुलवा दी थी। पर उनके जैसा सरल और दुनियादारी से अनभिज्ञ आदमी कितने दिन तक दुकान चला सकता था ? उनके परिचित, यार-दोस्त और सम्बन्धी सामान उधार ले जाते तो मना करने में इन्हें बहुत ही संकोच होता था। उधार चुकाना लोग न जानते थे, वसूली करना इन्हें न आता था। दूसरे या तीसरे साल में ही दुकान पर ताला लग गया। व्यवसाय से छुट्टी पा जाने के बाद ये कैलास-मानसरोवर की यात्रा पर चले गये।

अछूतोद्धार में उनका सराहनीय योगदान रहा था और इस कारण उनको सामाजिक बहिष्कार का भी शिकार होना पड़ा था। यह बहिष्कार अल्मोड़े के रूढ़िवादी संकीर्ण समाज के बीच उनके परिवार के लिये बड़ा ही दुःखदायी रहा था। चर्खे पर सूत या ऊन की कताई करने, सत्य और अहिंसा के धर्म का पालन करते हुए पूरी ईमानदारी और धर्मपरायणता से वे परिवार के साथ कष्टों को साहसपूर्वक झेलते रहे। उनके मामा जगन्नाथ जोशी और मामी ने उनकी सदा यथाशक्ति सहायता की। महात्मा गांधी जी द्वारा उन्हें भेजे गये एक पोस्टकार्ड से ज्ञात होता है कि अछूतोद्धार और चर्खे के काम में वे कितना अधिक व्यस्त रहने लगे थे।

भाई भवानीदास,

तुम्हारा खत पाकर मुझे आनन्द हुआ। जिसको सेवा का ही ध्यान है उसे ईश्वर ऐसा मौका दिया करता है। प्रभु दास के चर्खे पर हाथ जम जाने से अच्छा परिणाम आ जाये तो उस चर्खे के मार्फत बहोत कार्य हो सकेगा।

मोहनदास के आशीर्वाद 28.12.30
सन् 1940 में उनको कांग्रेस द्वारा संचालित ग्राम सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत विलेज ऑर्गेनाइजर या सुपरवाइजर का काम दिया गया और वे गाँवों में जाकर समाजसेवा का काम करने लगे। परिवार की देखभाल करने वाला कोई और न होने के कारण पंत जी ने इनको ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से हट कर काम करने को बाध्य किया था। सन् 1945 में वे दिल्ली क्लॉथ मिल में काम करने लगे थे। इनकी ईमानदारी और सत्यपरायणता देखते हुए बिरला की एक कम्पनी में ईंटों के भट्टों और कोयले, लोहे तथा सीमेंट का हिसाब-किताब देखने के काम पर नियुक्त कर दिया गया। वहीं से इन्होंने अपने एक छोटे भाई एवं छोटी बहन की शादी करवा दी और इन भाई को काम पर लगा कर व्यवस्थित भी कर दिया। 1946 में अपने एकमात्र पुत्र को छोड़कर इनकी पत्नी परलोक सिधार गई थी।

देश को आजादी मिलने के बाद मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने इन्हें प्रदेश में पहला जिला सूचना अधिकारी बनाकर नैनीताल में नियुक्ति करवा दी। फिर वे अल्मोड़ा तथा पौड़ी गढ़वाल में नियुक्त रहे। जिला सूचना अधिकारी रहते हुए उन्हें पूरे उत्तराखंड की यात्रा का अवसर मिला। मुनस्यारी, जौलजीवी, धारचूला, पिथौरागढ़, बद्रीनाथ, केदारनाथ जैसे स्थान तब तक मोटर सड़क से नहीं जुड़े थे और लम्बी यात्राओं में सात आठ दिन तक लग जाते थे। अतः उन्होंने अपने इकलौते बेटे को नैनीताल में रखवा दिया। वह मात्र 1956-57 में ही उनके साथ रह सका।

