Author Topic: Famous Shiv Temples In Uttarakhand - उत्तराखंड मे महादेव के प्रसिद्ध मन्दिर  (Read 83977 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Pinakeshwa

Pinakeshwar, at an altitude of 9050 feet, is about 20 km from Kausani. A temple dedicated to Lord Shiva is the main attraction here. Pinakeshwar also provides a panoramic view of the valleys around.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Sir,

Thanx a lot for letting us to know more about Unteshwar Mahadev. Though, our state is known for another word "Dev bhoomi". A place which is abode of God and Goddess. Step to step, there is a temple of God & Goddess. 
         

Kanra (Lamgara) - My ancestral Home is famous for Unteshwar Mahadev Temple.

Whensoever extraction of natural resources of Mother Earth reaches its peak, the difficulties of the people living in the earth have increased. This is the cycle since times immemorial. Unteshwar Mahadev Shiv Temple came into being when the mother Earth was excessively exploited.  As per the ancient stories, the Gods and the demons had been trying to extract maximum Riddhi (Prosperity) and Siddhi (Perfection) from the Earth and a time reached when they extracted the Riddhi and Siddhi to the unbearable extent.

The Earth was exploited to such an extent that Mother Earth went to Lord Brahma for help, who asked her to accompany him to Lord Vishnu and Lord Shiva. The Earth told them about her problems. The three Gods tried to look to the problems of mother Earth. At that place a voice from the sky (akashvani) said that when the head of Brahmdev would fall on the Brahma Kapali, exactly at that time, Lord Mahadv would give His Darshan.  Simultaneously Shivlings would also appear at different places and then only there would be solace to the mother Earth. As per popular belief when Lord Shiv appeared in Jhankar Hill, many Shivlings appeared at different places on the Earth. Unteshwar Mahadev is one of those Shivlings.  This Shivling has appeared as the Tongue of Lord Shiva or as Shiv Jiwha.

 There is a story about Kanra’s Shivling. During the period of Chand Kings, there were Ringal bushes spread over the outskirts of the entire village. The villagers used to prepare things of daily use from the Ringal plant.  Once a villagers tried to sharpen his sickle on a stone. Suddenly there was a spate of blood which came out from the Stone. The villager ran away crying from their, but on the way he was killed by a Lion.  Latter on people decided to establish the Shivling ceremoniously and they started worshipping the Shivling shaped stone. The Ling is seven feet above the surface, and the rest of the length is inside the land. Once the villagers tried to dig the place by the side of the Ling to find out its length, but they could not succeed. Near the Shiv Temple the idol of Panch Muykhi (Five faced) Ganesh is also there. Snakes are normally visible in the vicinity of the temple. Chand Kings constructed the Shiv Mandir and some temples of Sun and Durga.Thus Unteshwar Mahadev Temple is the oldest Temple of the area.

As per villagers, in 1990, there was a great famine and there was no rain fall for a long time. The villagers offered hundreds of Pitcher (earthern pot) water on the Shivling, the water submerged inside the Shiv Jiwha. In fact when so ever the water is offered on the Shiv ling, the water sinks inside the Shiv Jiwha, as it goes inside the tongue of Shivling and from there where actually the water goes is a mystery as on date. Due to the offering of water on the Shiv Ling, the Gods were pleased and there were incessant rains which fulfilled the needs of the people.

A popular fare is held every year on the Shiv Ratri, which has large participation of the people form the adjoining villages and far off places. Special Roat is offered to Lord Shiv and is distributed as Prasad to the devotees.

 Kanra is connected by road. It is 40 Km. from Almora. To reach Kanra, my ancestral Home from Almora one has to go to Lamgara then to Chaykhan, from where there is a pucca road, named Chaykhan –Thuwasimal road. From Chaykhan you can go by Car or Bus. The distance of Kanra is about 2 and a half Kms. from Chaykhan, after which one has to go half a Km. on foot and you reach the Untreshwar Mahadev Temple. Kanra is famous for its Basmati Rice and Jhunghra. Please do not forget to bring some Basmati from there. (By:D.N.Barola)


हेम पन्त

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रामनगर-रानीखेत मार्ग पर रानीखेत से १६ किमी की दूरी पर सौनी-देवलीखेत के निकट वनों में कुन्ज नदी के तट पर स्थित बिनसर महादेव भगवान शिव का बहुत प्राचीन मन्दिर है... इस मन्दिर की महिमा इस षटपदी में लिखी गयी है..

