Author Topic: FREEDOM FIGHTER OF UTTARAKHAND - उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी  (Read 74632 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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इन्द्र सिह गढ़वाली

जनम : टिहरी में 1906
He played active role during the freedom struggle and went jail in many times.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Pratap Singh Negi

Born in Pauri Garwal, Village Dauri Patti, Dabaralasiyu

He actively participated during the Freedom Struggle and also participated in "Namak Satyagrah" and Nashamandhi Movement, for which he was jailed for 9 months.

After independence, he was also elected MP from Garwal 1971. In his first speech in Parliament, he raised a issue for separate state Uttarakhand.

Devbhoomi,Uttarakhand

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         स्वतंत्रता सेनानी डूंगर सिंह बिष्ट
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अंग्रेजी हुकूमत से आजादी की लड़ाई में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानी डूंगर सिंह बिष्ट का कहना है कि एक बार उन्हें अंग्रेज समझकर ब्रिटिश हुकमरानों ने अपनी फौज में भर्ती कर सेकेंड लेफ्टिनेंट बना दिया था। लेकिन वह पं.गोविन्द बल्लभ पंत के नेतृत्व में शुरू हो रहे सत्याग्रह में शामिल हो गये। उन्होने बताया कि पहली बार गांधीजी ने भी उनका सत्याग्रही का फार्म अस्वीकृत कर दिया था। श्री बिष्ट ने कहा कि देश को मिली आजादी वर्तमान में मजाक बन गयी है।

साढ़े चार साल से अधिक देश की 15 जेलों में रहे स्वतंत्रता सेनानी श्री बिष्ट का कहना है कि एक बार अंग्रेजों ने फरमान निकाला कि जो लड़के 25 वर्ष व इंटर पास है उन्हे सीधे सेकेंड लेफ्टिनेंट बना दिया जायेगा। उन्होने बताया कि इसकी अल्मोड़ा में भर्ती हो रही थी, तो वह भी अन्य साथियों के साथ उसमें भागीदारी करने चले गये। उन्होंने बताया कि मैं काफी गोरा व लम्बा होने के कारण भर्ती कर रहे अंग्रेज कर्नल एडकिंसन ने बिना टेस्ट लिए ही मुझे पास कर दिया और शीघ्र नौकरी ज्वाइन करने को कहा।

 लेकिन वह घूमते हुए हल्द्वानी आ गये, यहां पंडित गोबिन्द बल्लभ पंत के नेतृत्व में विशाल सत्याग्रह आंदोलन चल रहा था। श्री बिष्ट ने बताया कि मुझे भी उस आंदोलन में शामिल होने की इच्छा हुई तो मेरा सत्याग्रह का फार्म भरकर बापू को भेज दिया गया। लेकिन कुछ दिनों बाद जब फार्म वापस आया तो उसमें मुझे आंदोलन की स्वीकृति नही मिली थी। क्योंकि फार्म में मेरे पारिवारिक स्थिति का उल्लेख था।

 जिसमें 80 वर्षीय वृद्ध पिताजी की देखरेख का जिम्मा लिखा हुआ था। उस दौरान वे हेडमास्टर की नौकरी भी कर रहे थे और माताजी के न होने के कारण घर की स्थिति ठीक नहीं थी। इन्हीं कारणों से उनका फार्म निरस्त कर दिया गया। बाद मे उन्होंने हेडमास्टर व फौज की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

स्वतंत्रता सेनानी बिष्ट ने बताया कि मैंने पुन:14 जनवरी 1941 को मुक्तेश्वर डाकघर से गांधीजी को पत्र लिखा था। जिसमें मैंने सत्याग्रह करने की प्रबल इच्छा जताई थी। इस पर 16 फरवरी 1941 को बापू के सहायक प्यारे लाल का पत्र आया कि उन्हे गांधी जी ने व्यक्तिगत सविज्ञा सत्याग्रह आंदोलन की स्वीकृति दे दी है। उन्होने बताया कि इसके बाद वह पहली बार 5 मार्च 1941 को नैनीताल जेल में बंद हुए थे। उसके बाद आठ माह तक हल्द्वानी व बरेली के जेल में रहे।

