Author Topic: Folk Gods Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के स्थानीय देवी-देवता  (Read 87656 times)

Risky Pathak

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Chhurmal Devta bhi lagbhag har jagah pooje jaate hai... Chhurmal Devta bhi Khet, gaay, bakrio ke devta maane jaate hai....

Kahi Kahi Ye Chaharmal ke naam se jaate hai.. Jaise humaare gaanv me...

Or Kahi Kahi Naagimal ke naam se....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नारसिंग देवता ( नरसिह देवता)

ये देवता श्री हरी भगवन विष्णु के अवतार आधा नर और आधा शेर का है ! इनकी पूजा भी उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रो मै होती है ! नारसिंग देवता को पूजने की विधि बी जागरण है !

पंकज सिंह महर

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कठपतरिया देवता

ये पथ प्रदर्शक देवता होते हैं, पिथौरागढ़ में चार-पांच जगह और अल्मोड़ा में चितई मन्दिर से पहले इनका मन्दिर है, इनके मंदिर में पत्थर का टुकडा, लकड़ी का टुकडा या पत्ते चढ़ते हैं, उस मार्ग से जाने वाला हर व्यक्ति पत्थर का टुकडा, लकड़ी का टुकडा या पत्ता उन्हें अर्पित करता है। ऎसा करने पर माना जाता है कि वे आगे का रास्ता दिखायेंगे और हम सही-सलामत घर या अपने गंतव्य तक पहुंच पायेंगे।
      इसका कारण यह भी रहा होगा कि पहले उत्तराखण्ड में काफी बर्फ पड़ती थी तो रास्ता नहीं दिख पाता था तो इस तरह से भगवान की स्थापना की गई इनके मन्दिर अक्सर चोटियों पर होते हैं, जिससे पैदल चलने वाला आदमी इस मन्दिर तक पहुंच जाता था और उस मन्दिर में पहुंचकर उसे आगे का गांव दिखाई पड़ जाता होगा।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Gosai Devta.

Ye deva bhi himalay ke kshetro mae rakhahte hai. Sur lal kapda badhate hai !  Inke saath kayee Gan bhi hote hai !

पंकज सिंह महर

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ग्वाल देवता-

यह देवता उत्तराखण्ड के सबसे लोकप्रिय और प्रचलित लोक देवता हैं, जंगल में जानवर चराने जाने वाले ग्वालो द्वारा जंगल में ही किसी शुद्ध स्थान पर अपनी रुचिनुसार छोटा सा मन्दिर ( दो पत्थर खड़े कर, उसके ऊपर एक पत्थर और इसके भीतर एक छोटा पत्थर, जिसे देवता मान लिया जाता है) स्थापित कर लिया जाता है। जब जानवर चर रहे होते हैं तो ग्वाले इसी मंदिर के पास खाना आदि बनाते हैं और आराम करते हैं......मुरुली की मीठी तान भी इसी देवता के थान के पास बैठ कर बजाई जाती है।
     ग्वाले मानते हैं कि यह उनका अपना देवता है, वह सभी प्रकार के दैवीय प्रकोपों और कष्टों से उनकी और जानवरों की रक्षा करते हैं।

पंकज सिंह महर

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बौधाण


यह जानवरों के, खासतौर पर दुधारु जानवरों की रक्षा करने वाले देवता माने जाते हैं, इनका कोई मंदिर नहीं होता, गोठ में जहां दुधारु जानवर बांधे जाते हैं वहां पर एक कीला गाड़कर उसमें बौधाण की स्थापना पूजा के दिन मान ली जाती है, इनकी पूजा पंडित नहीं करते बल्कि गुसै (वह पुरुष, जो इन जानवरों का स्वामी है) द्वारा ही इनकी स्थापना और पूजन किया जाता है। भैंस के उस दिन दुहे गये पूरे दूध की खीर बनाई जाती है और अपने बिरादरों को भोज पर बुलाया जाता है।
      माना जाता है कि इनकी पूजा करने से जानवरों को कोई रोग नहीं होता, वह स्वस्थ रहते हैं और धिनाली में वृद्धि होती है तथा इनके जानवरों को किसी की नजर नहीं लगती। कभी-कभी इनको बकरी भी चढ़ाई जाती है।

पंकज सिंह महर

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मलयनाथ

मलयनाथ जी की पूजा लगभग हर जगह की जाती है, ये सीराकोट (डीडीहाट के पास) के राजा थे, लेकिन वह बाद में जोगी बन गये और अपने लोकहित के कार्यों के कारण देवरुप में पूजे जाने लगे।

पंकज सिंह महर

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कासिन

ये कालिका जी के भाई हैं, जहां भी कालिका जी का मंदिर होता है, वहां इनका भी मंदिर होता है। इनके नाम पर पिथौरागढ़ में एक गांव भी है "कासिनी" संभवतः ये यहां के राजा रहे होंगे।

हेम पन्त

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Chaumu Devta

Chaumu devta ke mandir Pithoragarh ke Pancheshwar, chaupakhiya tatha Almora ke kuchh sthano par hain..

Chaupakhiya mein Chuamu devta ke mandir mein sardiyo ki Navratriyo ke dauran ek-divasiya bhavya mela aayojit kiya jata hai...

पंकज सिंह महर

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छुरमल

छुरमल भी उत्तराखण्ड के लोक देवता हैं, कई जगह इनके मंदिर हैं। इनको सूर्यपुत्र भी कहा जाता है, इसके पीछे यह कहा जाता है कि यह कासिन जी के लड़्के थे और कासिन इनको अपना लड़का नहीं मानते थे, लेकिन छुरमल जी ने जब कहा कि मैं आपका ही लड़का हूं तो कासिन जी ने इनसे कहा कि "अगर तुम जिन्दा शेर को पकड़कर ले आये, तो मैं मान जाऊंगा कि तुम मेरे ही पुत्र हो" इस पर छुरमल जी एक शेर को जिन्दा पकड़ लाये, फिर भी कासिन जी ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया। इनकी वीरता देखकर सूर्य भगवान ने इनको अपना पुत्र मान लिया। कासिन जी से इनकी हमेशा खट-पट ही रही, इसलिये इनके मंदिर भे एक साथ नहीं होते।

 

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