सोलह सालों की लम्बी अवधि तक निरंतर पैदल यात्रायें करते हुए उन्होंने जिले के लगभग हर गाँव तक पहुँच कर निःस्पृह भाव से काम किया, किन्तु उनकी सेवायें नियमित नहीं मानी गईं। 1961-62 में उन्हें उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा साक्षात्कार के निमित्त लखनऊ बुलाया गया था। आयोग ने उनको ‘सहायक’ सूचना अधिकारी के पद पर रेग्युलर करने की सिफारिश की। तब उन्होंने तत्काल त्यागपत्र दे डाला। साल भर बाद उनको फिर से जिला सूचना अधिकारी के पद पर वापस ले लिया गया। कुछ और दिनों तक वे इसी पद पर काम करते रहे किंतु सरकार द्वारा उनकी कर्तव्यनिष्ठा के प्रति दिखायी गयी उदासीनता से व्यथित होकर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया था। सेवाकाल यथेष्ट न होने के कारण उन्हें पेंशन पाने की सुविधा भी नहीं मिल पायी थी।

भवानीदत्त जोशी जी के स्वभाव, कार्यशैली, सरलता और ईमानदारी की विवेचना कर पाना कदाचित संभव नहीं हो पायेगा। वे ऐसे ही पुरुषों में से थे जो ईश्वर की कृपा पाते रहे, शांति से रहे और अपने आप में संतुष्ट भी। एक बार उन्हें 90,000 रुपयों का एक पे ऑर्डर प्राप्त हुआ। शायद कोई एरियर रहा होगा। उन्हें संदेह हुआ कि यह भुगतान ठीक नहीं है। वे विभाग के सेक्रेटरी के पास पहुँच गये और बताया कि यह भुगतान गलत हो रहा है। सेक्रेटरी ने कहा – जोशी जी मिल रहा है तो ले लीजिये। उन्होंने यह धन हल्द्वानी में मकान बनाने में लगा दिया था। किन्तु उनके नौकरी छोड़ देने के बाद में सन् 1984-85 के दौरान प्रदेश के ऑडिटर जनरल से उक्त रकम को वापस करने की माँग गई। तब उनके बेटे ने क्रमशः किश्तों में सारी रकम लौटाई।

वे डॉ. राजेन्द्रप्रसाद, विनोबा भावे, पं गोविन्द बल्लभ पंत, लाल बहादुर शास्त्री, हेमवतीनन्दन बहुगुणा आदि के सम्पर्क में भी रहे। आजादी के बाद उन्होंने कुछ समय गांधी स्मारक निधि के कामों में भी हाथ बँटाया। उनकी नजर में कुछ अनियमिततायें आई और इसकी सूचना तत्कालीन राष्ट्रपति, जो गांधी स्मारक निधि के चेयरमैन भी थे, को देना जरूरी हो गया था। अपने दो साथियों के साथ राष्ट्रपति से मिलने दिल्ली गये थे। ये बतलाते थे कि दोनों साथी साहस खो बैठे और रास्ते से लौट गये थे। राजेन्द्र बाबू उस समय जमीन पर बैठे कर चर्खे पर सूत कात रहे थे। उन्होंने जोशी जी की सारी बातें ध्यान से सुनीं। जब लालबहादुर शास्त्री जी केन्द्र में बिना विभाग के मंत्री थे, तब जोशी जी ने शास्त्री जी से दिल्ली जाकर पहाड़ के विकास के संबंध में काफी बातें की थीं। इन बड़ी-बड़ी हस्तियों से मिल कर बेझिझक समस्याओं पर बातचीत करना उनकी निर्भीकता को ही दर्शाता है।