श्री बिष्ट ने बताया कि दूसरी बार अंग्रेजों ने उन्हे साढ़े तीन साल साल तक देश के विभिन्न जेलों में रखा था और इस दौरान कई बार उन्हे कई बार यातनाएं भी दी गयी थी। श्री बिष्ट का कहना है कि यह आजादी इतनी सस्ती नही है, जितना इसका वर्तमान में मजाक बना दिया है। उनका कहना है कि वर्तमान शासकों से तो अंग्रेज भले थे जो सबकी सुनते थे। लेकिन आज तो यहां कोई सुनने वाला ही नही है।

Harish Rawat

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late..sobhan singh rawat (INA) freedom fighter
father name---laxman singh rawat
village --ayartoli, BAGESHAWAR
 

Harish Rawat

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MR....GUMAN SINGH RAWAT..
FATHER NAME--LAXMAN SINGH RAWAT
VILLAGE--AYARTOLI,  BAGESHAWAR, UTTARAKHAND 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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आजादी की जंग में बराबर का भागीदार रहा चम्पावत
          चम्पावत। गुलाम भारत को अंग्रेजों के चुंगल से छुड़ाने के लिए आज से   64 वर्ष पूर्व हजारों देशभक्तों ने स्वतंत्रता की बलवेदी पर हंसते हंसते   अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इस जंग में चम्पावत जनपद भी बराबर का भागीदार   रहा और यहां के दर्जनों सैनानियों ने अपने खून के कतरे से देश को आजाद   कराने की इबारत लिखी। उनकी शहादत को आज भुला दिया गया है। सरकारी उपेक्षा   का आलम यह है कि जिले में इन सेनानियों को याद करने के लिए न तो कोई स्मारक   बना है न ही सेनानियों की प्रतिमा स्थापित हो पाई है।
 वर्ष 1857 के गदर में स्व. कालू मेहरा की अगुवाई में यहां के लोगों ने   अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का झंडा गाड़कर आजादी की लड़ाई शुरू की थी। आजादी   दिलाने वाले सेनानियों की लंबी फेहरिस्त इस जनपद की रही है, लेकिन उनके   त्याग और बलिदान को पूरी तरह भुला दिया गया है। 23 लोगों के नाम स्वतंत्रता   सेनानियों की सूची में दर्ज हैं। इनमें से अब मात्र एक स्वतंत्रता सेनानी   जीवित बचे हैं। प्रशासन के पास जीवित सेनानियों को सम्मानित करने की न तो   फुरसत है न ही उनके नाम पर कोई स्मारक बनाया गया है। जनपद गठन को 13 साल   पूरे होने को हैं, लेकिन न तो इन क्रांतिकारियों की याद में कोई स्मृति पटल   बना है न ही जिले में उनकी मूर्तियां लगी हैं। यहां तक कि विद्यालय, पार्क   के नाम भी उनके नाम पर नहीं रखे गए हैं।
 काली कुमाऊं के शेर हर्षदेव ओली के नाम पर जरूर जीजीआईसी खेतीखान का   नामकरण किया गया है। जिला प्रशासन द्वारा उनके आवास को राष्ट्रीय धरोहर   बनाने के ऐलान पर आज तक अमल नहीं हो पाया है। वहीं सात स्वतंत्रता संग्राम   सेनानियों का क्षेत्र सूखीढांग आज भी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। मूलभूत   जरूरतों तक के लिए यहां के लोग तरस गए हैं। चौड़ाकोट के स्व. रामचंद्र   चौड़ाकोटी, स्व. पद्मादत्त चौड़ाकोटी, स्व. बेनीराम चौड़ाकोटी, स्व.   चूड़ामणि चौड़ाकोटी, धूरा के स्व. जयदत्त जोशी, तलियाबांज के स्व. चिंतामणि   जोशी वैला के स्व. त्रिलोकसिंह राणा ने देश को आजाद करने में अपना सबकुछ   न्यौछावर कर दिया, परंतु सरकार उनके क्षेत्रों का विकास तक नहीं कर पाई। कई   वर्षो से सूखीढांग-डांडामिनार रोड तक का आश्वासन अमलीजामा नहीं पहन पा रहा   है। स्वास्थ्य सहित अन्य सुविधाओं का यहां बुरा हाल है।
   
