Tourism in Uttarakhand > Religious Places Of Uttarakhand - देव भूमि उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध देव मन्दिर एवं धार्मिक कहानियां

Famous Temples Of Bhagwati Mata - उत्तराखंड मे देवी भगवती के प्रसिद्ध मन्दिर

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
Sureswari Devi Temple

Situated in the peaceful forest area of Rajaji National Park, Sureswari Devi Temple is a temple dedicated to Goddess Durga. It is believed that Sureswar (Lord Indra) meditated here and experienced the live presence of the goddess. Pilgrims visit this temple in large numbers and offer prayer with Indian Gooseberry (amla). This ritual is being practiced even today.

Sureswari Devi Temple is situated on Surkut hill, 2 km inside the Ranipur forest check post. The temple is 10 km from Haridwar, which is connected to all major parts of the country by well-maintained roads.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
Chandi Devi Temple

Chandi Devi Temple, built in the year 1929, is located about 6 km from Haridwar in Uttaranchal. It is placed on the top of a hill called the Neel Parvat, which is on the banks of Ganges River.

Built by Suchat Singh (the King of Kashmir), this beautiful temple is dedicated to Chandi Devi. The real image of the Goddess is said to have been established by Adi Shankaracharya in the 8th century AD.

Chandi Ghat is about 3 km from the temple. Legend says that Chanda Munda (the army chief of the local demon king, Shumbha Nishumbha) was killed by the Goddess Chandi. Thus the place got the name 'Chandi'.

Maya Devi Temple, Mansa Devi Temple and Bhimgoda Kund are located in the vicinity.

Haridwar Junction Railway Station is the nearest railhead. There are services from the Haridwar Bus Station to Chandi Devi Temple.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
आदि शक्ति के रूप में पूजी जाती हैं ईश्वरी भगवती माता

बागेश्वर। पनौरा गांव स्थित ईश्वरी भगवती माता की पूजा आदि शक्ति के रूप में की जाती है। यहां माता बैल पर सवार हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु मंदिर में सच्चे मन से पूजा करता है मैया उसकी सभी मनोकामनाओं को पूरी कर देती हैं। चैत्र और आश्विन महीने के नवरात्र पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

कपकोट तहसील मुख्यालय से करीब दो किमी की दूर सरयू के किनारे बसे पनौरा गांव में ईश्वरी भगवती माता का भव्य मंदिर है। सिलकानी गांव के ज्योतिषाचार्य पंडित जनार्दन जोशी ने कहा कि मंदिर की स्थापना आदिकाल में हुई। माता यहां आदि शक्ति के रूप में स्थापित हैं। वह बैल में विराजी हैं। बासुकि नाग को माता का सेवक माना जाता है। उन्होंने कहा कि ईश्वरी भगवती आदि शक्ति के विभिन्न रूपों में से एक हैं। उन्हें दुर्गा शप्तसती, देवी भागवत के मंत्र अत्यंत प्रिय हैं। मंदिर के पुजारी आंणू जोशी परिवार है। प्रधान पुजारी रमेश चंद्र जोशी ने बताया कि मंदिर में जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से पूजा करता है माता उसकी सभी मनोेकामनाओं को पूरी कर देती हैं। श्रद्धालु मैय्या को श्रृंगार सामग्री और फल, बताशे आदि अर्पित करते हैं। माता के साथ ही सरस्वती और लक्ष्मी के मंदिर भी हैं। मंदिर के दक्षिण भाग में भैलुवा देव का मंदिर है। गांव के बुर्जुग शिव सिंह कपकोटी ने बताया कि पहले मंदिर बहुत छोटे थे। पांच साल पहले क्षेत्र के लोगों के सहयोग से भव्य मंदिरों का निर्माण हो चुका है।