बिनसर विपिनं रम्यं कुन्ज नद्यास्तटे स्थितम I
स्फुट लिंग शिवोहयत्र भूतेशं भूत सेवितम II
वृषभो वाहनम यस्य दारुकारण्य वासिनम I
भूषणम वासुकिकण्ठे बिनसरं तं नमाम्यहम II
मोहन सिद्धपीठम च यज्ञेशं चेतनं सदा I
भव्यं विश्वेश्वरं नित्यं बिनसरं तं नमाम्यहम II
मदनं यज्ञपुरुषं च मोहकम भाव सेवितम I
पुरातनं विश्वेश्वरं नित्यं बिनसरं तं नमाम्यहम II
विद्याधीशं विपिन गहनं कुन्ज नद्यास्तटे स्थितम I
स्फुट लिंग स्वयं सिद्धं सिद्धपीठं च शाश्वतम II
कुन्ज तीरेष्चले नित्यं बसन्तं चन्द्रशेखरम I
भूत बेताल संसेव्यं श्मशानेशं शिवं भजे II


MR. M.S. NEGI

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Taleshwar Mahadev, Uttrakhand-Almora-Deghat-taleshwar, Taleshwar Mahadev Ji ka mandir Deghat se kuchh Kilometer Hight Per hai, Shiv ratri ki night ko yaha bahut bada mela lagta hai,

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Thanks Negi ji for the information.

Taleshwar Mahadev, Uttrakhand-Almora-Deghat-taleshwar, Taleshwar Mahadev Ji ka mandir Deghat se kuchh Kilometer Hight Per hai, Shiv ratri ki night ko yaha bahut bada mela lagta hai,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देहरादून स्थित टपकेश्वर महादेव


पंकज सिंह महर

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देव भूमि के नाम से प्रख्यात उत्तराखण्ड के बारे में प्रचलित है कि यहां देवता, किन्नर, यक्ष गन्धर्व तथा ऋषि मुनियों का सदा से ही वास रहा है। विश्व प्रसिद्ध तीर्थ हरिद्वार, उत्तराखण्ड के चार धाम श्री बदरीनाथ, श्री केदार नाथ गंगोत्री तथा यमुनोत्री यहीं इसी पावन धरती में स्थित हैं। अपने जीवन के अन्तिम पडाव के रूप में पांडवों ने भी इसी तपोभूमि को निर्वाण हेतु चुना। महारथी कर्ण की तपोस्थली कर्णप्रयाग आज भी अपने इतिहास को जीवंत किए हुए है। अनेकानेक शक्ति पीठ तथा देवालय भी इसी इलाके में विराजमान हैं। इसी इलाके में एक है भगवान भोलेनाथ का ताडक़ेश्वर मंदिर।


प्रकृति की गोद में महादेव धाम

श्री ताड़केश्वर महादेव मंदिर धाम भी अपने विराट स्वरूप तथा धार्मिक महत्व के कारण काफी लोकप्रिय है। यह जनपद पौडी गढवाल के रिखणीखाल विकासखण्ड से लगभग पच्चीस किलोमीटर बांज तथा बुरांश की जंगलों के बीच चखुलियाखांद से लगभग सात किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित है। गढवाल राइफल के मुख्यालय लैन्सडौन से लगभग पचास किलोमीटर दूर तथा गढ़वाल के द्वार कोटद्वार से लगभग पैंसठ किलोमीटर दूर स्थित यह धार्मिक स्थल दशकों से हजारों लोगों की आस्था का केन्द्र रहा है।

अद्भुत सौंदर्य


ताड़केश्वर महादेव ताड़ के विशाल वृक्षों के बीच में स्थित एक ऐसा प्राचीन तथा पौराणिक मंदिर है जहां आने मात्र से ही मन को सुकून और राहत मिलती है। यहां पर प्रकृति ने ऐसा वातावरण तथा दृश्यावली रची हुई है कि ऐसा इस जगह के अतिरिक्त और कहीं देखने को नही मिलता है। यहां विशाल ताड क़े वृक्ष तथा हर मौसम में लबालब भरे जलकुण्ड देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है।

