Author Topic: Devbhoomi - उत्तराखंड देवीभूमि, तपो भूमि के स्थान जहाँ की ऋषि मुनियों ने तपस्या  (Read 13647 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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वशिष्ठ गुफा-

ऋषिकेश से 22 किमी. की दूरी पर 3000 साल पुरानी वशिष्ठ गुफा बद्रीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर स्थित है। इस स्थान पर बहुत से साधुओं विश्राम और ध्यान लगाए देखे जा सकते हैं। कहा जाता है यह स्थान भगवान राम और बहुत से राजाओं के पुरोहित वशिष्ठ का निवास स्थल था। वशिष्ठ गुफा में साधुओं को ध्यानमग्न मुद्रा में देखा जा सकता है। गुफा के भीतर एक शिवलिंग भी स्थापित है।


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रानीबाग

काठगोदाम से तीन किलोमीटर नैनीताल की ओर बढ़ने पर रानीबाग नामक अत्यन्त रमणीय स्थल है। कहते हैं यहाँ पर मार्कण्डेय ॠषि ने तपस्या की थी।रानीबाग के समीप ही पुष्पभद्रा और गगार्ंचल नामक दो छोटी नदियों का संगम होता है। इस संगम के बाद ही यह नदी 'गौला' के नाम से जानी जाती है। गौला नदी के दाहिने तट पर चित्रेश्वर महादेव का मन्दिर है। यहाँ पर मकर संक्रान्ति के दिन बहुत बड़ा मेला का आयोजन होता है।


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जहां बाली ने की थी तपस्‍या

जहां बाली ने की थी तपस्‍याशिव की भूमि उत्तराखंड में हर तरफ देखने को मिलता है भक्ति का रंग, आस्था की उमंग, लेकिन जब बात होती है चंपावत जिले की तो यहां भक्ति संग मिलती है शक्ति की अनूठी सौगात. 

http://aajtak.intoday.in/index.php?option=com_magazine&opt=section&videoid=14786&sectionid=1&secid=2&Itemid=1

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गोविन्द तीर्थ में भगवान श्रीकृष्ण ने बालक के रूप में तपस्या की थी।
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सिमली (चमोली)। गोविन्द तीर्थ में भगवान श्रीकृष्ण ने बालक के रूप में तपस्या की थी। पिण्डर नदी के तट पर सिमली में स्थित इस तीर्थ का विशेष महत्व है। केदारखंड के अनुसार गोविन्द तीर्थ की स्थापना द्वापर युग में हुई थी। मंदिर के अन्दर गर्भगृह में जो मूर्ति है उसमें भगवान गोविन्द चतुर्भुज रूप में विराजमान हैं।

जनपद चमोली के कर्णप्रयाग-ग्वालदम मोटरमार्ग पर स्थित सिमली में यह तीर्थ है। पौराणिक कथानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने बालक रूप में यहां तपस्या की थी। इसी के बाद इसका नाम गोविन्द तीर्थ पड़ा। यहां भगवान श्रीकृष्ण की पाषाण मूर्ति के साथ कई मूर्तियां है। मंदिर परिसर में मां विरेसानी भगवती की स्थापना भी गोविन्द तीर्थ के साथ हुयी थी। मां विरेसानी देवी तीन शक्तियों के रूप में प्रकट हुई है। यह सिद्धपीठ उन शक्तिपीठों में से नहीं है जो मां आदि शक्ति पार्वती के देह के टुकड़ों से बने थे। यह अपने आप में अति प्राचीन और अद्वितीय है। मां चण्डिका मंदिर के पूर्व पुजारी हरि प्रसाद गैरोला ने बताया मां चंडिका की मूर्ति फरशे के रूप में पूजी जाती है। यह मूर्ति सातवीं सदी की है जो काष्ठ की प्रतिमा है। मां चंडिका प्राचीन काल में कैत्यूर वंशजों की कुल देवी थी। मां चंडिका ने यह रूप तब धारण किया जब रक्त बीज के अत्याचार से देवलोक में हाहाकार मचा और रक्त बीज पर प्रहार करते असंख्य रक्त बीजों की उत्पत्ति होने लगी तब देवी ने रक्त बीज के वध करने के लिए यह रूप धारण किया। मंदिर समिति के अध्यक्ष नत्थी सिंह नेगी व वर्तमान पुजारी प्रदीप गैरोला ने बताया कि सन 1994 के बाद देवी यात्रा का आयोजन इस वर्ष किया जा रहा है। श्री नेगी ने बताया कि सोमवार को मूर्ति अपने मूल स्थान गर्भ गृह से बाहर आयेगी।