वे सुबह तीन साढ़े तीन बजे ही उठ जाते थे और शौच तथा स्नान के बाद पूजा, वन्दना और पूरी गीता का पाठ करते थे। यह नियम वे रेलमात्रा अथवा बस में यात्रा के समय भी पूरी तरह निभाते थे। पूजा के उपरांत हठयोग, आसन आदि करते और तब दस पन्द्रह मिनट तक चर्खे पर सूत कातते थे। अपना भोजन वे स्वयं बनाया करते थे। प्याज, लहसुन, चाय और माँस का सेवन उन्होंने कभी भी नहीं किया था। नौकरी से मुक्ति पा जाने के बाद वे अपने गुरु श्री श्री 1008 नानतिन बाबा के पास ही ज्यादा समय व्यतीत करते थे।

उनके निजी खर्चे कम ही होते थे, किन्तु दूसरों की सहायता और साधु-सन्तों की सेवा पर वे नियमित रूप से खर्च करते थे। काम छूटने के पश्चात ऐसा कर पाना कठिन हो गया था। एक बार सहारनपुर में उनके पुत्र ने उन्हें गांधी आश्रम से रजाई लेने के लिये 60 रु. दे दिये। कई दिन बीत जाने के बाद भी रजाई न आने पर बेटे ने पूछा तो उन्होंने बताया कि सारे रुपये उन्होंने हल्द्वानी के गांधी आश्रम को भेज दिये थे, जहाँ से उन्होंने एक कम्बल किसी बाबा के लिये उधार में खरीदा था। कुछ समय के लिये वे पनुवानौला के आगे आँवलघाट नामक जगह पर एक गुफा में एकांतवास के लिये चले गये थे। जब वे उपवास के कारण एकदम अशक्त हो गये तो निदान वहाँ से निकले। मगर पास ही सड़क पर बेहोश हो गये। कुछ महिलाओं ने उनकी सेवा की तथा उन्हें हल्द्वानी भिजवा दिया।

वे अकसर रामपुर के पास मिलक जाया करते थे, जहाँ पर नानतिन बाबा एक तालाब बनवा रहे थे। इसकी जिम्मेदारी जोशी जी को ही सौंपी गयी। सन् 1988 में मिलक में ही उनकी तबीयत बिगड़ गई। उनके पुत्र को सूचना मिली तो वे उन्हें घर ले आये। डॉक्टर ने प्रोस्टेट का कैंसर बताया। पर वे एक स्थान पर टिक ही नहीं पाते थे। इसी आवाजाही में वे दिवंगत हो गये।

जीवन भर वे किसी भी तरह के प्रलोभन से दूर ही रहे। बुढ़ापे में आय का कोई साधन न रहने के कारण अवश्य उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को दी जाने वाली पेंशन की कोशिश की, पर बनारसीदास जी ने उनको पेंशन के बदले हल्द्वानी के पास ही दस एकड़ भूमि ले लेने की सलाह दी। उन्हें लगा कि शायद उनको बहलाने की कोशिश की जा रही है और उन्होंने इस मामले को बिल्कुल ही भुला दिया।


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Devi Dutt Pant (Freedom fighter) Khantoli (Settled in Bikaner. Died in 1982)
Upadhyaya Shiv Dutt.[Freedom fighter and Member of Parliament]
Late Parimal Singh Hyankey (Freedom Fighter )
Deb Singh Dasila (Freedom Fighter)
Ram Singh Dhoni (Saalam Satyagrah) (Freedom fighter)
Teeka Singh Kanyal (Saalam Satyagrah) (Freedom fighter)
Jyotiram Kandpal (Freedom fighter)
Late Bhopal Singh Khati (MLA Almora,Freedom Fighter)
Indra Singh Nayal (Freedom fighter)
Chandra Singh Pathani (Freedom fighter)
Durga Singh Rawat (Freedom fighter)
Sher Singh Karki (Satyagrahi) (Freedom fighter
)