vipin gaur:
नन्दा देवी राजजात जो कि दुनिया की सबसे लम्बी पैदल यात्रा है। जिसमेँ कि सर्वप्रथम चमोली जनपद के घाट(नन्दप्रयाग से मात्र 18 किमी आगे) मेँ नन्दाकिनी नदी की आँचल मेँ बसेँ "कुरुड़" गाँव से बाजे भुंकारे के साथ नन्दादेवी की नवीँ सदी पूर्व राजराजेश्वरी नन्दा देवी तथा दशौली क्षेत्र की ईष्ट साक्षात नन्दा भगवती की दो स्वर्णमयी डोलियाँ जाती हैँ
इसके पीछे से चौसिँग्योँ को ले जाया जाता है तथा उसके बाद काँसुवा के कुँवर अपनी छँतोली लेकर चलते हैँ ।

नन्दा देवी की डोलियोँ के साथ कन्नौजी गौड़ (कुरुड़ के पुजारी) चलते हैँ।

राजजात की शुरुआत तब होती है जब नन्दा के क्षेत्र मेँ दुर्भिक्ष(अपशगुन) पैदा होता है।
यह अपशगुन चौसिँग्या खाड़ू के रुप मेँ होते हैँ

2013 मेँ नन्दा देवी धाम कुरुड़ के सामने लुन्तरा गाँव मे तथा एक चौसिँग्या खाड़ू कुरुड़ गाँव के ही अनुसूचित जाति के नन्दा देवी के ओजी पुष्कर लाल के यहाँ तथा हाल ही मेँ एक चौसिँग्या कुरुड़ के समीप सुंग गाँव मे भी हुआ है।
सन 2000 मेँ ये चरबंग मेँ पैदा हुआ था
और इस बार 3 चौसिँग्या कुरुड़ क्षेत्र मे पैदा होने के कारण लोगोँ को परम विश्वास हो गया कि कुरुड़ ही नन्दा राजजात का मुख्य थान है।

नन्दा देवी राजजात के मुख्य दो मुख्य रास्ते हैँ
1--प्रथम रास्ता कुरुड़ से  चरबंग,कुण्डबगड़,धरगाँव, फाली उस्तोली सरपाणी लॉखी भेँटी स्यारी,बंगाली बूंगा डुंग्री कैरा-मैना सूनाथराली, राडीबगड़  चेपड़यू कोटि, रात्रि नन्दकेशरी इच्छोली हाट रात्रि फल्दियागाँव काण्डई,लब्बू ,पिलखड़ा ,ल्वाणी ,बगरीगाड रात्रि मुन्दोली लोहाजंग,कार्चबगड़ रात्रि वाण लाटू देवता तथावाण से होमकुण्ड ।
नन्दकेशरी मेँ अद्भुत नजारा रहता है यहाँ पर काँसुवा तथा नौटी की राजछतोली का मिलन कुरुड़ बधाण की नन्दा राजराजेश्वरी से होता है यहीँ से राजजात का प्रारम्भिक बिन्दु शुरु होता है यहाँ पर कुमाउँ की जात भी अपनी छंतोलियोँ के साथ शामिल होती है तथा यहाँ से यात्रा कई पड़ावोँ से  होकर वाण पहुँचती है।

