Author Topic: Personalities of Uttarakhand/उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध/महान विभूतियां  (Read 129875 times)

Hisalu

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Pandit Ganga Dutt Upreti
« Reply #210 on: February 25, 2013, 04:13:23 PM »
Rai Bahadur Pandi Ganga Datt Upreti (Dec. 1, 1834- Aug. 1, 1910) was a gifted thinker and keen observer of people lives and their cultural ethos. He was a profound scholar of Archaeology on the one hand and Folklore on the other. His ethnological and linguistic research was widely acclaimed. On Jan. 1, 1910 Lord Mints, Viceroy and Governor General of India conferred the title of Rai Bahadur to Pt. Ganga Datt Upreti. Some of his better known works are, Percept of this World and the Next, Hill Dialects of the Kumanun Division, and History of Kumaun.

Ref: http://www.conceptpub.com/servlet/DispInfo?offset=0&searchtype=Author&searchText=Pandit%20Ganga%20Dutt%20Upreti

Bhishma Kukreti

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 महेंद्र सिंह धोनी योगिक  प्रबंधन शैली अपनाता है


                                                                             भीष्म कुकरेती


बारह जुलाइ सन तेरह को जिन्होंने भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी द्वारा रणनीति के तहत एक लगभग हारा हुआ खेल जीतना देखा हो वे ख उठते होंगे कि धोनी के एक जुझारू  खिलाड़ी ओर खेल नेता सिद्ध करने में एक और कड़ी सिद्ध हुयी। कप्तान के रूप में महेंद्र सिंह धोने ने नेतृत्व शास्त्र के लिए कई उदाहरण पेश किये और प्रबंध शास्त्रियों को महेंद्र सिंह धोनी के खेल करतबों से प्रबंध विज्ञान के लिए कई पाठ मिले।

                                                                      अभिनव व अनुपम शैली याने अपनी प्रकृति को पहचानो

               महेंद्र सिंह धोनी जब  क्रिकेट संसार में भारतीय दल में शामिल हुए तो उन्हें क्रिकेट चुनाव दल के कई सदस्य भी नही जानते थे। किन्तु कुछ समय उपरान्त ही भारतीय क्रिकेट चुनवा दल ही नही लाखों  भारतीय भी धोनी को पहचानने लगे। उनके स्म्काशी विकेट कीपर  पार्थिव पटेल और दिनेश कार्तिक धोनी से अधिक स्थापित हो चुके थे किन्तु  कुछ ही अंतराल पश्चात पार्थिव पटेल और दिनेश कार्तिक नेपिथ्य  में चले गये। धोनी ने अपनी प्रतिष्ठा रन बनाने से नही अपितु रन कैसे बनाये जाते हैं से अर्जित की। धोनी की अभिनव बैटिंग शैली के कारण ण धोनी को विरोधी गेंदबाज नही समझ सके और धोनी रन बनाते गये।
            धोनी की बैटिंग किताबी बैटिंग आज भी नही है बल्कि अपनी खोजी और रचित बैटिंग शैली है। भारतीय क्रिकेट कप्तानो में साफ कप्तान धोनी ने बैटिंग शैली इजाद की लेकिन नकल से नही किन्तु अपने शरीर और मन, बुद्धि व अहंकार के अनुसार अपनी बैटिंग शैली इजाद की। हैलीकॉप्टर शौट का इजाद धोनी ने किताबों व पुराने खिलाड़ियों के खेल से नही अपितु शौट की बुनावट अपने शरीर और मन, बुद्धि व अहंकार के अनुसार आतिशी  शौट खोजा। नकल वाले शॉट की सबसे बड़ी खराबी होती है कि यदि नकल अपने शरीर , मन , बुद्धि व अहंकार के अनुरूप
न हो तो विफलता हाथ लगती है। यदि कार्य निरूपण शरीर और अपने मनोविज्ञान अनुरूप हो तो कार्य में सफलता सरलता से मिलती है। धोनी ने अपने शारीरिक बनावट अनुसार अपनी बैटिंग शैली न्रिधारित की ना कि नकल कर अपनी बैटिंग शैली को निखारा। किसी प्रसिद्ध खिलाड़ी की नकल से  नुकसान यह होता है कि यदि खेल  शैली खिलाड़ी की प्रकृति से मेल नही खाती तो खिलाड़ी निर्णायक समय पर सही नही खेलता है।
            धोनी ने अपनी शैली इजाद की और शैली अपनी प्रकृति के हिसाब से इजाद व परिपक्व की।
                      धोनी के लम्बे बाल भी धोनी को परम्परा से अलग  करते थे।