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दो गुमनाम क्रान्तिकारी

इन्द्रसिंह टिहरी गढ़वाल के एक ऐसे क्रान्तिकारी थे जिनके बारे में कम लोग जानते हैं। 23 साल में वे आजीविका के लिए घर से बाहर निकल आए। 1928 से 1930 तक अमृतसर में रहे, जहां आजादी की ओर इनका रुझान हुआ। पहले कांग्रेस की विचारधारा ने प्रभावित थे इसलिये 1929 में लाहौर के कांग्रेस सम्मेलन में भाग लेने गये। किन्तु उसके बाद वामपन्थी संगठन नौजवान भारत सभा से जुड़ गये। यहां पर क्रान्तिकारी शम्भूनाथ ने इनको हथियारों की खेप इलाहाबाद पहुंचाने की जिम्मेवारी दी। लेकिन पकड़े गये। जेल हुई जहां अनेकों यातनायें सही। बाद में मुल्तान (पाकिस्तान) जेल में तीन साल की कठोर सजा काटी। रिहा होने पर फिर से उसी संगठन में सक्रिय हुये। इसमें रहते हुये उनको कई राज्यों में संगठन के संचालन की जिम्मेवारी दी गई। आन्दोलन चलाने के लिये ऊटी में बैंक लूट के दौरान इनके कुछ साथी भागने सफल हुये तो कुछ धर लिये गये। इसके बाद संगठन ने बंगाल एवं मद्रास के गवर्नरों को उड़ाने की सोची लेकिन कामयाब न हो सके। दरअसल में जब ये प्रयुक्त होने वाले बम का परीक्षण कर रहे थे तो बम फटने से एक साथी की मौत हो गई। इससे पुलिस सतर्क हो गई। इसके बाद ये लोग छिपते रहे। एक दिन पुलिस ने उनको घेर लिया इसका पता चलते ही उन्होंने लूट के रुपयों व कागजों को जला डाला। इन्द्रसिंह व उनके तीन साथी इसके लिये गिरफ्तार हुये। सजा के लिये इनको अन्डमान की सेलुलर जेल भेजा गया। कुछ साल वहां रहने के बाद इन्द्रसिंह को लाहौर जेल में भेजा गया। 1939 मे ंरिहा हुये तो मेरठ मंे आकर एक समाचार पत्र में काम करने लगे। उनको पकड़ा गया और फिर 6 साल की सजा हुई। 1945 में रिहा हुये तो एक बार फिर से मेरठ में सी.पी.आई. आफिस में काम करने लगे। देहान्त होने के कारण 1952 के बाद उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। गढ़वाल के ही एक अन्य क्रान्तिकारी लैंसडौन तहसील के बच्चूलाल भट्ट भी थे जो बचपन में अमृतसर चले आये थे। वहां उनकी मुलाकात शम्भूनाथ आजाद से हुई जिन्होंने उनको नौजवान सभा में शामिल करवाया। ऊटी बैंक डकैती में वे पकडे़ गये थे। इस पर उनको लम्बी सजा हुईं। अंडमान जेल में रहने के कुछ समय बाद 1938 में उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ गया। इसके बाद उनको पूना व वाराणसी के मानसिक उपचार केन्द्रांे में भेजा गया किन्तु ठीक नहीं हो सके।

(डॉ. योगेश धस्माना की पुस्तक उत्तराखण्ड में जानजागरण व आन्दोलनों का इतिहास से साभार)

Published in Regional Reporter Magazine.

स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह धौनी की प्रतिमा का अनावरणNov 06, 10:00 pmबताएं




 अल्मोड़ा के सेकुड़ा तिराहे पर क्रांतिकारी राम सिंह धौनी की प्रतिमा का अनावरण करते विधायक मनोज तिवारी व अन्य।

जाका, अल्मोड़ा: ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ 'जै हिन्द' का नारा बुलंद कर क्रांतिवीर राम सिंह धौनी ने आजादी की जो अलख जलाई वह अविस्मरणीय है। उन्होंने महज कुमाऊं ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र तक क्रांतिकारियों का संगठन खड़ा कर गोरों के पैर उखाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। देश प्रेम व सेवा की प्रतिमूर्ति स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.धौनी के सपनों का राष्ट्र निर्माण ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यह बात स्वतंत्रता सेनानी देवेंद्र सनवाल ने कही।

