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आज आम चटणि
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सरोज शर्मा सहारनपुर बटिक

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1 केजी कच्चा आम कु गूदा (गूदा 1 केजी )
घीसिक
लूण 4- 5 चम्मच
चिन्नी 500 ग्राम
कलौंजी 2-3 चम्मच
लाल मर्च स्वादानुसार
सौंफ 2 चम्मच
सूखयां मेवा काजू किशमिश खरबूज का बीज
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विधि
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आमक गूदा मा लूण डालिक धैर दयाव ( धूप मा राखो त ज्यादा बड़िया) एक दिन तक
अगल दिन वै क रस निचोड़िक अलग धैर दयाव
कड़ै मा रस मा चिन्नी डालिक पकाव चिन्नी गल जाव त आमकु गूदा भि डाल दयाव, वै मा कलौंजी लाल मर्च सौंफ डालिक पकाव जब गाढ़ु हूण लग काजू किशमिश खरबूज क बीज भि डाल दयाव, इतगा पकाव कि जमण नि पाव
बस ह्वै ग्या तैयार ठंड हुण क बाद जार मा धैर ल्याव साल भर तक खराब नि हूंद।

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गडेरीक साग (कुमाउनी)   
अरबी की तरीदार सब्जी /साग
घुइयाँ की तरीदार साग

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छ मैशने लिजि
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सौमान
1 किलो गडेरी
1 ठुल गांठ लासन
20 ग्राम भांग
थोड़ अज्वैणक दाण (जख्या, मेथी ,ऐच्छिक)
द्वि डाड़ सरसों तेल
हल्द,धणि, लाल, हरीं खुश्याण, लूंण सवाद अनुसार।
तरिक
गडेरी कें छिल भेर गरम पाणि में साफ कर भेर काट लियो। लुआ भदै में सरसों तेल खित्या। अज्वैणक डाल भेर गडेरी डाल दियो। भली के भुनो। सबे मश्याल पिस भेर गडेरी दगड़ी कौल लियो। अब वीमें गरम पाणि जतु ज़रूरत छू उतु डाल भेर ढाक लगा दियो। गडेरी जब पाक जनि तो वीमे भांग पिस भेर, छान भेर थोड़ ग्यूं पिश्यूँ दगड़ी मिस भेर खितो( ग्यूं पिश्यूँ न खितला तो फाट जान्छ कई बार) थोड़ देर जाणे भली के पकावो। जब तलक बकव न है जवो। भात दगड़ी भलोभल सवाद हुन्छ।
नोट- गडेरी तासीर गरम हुन्छ। भौते सवाद हुनी। सितम्बर बेटि मार्च जाणे यो साग खनी।
सुमीता प्रवीण
मुंबई

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आलू  गुटका रेसिपी
आलू सूखी सब्जी रेसिपी
गढ़वाली आलू सब्जी बनाने का तरीका

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अनिता ढौंडियाल कोटद्वार
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चार माबतूं
सामान
आधा किलो अल्लू,
एक छ्वटु चम्मच भांगा दाणा,
आधा चम्मच जीरू,
आधा चम्मच राई,
एक चम्मच धनिया पाउडर,
आधा चम्मच लाल मर्च,
आधा चम्मच हल्दी पाउडर,
 आधा चम्मच गरम मसलू,लो
ण अन्दाजन,
आदा चम्मच अमचूर पाउडर,
एक बड़ू चम्मच तेल

बणाणू सगोर/रेसिपी /पाक विधि
सबसे पैली अल्लू उजैकि छील द्या अर हाथन म्वाटू म्वाटू मीन द्या
गैस मा कड़ै चड़ैकि तेल गरम करा
अब पैली जीरु डाला फिर राइ अर भंगुला दाणा
सब्या मसलु मिलैकि क्वारु ही डाला कम झौल मा
बीस सेकेंड भूनिकि अल्लू डाला लोण डालिकि अच्छी तरह मिलावा
ल्या ह्वेगी तैयार गरम पूरी परौंठौं दगड़ी खावा