                                             
                                                             अहंकार प्रबंधन

            महेंद्र सिंह धोनी ने जब राष्ट्रीय क्रिकेट क्षेत्र में पदार्पण किया तब भारतीय क्रिकेट दल में दुनिया के दिग्गज खिलाड़ी जैसे सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, गांगुली, अनिल कुंबले , वीरेन्द्र सहवाग, लक्ष्मण , जाहीर खान जैसे महान खिलाड़ी थे। धोनी ने अपने व्यवहार से इन सभी दिग्गजों के अहंकार को संतुष्ट भी किया और अपनी छाप छोड़ी। धोनी दिग्गज खिलाड़ियों का सम्मान करते हुए अपनी राय देते रहे होंगे तभी सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट बोर्ड को महेंद्र सिंह धोनी को कप्तान बनाने की सिफारिश की। अहंकार प्रबन्धन एक नत द्वारा रस्सी  पर चलने वाला काम है। दिग्गज खिलाडियों के होते अपनी स्पष्ट राय देते समय अनुभवी व प्रसिद्द खिलाड़ियों का सम्मान और स्पष्टता में मध्य  सामंजस्य करना सबके बस की बात नही है। फिर ट्वेंटी ट्वेंटी प्रतियोगिता जीतने के बाद माही को टेस्ट और फिफ्टी फोर्मेट का कप्तान बनाया गया तो धोनी ने वरिष्ठ खिलाड़ियों के पूर्वाग्रहों और अहंकार सही तरह से सम्भाला और इनके अहंकारों को सही भांति इस्तेमाल किया। दूसरे के अहंकार का प्रबंधन ही प्रबंधक का एक मुख्य कार्य होता है जो रांची के सूर्य धोनी ने किया। साथ साथ अपने से कनिष्ठ खिलाड़ियों को भी उभारा। कनिष्ठ खिलाड़ियों के अहंकार को उभारना भी प्रबंधन का एक मुख्य कार्य है जिसे महेंद्र ने सही ढंग से अंजाम दिया।


                                                        बदलाव प्रबन्धन का सही प्रबंध


    नीतिकार कहते हैं कि प्रत्येक प्रबंधक को बदलाव प्रबंधन में माहीत होना चाहिए।  महेंद्र सिंह धोनी का जीवन संघर्षमय रहा है और धोनी ने बदलाव प्रबंधन को बचपन से ही सीख लिया था। फ़ुटबाल गोल कीपर से क्रिकेट विकेट कीपर बनना धोनी के बदलाव प्रबंधन पर पकड़ का सबूत है। स्ट्रीट क्रिकेट से भारतीय क्रकेट का सूर्य बनने के पीछे धोनी में बदलाव प्रबंधन को सही ढंग से समझना  और बदलाव प्रबंध को सही अंजाम  देने की भी कहानी है।   अनुभवी क्रिकेट खिलाड़ियों को सरलता पूर्वक नेतृत्व  प्रदान करना और साथ साथ में नई पीढ़ी  को अवसर प्रदान करना व उन्हें विकसित करते रहना महेंद्र सिंह धोनी का बदलाव प्रबंधन में प्रवीणता का एक उदाहरण  है।
     

                                                          अनुकुलन  प्रबन्धन

 बदलाव प्रबन्धन की पहली शर्त है अनुकूलन प्रबंधन। धोनी अनुकूलन प्रबंधन में सिद्धहस्त है।


                                             अपनी ही सृष्टि को समाप्त करना

              विष्णु सहस्त्र नाम में कई बार विष्णु को अपनी ही सृष्टि या रचना को समाप्त करने वाला भी बताया गया है। जो अपनी सृष्टि को समाप्त करने में विश्वास रखता है वह  भूतकाल को नही ढोता है और समय पड़ने पर अपने विकसित सिद्धांतो या नियमो को तिलांजलि देकर नई सृष्टि करता है। राहुल द्रविड़ , लक्ष्मण , सहवाग, जहीर खान , आदि को किनारे करने में चुनाव कमेटी का साथ देना यह साबित करता है कि महेंद्र सिंह धोनी नव निर्माण में पुरानी सृष्टि नष्टिकरण  से नव निर्माण सिद्धांतो को समझता है।
     