शहर से सटे सेकुड़ा तिराहे पर रविवार को विधायक मनोज तिवारी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी की प्रतिमा का अनावरण किया। उन्होंने स्व.धौनी को महान क्रांतिकारी बताते हुए कहा कि क्षेत्र में महान विभूति की प्रतिमा स्थापित किया जाना सौभाग्य की बात है। विधायक ने पार्क निर्माण को एक लाख रुपए की घोषणा करते हुए लोगों से स्वतंत्रता सेनानियों के बताए मार्ग पर चलने का आह्वान भी किया। मुख्य वक्ता साहित्यकार डॉ.लक्ष्मण सिंह 'बटरोही' ने कहा, देश की आजादी में क्रांतिवीर स्व.धौनी का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका कहना था कि कुमाऊं में देशभक्ति का संचार कर स्व.धौनी ने राष्ट्रीय स्तर पर ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ जो बिगुल फूंका, निश्चित तौर पर स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा भी मिली।

स्व.राम सिंह धौनी ट्रस्ट के कार्यकारी अध्यक्ष आनंद सिंह ऐरी ने कहा, सबसे पहले 1921 में स्व.धौनी ने ही जय हिंद का नारा देकर गोरों के खिलाफ जंग छेड़ी थी। वरिष्ठ पत्रकार पीसी जोशी ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की भांति स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह धौनी ने भी अल्प अवधि ही जो महान कार्य किए हैं, उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। संचालन कर रहे भूपेंद्र सिंह नेगी ने सांसद प्रदीप टम्टा का संदेश पढ़कर सुनाया।

इस दौरान ट्रस्ट के उपाध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त आयुक्त प्रेमराम शिल्पकार, व गंगा सिंह बगड्वाल, बसंत बल्लभ तिवारी, श्याम सिंह कुटोला, भगवती परिहार, एडवोकेट मदन लाल साह आदि ने भी विचार रखे। इससे पूर्व स्व.राम सिंह धौनी पार्क के निर्माणाधीन पार्क का भी उद्घाटन किया गया। कार्यक्रम में ग्राम प्रधान उमा बिष्ट, डॉ.शमशेर सिंह बिष्ट, प्रताप सिंह सत्याल, एडवोकेट जमन सिंह बिष्ट, चंदन सिंह परिहार व गोविंद लाल वर्मा, स्वामी साधनानंद, आनंद सिंह बगड्वाल, लता तिवारी, हरिप्रिया नेगी, नरेंद्र सिंह नेगी, कल्पना नेगी, धना धौनी, शिब्बन पूना, त्रिलोचन जोशी, नीरज नयाल, सिकंदर पवार, बिशन सिंह बिष्ट, मनोज सनवाल, हेम लोहनी, वीरेंद्र सिंह बिष्ट, एलएम पंत, पूरन तिवारी, पूरन सिंह बोरा आदि थे।

::::::इंसेट:::::

एक माह में तैयार हुई प्रतिमा

अल्मोड़ा: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी की आदमकद प्रतिमा को तैयार करने में एक माह लगा। एसएसजे परिसर में फाइन आ‌र्ट्स विभाग के प्रवक्ता कैलाश बिष्ट ने प्रतिमा को अंतिम रूप दिया।

(Source - Dainik Jagran)

