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Shukraniti Defining Smriti

Planning Strategies for CEOs of Educational institutions and Social organization, -26 
Policies for CEOs of organizations related to Skill development – 26
Planning/Strategies to be known by political leaders, administrators, statesmen for administrating the country
Immutable Strategic Formulas for Chief Executive Officer
(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)
(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)           
Successful Strategies for successful Chief executive Officer – 337
Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 337   
s= आधी अ         

By Bhishma Kukreti (Management Acharya)
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वर्णादिधर्मस्मरणं यत्र  वेदाविरोधकम् II31II
कीर्तनं चार्थशस्त्राणआं स्मृति: सा च प्रकीर्तिता I
 Smriti is that which discusses the for classes (castes) and duties as per Vedas and not against the. It also deals with social moral values and economics.

(Shukraneeti, Chapter 7 Vidya VA Kala Nirupa-31-32 II
References:
1-Shukra Niti, Manoj Pocket Books Delhi, page –218   
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2021



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  उत्तराखंड का   मंडुवे का आयुर्वेदिकअलुण बाड़ी

 मंडुवे का   आयुर्वैदिक हलवा या नमकीन हलवा / मीठा बाड़ी
    चूनो   आयुर्वेदिक अलुण   बाड़ी  पकाणो  ब्यूंत
 Badi or  Halva   from Ragi /Finger Millete  Flour (Recipe )
उत्तराखंड के   आयुर्वेदीय  पारपम्परिक भोजन व्यंजन विधि /पाक विधि/ पाक कला  श्रृंखला  भाग - ४
Recipe of Ayurvedic Traditional Food of Garhwal, Kumaon (Uttarakhand)part- 4
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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  चूनो (मंडुवे का आटा ) बाड़ी  पकाई खाणै  परथा  सैत  च अशोक काल या पैल  बिटेन च। 
समान /सामग्री -
 मंडुवा आटु  /चून - जथगा  बणान हो पाणी
उपकरण -
कढ़ाई
दबुळ
बाड़ी पकाणो  ब्यूंत /बाड़ी पाक विधि -
कढ़ाई म पाणी  ग्राम कन  धारो।  जब पाणी  गरम हो  धीरे धीरे चून  डाळो  अर  दबळन खैडो , तब तक दबळ  चलाओ जब तक चून  हलवा या बाड़ी म नि  बदल जावो।  डुबक (  आटा सहित  गुब्बारा ) नि लगणो  दबळन लगातार खैंडण  जरूरी च। ध्यान दीण  कि दबळ हर समय   चलण चयेंद। 
 जु लुण्या  बाड़ी पकाण त  चूनम लूण , जवाण डाळि  चून  खैंडो।    बाड़ी कथगा  पंद्यर/ लसलसो  या सूखा चयेणु  च वै अनुसार चून  मिलांद  जावो। 
  चूनो मिठ  हलवा पकाणो  तरीका वी च जु ग्यूं  हलवा या गुड़ज्वळि  पकाये जांद अर्थत चून भूनो फिर वैमा  गुड़ की गरम गर्म  चासनी डाळो  अर  दबळ  चलांद  जावो।
 सर्दी ह्वेन या रुड़ी  या बरखा सब मौसमों बाडी  खाये जांद। 

Copyright @ Bhishma  Kukreti 
उत्तरखंड की   आयुर्वैदिक पारम्परिक भोजन  पका कला , recipe for Ayurvedic  Traditional Cuisine of   Uttrakhand  , गढ़वाल की आ  आयुर्वेदिक   पारम्परिक पाक कला, कुमाऊं की  आयुर्वेदीय पारम्परिक भोजन  पाक कला निरंतर
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पर्वताकार पौरव काल में बिजनौर, हरिद्वार , सहरानपुर में वेशभूषा

Dressings  in Bijnour, Haridwar , Sahranpur in   Paurava/Parvatkar Ruling period
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -२२