Source : http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5728032.html

Devbhoomi,Uttarakhand

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गोपेश्वर के ऊपर एक बड़े गांव मंडल से अनुसूया माता मंदिर के 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा आरंभ होती है।

पैदल-पथ बालकाल्या नदी के किनारे-किनारे जाता है तथा यह जंगलों तथा चबूतरानुमा धान के खेतों से गुजरता है। इस मंदिर पर संतान विहीन माता-पिता संतान का वर पाने आते हैं।

एक घने वन के बीच एक पर्वत के नीचे यह मंदिर स्थित है। भूरे पत्थरों के टुकड़ों से निर्मित इस मंदिर का शिखर नागर शैली में निर्मित है, जबकि मंदिर के आगे का भाग हाल ही में पुनर्निर्मित हुआ है। आप मंदिर समिति की अतिथिशाला में ठहर सकते है, जहां आपको बिस्तर एवं भोजन प्राप्त होगा।

एक किंवदंती के अनुसार नारद मुनि के उकसाने पर ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की पत्नियों ने उन्हें अत्री मुनि की पत्नी अनुसूया की परख करने को कहा, जिन्हें सर्वोत्तम धार्मिक स्त्री माना जाता था। इसका प्रमाण मिल गया और तीनों पत्नी देवियों को अनुसूया का दर्शन करने आना पड़ा।

यहां से 2 किलोमीटर दूर वह गुफा है, जहां अत्री मुनि तप करते थे। यह गुफा एक झरने के पीछे है, जिसके इर्द-गिर्द आप घूम सकते हैं।
 

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TAPOVAN
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भगवान शिव एवं उनकी पत्नी पार्वती को समर्पित इन जलाशयों के निकट एक गौरी शंकर मंदिर है। माना जाता है कि भगवान शिव को पतिरूप में पाने के लिये इसी जगह पार्वती ने 6,0000 वर्षों तक तप किया था। उनके संकल्प की परीक्षा लेने भगवान शिव ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया। उसने पार्वती को बताया कि उसका तप निरर्थक है, क्योंकि भगवान शिव 88,000 वर्षों से तप कर रहे हैं और वह उतना तप नहीं कर सकती। उसने यह भी बताया कि भगवान इन्द्र या विष्णु की तरह देने को भगवान शिव के पास कुछ भी नहीं है। पार्वती ने परेशानी एवं क्रोध में तत्काल चले जाने को कहा। तब भगवान शिव असली रूप में आये और पार्वती से कहा कि उसकी तपस्या सफल हुई है और वह उनसे विवाह करेंगे। इसीलिये यह कहा जाता है कि जो कोई भी किसी इच्छा से इस मंदिर में पूजा करेंगे तो पार्वती की तरह उसकी इच्छा भी पूरी होगी।