जहां विश्राम करते हैं भोलेनाथ

कहते हैं यहां भगवान भोलेनाथ रात्रि में विश्राम करने आते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार दिनभर कैलाश में तपस्या करने के बाद जब भगवान शिव ताडक़ेश्वर में रात्रि विश्राम करने आते हैं तो रात्रि में यहां कंपन होता है जिससे पता चलता है कि भगवान भोलेनाथ आ चुके हैं। पुराने लोगों का कहना है कि पहले किसी-किसी भाग्यशाली व्यक्ति को मनुष्य जो रात्रि में यहां ठहरे होते थे उन्हें यहां भगवान भोलेनाथ के आने का आभास हो जाता था। आज भी कई सिद्धपुरूष इस बात का आभास लगा लेते हैं। कहते हैं कि ताड़कासुर का वध करने के बाद भगवान शिव ने यहां विश्राम किया था जब माता पार्वती ने देखा कि भगवान शिव को सूर्य की गर्मी लग रही है तो माता पार्वती ने स्वयं देवदार के वृक्षोें का रूप धरा और भगवान शिव को छाया प्रदान की। भगवान शिव मंदिर के प्रांगण में आज भी वे सात ताड क़े पेड़ विराजमान हैं। रामायण में भी ताडक़ेश्वर का वर्णन एक पवित्र तीर्थ के रूप में मिलता है।

मन्नत पूर्ति पर घंटी चढाने की मान्यता

बाबा ताडकेश्वर के पास लोग यहां अपनी मुरादें लेकर आते हैं और भोलेनाथ अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब किसी की मनोकामना पूरी होती है तो वे यहां मंदिर में घंटी चढाते हैं। यहां मंदिर में चढाई गई हजारों घंटियां इस बात का प्रमाण हैं कि यहां बाबा की शरण में आने वाले मनीषियों का कल्याण होता है। जब आप चखुलियाखांद से मंदिर की ओर चलते हैं तो आपको जरा भी आभास नहीं होता कि आप ताडक़ेश्वर महादेव पहुंचकर ऐसे भव्य शक्ति स्थल के दर्शन करेंगे जो आपकी थकान तथा परेशानियों को पल में ही भुला देगा। यहां भगवान कैलाशपति महादेव की साक्षात उपस्थिति का भान होता है। ताडक़ेश्वर पहुंचकर पता चलता है कि सम्पूर्ण गढवाल में ऐसा भव्य शक्ति स्थल शायद ही कहीं होगा। यहां आकाश को चूमते विशाल देवदार के वृक्षों को देखकर ऐसा लगता है मानो वे आकाश से बातें कर रहे हों। सामने छोटी-छोटी पहाड़ियां और बांज तथा बुरांश के घने जंगल इसकी शोभा को चार-चांद लगाते हैं। यहां अनेक प्रकार की जडी बूटियां तथा वनस्पतियां हैं जो कि ताड़केश्वर महादेव की सीमा से बाहर आने के बाद कहीं नहीं दिखाई देती हैं।

पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता है कि ताड़केश्वर महादेव के शिवलिंग में जो दूध चढाया जाता था वह यहां से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर झाल नामक स्थान पर एक जलकुण्ड से निकलता था। इस कुण्ड को लोग शिवलोक का प्रवेशद्वार भी मानते हैं। इस विषय में एक रोचक कथा भी प्रचलित है। कहते हैं कि पास के ही एक गांव की एक लडक़ी इस कुण्ड में अपनी छाया देख रही थी और अचानक वह इस कुण्ड में आ गिरी और शिवलोक पहुंच गई। वहां पहुंचकर कन्या ने शिव से विवाह कर लिया उसका नाम पार्वती था। एक बार जब पार्वती अपने मायके गईं तो उन्होंने शिव के बारे में किसी को नहीं बताया। जब वहां से वापस आईं तो उनके मायके वालों ने उसके साथ कलेवा और राशन आदि जो बेटी को मायके से विदा करते समय मिलता था, उसे लेकर गांव के आदमियों को भेजा। पार्वती उनके साथ उस जलकुण्ड तक पहुंची, देखते ही देखते अचानक पार्वती वहां से गायब हो गईं। तब लोगों को शिव की महिमा का भान हुआ तब से इस कुण्ड की पूजा होने लगी।