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -22

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -    299                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  २९९               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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मोरध्वज  किला स्थल के उत्खलन से प्राप्त मृणमूर्तियों से ज्ञात होता है कि  उस समय नर नारी छोटी धोती पहना करते थे।  धोती कमर पर कास कर बंधी होती थी (२ )  I उसके ऊपर नर नारी  पटुका बांधते थे।   नारियों के पटुके से  कोई आभूषण लटका रहता था धोती ऊपर शरीर नग्न होता था।  )१ )
तब बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर के नर  नारी बालों में  जूड़ा  बनाते।  नारियों गले में हर होते थे।  योगी व भद्र पुरुष आसन बांधकर बैठते थे व शिष्य या सेवक चंवर डोलते थे।  अंजन का बड़ा प्रचलन था।  मोरध्वज की खुदाई में अंजन की सलाईयां मिलीं है।
   मोरध्वज यद्यपि बिजनौर में आज है किंतु  यह स्थल हरिद्वार व सहारनपुर से कोई दूर नहीं है कि  संस्कृति में भारी बदलाव आये।   
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 संदर्भ -
शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ ४२२ ४२३
मखराम - जॉर्नल , एसियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल vol  ६० , पृष्ठ २ व ४
Copyright @ Bhishma  Kukreti
हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का प्राचीन इतिहास  आगे खंडों में   ..

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बरसु (अगस्तमुनि, रुद्रप्रयाग )  में भवन  (२ ) की तिबारी में पारम्परिक  गढवाली शैली की काष्ठ कला अलंकरण


Traditional House wood Carving Art of  Barsu (Augstmuni ) Rudraprayag         : 
गढ़वाल, कुमाऊँ,केभवन (तिबारी, निमदारी, बाखली, जंगलेदार  मकान, खोलियों ) में पारम्परिक  गढवाली शैली की काष्ठ कला अलंकरण उत्कीर्णन  अंकन,-476   

 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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आजकल मित्र उन भवनों की आधी फोटो भी भेज रहे हैं जहां पुरे भवन की फोटो संभव   नहीं है।  उनके प्रयास को नमन। 
आज  बरसु (अगस्तमुनि, रुद्रप्रयाग )  में  एक भवन   की तिबारी में काष्ठ कला अलंकरण पर चर्चा होगी।  बरसु  का प्रस्तुत भवन सुदृढ़ व दुपुर -दुखंड है।  छायाचित्र में तिबारी ा एक स्तम्भ दृष्टिगोचर हो रहा है।  स्तम्भ देख क्र अनुमान लगाना सरल है कि तिबारी युक्त भवन बड़ी तबियत व ध्यान से  निर्मित हुआ है।  स्तम्भ के  आधार  में अलङ्कतित ड्यूल है जिसके ऊपर अधोगामी पद्म पुष्प दल से कुम्भी बनी है।  कुम्भी के आकर्षक  पात अंकन हुआ है। कुम्भी के ऊपर ड्यूल है।  ड्यूल के ऊपर खिले चीड़ फूल (चिलगोजा फूल दल  ) या कमल दल अंकन हुआ है , जिसके ऊपर बड़ा कमल दल दृष्टिगोचर हो रहे हैं जिसके ऊपर उर्घ्वगामी पद्म पुष्प दल ०बड़े आकर ) अंकन हुआ है। पुष्प दल से स्तम्भ लौकी आकर ले ऊपर बढ़ता है और जहां सबसे कम मोटाई है वहां  अधोगामी पदम् पुष्प दल अंकित हैं फिर ड्यूल है व ड्यूल के ऊपर आकर्षक  उर्घ्वगामी पद्म पुष्प दल आंकना हुआ है।  यहां से स्तम्भ थांत एकत्र लेता है ाव दोस्सरी और अर्धचाप बनता है।  निष्कर्ष निकलता है कि  बरसु  गांव के प्रस्तुत भवन की तिबारी उत्कृष्ट है व ज्यामितीय , प्राकृतिक अलंकरण कला  अंकन हुआ है। 