                                                                    वर्तमान में रहना


                            प्रत्येक  प्रबंधक भुत , वर्तमान और भविष्य के झंकोलों  में  झोलता रहता है  और या तो असफल  प्रबंधक या असफल प्रबंधक साबित होता है। कोई प्रबंधक  भूतकाल को अपने सिर  पर ढोता  रहता है और वर्तमान को समझ ही नही पाता  और असफल हो जाता है। कई प्रबंधक भविष्य के डर से कई योग्य फैसले नही ले पाते और वर्तमान में मिले अवसरों को डुबा देते हैं। जिन्होंने धोनी के मैच शुरू होने से पहले बयानों को सूना होगा तो वे जानते हैं कि धोनी कहता है कि ब्याळि (कल ) क्या हुआ और भोळ (कल ) क्या होगा आज के  मैच को नही जिता सकते हैं. वर्तमान के हिसाब से ही  आज का मैच जीता जा सकता है. वर्तमान मे रहना काफ़ि कठिन काम है और धोनी वर्तमान मे रहने  की कला जानता है. योगी  ही  वर्तमान मे रहते हैं और ल्वाली , लम्बगढ़ कुमाऊं का प्रवासी सचमुच में योगी है।
                             भावनाओं पर काबू करना और हर समय ठंडे दिमाग से सोचना केवल वही कर  सकते हैं जो योगिक शैली प्रबंधन के रास्ते पर चलते हैं। धोनी हर समय एक ही वर्ताव करता है। अधिकतर देखा गया है कि महेंद्र सिंह धोनी ऐसे फैसले लेता है जो क्रिकेट किताब में हैं ही नही जैसे ट्वेंटी ट्वेंटी के फाइनल में तनावपूर्ण  आखरी ओवर में जोगेन्दर शर्मा को बौलिंग थमाना और मैच जीतना या वर्तमान समय में जब इशांत शर्मा पिट रहा हो और भुवनेश कुमार अच्छी बौलिंग प्रदर्शन कर रहा हो फिर भी इशांत शर्मा से बौलिंग करा कर विकेट लिवाना आदि निर्णय दर्शाते हैं कि धोनी वर्तमान में जीता है।
                                   
                                                      ध्यान याने योगिक प्रबंधन पथ

 महेंद्र सिंह धोनी की विशेषता है कि वह  वर्तमान को ध्यान से जीतता है। चैम्पियन ट्रौफी से पहले भारतीय क्रिकेट मैच फिक्सिंग और स्वयम धोनी के  सपोर्ट मैनजमेंट कम्पनिययां  होने से धोनी के लिए परिस्थितियाँ  सर्वथा प्रतिकूल थीं। किन्तु धोनी ने वर्तमान पर योगी की भाँती ध्यान दे कर भारतीय क्रिकेट को नई उंचाई प्रदान की। ध्यान स्थित  रहना प्रत्येक खिलाड़ी व कप्तान के बस की  बात नही है।


                                              आचार विचार से ध्यान या ध्यान से आचार विचार?


  क्रिकेट खिलाड़ी वास्तव में युवा होते हैं और उनमे भी वही उमंग और उछ्रिन्खलता होती जो है अन्य युवकों में होती है। इस दौरान कई योग्य खिलाड़ी शराब, जुआ  व युवतियों के कुसंग में पड़  कर अपने खेल के स्तर क्षीण कर डालते हैं। विनोद काम्बली इसका जीता जागता उदाहरण है। आचरण शुद्धता, विचार शुद्धता  अथवा अनुशासन खेलों के लिए अनिवार्यता  है। ध्यान से आचरण शुद्ध होता है और आचरण शुद्धता से ध्यान जगता है। आचरण शुद्धता और वर्तमान इंगित ध्यान पृथक नही अपितु एक दूसरे के पूरक हैं। धोनी की प्रबंधन सफलता में आचरण शुद्धता का बड़ा हाथ है। आचरण शुद्धता व ध्यान ही धोनी को अपने टीम सदस्यों से विलक्षण बना देता है।

                                             दबाब झेलने की क्षमता


यह सर्वविदित है कि मेहन्द्र सिंह धोनी किसी भी प्रकार के दबाब झेल सकता है। दबाब वही झेल सकता है जो वर्तमान में रहे , ध्यान में रहे और अचार विचार में शुद्ध हो। सफलता और असफलता को बोझ लेकर ढोने  वाले दबाब नही झेल सकते हैं। गली क्रिकेट खेलने के कारण धोनी दबाब झेलने में अनुभवी है।

                         प्राकृतिक वृति आधारित  निर्णय  (इंस्टिंक्टिव  डिसिजन)
 
                               
  दुनिया में कोई चीज इंस्टिक्टिव डिसिजन नही होती अपितु यह बचपन से निर्णय लेने हेतु शीघ्र अनुमान और आकलन करने के गुण के कारण होता है।  शीघ्र अनुमान लगाना और उस परिश्थिति को अनुभवों से शीघ्र तौलना एक मानवीय विलक्षण  गुण होता है जो माही  में है। स्ट्रीट क्रिकेट खेलने से भी धोनी के इंस्टिक्टिव डिसिजन लेने की प्रवृति में सुधार हुआ।

                                 अनुभव को उचित सम्मान देना


प्रबंधक को क्रूर निर्णय लेने पड़ते है। किन्तु अनुभव का सम्मान कभी भी नही भुला जाता। पाठक अनिल कुंबले का अंतिम टेस्ट की याद करेंगे तो याद करेंगे कि किस तरह महेंद्र सिंह धोनी ने भारत के सर्वश्रेष्ठ बौलर को अपने कंधे पर बिठाया और खेल मैदान में घुमाया। यह गुण दर्शाता है कि माही अनुभव को सर्वोचित सम्मान देता है। फिर सौरभ गांगुली के अंतिम टेस्ट में भी धोनी ने जीतते मैच के अंतिम समय में नेतृत्व सौरभ गांगुली को सौंपा। यह गुण एक विशेष पहाड़ी गुण भी माना जा सकता है।