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केदार खंड में मुख्यमठ की तीर्थयात्रा को महत्वपूर्ण माना गया है। इससे सटा है मार्कण्डेयपुरी जहां मार्कण्डेय मुनि के तप किया तथा उन्हें भगवान विष्णु द्वारा सृष्टि के विनाश का दर्शन कराया गया। किंबदन्ती अनुसार इसी प्रकार से मातंग ऋषि ने वर्षों तक बिना कुछ खाये-पीये यहां तप किया।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नारद मुनि यहां पहुंचे और संगम पर स्थित एक शिला पर सौ वर्ष तक भगवान शिव की तपस्या की।
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रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड के सांस्कृतिक व धार्मिक जीवन में पंच प्रयागों का विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक है रुद्रप्रयाग। अलकनंदा व मंदाकिनी नदियों का संगम होने के कारण तो यह पवित्र माना ही जाता है, नारद मुनि की तपस्थली होने से अध्यात्म के क्षेत्र में भी इसका विशेष स्थान है। मान्यता है कि द्वापरयुग में रुद्रप्रयाग में ही नारद मुनि ने भगवान महादेव की तपस्या की थी, जिसके बाद शिव ने उन्हें यहां दर्शन दिया और संगीत का ज्ञान भी दिया।



रुद्रप्रयाग से नारद मुनि के जुड़े होने से इसकी पवित्रता और बढ़ जाती है। धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि द्वापरयुग में नारद मुनि संगीत का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विष्णु भगवान के पास गए, लेकिन उन्होंने नारद को भगवान शिव की तपस्या करने को कहा। इसके लिए भगवान ने नारद को अलकनंदा व मंदाकिनी के संगम, यानी रुद्रप्रयाग जाने को कहा। इसके बाद नारद मुनि यहां पहुंचे और संगम पर स्थित एक शिला पर सौ वर्ष तक भगवान शिव की तपस्या की। तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा संगीत के ज्ञान का आशीर्वाद दिया। जिस शिला पर नारदमुनि ने तपस्या की थी, वह आज भी संगम पर स्थित है। प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में भक्त इस शिला के दर्शन करने आते हैं। संगम के प्रति स्थानीय लोगों में भी बड़ी आस्था है। प्रतिदिन शाम को यहां विशेष आरती का आयोजन किया जाता है, जिसमें स्थानीय लोगों समेत देशी-विदेशी पर्यटक भी भाग लेते हैं। इसके अलावा यहां चामुंडा देवी व रुद्रनाथ भगवान का मंदिर भी दर्शनीय है। बताया जाता है कि रुद्रनाथ मंदिर यहां द्वापरयुग से स्थित है। इस मंदिर के नाम पर ही रुद्रप्रयाग का नाम भी पड़ा है। रुद्रनाथ मंदिर के महंत धर्मानंद का कहना है कि रुद्रप्रयाग का पूरा क्षेत्र शिवभूमि माना जाता है। मंदिर में स्थित स्वयंभू लिंग के अलावा क्षेत्र में करोड़ों शिवलिंग स्थापित हैं।


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PANDUKESHWAR, GOPESHWAR GARWAL
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पांडुकेश्वर गांव हिन्दुओं के चार धामों में से एक श्री बदरीनाथ और जोशीमठ के बीच में स्थित है। मान्यता है कि हस्तिनापुर की गद्दी राजा परीक्षित को सौंपने के बाद पांडवों ने यहां तपस्या की थी, लिहाजा इस गांव का नाम पांडुकेश्वर रख दिया गया।

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चन्द्रबाणी मंदिर मह्रिषी गौतम का निवास

देहरादून-दिल्ली मार्ग पर देहरादून से 7 कि.मी. दूर यह मंदिर चन्द्रबाणी (गौतम कुंड) के लिए प्रसिद्ध है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस स्थान पर महर्षि गौतम अपनी पत्नी और पुत्री अंजनी के साथ निवास करते थे. इस कारण मंदिर में इनकी पूजा की जाती है।

 ऐसा कहा जाता है कि स्वर्ग-पुत्री गंगा इसी स्थान पर अवतरित हुई, जो अब गौतम कुंड के नाम से प्रसिद्ध है। प्रत्येक वर्ष श्रद्धालु इस पवित्र कुंड में डुबकी लगाते हैं। मुख्य सड़क से 2 कि.मी. दूर, शिवालिक पहाड़ियों के मध्य में यह एक सुंदर पर्यटन स्थल है।



 

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