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मूली का परोंठा।
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प्रदीप का रसवाड़ा बिटिन- देहरादून।
मन्खी- ३।
समै- १/२ घन्टा।
 सामग्री- ताजी मूली ५००ग्राम,
कसूरी मेथी५ग्राम,
अजवाइन५ ग्राम,
आटु ५००ग्राम,
१/२ चम्मच पाव भाजी मसालू,
१ चम्मच अमचूर पौडर,
२ चम्मच हरू धणियां बरीक कट्यूं,
४ हरी मर्च बरीक कटीं,
१ टुकड़ा कदुकस कर्यूं आदू
,१ प्याज
लोण ११/२ चम्मच।
विधी- मूली साफ वै तैं कोर ल्या साथ मा प्याज भी कोर द्या परात पर आटा दगड़ी सब सामग्री मिलै क गूंदा पाणी जरूरत पड़न पर ही डाल्यान अच्छ सा गूंदणा का बाद मध्यम आकार की गोली बणै द्या रोटी की तरह गोल बणा अब तवा गरम करा घी लगै द्या अब रोटी डाला तेल घी जु भी लगा परोठां बणा, दै, चटणी या मक्खन दगड़ी गरम गरम परोसा
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नाटकुंम बनि  बनि गीत संगीत की परिभाषा  भाग - २
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  पंचों ५ वों  ( पूर्व रंग विधान)  , पद /गद्य भाग  २७  बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  १४४ 
s = आधा अ
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
-गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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चारी  -महाचारी - श्रृंगार रसौ  भाऊँ  तै गति द्वारा प्रदर्शन करण चारी अर रौद्र रसौ  प्रदर्शन महाचारी बुले जांदन। २७।
त्रिगत - तीन पात्रों संभाषण जख सूत्रधार , पारपार्श्विक व विदक्षकौ  प्रलाप हो वो त्रिगत बुले जांद।  २८।
प्ररोचना -जु  सूत्रधार या नाट्यविशेषज्ञ द्वारा रूपक कार्य हेतु युक्ति की सयाता लेकि सिद्धसिदृश कथन  करे जाय त ' प्ररोचना' बुले जांद।  २९।
बहिर्गीत उतपति अर  कारण -
जब नारद मुनि आदि वाद्य विशारदों अर गंधर्वों द्वारा चित्र अर दक्षिण मार्ग से युक्त सप्तरुप सम्वनित उपोहन कार अर निर्गीत का साथ दिबतौं स्तुतियों से प्रशस्त स्वरूप वळ अर लय अर तालक उचित मेल से युक्त उस निर्गीत (धुन ) तै दिबतौं  अर दानवों  सभा म सुणाये गे। ३१ -३२।
तब ये सुखदायी अर   देबों स्तुति अर  अभिनन्दन से युक्त गीत सूणी सभी दैत्य व रागसगण  नाराज ह्वे गेन। ३३।
तब दैत्य गण  परस्पर विचार करदा  बुलिन -हम यूं  निर्गीत से सम्वनित  छा अर प्रसन्न छंवां अर ये तैं  इ ग्रहण करला। जु सप्तरूपों से युक्त गीत छन अर यूं देवगणों क कर्मों अनुवादक छन -ऊंसे देवगण खुश रावन अर ऊं  तैं  सुणदा  रावन। हम ये निर्गीत तै ली लींदा अर येसे संतुष्ट छंवां। ये तरां  से दैत्यों न निर्गीत  तैं  अपणायी अर विकि साधना व प्रयोग करण लग गेन।  ३४ -३६ । 
तब देवगण  रुसे गेन तब  पुनः  नारद जी से बुलण  लगिन - हे मुनि ! यी दानव केवल निर्गीत से संतुष्ट छन अर दुसर वस्तु नि  चांदन। इलै हम ये निर्गीत तै नष्ट करण  चाणा छा।  आपक क्या राय च ? ३६-३७।