                                      अपने सदस्यों पर सम्पूर्ण भरोसा

धोनी ने साबित कर दिया है कि एक बार कोई भी टीम सदस्य बन जाय तो धोनी उस पर सम्पूर्ण भरोसा करता है और प्रत्येक सदस्य से उसकी विशेषता अनुसार कार्य सम्पादन करना जानता है
           

                           सम्मान द्वारा प्रतिद्वंदी को डराना


  आदि काल से ही युद्ध में बाचाल प्रक्रिया द्वारा प्रतिद्वंदी को युद्ध से पहले ही धरासायी करने की नीति रही है। धोनी भी खेल युद्ध शुरू होने से पहले प्रतिद्वंदी को घायल करता है  किन्तु धोनी की विशेषता है कि वह खेल से पहले व खेल होते हुए प्रतिद्वंदी को उचित सम्मान देकर धराशायी करता है।

                                     असफलता का प्रबंधन

जीवन में असफलता आना एक अवश्यम्भावी आयाम है। राष्ट्रीय क्रिकेट क्षेत्र में आने के बाद धोनी के जीवन में अप्रतिम सफलता के साथ असफलताएं भी आयीं हैं। धोनी ने प्रत्येक असफलता को अवसर का एक बड़ा माध्यम बनाया। कप्तान बनने के बाद धोनी ने कई असफलताएं भी देखीं और हर असफलता के बाद धोनी ने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किये। धोनी के कट्टर आलोचक खिलाड़ी -टीकाकार जैसे कीर्ति आजाद, अशोक मल्होत्रा, मोहिन्दर अमरनाथ भी धोनी के असफलता प्रबंधन के प्रशंसा करे बगैर नही रह सकते हैं।


                                          सफलता में  भागीदार को समुचित सम्मान

धोनी अन्य क्रिकेट कप्तानो से सर्वथा अलग दिखता है। विशेष ट्रोफी जीतने के बाद धोनी नेपथ्य में चला जाता है और अपने सहयोगियों को सफलता का भागिदार बनाता है। महेंद्र सिंह धोनी वर्ल्ड कप 2011, चैम्पियन ट्रोफी 2013 में कप लेने के बाद नेपिथ्य में चला  गया और अपनी टीम सदस्यों को सफलता का सुख उठाने का मौक़ा देना यह दर्शाता है की रांची का चेहता युवराज अपने साथियों की भागीदारी को सही समय पर सम्मान देता है। अभी अभी ट्राईन्गल सिरीज में कप लेने के लिए विराट  कोहली को कप भागीदारी करने के लिए बुलाना दर्शाता है कि धोनी मानवीय प्रबंधन की बारीक से बारीकियों को जानता है। भागीदारों को समुचित भागीदारी देना का गुण टीम में उत्साह और प्रेरणा भरता है।


                                 नई पौध विकास याने स्वर्णिम भविष्य

प्रबंधन में एक शब्द प्रयोग किया जाता है -व्हेयर इज रिजर्व ? या व्हेयर इज न्यू टैलेंट ? धोनी नई पौध खोजना और उन्हें विकसित करना जानता है।


                                  मान्यतायों पर विश्वास

धोनी जब भी कोई बड़ी प्रतियोगिता जीतता है तो रांची में देवी मन्दिर में बकरा  बली देता है। मान्यताओं पर विश्वास अपने आत्मविश्वास के लिए आवश्यक उपादान होता है।
                                   


          उपरोक्त विश्लेषणों से सिद्ध होता है कि धोनी की सफलता के पीछे योगिक शैली  प्रबंधन का प्रमुख  हाथ है।
अंत में धोनी के लिए महान खिलाड़ी सुनील गावास्कर के शब्द - धोनी को समझना बहुत कठिन है। जब धोनी क्रिकेट से संन्यास लेगा तो किसी को गिलवे शिकवे नही बताएगा अपितु अपनी मोटर साइकल उठाएगा और कहीं दूर चला जाएगा।

Copyright@ Bhishma Kukreti 14/7/2013

Bhishma Kukreti

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Dr. Dinesh Chandra Baluni: Historian of Uttarakhandi Culture

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                                  Bhishma Kukreti

  Dr. Dinesh Chandra Baluni is one of the prolific historians of Uttarakhand culture and folk literature.
            Dr. Dinesh was born in 1952 of Chhoti Bagi village, Ajmir Patti of Lansdowne Tehsil, Pauri Garhwal. Baluni took his primary education from Ajmir region. Dr. Dinesh Chandra Baluni passed M.A four times in four subjects Sociology, Economics, History and Political science. Dinesh got Ph.D. degree from Ruhelkhand University.
                    Dr. Dinesh Chandra is diploma holder in Bengali language too. Dr, Baluni is teacher by profession.
 Dr. Baluni is famous for books as
Uttarakhand Ki Lokgathayen
Uttrakhand ke Sevanirvrit Sainik
Uttrakhand ki Sabhyata aur Sanskriti
Uttrakhand ki Jatiyan aur Jan Jatiyan
             Dr Baluni published tens of articles related to Uttrakhand culture in various magazines and news papers.
    People will remember Dinesh Chandra Baluni for his outstanding works on Folk Literature of Central Himalaya and Uttrakhand culture.