तथा नन्दा देवी राजजात का दूसरा रास्ता
2--नन्दा देवी दशोली की डोली का कुरुड़ से धरगाँव कुमजुग
से कुण्डबगड़, लुणतरा,कांडा मल्ला,खुनाना,लामसोड़ा लाटू मन्दिर माणखी,चोपड़ा कोट.चॉरी  काण्डई
खलतरा,मोठा  चाका,सेमा बैराशकुण्ड
 बैरो,इतमोली,मटई, दाणू मन्दिर
पगना देवी मन्दिर भौदार,चरबंग ल्वाणी
 सुंग,बोटाखला रामणी आला,जोखना, कनोल से वाण लाटू देवता। ये रास्ता नन्दाकिनी के साथ साथ चलता है ।रामणी में  विशाल भव्य मेला लगता है रामणी मेँ आते आते कुरुड़  नन्दा देवी डोली के साथ कुरुड़ कीनन्दामय लाटू, हिण्डोली, दशमद्वार की नन्दामय लाटू, मोठा का लाटू, केदारु पौल्यां, नौना दशोली की नन्दादेवी, नौली का लाटू, बालम्पा देवी, कुमजुग से ज्वाल्पा देवी की डोली, ल्वाणी से लासी का जाख, खैनुरी का जाख, मझौटी की नन्दा, फर्सवाण फाट के जाख, जैसिंग देवता, काण्डई लांखी का रुप दानू, बूरा का द्यौसिंह, जस्यारा, कनखुल, कपीरी, बदरीश पंचायत, बदरीनाथ की छतोली, उमट्टा, डिम्मर, द्यौसिंह, सुतोल, स्यारी, भेंटी की भगवती, बूरा की नन्दा, रामणी का त्यूण, रजकोटी, लाटू, चन्दनिय्यां, पैनखण्डा लाटा की भगवती आदि २०० से अधिक देवी-देवताओं का मिलन होता है।अतः रामणी एक पवित्र स्थल है ।रामणी मेँ जाख देवता का अद्भुत कटार भेद दर्शन भी होता है।यहां से आगे कुरुड़ की नन्दा के पीछे पीछे चलते वाण पहुँचते हैँ जहाँ पर राजजता के दोनो रास्ते मिलकर एक हो जाते हैँ  वाण मेँ स्वर्का का केदारु, मैखुरा की चण्डिका, घाट कनोल होकर तथा रैंस असेड़ सिमली, डुंगरी, सणकोट, नाखाली व जुनेर की छलोलियां चार ताल व चार बुग्यालों को पार करके वाण में राजजात में शामिल होती हैं।।

वाण राजजात का आखिरी गाँव है। यहाँ से आगे वीरान है।
वाण गाँव के बाद गेरोली पातळ में रण की धार नामक जगह पर देवी नंदा ने आखिरी राक्षस को मार गिराया था। लाटू की वीरता से प्रसन्न होकर देवी ने आदेश दिया कि आगे से वो ही यात्रा की अगुवाई करेंगे। रण की धार के बाद यात्री कालीगंगा में स्नान कर तिलपत्र आदि चढाते हैं!
रास्ते मेँ वेदिनी बुग्याल है।
बेदिनी  बुग्याल उत्तराखंड का सबसे बड़ा और सुंदर बुग्याल माना जाता है। यहाँ पर यात्री वैतरणी  कुंड  में स्नान करते हैं। राजकुंवर यहाँ पर अपने पित्तरों की पूजा करते हैं। एक बांस पर धागा बाँधा जाता है। श्रद्धालु धागा थामकर अपनें पित्तरों का तर्पण करते हैं। हर साल यहाँ पर नन्दा धाम कुरुड़ की नन्दा देवी की जात होती है।रास्ते मेँ
पातर  नचौणिया है। कहा जाता है कि यहाँ पर कन्नौज के रजा यशधवल ने पात्तर यानि नाचने-गाने वालियों का नाच गाना देखा। यशधवल के इस कृत्य से नंदा कुपित हो गयी और देवी के श्राप से नाचने-गाने वालियां शिलाओं में परिवर्तित हो गयी!
आगे कैलवा विनायक है।यहाँ से हिमालय का बहुत ही सुंदर दृश्य दिखता है। यहाँ से बेदिनी, आली और भूना बुग्याल देखते ही बनते हैं।
इस जगह  कन्नौज के राजा की गर्भवती रानी वल्लभा ने गर्भ की पीड़ा के समय विश्राम किया था। यहीं पर उसने एक शिशु को जन्म भी दिया था। इस दौरान राजा का लाव-लश्कर रूपकुंड में डेरा डाले रहा। गर्भवती रानी की छूत से कुपित होकर देवी के श्राप से ऐसी हिम की आंधी चली कि राजा के सारे सिपाही और दरबारी मारे गए।चेरिनाग से  रूपकुंड के लिए यात्रा बहुत ही खतरनाक रास्तों से गुजरती है। चट्टानों को काटकर बनायीं गयी बेतरतीब सीढ़ियां यात्रा को और मुश्किल बना देती हैं।रूपकुंड का  निर्माण भगवान् शिव ने नंदा की प्यास बुझाने के लिए किया था। मौसम के अनुसार अपना रूप और आकार बदलने के लिए विख्यात रूपकुंड बहुत ही सुंदर दिखता  है।खतरनाक  उतार-चढ़ाव के कारण ज्युरांगली को मौत की घाटी भी कहा जाता है।ज्युरांगली  के खतरनाक उतार-चढ़ाव के बाद यात्री शिला समुद्र में विश्राम के लिए रुकते हैं।
शिला समुद्र  में रात्रि विश्राम के बाद होमकुंड के लिए प्रस्थान करते हैं। होमकुंड पहुंचकर यात्री पूजा-अर्चना करते हैं। यहाँ पर चौसिँग्या खाड़ू को छोड़ दिया जाता है।
vipin gaur