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  Jan 11, 06:29 pm 
            चम्बा/कीर्तिनगर, जागरण कार्यालय : टिहरी जनक्रांति के नायक शहीद नागेन्द्र सकलानी की 65वीं पुण्यतिथि पर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों व सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों ने उनका भावपूर्ण स्मरण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
बुधवार को चम्बा में उत्तराखंड शोध संस्थान, सामुदायिक रेडियो हेंवलवाणी और संगीत विद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित गोष्ठी में नगर पंचायत अध्यक्ष सूरज राणा, समाजसेवी व शिक्षक सोमवारी लाल सकलानी ने कहा कि श्रीदेव सुमन के अलावा टिहरी जनक्रांति के नायकों में नागेन्द्र सकलानी का नाम बड़े सम्मान के साथ याद किया जाता है, लेकिन शासन, प्रशासन की ओर से कोई कार्यक्रम आयोजित न किया जाना चिंतनीय है। स्व. सकलानी का जन्म 20 फरवरी 1920 को जौनपुर प्रखंड के पुजारगांव में हुआ था। बचपन में ही देश के लिए 1948 में टिहरी रियासत के खिलाफ चलाए गए आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। इस मौके पर दूसरे शहीद मौलू भरदारी को भी याद किया गया। श्रद्धांजलि देने वालों में प्रो. बीडी शर्मा, रामप्रसाद डोभाल, पदम सिंह गुसांई, रवि गुसांई, राजेन्द्र सिंह, आरती बिष्ट, सीतल, भरत सिंह, जितेन्द्र सिंह आदि शामिल थे।
कीर्तिनगर : मोलू भरदारी व नागेन्द्र सकलानी की पुण्यतिथि पर उनके बलिदान को याद किया गया। नगर पंचायत अध्यक्ष विजयराम गोदियाल, ब्लॉक प्रमुख जय प्रकाश शाह व क्षेत्र के लोगों ने उनकी प्रतिमाओं पर पुष्प माला अर्पित कर सामंती अत्याचारों से जनता को मुक्ति दिलाने वाले इन क्रांतिकारियों को याद किया। इस मौके पर सुरेन्द्र सिंह कंडारी, दलीप नेगी। एडवोकेट शूरबीर आदि मौजूद रहे।

(Source Dainik Jagran)

   