सूचना व फोटो आभार:   अरविन्द भट्ट
  * यह आलेख भवन कला संबंधी है न कि मिल्कियत संबंधी, भौगोलिक स्तिथि संबंधी।  भौगोलिक व मिलकियत की सूचना श्रुति से मिली है अत: अंतर  के लिए सूचना दाता व  संकलन  कर्ता उत्तरदायी नही हैं . 
  Copyright @ Bhishma Kukreti, 2021   
  रुद्रप्रयाग , गढवाल   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों, बाखलीयों   ,खोली, कोटि बनाल )   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण ,
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya ; Traditional House wood Carving Art of  Rudraprayag  Tehsil, Rudraprayag    Garhwal   Traditional House wood Carving Art of  Ukhimath Rudraprayag.   Garhwal;  Traditional House wood Carving Art of  Jakholi, Rudraprayag  , Garhwal, नक्काशी , जखोली , रुद्रप्रयाग में भवन काष्ठ कला,   ; उखीमठ , रुद्रप्रयाग  में भवन काष्ठ कला अंकन,  उत्कीर्णन  , खिड़कियों में नक्काशी , रुद्रप्रयाग में दरवाज़ों में उत्कीर्णन  , रुद्रप्रयाग में द्वारों में  उत्कीर्णन  श्रृंखला आगे निरंतर चलती रहेंगी