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6649553.html

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from   KC Pant <pant_k_c@yahoo.com>
to   msmehta@merapahad.com
date   Tue, Aug 17, 2010 at 8:10 PM
subject   Re: FREEDOM FIGHTER OF UTTARAKHAND - उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी
   
   
from pant_k_c@yahoo.com
Mehta JI,
 
Very detailed article and a tribute to all freedom fighters. You may also add Pt. Ghanshyam Joshi Ji Shashtri in the list, who hails from Devidhura. Never cut his hairs and never wore shoes/ chappals , until recently he has started wearing footwear as adviced by doctors due to his age (must be over 85 yrs) and ailments, though still has same level of grace, voice, and wisdom in the talks. Also Known well as a Bhagwat pandit and for Varahi Devi Sanskrit Mahavidyalaya of Devidhura.

Devbhoomi,Uttarakhand

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स्वतंत्रता सेनानी डूंगर सिंह बिष्ट का कहना है, मजाक बन कर रह गई है आजादी

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अंग्रेजी हुकूमत से आजादी की लड़ाई में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानी डूंगर सिंह बिष्ट का कहना है कि एक बार उन्हें अंग्रेज समझकर ब्रिटिश हुक्मरानों ने अपनी फौज में भर्ती कर सेकेंड लेफ्टिनेंट बना दिया था। लेकिन वह पं.गोविन्द बल्लभ पंत के नेतृत्व में शुरू हो रहे सत्याग्रह में शामिल हो गये। उन्होंने बताया कि पहली बार गांधी जी ने भी उनका सत्याग्रही का फार्म अस्वीकृत कर दिया था।

 श्री बिष्ट का मानना है कि देश को मिली आजादी वर्तमान में मजाक बन कर रह गयी है।आजादी की लड़ाई के दौरान साढ़े चार साल से अधिक देश की 15 जेलों में रहे स्वतंत्रता सेनानी श्री बिष्ट का कहना है कि एक बार अंग्रेजों ने फरमान निकाला कि जो लड़के 25 वर्ष व इंटर पास हैं, उन्हे सीधे सेकेंड लेफ्टिनेंट बना दिया जायेगा।

 उन्होंने बताया कि इसकी अल्मोड़ा में भर्ती हो रही थी, तो वह भी अन्य साथियों के साथ उसमें भागीदारी करने चले गये। उन्होंने बताया कि मेरे काफी गोरा व लम्बा होने के कारण भर्ती कर रहे अंग्रेज कर्नल एडकिंसन ने मुझे भी अंग्रेज समझ लिया और बिना टेस्ट लिए ही मुझे पास कर शीघ्र नौकरी ज्वाइन करने को कहा। लेकिन वह नौकरी न ज्वाइन कर हल्द्वानी आ गये। यहां पंडित गोबिन्द बल्लभ पंत के नेतृत्व में विशाल सत्याग्रह आंदोलन चल रहा था। श्री बिष्ट ने बताया कि उनकी भी उस आंदोलन में शामिल होने की इच्छा हुई तो सत्याग्रह का फार्म भरकर बापू को भेज दिया गया।

 लेकिन कुछ दिनों बाद जब फार्म वापस आया तो उसमें मुझे आंदोलन की स्वीकृति नहीं मिली थी। क्योंकि फार्म में मेरी पारिवारिक स्थिति का उल्लेख था, जिसमें 80 वर्षीय वृद्ध पिता की देखरेख का जिम्मा लिखा हुआ था। उस दौरान वे हेडमास्टर की नौकरी भी कर रहे थे और माताजी के न होने के कारण घर की स्थिति ठीक नहीं थी। इन्हीं कारणों से उनका फार्म निरस्त कर दिया गया।