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स्वतंत्रता संग्रामी हरस्वरूप पाण्डेय की मूर्ति का अनावरण व स्मारक स्थल का उद्घाटन न होने से पट्टी मल्ला स्यूनरा (अल्मोड़ा) की जनता नाराज है। लोगों ने 26 फरवरी 2011 को भैंसोड़ी स्थित स्मारक स्थल पर धरना-प्रदर्शन कर आगे की रणनीति तय करने का निर्णय लिया है। हरस्वरूप पाण्डेय का जन्म 15 अगस्त 1909 को और 26 सितम्बर 1978 को निधन हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भागीदारी के साथ एक वैद्य के रूप में भी उन्होंने क्षेत्र के लोगों की ताउम्र सेवा की। वे आयुर्वेदिक औषधियों से घर-घर जाकर निःशुल्क सेवा करते थे। यदि कभी शुल्क भी लिया तो आठ पुड़िया दवा के साथ एक ‘धर्म की पुड़िया’ खुराक के रूप में साथ में देते थे।
उनके पुत्रों व क्षेत्र के जागरूक लोगों के प्रयासों से 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी ने हरस्वरूप पाण्डेय की मूर्ति, स्मारक तथा एक कक्ष निर्माण की स्वीकृति प्रदान की थी। 2007 में इस कार्य की शुरुआत हुई। 3 सितम्बर 2009 को मूर्ति स्थापित भी कर दी गई। विगत वर्ष 7 मीटर लम्बे व 4 मीटर चौड़े एक कक्ष का निर्माण भी पूरा हो गया। लेकिन इस स्मारक का उद्घाटन लगातार प्रयासों के बावजूद नहीं हो पाया है।
यहाँ हम हरस्वरूप पाण्डेय जी के हाथ से लिखा एक संक्षिप्त लेख प्रस्तुत कर रहे हैं। 28 दिसम्बर 1956 को लिखा यह संस्मरण उन्होंने तत्कालीन कांग्रस कमेटियों व भारत सरकार को भी भेजा है, जिसके संदर्भ में उन्होंने एक टिप्पणी की है:-
‘‘15 अगस्त 47 के बाद भारत को स्वतंत्र होने के उपरान्त काँग्रेस कमेटियों व सरकार द्वारा समय-समय पर स्वतंत्रता संग्राम के कार्यकर्ताओं की जीवनियाँ मागी गई। उन पर क्या हुआ व होगा यह तो अभी तक ज्ञात न हो पाया। इतिहास के किसी कोने में तो वह शायद ही अंकित हो पर तसल्ली देने को ऐसा समय-समय पर होता आ रहा है। जो भी हो कभी आवश्यकता रहे, इस उद्देश्य से अतीत की जो-जो स्मृतियाँ इस समय याद आई हैं वह लिख रहा हूँ।’’
हरस्वरूप पांडेय आत्मज श्री अंबा दत्त पांडेय शिमल्टिया, ग्राम भैंसोड़ी पट्टी मल्ला स्यूनरा, जन्म तिथि दिनांक 15 अगस्त 1909। मेरे पिता श्री अंबादत्त पांडेय जोतिष, कर्मकाण्ड तथा तांत्रिक विद्या के एक नामी विद्वान थे पर लक्ष्मी के भक्त नहीं। साधारण किसान जीवन में ही उनका तथा मेरा जीवन गुजरा व चला आ रहा है। पिताजी मेरे राजभक्त थे, पर मैं बालकाल से ही ब्रिटिश सत्ता का असहयोगी होता चला आया। बागेश्वर के मेले में जिस दिन कुली उतार का आंदोलन कूर्मांचल केशरी श्री बद्रीदत्त पांडेय जी के नेतृत्व में हुआ व सरयू के गंगा के बगड़ में उन्हें गिरफ्तार किया गया तो तभी से मेरे हृदय में देश सेवा के प्रति उद्गार उत्पन्न हो गये। उस दिन के दृश्य को उस छोटी अवस्था में देखने से अभी तक नहीं भुला पाया हूँ। पिताजी मेरी ओर से बहुत सतर्क रहते थे। 18 नवम्बर 1928 को अल्मोड़ा स्कूल में दिन के करीब 9 बजे जब में क्लास छोड़कर लाला लाजपत राय के शोक जलूस में शामिल होने चला आया तो फिर घर से भी बागी करार हो गया और बहुत डांट-फटकार खानी पड़ी। मेरी सब सहायतायें बंद कर दी गयी। 1929 जून के बाद स्कूली पढ़ाई भी बंद कर दी गयी। पर छिपे-छिपे मैं हमेशा काँग्रेस कार्यकर्ताओं के संपर्क में व सभाओं में आता-जाता रहा। सन् 1934 में घर से बाहर रहने के कारण हल्द्वानी शराब बंदी में धरना देने वालों की टोली में चला गया। पुलिस हमें 90/92 आदमियों (लड़कों) को पकड़ मोटर में बिठा कर बड़े-बड़ों को थाने में बंद कर छोटों को लालकुआ व किच्छा के जंगलों में छोड़ देती थी। 2-3 दिन बाद हम फिर पैदल हल्द्वानी आ जाते थे। 15 दिन तक मैं भी इसी क्रम में रहा। फिर हमें नहीं पकड़ा गया। पिताजी के देहावसान के बाद में प्रकट रूप से राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के संपर्क में चला गया। सन् 1933 से 38 के मध्य तक शैल आश्रम बिनसर (खाली) में सेठ जमना लाल बजाज जी के पास चला गया, जहाँ क्रान्तिकारियों से भेंट हुआ करती थी। 1934 दिसम्बर से 35 के मध्य तक अखिल भारतीय ग्राम उद्योग संघ व हरिजन सेवक संघ की ओर से ग्राम गुलड़िया, जिला बदायूँ में रहा। वहाँ स्वास्थ्य खराब होने के कारण घर चला आया और स्थाई रूप से अपने गाँव में ही सड़क के किनारे मकान तथा दुकान बना कर रहने लगा।
मई 1936 के बाद मल्ला स्यूनरा में ही काँग्रेस के राजनैतिक संगठन का श्रीगणेश किया। सन् 38 के मध्य में ही दुकानदारी काँग्रेस संगठन में लगे रहने के कारण ठप हो गई। फिर श्री गांधी आश्रम चनौदा-सोमेश्वर को चला गया। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण घर आना पड़ा और यहीं से सन् 1940 में सत्याग्रह ट्रेनिंग कैम्प में ट्रेनिंग लेकर सत्याग्रह की तैयारी में रहा। सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के लिये बापू जी ने मुझे भी छाँट लिया था। अतः 26-2-1941 को ताकुला पड़ाव में युद्ध विरोधी नारे लगाने पर गिरफ्तार कर लिया गया। 28-2-41 को इलाका हाकिम दानपुर की अदालत से मुझको एक साल की सख्त कैद व 40 रुपया जुर्माना कर दिया गया। अल्मोड़ा, बरेली, तथा लखनऊ कैम्प में सजा पूरी काट कर दिसम्बर 41 के आखिर में रिहा हुआ और फिर अगस्त 42 के दिन शाम के 4 बजे अपने निवास स्थान भैंसोड़ी में ही भारत रक्षा विधान की धारा 129 के अनुसार गिरफ्तार कर जिला जेल अल्मोड़ा में नजरबंद कर दिया गया। अल्मोड़ा जिले में आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया। आंदोलन में हिंसात्मक कार्यवाहियाँ होने के कारण अल्मोड़ा जेल के समस्त नजरबंदों के साथ बिना पूर्व सूचना के सेना के संरक्षण में दिनांक 30 अगस्त 1942 को जिला जेल बरेली भेज दिया और 29-8-1943 को बिना शर्त जिला जेल बरेली से रिहा कर दिया। जेल से छूटने के बाद फिर मल्ला स्यूनरा में ही काँग्रेस संगठन में जुट गया। 15 अगस्त 1947 को देश भक्तों के बलिदानों से भारत स्वतंत्र घोषित हो गया। अतः आंतरिक कल्पना साकार हो गई मेरे राजनैतिक जीवन की।