 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - १६१ - १६४ 
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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स्वेद दीणो भिन्न भिन्न तरीका

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौदवां , स्वेद अध्याय    )   पद  २०  बिटेन  २८ - तक
  अनुवाद भाग - १०९ 
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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स्वेद योग्य व्यक्ति -
जुकाम , खांसी हिचकी , दमा ,सरैलौ  भारीपन ,कंदूड़ो डा /दर्द ,मन्या शूल ,शिरशूल , स्वरभेद,गलगंड ,मुखाक लकवा ,एकांगी  वात्त ,सर्वांग वात्त ,पक्षाघात रोग,बिनामक म ,अफ़रा , मल्ल मूत्र अवरोध म ,वीर्य अवरोध , बिंडी जमै आण , पार्श्वशूल ,पृष्टवेदना,कटिशूल ,कुक्षिशूल ,गृघ्रसी  रोग ,मूत्रकृच्छ , अंडकोष वृद्धि ,सरा सरैलम डा /वेदना ,खुटम डा /ऐंठन (खुट खाण ) ,हाथ खुट खाण /वेदना , घुंड अर जंगड़ों म डा ,हाथ पाँव क ऐंठन ,आम रोग ,शीतावस्था, कंपकंपी ,वातकंटक ,गुल्फाश्रित,वात रोग , शरीर तै संकुचित करण वळ  वात  रोग ,आयाम , अंतरायाम वात रोग ,शूलवेदना , जड़ता , भारीपन , स्पर्श आभाव ,शून्यता , ज्वरादि ,वात श्लेमा आदि स्तिथि म स्वेद याने पसीना दिलाण  हितकारी च।  २०-२४।
तिल , उड़द ,कुल्थी , चांगेरी ,घी , तेल ,ओदन पक्यां चौंळ ,खीर , तिल अर मांस खिचड़ी ,यूं पदार्थों ढिन्डी  बणैक ,पिंड -स्वेदक प्रयोग करण  चयेंद।
रुक्ष  स्वेद का द्रव - गाय गोबर , गधा मोळ ,ऊंट , सुंगरौ मोळ ,घ्वाड़ा लीद ,छिलका वळ  जौ ,बबारीक रेत ,इंटक चूरा ,यूंक पोटलीबणऐक  कफ रोगी तै स्वेद दीण  चयेंद। अर उड़द आदि से वात रोग्युं  तै स्वेद दीण  चयेंद।  पिंड स्वेद तै शंकर स्वेद बुल्दन। यि तिल  आदि पदार्थ प्रस्तर स्वेद म बी  प्रशस्त छन। 
नाड़ी स्वेद - जमीन खोदि  बणायूं  घर ,कृत्रिम विधि से गरम कर्युं  घर ,बिन खिड़की घर ,यूं माँ लकड़ी  जळैक , धुंवा रहित आग से घर गरम करे  जावन। शरीर स्नेहन का बाद मनिख स्वेद ले सकद।  २५-२८

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १७५   बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली   

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कद्दू /खिरबुज /Pumpkin  क बनि बनि पकवान
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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 कद्दू क बनि बनि सब्जी या पकवान पकाये जांदन। 
कुछ भारतीय व कुछ विदेशी भोजन /पकवान इन छन -

कद्दू की पत्तियों से हरी सब्जी व कपिल बि पकद। 
कद्दू पत्तों व फूलों से पकोड़ी /भजिया बि पकद.
कद्दू पत्तों क मिश्रित सब्जी बि बणद.
 भारत म कद्दू निम्न पकवान पकाए जान्दन-
 कद्दू फल  की भुज्जी
उस्यायुं कद्दू  तै सत्तू  दगड़  खाण।
 कद्दू रेलु /खट्टी सब्जी
पाँव दगड़ कद्दू भाजी
कद्दू कहती मिठी  भुज्जी
कद्दू क भरता
कद्दू खीर
कद्दू हलवा
कद्दू दगड़  अन्य सब्जी मिलैक भुज्जी /साग
कद्दू म सांबार  म प्रयोग /उपयोग
कद्दू लसूणी  सब्जी
कद्दू सूप
कद्दू छिलकों भजिया /भुजिया
कद्दू रसम
कद्दू क रायता
कद्दू मिठाई चौकलेट
कद्दू नाइयल दगड़  सूप
कद्दू बर्फी
कद्दू टिकिया
कद्दू का थाई शैली सूप