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
सिद्धिपीठ चन्द्रबदनी


भारत वर्ष समूचे संसार में धार्मिक, आध्यात्मिक एवं साँस्कृतिक दृष्टि से अनन्य स्थान रखता है। निःसृत गंगा, यमुना भारतीय संस्कृति, सभ्यता एवं आधात्म की संवाहिका है। हिमालय क्षेत्र उत्तराखण्ड की भूमि, देव भूमि, देवस्थान, देवस्थल, स्वर्ग भूमि, पार्वती क्रीड़ा स्थल, यक्ष किन्नरों का आवास एवं ऋषिमुनियों की तपस्थली आदि नामों से विख्यात समस्त मानव जाति में पूज्य है। अल्हड़ भागीरथी, अलकनन्दा, भिलंगना, बालगंगा आदि का प्रवाह कल-कल का निनाद करती हुई इस क्षेत्र की विशेषताओं को मैदानों में बिखेरती है। धार्मिक, साँस्कृतिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक एवं पर्यटन की दृष्टि से उत्तराखण्ड का यह क्षेत्र एक अनन्य स्थानों में से एक है। तीर्थ धाम, मठ, मंदिर एवं शक्ति सिद्धपीठों से भरपूर इस क्षेत्र ने विश्व में अपना नाम प्रतिस्थापित किया है। ऐसे ही सि(पीठों में चन्द्रकूट पर्वत पर अवस्थित उत्तराखण्ड का शक्ति सिद्धपीठ है-चन्द्रबदनी।