भगवान का दूसरा नाम

ताडक़ेश्वर महादेव को बोलांदा माने बोलने वाला भगवान भी कहा जाता है। कहते हैं कि पहले समय में बाबा ताडक़ेश्वर महादेव क्षेत्रीय जनता को बार-त्यौहार तथा विपदा आदि की पूर्व में सूचना किसी न किसी माध्यम से या अपनी वाणी से दे दिया करते थे। एक किंवदंति के अनुसार एक बार असवाल जाति के कुल देवता और भगवान ताड़केश्वर महादेव के बीच किसी बात को लेकर तकरार हो गई। भगवान ताड़केश्वर महादेव उसका पीछा कर रहे थे कि अचानक रास्ते में एक शाल का पत्ता पड़ा हुआ था जिस पर सरसों का तेल लगा था उस पर पैर पड़ते ही ताड़केश्वर महादेव फिसल गए और वे गिर पडे। तब उन्होंने ताडना लगाई कि मेरे स्थान पर आज के बाद कोई असवाल जाति का मनुष्य, सरसों का तेल तथा शाल का पत्ता वर्जित है। तब से आज तक न तो यहां सरसों के तेल को सिर आदि पर लगाकर कोई आता है न कोई असवाल जाति का मनुष्य जाता है और न यहां शाल का पत्ता लाया जाता है।
स्थानीय निवासियों के यहां जब उनकी गाय या भैंस का बच्चा होता है तो उसके दूध को ग्याहरवें दिन शुद्ध कर पहले यहां लाया जाता है और मंदिर में चढाने के बाद ही लोग गाय-भैंस के दूध का प्रयोग करते हैं। भगवान भोलेनाथ यहां आए हुए प्रत्येक उस व्यक्ति की मनोकामना पूरी करते हैं जो वास्तव में सच्चे मन और ध्यान से आता है। शिवरात्रि के अवसर पर यहां भीड देखने लायक होती है। वर्ष के बारहों महीने यहां लोगों का आना जाना लगा रहता है।

ठहरने का प्रबंध

पहले यहां ठहरने के लिए उचित व्यवस्था नहीं थी, यहां रहने वाले साधु बाबा लोग यात्रियों को ठहराते थे लेकिन भीड होने पर यहां ठहरना मुश्किल हो जाता था लेकिन अब यहां तीन चार बड़ी धर्मशालाएं हैं और यहां लोग आराम से ठहरते हैं। पास में ही चखुलियाखांद स्थान है तथा रिखणीखाल विकासखण्ड भी पास में ही है। यहां यों तो साल के बारह महीने जाया जा सकता है लेकिन सावन में तथा शिवरात्रि में यहां आकर ध्यान पूजा करने का विशेष लाभ मिलता है। तपस्वी लोग यहां आकर शिव का ध्यान करते हैं तथा इस तपोभूमि में तप करके अपने जीवन को धन्य बनाते हैं। कहते हैं कि यहां तप व ध्यान करने से आदमी को उच्च पद प्राप्त होता है और उसके सारे पाप धुल जाते हैं। यहां गर्मियों में भी वर्षा होने पर काफी ठंडा मौसम हो जाता है। यहां सर्दियों में नवंबर से जनवरी तक कभी-कभी बर्फ पडती है। 

पंकज सिंह महर

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गढ़वाल के केदारखंड में केदारनाथ जी के मदिंर के अतिरिक्त चार केदार और हैं। मदमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर। यही है पंचकेदार की परिकल्पना। सभी अद्भुत, सभी दुरूह लेकिन सभी मोहक, कल्याणकारी। पंचकेदारों में द्वितीय हैं मदमहेश्वर। जनपद रुद्रप्रयाग की ऊखीमठ तहसील के गोंडार गांव के ऊपर।