Copyright@ Bhishma Kukreti 18/7/2013
Great celebrity  from Garhwal; Great  Scholars  from Gangasalan Pargana , Garhwal; Great Personalities from Ajmir Patti, Garhwal; Great  researcher  from Yamkeshwar assembly constituency Garhwal; Great Personalities from Lansdowne Tehsil Garhwal; Great Intellectual from Pauri Garhwal; Great Personalities from Tehri Garhwal; Great Personalities from Rudraprayag, Garhwal; Great Writer  from Chamoli Garhwal; Great Personalities from Uttarkashi Garhwal; Great cultural Historian from Dehradun, Garhwal; Great Personalities from Garhwal, Uttarakhand; Great Culture Analyzer  from Garhwal central Himalaya; Great Personalities from Garhwal North India; Asian Great Personalities from Garhwal series to be continued…

Bhishma Kukreti

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Prem Lal Gaud, Shashtri : A Prose Maker in Garhwali , Himalayan language
                  Bhishma Kukreti

Prem lal gaud Shashtri wrote mostly in Hindi but also published on prose collection book in Garhwali, Himalayan language.
Prem Lal Gaud Shashtri was born in a Himalayan village Gaindkhal, Talla Dhangu, Gangasalan of Pauri Garhwal, Uttarakhand in 1947. After passing Acharya degree from Haridwar, he shifted to Chandigarh. He was active organizing Uttarakhadis in Chandigarh and took part in cultural and social activities of Uttarakhandis in Chandigarh.
He wrote around ten books in Hindi. In Garhwali, Himalayan language literature, Gaud is famous for his book in ‘ Premekanki’ Premekanki is collections of prose written by Prem Lal Gaud Shashtri .

Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai, India, 2009

Bhishma Kukreti

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गंगासलाण व   यमकेश्वर ब्लाक की विभूतियाँ - 2

          स्व. विश्वम्भर दयाल 'मुनि विश्वकर्मा' :शिल्पकार समाज उत्थान कर्ता

         संकलन -भीष्म कुकरेती

 
स्व. विश्वम्भर दयाल का जन्म 1911 में बमोली (डबराल स्यूं , पौड़ी गढ़वाल) में श्र गट्टी लाल के यहाँ हुआ था। पांच भाई और तीन बहिनों में सबसे बड़े थे। श्री गट्टी लाल चैलुसैण के आस पास क्षेत्र के पसिद्ध मिस्त्री व काष्ठ कलाकार थे ।
स्व. विश्वम्भर दयाल की प्राम्भिक पढ़ाई लिखाई मिशनरी स्कूल चैलूसैण में हुई। चैलूसैण स्कूल पर क्रिस्चियन बनाने का अभियोग था और सामाजिक दबाब के कर्ण यह स्कुल बंद किया गया तो स्व. विश्वम्भर दयाल को लखनऊ  जाना पड़ा। वहां उन्होंने   कष्ट कला विषय में लखनऊ आर्ट कॉलेज में प्रवेश लिया। चात्वृति मिलने से धन की मस्या हल हुयी। आर्ट कॉलेज से पांच वर्षीय डिप्लोमा प्रथम श्रेणी में पास किया। इलाहाबाद से कारपेंटरी टीचर्स ट्रेनिंग का दो साल का डिप्लोमा पास किया।
 कुछ समय महानन्द मिशन इंटर कॉलेज में शिक्षक रहे।
फिर दिल्ली में नौकरी की
इसके बाद आगरा में इंडस्ट्रियल स्कुल में अनुनिदेश्क पद पर रहे।