चन्द्रबदनी मंदिर काफी प्राचीन है। जनश्रुति है कि आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी ने श्रीनगरपुरम् (श्रीनग) जो श्रृंगीऋषि की तपस्थली भी रही है, श्रीयंत्र से प्रभावित होकर अलकनन्दा नदी के दाहिनी ओर उतंग रमणीक चन्द्रकूट पर्वत पर चन्द्रबदनी शक्ति पीठ की स्थापना की थी। मंदिर में चन्द्रबदनी की मूर्ति नहीं है। देवी का यंत्र (श्रीयंत्र) ही पुजारीजन होना बताते हैं। मंदिर गर्भ गृह में एक शिला पर उत्कीर्ण इस यंत्र के ऊपर एक चाँदी का बड़ा छत्र अवस्थित किया गया है।
पद्मपुरण के केदारखण्ड में चन्द्रबदनी का विस्तृत वर्णन मिलता है। मंदिर पुरातात्विक अवशेष से पता चलता है कि यह मंदिर कार्तिकेयपुर, बैराठ के कत्यूरी व श्रीपुर के पँवार राजवंशी शासनकाल से पूर्व स्थापित हो गया होगा। इस मंदिर में किसी भी राजा का हस्तक्षेप होना नहीं पाया जाता है। सोलहवीं सदी में गढ़वाल में कत्यूरी साम्राज्य के पतन के पश्चात् ऊचूगढ़ में चैहानों का साम्राज्य था। उन्हीं के पूर्वज नागवंशी राजा चन्द्र ने चन्द्रबदनी मंदिर की स्थापना की थी। जनश्रुति के आधार पर चाँदपुर गढ़ी के पँवार नरेश अजयपाल ने ऊचूगढ़ के अन्तिम राजा कफू चैहान को परास्त कर गंगा के पश्चिमी पहाड़ पर अधिकार कर लिया था। तभी से चन्द्रकूट पर्वत पर पँवार राजा का अधिपत्य हो गया होगा। 1805 ई0 में गढ़वाल पर गोरखों का शासन हो गया। तब चन्द्रबदनी मंदिर में पूजा एवं व्यवस्था निमित्त बैंसोली, जगठी, चैंरा, साधना, रित्वा, गोठ्यार, खतेली, गुजेठा, पौंसाड़ा, खाखेड़ा, कोटी, कंडास, परकण्डी, कुनडी आदि गाँवों की भूमि मिली थी। केदारखण्ड के अध्याय 141/27 से स्पष्ट होता है यथा-
दृष्ट्वा तां चन्द्रबदनां विश्वानन्दन तत्पराम्।
उत्न पूर्ण घटस्थां च कोटिबालार्कसान्निभाम्।।
पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में दुखी होकर हवन कुण्ड में आत्मदाह कर दिया था। दुखित शिव हवनकुण्ड से माँ सती का कंकाल अपने कंधे पर रखकर कई स्थानों में घूमने लगे। जब शिव कंधे पर माँ सती का कंकाल कई दिन तक लिये रहे तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से शिव के कंधे से माँ सती के कंकाल के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। इस तरह हिमालय प्रदेश में माँ सती के अंग कई स्थानों पर बिखर गये। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे वे पवित्र शक्तिपीठ हो गये। ये शक्तिपीठ मानव जाति के लिए पूज्य हैं। चन्द्रमुखी देवी सती का बदन ही चन्द्रबदनी के रूप में विख्यात है।
चन्द्रबदनी माँ सती का ही रूप है। सती का शव ढोते-ढोते शिवजी स्वयं निर्जीव हो गये थे तथा चन्द्रकूट पर्वत पर आने पर शिव अपने यथार्थ रूप में आ गये। वास्तव में शक्तिस्वरूपा पार्वती के अभाव में शिव निर्जीव हो गये थे। पार्वती ही उन्हें शक्ति व मंगलकारी रूप में प्रतिष्ठित कर जगदीश्वर बनाने में सक्षम हैं। दुर्गा सप्तसती के देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम में उल्लेख है-
चिताभस्मा लेपो गरलमशनं दिक्पटधारी
जटाधारी कण्ठे भुजग पतिहारी पशुपतिः
कपाली भूतेशो भजति जगदीशशैकपदवी