 

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 तोलगांव  (रुद्रप्रयाग ) के  एक भवन में पारम्परिक गढवाली शैली की काष्ठ कला अलंकरण

Traditional House wood Carving Art of Tolganv, Rudraprayag         : 
गढ़वाल, कुमाऊँ के भवन (तिबारी, निमदारी, बाखली,जंगलेदार  मकान, खोलियों ) में पारम्परिक गढवाली शैली की काष्ठ कला अलंकरण उत्कीर्णन  अंकन,- 488   
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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तोलगांव  का प्रस्तुत भवन पहले मंजिल में जंगलादार है व  रुद्रपयाग संस्कृति अनुसार खोली भी महत्वपूर्ण है। 
तोलगांव  का प्रस्तुत भवन दुपुर व दुखंड है।  तोलगांव  का प्रस्तुत भवन की छत टिन  है अर्थात नया ही होगा। 
तोलगांव  का प्रस्तुत भवन में तल मंजिल में खोली है जिसके  दोनों ओर  तीन तीन उप सिंगाड़ों /स्तम्भों से मुख्य सिंगाड़ निर्मित है।  उप स्तम्भ /सिंगाडों  पर जालीदार प्राकृतिक सजावट हुयी है।  उप सिंगाड़  ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड /शीर्ष में जाकर मुरिन्ड के स्तर  निर्माण करते।  हैं मुरिन्ड में चतुर्भुज गणपति विराजमान हैं।
मुरिन्ड के दोनों ओर  दीवालगीर  हैं जिनमे हाथी मुख  स्थापित हैं।  हाथीमुख के नीची कलात्मक आधार हैं। '
 तोलगांव  का प्रस्तुत भवन के पहले मंजिल में  ज्यामितीय कटान के दस स्तम्भों से युक्त जंगला (बाल्कोनीदार )  बंधा है।   आधार पर लघु जंगला  लौह का है।  आधार व मुरिन्ड /मथिण्ड की कड़ियाँ भी सपाट हैं। 
 निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि  तोलगांव  का प्रस्तुत भवन में ज्यामितीय , प्राकृतिक व मानवीय अलंकरण के कला स्थापित है। 
सूचना व फोटो आभार:  भगवती नैनवाल
  * यह आलेख भवन कला संबंधी है न कि मिल्कियत संबंधी, भौगोलिक स्तिथि संबंधी।  भौगोलिक व मिलकियत की सूचना श्रुति से मिली है अत: अंतर  के लिए सूचना दाता व  संकलन  कर्ता उत्तरदायी नही हैं . 
  Copyright @ Bhishma Kukreti, 2021   
    रुद्रप्रयाग , गढवाल   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों, बाखलीयों   ,खोली, कोटि बनाल )   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण ,
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya ; Traditional House wood Carving Art of  Rudraprayag  Tehsil, Rudraprayag    Garhwal   Traditional House wood Carving Art of  Ukhimath Rudraprayag.   Garhwal;  Traditional House wood Carving Art of  Jakholi, Rudraprayag  , Garhwal, नक्काशी, जखोली , रुद्रप्रयाग में भवन काष्ठ कला,   ; उखीमठ , रुद्रप्रयाग  में भवन काष्ठ कला अंकन,  उत्कीर्णन  , खिड़कियों में नक्काशी , रुद्रप्रयाग में दरवाज़ों में उत्कीर्णन  , रुद्रप्रयाग में द्वारों में  उत्कीर्णन  श्रृंखला आगे निरंतर चलती रहेंगी