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   भरत नाट्य शास्त्र म अन्य अंगहार चर्चा
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग २३१   बिटेन  २४२  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२६
s = आधा अ
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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जु रेचित  हथ तै बाजुम  लिजैक रेचित  अवस्था  नमाये जाय  फिर  वै  रेचित  अवस्था म सरा शरीर तै नमाते  प्रदर्शित  करे जाव  अर  नूपुरपाद , भुजंगत्रासित,रेचित उरोमण्डल , कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन करे जाव  फिर रेचित , उरोमण्डल , अर कटिच्छिन्न  करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'रेचित' अंगहार हूंद।  २३० -२३२।
जु नूपुर ' करण तै प्रदर्शन करि त्रिक  तै एक घुमाव दिए जा फिर बैं  खुटन 'अलातक' करण प्रदर्शन करि सूची , करिहस्त ,अर कटिच्छिन करणों प्रदर्शन ह्वा  त 'आच्छुरित' अंगहार हूंद।  २३२- २३४।
जु  द्वी  स्वस्तिक पाद रेचित ह्वावन अर  इनि स्वस्तिक हथ  बि रेचित  रावो फिर रेचित क्रिया से इ अलग होवन अर  फिर रेचित क्रिया द्वारा वूं  तै मथ्या तरफ उछाळे जाव ; तब उद्वृत , आक्षिप्तक , उरोमण्डल ,नितम्ब , , करिहस्त , कटिच्छिन्न को क्रमशः प्रदर्शन ह्वा  त  आक्षिप्तरेचित' अंगहार हूंद। २३४ -२३७।
जब विक्षप्त करण तै प्रदर्शित करि  द्वी हथ -खूट तैं  मुखा तरफां अनुगामनी स्तिथि म रखदा बैं  हथ तै सूची मुद्रा म विक्षिप करे जाव अर दैं हथ  तैं वक्षस्थल म धरिक  फिर त्रिक  तै एक घुमाव द्यावो।  फिर एक एक कौरि नूपर ,आक्षिप्तक , अर्ध स्वस्तिक , नितम्ब , करिहस्त, उरोमण्डल ,अर कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'संभ्रांत' अंगहार हूंद।  २३७ -२४०। 
जब अपक्रान्त' करण कु  प्रदर्शन करदा व्यंसित करणो केवल हथों से प्रदर्शन ह्वावो अर हथों तै  उद्वेष्टित मुद्राम कम्पित करदा फिर अधिसूची विक्षिप्त , कटिच्छिन्न , उद्वृत ,आक्षिप्तिक , करिहस्त, अर कटिच्छिन करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'अपसर्पितक ' अंगहार हूंद।  २४० -२४२। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -   १२९  - १३१
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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वायु की महत्ता
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,    बारौं  वातकलाकलाय  अध्याय   ( तिस्त्रैषणीय  )   पद   ७ बिटेन  -८  तक
  अनुवाद भाग -  ९०
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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कांकयन ऋषि बचन सूणी  बडिश धमार्गवन बोलि - आपन जु  बोलि  वु  सै  बोलि।  आपक बतयां कारण इ  वायु तैं  कुपित या शांत करदन।  जन  सूक्ष्म अर  निरंतर गतिशील वायु तै पैक यी  रूखा गुण  वायु तै कुपित करदन अर शांत करदन , यांकी  व्याख्या करला। वायु तै कुपित करण  वळ  द्रव्य  शरीर तै रुक्ष , लघु ठंडा दारुण कठिन ) , खरखरा  अर  दुंळदार (/छीजीक ) बणै दींदन।   रुक्ष लघु आदि शरीर म आश्रय पैका कट्ठा  हुईं वायु प्रकुपित ह्वे  जांद। वात  तै शांत करण  वळ द्रव्य अर कर्म शरीर तै स्निग्ध /चिपुल ,गुरु , उष्ण ,श्लक्ष्ण (चिपुळ , सौम्य ) , कोमल , चिपचिपा अर  गाढ़ा कर दींदन। इन  शरीर म वायु  आश्रय नि  मीलिक शांत ह्वे  जांद।  ७। 