 1942-1945 तक देहरादून में निजी व्यवसाय किया फिर 1947-1965 उत्तरप्रदेश सरकारी नौकरी की। वे पदमपुर कोटद्वार बस गये थे
1965-1975 तक ठेकेदारी की।
स्व. विश्वम्भर दयाल आर्यसमाजी बने और इस दिशा में उनका योगदान शिल्पकार समाज को सामजिक अधिकार दिलाने हेतु प्रशसनीय है। उन्होंने अपने क्षेत्र के कई लोगों को आर्य समाजी बनाया और भाभर कोटद्वार में जमीन दिलाकर बसाया। शिल्पकारो के पास मिलकियत नही होती थी और उन्होंने शिल्पकारों को जमीन मिलकियत दिलाने में सार्थक प्रयत्न किया।
इसी तरह शिल्पकार बच्चों को शिक्षा दिलाने में कई प्रयत्न किये यवाओं को वे उच्च शिक्षा लेने की प्रेरणा देते थे और आवश्कतानुसार सहायता प्रदान भी करते थे
पद्मा पुर भाभर , कोटद्वार में उन्होंने फलदार बगीचा लगाया और उस समय फलदार बगीचा बहुत से कास्तकारों के लिए प्रेरणा स्रोत्र बना।
स्व. विश्वम्भर दयाल का सपना था कि प्रत्येक शिल्पकार पढ़ा लिखा हो। फिर दो लाख की राशि से उन्होंने शिल्पकार छात्रों को छात्रवृति देने हेतु एक ट्रस्ट  बनाया। यह ट्रस्ट आज भी शिल्पकार समाज हेतु कार्यरत है। स्व. विश्वम्भर दयाल के  पुत्र कान्ति प्रकाश इस ट्रस्ट को सम्भालते हैं।
स्व. विश्वम्भर दयाल के शिल्पकार उत्थान कार्य हेतु लोग उन्हें 'मुनि विश्वकर्मा' के नाम से बुलाते थे।
 



Copyright@ Bhishma  Kukreti 16/7/2013
सन्दर्भ - विनोद शिल्पकार, 2009. उत्तराखंड का उपेक्षित समाज और उसका साहित्य

Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड की विभूतियाँ श्रृंखला

                   संस्कृत और हिंदी साहित्य के इतिहासकार डा प्रेम दत्त चमोली नही रहे


             प्रचार प्रसार से दूर रह अपने काम में लग्न रहने वाले डा प्रेम दत्त चमोली का स्वर्गवास रूडकी में 9 जलाई 2013 को हो गया. यह समाचार मुझे कल ही नैनीताल बैंक के प्रबंधक श्री गिरीश पोखरियाल से मिली। डा चमोली से मेरा परिचय फोन पर हुआ जब मैं गढ़वाली काव्य का इतिहास हेतु कवियों का परिचय खोज रहा था. फोन से ज्ञात हुआ कि डा प्रेम दत्त चमोली गढ़वाली में नही लिखते। डा चमोली ने बताया कि वे इस समय अपने ग्रन्थ 'संस्कृत को गढ़वाल की देन' प्रकाशन और 'उत्तराखंड का हिंदी साहित्य को देन हेतु कार्यरत हैं.   
            दो साल पहले (६/११/२०११ )मुझे डा प्रेम दत्त को रूबरू मिलने का  अवसर रुड़की में मिला। डा प्रेम दत्त चमोली सात्विक भोजन करते थे और शादी जैसे अवसरों पर भी घर से भोजन कर आते थे. तब उनके ऐतिहासिक पुस्तक ' गढ़वाल की संस्कृत साहित्य को देन' प्रकाशित हो चुकिथी और उन्होंने मुझे वह पुस्तक भेंट की. फिर जब मैंने इस पुस्तक की समीक्षा नेट पर प्रकाशित की तो उन्हें सूचना दी और उन्होंने उल्हास में धन्यवाद दिया। उसके बाद उनसे सम्पर्क का अवसर प्राप्त नही हुआ.
                         डा प्रेम दत्त चमोली का जन्म ग्राम पलाम , पट्टी मखलोगी , टिहरी  गढ़वाल में 15 अक्टूबर 1931  को श्रीमती गंगा देवी -शर्णु राम के यहाँ हुआ.
 शिक्षा - बालक प्रेम दत्त  ने क्यारी गाँव से आधारिक शिक्षा प्राप्त की और फिर संस्कृत शिक्षा हेतु हरिद्वार चले गए. संस्कृत व हिंदी से उन्होंने एम. ए. किया और डी. फिल के पदवी सन 1979 में प्राप्त की.
       सन 1958 से 1995 तक डा प्रेम दत्त चमोली मेरठ में अध्यापक रहे और प्रधानाचार्य के पद से निवृत हुये.
 
  उन्होंने खोजपूर्ण साहित्य की  रचनाएँ प्रकाशित कीं
१ - गढ़वाल की संस्कृत साहित्य को देन
२- ज्ञान निबन्ध
३ -गढ़वाली साहित्यकोश
४- श्रीमद भागवत पुराण का सप्ताह
इसके अतिरिक्त उनकी  की खंडो की वृहद् पुस्तक ' उत्तराखंड का हिंदी साहित्य को देन' प्रकाशाधीन थीं
डा प्रेम दत्त चमोली राजकीय योजना ' उत्तराखंड की विभूतियाँ ' के टिहरी और चमोली गढ़वाल क्षेत्र के प्रभारी भी थे.
वे दो सुयोग्य पुत्रों के पिता जी भी थे.