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Uttarakhand पहाड़ों म बरसात अर  हेमंत की  भुज्जी सब्जियां
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Monsoon Vegtables of Uttarakhand , Garhwal, Kumaun , Haridwar
संकलन - भीष्म कुकरेती
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मूळा
मूळा पत्ता
पैथर  मूळा  फूळड़
पिंडालु
पिंडाळु  पत्ता
सूंटुं  फुळड़
लुब्याफुळड़
खीरा /कद्दू
खीरा /कद्दू  पत्ता
मर्सू
 ओगळ
लमिंडा /चचिंडा
गुदड़ी /तोरई
करेला
मिठ  करेला
कंकोड़ा / जंगली परबल जन टेंडुली  /कुंदरू
भट्टा
भिंडी
काची मुंगरी से बनि बनि साग या कपिलु
टिंडा
बाद म शलगम
टमाटर
स्क्वैश
तुमड़ी /लौकी
लौकी पत्ता
च्यूं /मशरूम
बेडु /तिमल
पपीता

बाद म राई /पळिंगु/ बेथु 



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नाटक म बनि  बनि गीत संगीत की परिभाषा  भाग - १
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  पंचों ५ वों  ( पूर्व रंग विधान)  , पद /गद्य भाग  १९  बिटेन  २६  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १४३
s = आधा अ
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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परिघट्टना  वीणा आदि तंतुवाद्यों वादन हेतु आस्फालन परिघट्टना  बुले जांद।  १९।
सङ्घोटना - हथों  से वाद्यों पर प्रहार कौरि फिर से ठीक करण पर सुणन तै सङ्घोटना  बुल्दन। २०।
मार्गसारित - वीणा अर भांड (अवनद्ध ) वाद्यों क मिश्रित ध्वनि प्रयोग कुण  मारगसारित  बुल्दन , २०।
आसारित - कला या मात्रा विभाग हेतु हूण  वळि वाद्यवादन क्रिया तै आसारित बुल्दन।  २१।
गीतविधि - दिबतों कीर्ति विस्तार /बड़ैं म प्रस्तुत गाणा  तैं  गीतविधि बुल्दन।  २१।
या विधि  नांदी पाठकों द्वारा सर्व प्रथम  रंगमंच पर काज शुरू करवांद इलै यिन विधि तै उत्थापना बुल्दन।  २२।
परिवर्तन - पूर्व आदि दिशाओं अधिपति लोकपालों की चरी तरफ घूमी वंदना करण 'परिवर्तन 'बुले जांद।  २३।
नांदी - चूंकि येमा  देव , द्विज अर  भूपालों की आशीर्वचन समन्वित स्तुति करे जांद  त ये तै नांदी संज्ञा दिए गे।  २४।
नांदी पाठ का अवसर पर वैक पादों म मध्य म चित्रपूर्वरंग ह्वावो त 'वर्धमानक ' क प्रयोग करण  चयेंद जांक लक्छण बताये गे छ।  कुछ आचार्य क प्रयोग पश्चात शुद्ध -चित्रपूर्वरंग  म 'वर्धमानक'प्रयोग  पक्ष म छन
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शुस्कावकृष्टाध्रुवा -
जब अवकृष्टा ध्रुवा अर्थहीन ध्वनि म संयोजन करे जांद त  ये तैं  शुष्कावकृष्टा ध्रुवा ' बुले जांद। यो  जर्जर  श्लोक  को अवसर पर प्रयोग हूंद। २५।
रंगद्वार - किलैकि सबसे पैल वाचिक व आंगिक अभिनय की शुरुवार यखी  बिटेन हूंद तो शब्द व शरीर क अभिनय से संयुक्त ये अंग तै रंगद्वार 'बुले जांद।  २६। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  १५७-  १६१। 
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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