बडिश का सत्य बचन अर ऋषिओं  द्वारा  अनुमोदित वे बचन सूणी राजर्षि आयुर्विदन बोलि -आपन जु  बोली वो ठीक बोलि याने यूँ नियमों विरुद्ध एक बि उदारण  नी च।  'अपवादौ' अर्थ निन्दामी हूंद।  बुलणो  मंतव्य च बल सब ऋष्यूं  ये बाराम एकि  मत च। कुपित अर  शांत हुयां  शरीर म संचार करण वळ  अर शरीरो भैर संचार करण  वळ वायु क शरीर म अर शरीर या शरीर क भैर जु कर्म छन ऊंक अवयवों तै प्रत्यक्षादि प्रमाणो  से करि अर वायु तै नमस्कार करि यथशक्ति बुललु।  वायु शरीर रूपी यंत्र तै धारण  करण  वळ  च।   तन्त्र शब्द से  शरीस्थ धातुओं का अपण अपण  नियम छन उन्सै अभिप्राय च।  यंत्र कु  अभिप्राय च जैका  द्वारा शरीरस्थ धातुओं  एक स्थान से दुसर स्थान जाणो  आदि व्यापार हूंद।  अर्थात तंत्र  (नियम ) अर  यंत्र दुयुं तै  धारण करण  वळ  च।
  वायु प्राणादि पांच रूप वळ च।   सम्पूर्ण उच्च या नीच विविध प्रकारों का प्रवर्त्तक च , मन का नियामक अर लिजाण वळ च , यी वायु सब संपूर्ण इन्द्रियों विषयोंम प्रेरणा करद।
  संपूर्ण शब्द आदि इन्द्रियों क विषयों क वहन करण  वळ बि  वायु ही च।  शरीरस्थ धातुओं तै यथानियम अपण अपण स्थलों पर स्थापित करदो।  शरीर जुड़न  वळ  बि वायु ही च , वाणी तै प्रवृत्त करण वळ स्पर्श अर शब्द की प्रकृति (कारण ) श्रीत्रिन्द्रिय अर स्पर्श इन्द्रिय कु  मूल कारण वायु इ च। 
             यु वायु हर्ष अर उत्साह की योनि  है (अभिव्यक्ति ) का कारण च। अग्नि क प्रेरक शरीरस्थ  दोषों शोषण करण वळ।  मन तै भैर गडण वळ , स्थूल अर सूक्ष्म स्रोतों को भेदन करण वळ ,शरीरोतपति क समय गर्भ की आकृतियों तै बणान वळ  बि वायु च।  यु वायु आयुक अनु वर्त्तन -परिपालन का कारणभूत हूंद। सि सबि कर्म शांत वायु का बुले गेन। शरीर म कुपित हुईं वायु त शरीर तै नाना प्रकार का रोगुं से पीड़ित करद , जां से वलवर्णादि क्षीण हूंदन ,मन तै दुखी करदन ,सम्पूर्ण इन्द्रियों तै नष्ट करदन ,गर्भ नाश करद , या जथगा देर तक गर्भाशय म रौण  चयेंद वैसे  अधिक देर तक गर्भाशय म ठैर जांद। भय , शोक , मोह , दीनता ,अतिप्रलाप , तै उतपन्न करद।  अर मृत्युक बि  कारण हूंद।  प्रकृतिस्थ वायु क लोक म संचरण   करण से  यि   कर्म हूंदन जन कि पृथ्वी धारण करण , अग्नि तै जळाण , सूर्य चंद्र , नक्छत्र ,अर  ग्रहों तै बरोबर नियमपूर्वक गतिम रखण , बादलों तै बणान ,पाणी छुड़ण ,स्रोतों तै बगाण ,फल -फूलों तै उतपन्न करण ,वृक्षादि तैं  भूमि से भैर गडण/ अंकुरण  ,ऋत्युं क बंट्याण /ऋतुओं तै बंटण ,स्वर्णादि धातुउं आकार अर परिमाण व्यक्त करण ,बीजों म अंकुरण सक्यात  पैदा करण , शस्यादि तै बढ़ान , वै तै लड़न अर सुखण नि दीण ,अन्य ज्वी बि प्रकृति कार्य छन ऊं  तै करण ,जब या वायु प्रकुपित ह्वे संसारम संचरण करद ये से यी कर्म हूंदन - समुद्र तै उत्पीड़ित करण , तलाब जलाशय म जल उच्चो करण (तट तुड़ण ), नदियों। गदनों विपरीत दिशाम बगण , भूकंप कराण , बादलों गरजण ,पाख-पख्यड़  तुड़न , डाळों  तै उखड़न ,नीहार , गर्जन , धूळी , बळु , माछ , मिंडक ,गुरा , छार /रंगुड़ ,ल्वै ,छुट  छुट पत्थर ,अर अगास बिटेन  बजर गिराण ,छै रितियुं बिणास करण , अन्न पैदा नि हूण दीण , प्राण्युं  तै मरण , उतपन्न तै नाश करण ,चारो युगुं  संघार करण  वळ बादल , सूर्य ,अग्नि अर  वायु की सृष्टि करण  आदि हूंदन। 
     वो भगवान वायु  उतपति का कारण छन , अविनाशी छन ,प्राणियों उत्पादक अर  नाशक छन।  सुख -दुःख दीण वळ , मृत्यु ,यम , नियंता,प्रजापति ,आदिति ,विश्वकर्मों ,विश्वरूप ,व्यापक ,सब नियमों ,कर्मों ,अर शरीर  बणाण  वळ , सब्युं  विधाता , सूक्ष्म , व्यापक, विष्णु ,पृथ्वीआदिलकों , का आक्रमण करण  वळ  भगवान वायु च।  ८।     
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   १५०  बिटेन  १५३   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charaka  Samhita, First-Ever Garhwali Translation of Charaka  Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charaka Samhita   