रुद्रप्रयाग से अगस्त्य मुनि होते हुए कुंड तक का मार्ग तो केदारनाथ जी का ही रास्ता है। कुंड से मंदाकिनी के पुल को पार न करके दाहिने हाथ जो रास्ता ऊपर जाता है, वह ओंकारेश्वर महादेव, ऊखीमठ तक पहुंचता है। यहीं है केदारनाथ और मदमहेश्वर की शीतकालीन पूजास्थली। ऊखीमठ से लगभग नौ किलोमीटर पर है मनसूना, जहां तक बसें और टैक्सियां जाती हैं। इसके आगे का रास्ता नदी पार करके पैदल का ही है। लगभग पांच किलोमीटर की उतराई और फिर थोड़ी चढ़ाई के बाद आता है गांव राउलेक। वैसे राउलेक तक एक और रास्ता गुप्तकाशी कालीमठ होकर भी जाता है।
राउलेक में विश्राम केबाद अगला पड़ाव आता है रॉसी गांव, जहां का राकेश्वरी देवी का मदिंर बहुत प्रसिद्ध है। यह सिद्ध पीठ है। कत्पूरी शैली में ही बना यह प्राचीन मदिंर चंद्रमा की तपस्थली रहा है जहां मां पार्वती ने प्रसन्न होकर उसे कुष्ठ रोग से मुक्ति दिलाई थी, जो राकेश्वरी देवी कहलाई। कहते हैं इस क्षेत्र में किसी को कुष्ठ नहीं होता। यहां अखंड धूनी जलती रहती है। यहां के पुजारी जानकीप्रसाद भट्ट ने बताया कि धूनी जलते रहने की जिम्मेदारी रॉसी परिवारों की है और पिछले कई सौ वर्षों से लगातार जल रही है। प्रतिवर्ष, जिसमें भक्त नंगे पांव चलकर ऊपर बर्फीली चोटियों से ब्रह्म कमल लाते हैं।
यह मेला कई दिन चलता है जिसमें रात-रात भर जागर गाए जाते हैं। इन जागरोंं में पांडवों की कथाएं नाचकर और गाकर कही जाती हैं। एक नर्तक शिवराजसिंह पंवार ने बताया कि जुए में हारने पर पांडवों को 12 वर्ष का बनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भुगतना पड़ा था। वह अवधि पांडवों ने अधिकतर इन्हीं पर्वतमालाओं पर बिताई थी और तब अनेक मदिंरों का निर्माण किया था। अज्ञातवास का समय राजा विराट के महल में छिपकर छद्मवेश में बिताया था। विराट का किला अभी भी जॉनसार बावर केकालसी क्षेत्र में खंडहरों के रूप में स्थित है। यही जनश्रुतियां जागर के रूप में पूरे गढ़वाल, जॉनसार बावर और कुमाऊं मंडलों में फैल गई।
रॉसी से गुंडार गांव तक का पांच किलोमीटर लंबा रास्ता सुरम्य वनों, पर्वतीय जल-धाराओं और छोटे-छोटे पहाड़ी गांवों के बीच से जाता है, किंतु ग्यूडांर से आगे की दस किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई आपके धैर्य और साहस की परीक्षा ले लेगी। आप भाग्यशाली होंगे अगर आपको घोड़े मिल जाएं, क्योकिं इतने यात्री यहां आते ही नहीं हैं कि नियमित घोड़े, खच्चर उपलब्ध हों।
3300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बाबा मदमहेश्वर के धाम पहुंचते-पहुंचते शाम ढल जाती है। यात्रियों की थकावट दूर होती है केदार मदिंर समिति की धर्मशाला में।
कहा जाता है कि पांडव जब स्वर्गारोहण के पथ पर थे, केदार क्षेत्र में भगवान शिव, जो कि उनसे इसलिए अप्रसन्न थे कि उन्होंने महाभारत युद्ध में अपने गुरुजनों का वध किया था, पांडवों को आते देख वे भैंसे का रूप धरकर भागे। किंतु भीम ने उन्हें पहचान लिया तो भगवान शंकर का पार्श्व केदारनाथ में रह गया तथा मध्य भाग मदमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर में होता हुआ सिर काठमांडू नेपाल में पशुपतिनाथ के रूप में निकला। वैसे मदमहेश्वर या ममहेश्वर का अर्थ म के देव विषपायी नीलकंठ भी माना जा सकता है।
मदमहेश्वर मदिंर से ही एक पथ गया है बूढ़े मदमहेश्वर मदिंर की ओर, जो वहां से लगभग एक-दो किलोमीटर की चढ़ाई पर है। यहां से हिमालय की हिम धवल पर्वत चोटियों का बेहद मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता है।
यपि पंचकेदारों में मदमहेश्वर कुछ अधिक ही कठिन यात्रा करवाते हैं, लेकिन देशी-विदेशी श्रद्धालुओं की कमी नहीं है, जो बड़ी ही श्रद्धा से मनसूना या कालीमठ से 26-27 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं।