भवानी त्वत्पाणिग्रहण परिपाटीफलमिदम्।
ऋग्वेद में ईश्वर के मातृ रूप को अदिति कहा गया है, जो विश्व का समूल आधार है। ऋग्वेद के अनुसार आदिति स्वर्ग एवं मृत्युलोक के मध्य जो धूलोक है, वहाँ भी विद्यमान है। शक्ति का लौकिक अर्थ बल व सामथ्र्य से ही है। आध्यात्मिक जगत में ब्रहम् परमात्मा व चिति आदि शक्ति के ही नाम है। वेदान्त में अविद्या, माया व प्रकृति भी इसी को कहते हैं।
चन्द्रबदनी मंदिर 8वीं सदी का होना माना जाता है। चूंकि उत्तरी भारत के इतिहास में चैथी सदी से 12वीं सदी तक मंदिरों का युग कहा जाता है। गढ़वाल के केदारनाथ, कालीमठ, आदिबद्री, गोपीनाथ, विश्वनाथ, पलेठी, गोमुख आदि प्राचीन मंदिर एक ही शैली के माने जाते है। चन्द्रबदनी के उपलब्ध पुरातात्विक अवशेषों जिनमें शिव-गौरी की कलात्मक पाषाण मूर्ति से प्रतीत होता है कि चन्द्रबदनी मंदिर भी इन्हीं मंदिरों में से एक है। महा घुमक्कड़ी कवि राहुल सांकृत्यायन ने इन्हें सातवीं, आठवीं सदी का ही बताया है तथा डॉ0 शिव प्रसाद डबराल ने इन मंदिरों को गुप्तकाल का होना बताया है।
सन् 1803 ई0 में गड़वाल मण्डल में भयंकर भूकम्प आया था, जिससे यहाँ के कई मंदिर ध्वस्त हो गये थे। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार 1742-43 में रूहेलों ने धार्मिक स्थलों को तहस-नहस कर दिया था। समय काल एवं परिस्थितियों के चलते इन मंदिरों में आमूलचूल परिवर्तन होते गये और आज स्वामी मन्मथन के अथाह प्रयास के फलस्वरूप माँ चन्द्रबदनी का मंदिर एक भव्य मंदिर के रूप में प्रसिद्धी है। यहाँ पर लोगों द्वारा अठ्वाड़ (पशुबलि) दी जाती थी, किन्तु स्वामी जी व स्थानीय समाजसेवी लोगों द्वारा सन् 1969 ई0 में पशुबलि प्रथा समाप्त कर दी गयी। आज मंदिर में कन्द, मेवा, श्रीफल, पत्र-पुष्प, धूप अगरबत्ती एवं चाँदी के छत्तर श्रधालुओं द्वारा भेंटस्वरूप चढ़ाया जाता है।
मंदिर में माँ चन्द्रबदनी की मूर्ति न होकर श्रीयंत्र ही अवस्थित है। किवंदती है कि सती का बदन भाग यहाँ पर गिरने से देवी की मूर्ति के कोई दर्शन नहीं कर सकता है। पुजारी लोग आँखों पर पट्टी बाँध कर माँ चन्द्रबदनी को स्नान कराते हैं। जनश्रुति है कि कभी किसी पुजारी ने अज्ञानतावश अकेले में मूर्ति देखने की चेष्टा की थी, तो पुजारी अंधा हो गया था।
चन्द्रबदनी का नाम चन्द्रबदनी कैसा पड़ा? इसमें कई मतभेद हैं। चन्द्रकूट पर्वत पर सती के बदन की अस्थि गिरने से चन्द्रबदनी नाम पड़ा हो, क्योंकि सती चन्द्रमा के समान सुन्दर थी। या नागों के राजा चन्द्र द्वारा स्थापना करने पर चन्द्रबदनी सार्थक सिद्ध नहीं होता है। मेरी दृष्टि में सती के बदन की अस्थि चन्द्रकूट पर्वत पर गिरने से चन्द्रबदनी नाम पड़ा होगा, क्योंकि माँ सती चन्द्रमा के समान सौम्य व सुन्दर थी।
सिद्धपीठ चन्द्रबदनी जनपद टिहरी के हिण्डोलाखाल विकासखण्ड में समुद्रतल से 8000 फिट की ऊँचाई पर चन्द्रकूट पर्वत पर अवस्थित है। स्कन्दपुराण के केदारखण्ड में इसे भुवनेश्वरीपीठ नाम से भी अभिहित किया गया है। स्वामी मन्मथन जी ने सन् 1977 ई0 में इसी के नाम से अंजनीसैंण में श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम की स्थापना भी की है, जहाँ पर बहु आयामी कार्य किये जाते हैं। इस आश्रम के होने से इस क्षेत्र का बड़ा विकास हुआ है और कई जनजागरण कार्यक्रमों के चलते यहाँ पर विकास की और भी सम्भावनायें परिलक्षित होती हैं।