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Shukraniti Defining Purana


Planning Strategies for CEOs of Educational institutions and Social organization, -25 
Policies for CEOs of organizations related to Skill development – 25
Planning/Strategies to be known by political leaders, administrators, statesmen for administrating the country
Immutable Strategic Formulas for Chief Executive Officer
(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)
(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)           
Successful Strategies for successful Chief executive Officer – 336
Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 336   
s= आधी अ         

By Bhishma Kukreti (Management Acharya)
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सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च II 30 II
वंशानुचरितं यस्मिन पुराण तद्धि कीर्तितम I
Purana is that in which there is descriptions of  account of creation, destruction, the dynasties , the epochs or cycles, incidents and the events of each dynasty, 

(Shukraneeti, Chapter 7 Vidya VA Kala Nirupa30-31)
References:
1-Shukra Niti, Manoj Pocket Books Delhi, page –217   
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2021

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मोरध्वज किला व तब बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर में आजीविका साधन

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास २१

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death - 21

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -   298                 
                           
  हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -२९८                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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 मोरध्वज  किला वा आस पास के उत्खलन से उस समय क्र भाभर (बिजनौर  , हरिद्वार व सहरानपुर ) के इतिहास पर कई तरह का प्रकाश पड़ता है।   बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर में   उस समय विशेषतः हर्ष व पर्वताकार समय आजीविका का मुख्य साधन कृषि  व वन उत्पाद संबंधी कार्य था।  कृषि तब भी वर्षा पर निर्भर थी।  भाभर , नजीबाबाद , मोरध्वज व आसपास के उखलन में तालबों के मिले अवशेषों से अनुमान लगता है कि  तब वर्षा कम होती थी और वर्षा जल संग्रहण (पीने , घरलू उपयोग , पशुओं के पीने व सिंचाई हेतु ) हेतु तालाब खोदे जाते थे।  तलबाब तट पर यक्ष मूर्तियों से पता चलता है कि  वर्षा हेतु मनौती मानी जाती थी व बलि चढ़ाई जाती थी (१ ) । 
एशिया लगता है व्यापर भी आजीविका माध्यम था।  सोने की मुद्रा प्रचलित थीं।  लोगों  की आवश्यकताएं कम थीं। 
संदर्भ
१- शिव प्रसाद  डबराल  ‘चारण’ , १९६९ , उत्तराखंड का इतहास भाग -४ पृष्ठ ४२२ , वीर गाथा पर्सेस दुगड्डा , उत्तराखंड , भारत
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Copyright @ Bhishma  Kukreti
मोरध्वज किला व तब बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर में आजीविका साधन , हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का प्राचीन इतिहास  आगे खंडों में   .. ,

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 आयुर्वेदीय मंडुआ'क्वादो  चूनो (आटो ) काच  गहथों  भर्यां  रुटळ (नाश्ता )

 Recipe of  Ayurvedic  Stuffed Paratha  of Finger  Millet with Horse Gram
उत्तराखंड के   आयुर्वेदीय  पारपम्परिक भोजन व्यंजन विधि /पाक विधि/ पाक कला  श्रृंखला
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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  आयुर्वेदीय मंडुआ चुनो (आटो ) काच  गहथों  भर्यां  रुटळ (नाश्ता )  पकाणो  सामान (ingredients )
चून- ६००  ग्राम , १०० ग्राम ग्यूं आटु 
 भिगयां गहथ /गैथ /कुल्थी - ३०० ग्राम ,  तै पीसो ,  रात  भर  भिगाण
ब्रेक कट्यूं  प्याज -  १/२ कटोरी
एक चौथाई कटोरी  कट्यां  धणिया  पत्ता
ल्यासण  - एक गांठि
२ चमच आदो कुर्स्यूं
कटीं  मर्च -  एक चमच
एक चमच धणिया चूरा
 स्वाद  कुण गरम मसाला चयेणु  च  - एक चमच
अमचूर - १ चमच
जवाण - १ चमच
हींग अर लूण  स्वाद हिसाब से
आठ  दस घंटो म भिगायुं गहथ तै ल्यासण , हरो धणिया ,  हौरि  मर्चक,  आदो, हींग, लूण   दगड़  म्वाटो पीसो  या इनि  मसाला मिलाओ अर  मस्यट बणाइ  द्यावो। मस्यटम जवाण, कटयूं प्याज   व हरो धणिया छिड़क द्यावो।
चयेणु  च तो गरम मसाला , अमचूर मस्यट म मिलाई द्यावो।
  चून  अर  ग्यूं  आटु  ओलो . फिर लोई बणैक  मसाला वळ मस्यट  भरो अर बलिक रूटी बणएक गरम तवा म धारो अर  द्वी  तरफ पकाओ।
  चुल  च तो क्वीला म पकावो।
  इच्छा च तो घी , तेल या नौणी म बि पकाई सक्यांद। 
 गैथौ भर्यां  रुटि घी ,  चटणी , । 
सर्दियों म अधिक खाये जांद अर  गर्मियों कम ही खाये जांद।  पहाड़ों म दही दगड़ नि खाये जांद। 
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पुरण  समय कम ही मसाला प्रयोग हूंद  छा ल्यासण , मर्च लूण , हींग बस।
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इनि  उसयीं  दाळो  मस्यट (राजमा , सूंट , रयांस , तोर आदि ) भोरी बि भर्यां  रोटी पकाये जांद।
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   रेसिपी म मौलिक कुछ नी  च।  सैकड़ों साल से खयाणु  च। 

Copyright @ Bhishma  Kukreti 
उत्तरखंड की   आयुर्वेदीय पारम्परिक भोजन  पका कला , recipe for Ayurvedic  Traditional Cuisine of   Uttrakhand  , गढ़वाल की आयुर्वेदीय  पारम्परिक पाक कला, कुमाऊं की  आयुर्वेदीय पारम्परिक भोजन  पाक कला निरंतर