 उन्होंने हेडमास्टर व फौज की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।स्वतंत्रता सेनानी बिष्ट ने बताया कि मैंने पुन:14 जनवरी 1941 को मुक्तेश्वर डाकघर से गांधीजी को पत्र लिखा था। जिसमें मैंने सत्याग्रह करने की प्रबल इच्छा जताई थी। इस पर 16 फरवरी को बापू के सहायक प्यारे लाल का पत्र आया कि उन्हे गांधी जी ने स्वीकृति दे दी है और कहा कि अब वह गांधीजी के आंदोलन में सक्रिय रूप से कार्य करें।

 श्री बिष्ट ने बताया कि वह इसके बाद पहली बार 5 मार्च 1941 को नैनीताल जेल में बंद किये गये थे। उसके बाद आठ माह तक हल्द्वानी व बरेली के जेल में रहे। श्री बिष्ट ने बताया कि दूसरी बार अंग्रेजों ने उन्हे साढ़े तीन साल तक देश के विभिन्न जेलों में रखा था और इस दौरान कई बार उन्हें कई बार यातनाएं भी दी गयी थीं।

श्री बिष्ट का कहना है कि यह आजादी इतनी सस्ती नहीं है, जितना इसका वर्तमान में मजाक बना दिया गया है। उनका कहना है कि वर्तमान शासकों से तो अंग्रेज भले थे, जो सबकी सुनते थे। लेकिन आज तो यहां कोई सुनने वाला ही नहीं है।

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हमेशा याद रहेगा धौनी का योगदान     अल्मोड़ा। महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी क्रांतिदूत राम सिंह धौनी को 80वीं पुण्य तिथि पर याद किया गया। जिला पंचायत परिसर में स्थित स्व. धौनी की मूर्ति पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। आजादी के आंदोलन में स्व.धौनी का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।   सालम समिति के तत्वावधान में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि जिपं अध्यक्ष मोहन राम आर्या ने कहा कि निर्माणाधीन राम सिंह धौनी वाचनालय भवन का कार्य हर हाल में पूरा कराया जाएगा। विशिष्ट अतिथि उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी, समिति के वरिष्ठ सदस्य विपिन चंद्र जोशी, गोविंद बल्लभ बहुगुणा ने भी विचार रखे। अध्यक्षता मनोज सनवाल, संचालन समिति अध्यक्ष राजेंद्र रावत ने किया। पीआर शिल्पकार, गोविंद लाल वर्मा आदि थे। इधर, स्व. राम सिंह धौनी ट्रस्ट के तत्वावधान में स्व. धौनी को पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि दी गई। स्व. धौनी की पुत्री हरिप्रिया नेगी ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।   इस मौके पर सिकुड़ा तिराहे पर स्व. धौनी की प्रतिमा लगाने पर जोर दिया गया। समारोह में ट्रस्ट संरक्षक आनंद सिंह ऐरी, उपाध्यक्ष प्रेम राम शिल्पकार, कोषाध्यक्ष भगवती परिहार, सचिव भूपेंद्र नेगी, हीरा बिष्ट, नीरज नयाल, मोहन मेहता, करम मेहरा, शेर सिंह पिलख्वाल, उमा देवड़ी ने विचार रखे।  ड्  पुण्य तिथि पर क्रांतिदूत राम सिंह धौनी को दी श्रद्धांजलि  द्      (Source : Amar Ujala)

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  आजाद हिंद फौज के सेनानी (Pithoragarh)
         

                








निवासी गोपाल सिंह घोटा आजाद हिंद फौज के सेनानी रहे थे। देश की आजादी के बाद उन्होंने अपना जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया। क्षेत्र के सभी सामाजिक कार्यो में वह बढ़-चढ़कर भाग लेते थे।

 

   

 

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