डा प्रेम दत्त चमोली उत्तराखंड के एक जगमगाते नक्षत्र थे जिन्होंने उत्तराखंड में संस्कृत और हिंदी साहित्य के इतिहास के   दिया था. उत्तराखंड उन्हें व उनके योगदान को कभी नही भुला पायेगा

Copyright@ Bhishma Kukreti 20/7/2013

Bhishma Kukreti

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Great Uttarakhandi Personality from Malla Dhangu 
 Dr. Achla Nand Jakhmola: A Prolific Linguistic Scholar

                       Bhishma Kukreti
                     Dr Achla Nand Jakhmola is one of the great linguistic scholars of Hindi and Garhwali. Dr. Achla Nand Jakhmola is said to be dictionary expert.
            Dr. Achla Nand Jakhmola was born in Gatkot village, Malla Dhangu, Pauri Garhwal in 1934. Gatkot village is famous for producing great teachers.
    Dr. Jakhmola got education from Gatkot, Silogi, Dehradun and Allahabad. After passing his MA degree he got D.Phil in 1961. Achla Nand is having diploma in Russian language and management. Dr Jakhmola has full knowledge of Sanskrit and Arabic languages.
 Initially he joined teaching profession. Later on he was selected in Sales Tax department of Uttar Pradesh. Then he joined Army and retired as Lt Colonel from Indian Army.  He is well travelled personally and travelled Europe.
Dr. Jakhmola has credits for publishing tens of articles on languages and dictionary creation.  His books are published following book –

Madhyakalin Hindi Kosh Sahitya
Hindi Kosh Sahitya
Kosh Vidha evam Anya Shodh
Uttarakhand ki Lok Bhashayen
Under Publication
Garhwali-Hindi –Angreji Shabdkosh
English-Garhwali- Hindi shabdkosh
Garhwali Bhasha ke Analochit Paksh
Yayvar Sahitya
 Great scholars as Dr. Dhirendra verma, Dr Hardev Bahari, Dr Mata Prasad Gupta, Prof D.dD.Sharma, Dr Sher Singh Bisht appreciated his works on languages and philology. 

 Dr Jakhmola is busy in promoting Hindi and Garhwali languages in Dehradun.
Copyright@ Bhishma Kukreti 14/8/2013

Bhishma Kukreti

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ब इतिहासकार डा.  शिव प्रसाद डबराल को "कुमाऊं का  इतिहास" प्रकाशन हेतु  भूमि बेचनी पड़ी



                  भीष्म कुकरेती

आज स्वतन्त्रता दिवस है तो आज हमारे मनीषियों के योगदान -बलिदान स्मरण होना भी आवश्यक है।
अपनी जन्म भूमि के आत्माभिमान के लिए त्याग भी स्वतंत्रता आन्दोलन जैसा ही ही है। अपने इतिहास को अक्षुण रखना भी एक सामजिक उत्तरदायित्व है । डा शिव प्रसाद डबराल का उत्तराखंड के इतिहास को लिखने में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है ।
 डा शिव प्रसाद डबराल ने उत्तराखंड के सभी क्षेत्रों का इतिहास पर अन्वेषण किया और उसे लिपिबद्ध  किया । इन कार्यों के लिए उन्हें कई कष्ट भी सहने पड़े ।

कुमाऊँ का  इतिहास (1000 -1790 ई ) की भूमिका में डा शिव प्रसाद डबराल इस प्रकार लिखते हैं -
 " छै वर्षों तक सूरदास बने रहने के कारण लेखन कार्य रुक गया था ।प्रकाशन कार्य में निरंतर घाटा पड़ने से प्रेस (वीर गाथा प्रेस ) बेच देना पड़ा ।ओप्रेसन से ज्योति पुन: आने पर  चला कि दरजनो फाइलें , जिसमें महत्वपूर्ण नोट्स थे , शायद रद्दी कागजों के साथ फेंक दी गईं हैं । कुमाऊँ का इतिहास भी गढ़वाल के इतिहास के समान ही छै सौ पृष्ठों में छपने वाला था ।इस बीच कागज़ का मूल्य  छै गुना और छपाई का व्यय १६ गुना बढ़ गया था ।छै सौ पृष्ठों का ग्रन्थ छपने के लिए 35000 रुपयों की आवश्यकता थी ।इतनी अधिक राशि जुटाना सम्भव नही था । 76 की आयु में मनुष्य को जो भी करना हो तुरंत कर लेना चाहिए ।दो ही साधन थे ।भूमि बेच देना और पांडू लिपि को संक्षिप्त करना ।अस्तु मैंने कुछ राशि भूमि बेचकर जुटाई तथा कलम कुठार लेकर पांडुलिपि के बक्कल उतारते उतारते उसे आधा , भीतरी , 'टोर' मात्र बना दिया । किसी 'चिपको वाले 'मित्र ने मुझे इस क्रूर कार्य से नही रोका ! "