विभिन्न नामों से प्रसिद्ध शैल पुत्री ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कन्धमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिधिदात्री देवी की नवरात्रियों में जौ;मवद्ध की हरियाली बोकर इस अवसर पर दुर्गा सत्पसती का पाठ किया जाता है। चैत्र, आश्विन में अष्टमी व नवमी के दिन नवदुर्गा के रूप में नौ कन्याओं को जिमाया जाता है। मंदिर के पुजारी पुजार गाँव के भट्ट लोग तथा पाठार्थी के रूप में सेमल्टी लोग भी सहायता करते है। जनश्रुति है कि माँ भगवती अरोड़ा नामक स्थान के समीप एक कुण्ड में नित्यप्रति स्नान करने जाती है। ये अदृश्य कुण्ड भक्तिपूर्वक ही देखा जा सकता है। मंदिर में चोरखोली काफी विख्यात है। इसके अतिरिक्त भोगशाला, सतसंग भवन, पाठशाला, भण्डारगृह, कैण्टीन, सिंहद्वार, परिक्रमा पथ देखने योग्य हैं।
चन्द्रबदनी मंदिर बांज, बुरांस, काफल, देवदार, सुरई, चीड़ आदि के सघन सुन्दर वनों एवं कई गुफाओं एवं कन्दराओं के आगोश में अवस्थित है। चन्द्रबदनी में पहुँचने पर आध्यात्मिक शान्ति मिलती है। अथाह प्राकृतिक सौन्दर्य, सुन्दर-सुन्दर पक्षियों के कलरव से मन आनन्दित हो उठता है। चित्ताकर्ष एवं अलौकिक यह मंदिर उत्तराखण्ड के मंदिरों में अनन्य है। यहाँ से चैखम्भा पर्वत मेखला, खैट पर्वत, सुरकण्डा देवी, कुंजापुरी, मंजिल देवता, रानीचैंरी, नई टिहरी, मसूरी आदि कई धार्मिक एवं रमणीक स्थल दिखाई देते हैं। वन प्रान्त की हरीतिमा, हिमतुंग शिखर, गहरी उपत्यकायें, घाटियां व ढलानों पर अवस्थित सीढ़ीनुमा खेत, नागिन सी बलखाती पंगडंडियां, मोटर मार्ग, भव्य पर्वतीय गाँवों के अवलोकन से आँखों को परम शान्ति की प्राप्ति होती है। श्रधालुओं के लिए नैखरी में गढ़वाल मण्डल विकास निगम को पर्यटक आवास गृह, अंजनीसैंण में श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम के अलावा कई होटल व धर्मशालाएं भी हैं। यहाँ जाने के लिए पहुँच मार्ग ऋषिकेश से 106 किमी0 देवप्रयाग होते हुए व पुरानी टिहरी से 47 कि0मी0 दूरी पर है। काण्डीखाल से सिलौड़ गाँव होते हुए 8 कि0मी0 पैदल यात्रा तय करनी पड़ती है।

निष्कर्षतः सिद्धपीठ चन्द्रबदनी में जो भी श्रद्धालु भक्तिभाव से अपनी मनौती माँगने जाता है, माँ जगदम्बे उसकी मनौती पूर्ण करती है। मनौती पूर्ण होने पर श्रद्धालु जन कन्दमूल, फल, अगरबत्ती, धूपबत्ती, चुन्नी, चाँदी के छत्तर चढ़ावा के रूप में समर्पित करते हैं। वास्तव में चन्द्रबदनी मंदिर में एक अलौकिक आत्मशान्ति मिलती है। इसी आत्म शान्ति को तलाशने कई विदेशी, स्वदेशी श्रद्धालुजन माँ के दर्शनार्थ आते हैं। अब मंदिर के निकट तक मोटर मार्ग उपलब्ध है। प्राकृतिक सौन्दर्य से लबालब चन्द्रकूट पर्वत पर अवस्थित माँ चन्द्रबदनी भक्तों के दर्शनार्थ हरपल प्रतीक्षारत है।

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