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मलारी (चमोली ) में भवन संख्या ७ - ९ तक तीन भवनों में काष्ठ  कला उत्कीर्णन

  Traditional  House Wood Carving Art  in Houses  of  Malari  , Chamoli   
 गढ़वाल,कुमाऊंकी भवन (तिबारी, निमदारी,जंगलादार मकान, बाखली,खोली) में पारम्परिक गढ़वाली शैली की  काष्ठ कला अलंकरण, उत्कीर्णन  अंकन, - 475
(अलंकरण व कला पर केंद्रित) 
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती     
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   धौळी  गंगा घाटी के मलारी गाँव की मिनि  तिब्बत  भी कहते हैं।  गाँव में शीतकाल में अति ह्यूं /हिम गिरता है और मलारी निवासी निम्न तल की और बसने आ जाते हैं।  चार महीने मलारी जन शून्य रहता है।  यही कारण है कि  मलारी में तल मंजिल में भंडार या गौशालएं हिन् हिअ क्योंकि जब ह्यूं  पिघलता होगा तो आंगन जल  से भर  जाता होगा।  मलारी एक तिबत -गढ़वाल का महत्वपूर्ण व्यापारिक कनेद्र भी रहा है तो यहां भवन एक दुसरे से सटे  हैं।  शीट से बचने हेतु देवदारु के दीवारों वाले भवन आज भी प्रचलित हैं। 
 आज हेमंत डिमरी के संग्रह में संग्रहित मलारी के तीन जंगलेदार  भवनों की काष्ठ कला  पर चर्चा होगी।  सभी भवन तीन मंजिल से अधिक मंजिल वाले हैं।  तीनों भवनों में जंगलों  (बालकोनी के बाहर स्तम्भ वाला संरचना ) में सत्मव्ह हैं व  दो घरों  के (हरे व नीले ) उप जंगलोंमें XX  आकर के लघु स्तम्भ संरचना भी है। 
तीनों घर प्राचीन हैं व सभी घरों के स्तम्भों व दरवाजों ,  खिड़कियों के दरवाजों , स्तम्भों या बालकोनी ढकने के लकड़ी के तख्तों में सपाट ज्यामितीय कटान  की कला ही दृष्टिगोचर होती है।  सारे स्थलों की कड़ियाँ भी सपाट हैं। 
निष्कर्ष निकलता है कि मलारी के भवन ७ , ८ , ९ में ज्यामितीय कटान की कला ही दृष्टिगोचर हुयी है।  भवन की शैलियां प्राचीन हैं जैसे उत्तरी पश्चिम उत्तरकाशी (नेलंग, बागोरी  ) में मिलते हैं या जौनसार में मिलते हैं।  भवन आधारिक कला से समृद्ध हैं।  जिनमे अलंकरण व अंकन नहीं मिलते हैं जैसे कि   चमोली दक्षिण क्षेत्रों के भवनों में मिलते हैं। 
सूचना व फोटो आभार: हेमंत डिमरी संग्रह   
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत:  वस्तु स्थिति में  अंतर   हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली , मोरी , खोली,  कोटि बनाल  ) काष्ठ  कला अंकन ,   श्रंखला जारी   
   House Wood Carving Ornamentation from  Chamoli, Chamoli Garhwal, Uttarakhand ;   House Wood Carving Ornamentation/ Art  from  Joshimath , Chamoli Garhwal, Uttarakhand;  House Wood Carving Ornamentation from  Gairsain Chamoli Garhwal, Uttarakhand ;     House Wood Carving Ornamentation from  Karnaprayag Chamoli garhwal , Uttarakhand ;   House Wood Carving Ornamentation from  Pokhari  Chamoli garhwal , Uttarakhand ;   कर्णप्रयाग में  भवन काष्ठ कला,   ;  गपेश्वर में  भवन काष्ठ कला,  ;  नीति,   घाटी में भवन काष्ठ  कला,    ; जोशीमठ में भवन काष्ठ कला,   , पोखरी -गैरसैण  में भवन काष्ठ कला,   श्रृंखला जारी  रहेगी

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