पंकज सिंह महर

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उत्तरांचल के गढ़वाल मंडल में हिंदुओं के प्रसिद्ध तीर्थ गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के पांच-पांच स्वरूप और भी हैं जो पंच केदार और पंच बद्री के रूप में पहाड़ों पर अवस्थित हैं। पंच केदारों की परिकल्पना महाभारत युग की है। जब भगवान शंकर गुरु-हंता कुल-हंता पांडवों से रुष्ट होकर भैंसे का रूप रखकर भागे तब भीम ने उन्हें पहचानकर उनका पृष्ठ भाग पकड़ लिया।
वही पृष्ठ भाग केदारनाथ जी में आज पूजित हो रहा है लेकिन मध्य भाग मदमहेश्वर, कंधे एवं बाहुभाग तुंगनाथ, चेहरा रुद्रनाथ और जटाएं कल्पेश्वर तक चली गईं और कालांतर में वहां भी मंदिर बने और आराधना प्रारंभ हुई। ये सभी स्थल दुरुह चढ़ाइयों वाले पर्वतों की चोटियों पर स्थित हैं और वहां पहुंचना असंभव तो नहीं किंतु दुष्कर अवश्य है। रुद्रनाथ जी का मंदिर जनपद चमोली में 2280 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। चमोली जनपद के मुख्यालय, गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मंदिर भगवान शिव के मुखार बिंदु रुद्रनाथ जी की शीतकालीन पूजा स्थली है जहां नवंबर में मुख्य मंदिर के पट बंद होने पर रुद्रनाथ जी की उत्सव मूर्ति गाजे बाजे के साथ लाई जाती है एवं मई में पट खुलने पर पुनः ऊपर मुख्य मंदिर ले जाई जाती है। इस बीच पूरा पर्वत शिखर बर्फ से ढक जाता है। गोपीनाथ मंदिर के पुजारी बताते हैं कि गोपीनाथ मंदिर भगवान शिव के मुख की शीतकालीन पूजा स्थली होने के कारण उतनी ही महत्ता रखता है जितनी रुद्रनाथ महादेव का मंदिर। गोपेश्वर मंदिर परिसर में कभी 360 मंदिर हुआ करते थे, जिनके भग्नावशेष अभी भी इधर-उधर मिल जाते हैं। अनेक शिवलिंग तथा छत्र मंदिर के परिक्रमा मार्ग में रखे हुए हैं।
इस मंदिर को भगवान रुद्रनाथ जी की मूल गद्‌दी बताते हुए गोपीनाथ मंदिर के पुजारी श्री भट्‌ट ने बताया कि यहां अवस्थित शिवलिंग भगवान शिव की ही मुखाकृति है। शिवरात्रि और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर पिंड को मुकुट धारण कराया जाता है और वैष्णव प्रथा के ही अनुसार पूजा होती है, लिंगायत प्रथा के अनुसार नहीं। यहां के पुजारी शैव नहीं हैं, स्नात हैं जो सनातन धर्म के मानने वाले हैं। इसलिए शिव के साथ विष्णु, राम, कृष्ण सबको मानते हैं।
गोपेश्वर से चार किमी. गोपेश्वर चोपता मार्ग पर है ग्राम सगर जहां से रुद्रनाथ का 18 किमी. का पैदल पथ प्रारंभ होता है। पहले कुछ ऊंचे-नीचे पर्वतीय खेत फिर जंगल और झरनों के बीच से होते हुए सीधी खड़ी चढ़ाई।
खर्क से खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद 10000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है पनार गांव। इस गांव से चढ़ाई काफी आसान और सुखद हो जाती है। रंगबिरंगे फूलों के बीच है गुफानुमा मंदिर जहां शिला पर भगवान की मूर्ति बनी है।
बद्रीनाथ जी की मूर्ति स्वयंभू बताई जाती है। ऐसा ही है भगवान शंकर का मुखार बिंदु जो शिला पर स्पष्ट उभार लिए हुए है। चाहे यह स्वयंभू हो या किसी के द्वारा बनाई गई लेकिन मूर्ति में एक-एक अंग स्पष्ट है। मूर्ति की दाईं ओर माथे के ऊपर एक छेद तक साफ दिखता है जिसके बारे में कहा जाता है कि जब दक्ष के यज्ञ में सती की आत्माहूति के बारे में शिवजी ने सुना तो क्रोध से अपनी जटा से ही एक बाल उखाड़कर वीरभद्र का आह्वान किया, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ को विध्वंस किया था।

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Sidhi Vinayakeshwar Mahadev Temple

There is a Sidhi Vinayakeshwar Mahadev temple in Village Jarti of District Bageshwar. There is Shivling which depth is known. Once a Baba Ji named Sita Ram came there and asked the villagers to dig out and find the depth of the Shiv Ling. Villagers tried their best but they did not find its end.

A big temple has been, thereafter, constructed. This temple is between the Jarti, Junayal, Randev and other villages. A lot of devoties throngs their during Shiv Ratri and other occassions.

Baba Sita Ram organized more 16 Shiv Bhagwat etc in that temple.


 

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