डा शिव प्रसाद डबराल की  'कुमाऊँ का इतिहास '  (1987 ) पुस्तक में कुल 272 पृष्ठ हैं और पुनीत प्रेस मेरठ से मुद्रित  हुयी है
डा डबराल को कोटि कोटि नमन


Bhishma Kukreti

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Yatyendra Prasad Gaur: A Modern Garhwali Lyricist famous for his various Poetic Images of Garhwal 

                                Bhishma Kukreti

                         Yatyendra Prasad gaur is modern lyricist of Garhwali poetry. The modern Garhwali Rhymester Gaur is well-known for his creating images of Garhwal.
              Yatyendra Prasad Gaur was born in village Bichhal Simal, Ajmir of Pauri Garhwal on 27th April 1967. His mother name is Shrimati Pyari Devi and father name was late Shri Govind Prasad Gaur.
              Yatyendra Guar got his B.Ed. degree after passing M.A in English and Economics. From his childhood age, Yatyendra had attraction for music. Yatyendra Gaur is diploma holder in Music form Allahabad; Gaur took singing training from Manohar Singh Rawat of Kotdwara and Mohan Singh Rawat of Pauri. Yatyendra Gaur took training of Tabla playing from Mohmmad Kayum Khan of Nazibabad . 
            Yatyendra got inspiration from great Indian singer Narendra Singh Negi to write lyric in Garhwali.
  Yatyendra Gaur released Garhwali song album as ‘ Barkhwalun Chaumas’. The aid album was praised by common men and was appreciated by literature critics too.
      Gaud had been writing Garhwali poetries for magazines-newsletters as  Ghughati, Khabar Sar, Shailvani Siddhvani, Chitthi Patri, Garh Gaurav.
  Akashvani (Radio Station) Nazibabad have relayed songs and folk songs by Yatyendra Gaur.
           Recently (2009) published his first modern Garhwali lyric collection ‘Garhwali Bhaun’ from Samay Sakshya Dehradun.   
             The great Indian singer Narendra Singh appreciated very much the style and structure of lyrics of Yatyendra gaur.
  Famous Garhwali and Hindi critic and literature historian Dr. Nand Kishor Dhoundiyal praised the poems of Yatyendra Gaur. Yatyendra would be remembered for his lyrics creating the various images and mood of Garhwal.
 Gaur created marvelous images of Ajmir region and Gangasalan regionin his various Garhwali poems as Gadh –Mabgarh ; Malini Pandu ki Bala he Shakuntala, Gendu Khyalela Ho aaaa 
The following poem is about Malini emerging from upper Chandakhal
माळू  का जौड़यूंद बौगदी ठंड़ू पाणी मालिणी
गंगा सि  पवित्र प्यारी छाळू पाणी मालिणी 
मल्या चंडाखाळम बटी अवतरित ह्वै तू मालिणी
अद्बाट अकौशानी हूणी , तेरी सौज्ड्या मालिणी   
xxx
 Gaur perfectly created another poem about Mabgarh temple and the region
गढ़ माsब गढ़

 ऊंची धार शिवलिंगी अन्वार।
ऐंच आगास माया नीलू छतर
जौ जस देंद हे भूमि भूम्याळ
हे इष्ट माsब गढ़ , माsब गढ़
 


             Yatyendra Gaur is teacher in Lal Dhang.
He may be contacted on 09411585692

Copyright@ Bhishma Kukreti, 16/8/2013
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Bhishma Kukreti

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Rajendra Prasad Kotnala: A Garhwali Satirical Poet and Spiritual Verses maker   

                 (Critical Review of Garhwali Literature Series) 
                   
                      Bhishma Kukreti

                 Rajendra Prasad Kotnala is versatile Garhwali language writer.
        Rajendra Prasad Kotnala was born in Rauta village, Bichla Badalpur, Pauri Garhwal on 13th May 1944.
                      After passing his M.A degree, Kotnala got diploma of DPM. Rajendra Prasad joined army for his livelihood.  Rajendra Kotnala is an active social organizer. He is one of the founder members of Uttarakhand Purv Sainik and Ardh Sainik Sangharsh samiti. Rajendra Prasad took active part in separate Uttarakhand movement.
          He wrote and published Garhwali language stories, poems and verses.
 Ram Prasad writes satirical and religious Garhwali poem with ease.
 Kotnala uses Garhwali symbols for creating humor and satire as the example is -
राम प्रसाद कोटनाला की  व्यंग्य कविता


दादा हुयुं छाई हरान
कुर्स्यळी जनि मुखड़ी
मोर जनि नाड़ी
भैर हलणु छाई
खिरबोज कु दाणु जनु पुटगु
बौ दिखेणी छै पर्या जनि
नौनि जन सरकंडा
नौनु गिंदड़ु बण्यो छायो

 Famous Garhwali literature activist Lokesh Navani appreciates the poems of Kotnala for his using figure of speeches and similes.
Copyright@ Bhishma Kukreti 29/8/2013
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