(SOURCE-http://www.nainitalsamachar.in/remembering-unsung-hero-harswaroop-pandey/)

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Jagannath Sharma

 Freedom Fighter, Politician, Social Activist

Jagannath Sharma was born on 10th, February 1924 in Mussoorie. He was a well known parliamentarian, legal luminary, academic and social worker. After his early education in Mussoorie and Dehradun he entered Allahabad University in 1943 and passed with distinction his M.A. and LL.B. examinations. While still a student he came in contact with the leaders of freedom movement, was inspired by their ethics, and led the students in the 1942 Quit India movement. He remained committed to the nationalistic cause. As a popular leader he has distinguished himself as a powerful orator.

As the General Secretary of Samyukta Garhwal Sammelan, a body of prominent Garhwalis, formed in 1949, he mobilized support for unification of the hill districts of Garhwal and later raised demand for the separate hill state, which was, indeed the beginning of the Uttarakhand movement. In 1953 he was elected to the Mussoorie Municipal Board and was Chairman of the Board from 1957 to 1964.

During this period he was instrumental in setting up and nurturing several institutions in the town, such as the Municipal Post Graduate College, the National Academy of Administration and defense Institute of Work Study. He was the Dean of the Faculty of Law of Garhwal University from 1980 to 1983. He has an unparalleled grasp of the Constitutional Law which he has taught for many years. He was elected member of Uttar Pradesh Legislative Council, from the graduates’ constituency of Garhwal-Kumaon, and served in this capacity from 1966 to 1972 and then from 1972 to 1977. He was a Member of Parliament (Lok Sabha) and represented the Garhwal constituency from 1977 to 1979. During his interventions in the Lok Sabha debates he raised the issue of constructing a railway line from Rishikesh to Karnaprayag that was earlier proposed during the British Raj.

Jagannath Sharma has visited several counties on parliamentary delegations and provided significant inputs from his visits abroad. He has been associated with several educational institutional institutions and philanthropic organizations. He has received several honors and awards for his contribution to social work and political and academic leadership.

(euttranchal.)

 

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