Author Topic: Jageshwar Temple - जागेश्वर मंदिर  (Read 68684 times)

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #20 on: April 16, 2008, 08:25:28 PM »
Ghane Devdaar ke vrikshon se ghira hua Jaageshwar Dhaam apne praakritik saundarya aur aitihaasik mahatva ke liye Duniya bhar main prasidhh hai. Saawan ke mahine main yahan shradhhaluon ki bhaari bheed jama ho jaati hai. Kaafi Videshi paryatak bhi yahan aate hain.

पंकज सिंह महर

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #21 on: April 17, 2008, 11:25:07 AM »
श्री महामृत्युंजय महादेव मन्दिर  Mahamritunjaya Mahadev

        यह जागेश्वर मंदिर समूह का दूसरा बड़ा मन्दिर है, यहां पर काले रंग का एक बहुत बड़ा लिंग स्थापित है, इसके बारे में कहा जाता है कि पहले यह पूरा बाहर था, बाद में शंकराचार्य जी ने इसे पाताल तक पहुंचा कर छोटा किया है। इस लिंग के ऊपरी भाग में एक आंखनुमा आकृति बनी है, जिसे महादेव की तीसरी आंख कहा जाता है। जनश्रुति है कि यदि कोई मृत्यु शैय्या पर हो तो उसका नाम इस आंख के पास मुंह लगाकर कहने मात्र से वह बच जाता है।
       Wikipedia- This is the biggest temple situated in the main temple premises.This temple of Shiva is eastern facing and big Linga is worshipped as the saviour from death-महामृत्युंजय .This unique linga has an eye shaped opening.This is the oldest temple in the premisce.Reciting of Mahamritunjaya Mantra (महामृत्युंजय मंत्र) is considered very fruitful, auspicious and powerful way of self realisation,dispelling of evil effects,freedom from all kinds of fears,illness and negativity.It is provider of fulfillment and bliss in one's life. Chanting of Mahamrityunjaya Mantra is said to create divine vibrations that heals.Mahamritunjaya Mantra has been taken from the Sukla Yajurveda Samhita III/60 -

“ ॐ हौ जूँ सः ॐ भूर्भुवः स्वः

ॐ त्रयंबकं यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवधर्नम्

उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्यॊर्मुक्षीय मामृतात्

ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूँ हौ ॐ ”


(We pray Lord Shiva, the All-Seeing One,three eyed,who bears grace of all-pervading divine fragrance and enricher of all kinds of powers and viguour by His enormous prosperous bestowals. May He release me from the grip of premature untimely death,but not from immortality like pumpkin or watermelon separates after ripening from its vine.)[/b][/color]

पंकज सिंह महर

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #22 on: May 01, 2008, 02:18:52 PM »
"कुमाऊं का इतिहास" में जागेश्वर के बारे में निम्न वर्णन है-

कूर्मांचल में जागीश्वर सबसे बड़ा मंदिर है, जिसमें बहुत सी गूंठें हैं। मानसखंड में भी इसका वर्णन है, यहां अनेक देवता हैं, जिनके मंदिर अन्यत्र भी हैं, यथा तरुण जागीश्वर, वृद्ध जागीश्वर, भांडेश्वर, मृत्युंजय, डंडेश्वर, गडारेश्वर, केदार, बैजनाथ, वैद्यनाथ, भैरवनाथ, चक्रवक्रेश्वर, नीलकंठ, बालेश्वर, विमेश्वर, बागीश्वर, बाणीश्वर, मुक्तेश्वर, डुंडेश्वर, कमलेश्वर, हाटेश्वर, पाताल भुवनेश्वर, भैरवेश्वर, लक्ष्मीश्वर, पंचकेदार, बह्रकपाल, क्षेत्रपाल या समद्यो तथा यह शक्तियां भी पूजीं जाती हैं- पुष्टि, चंडिका, लक्ष्मी, नारायणी, शीतला एवं महाकाली।
       वृद्ध जागीश्वर ऊपर चोटी में चार मील पर है और क्षेत्रपाल लगभग ५ मील पर है। यह मंदिर अल्मोड़ा और गंगोली के बीच में है। अल्मोड़ा से उत्तर की ओर १६ मील पर यह मंदिर है। यहां महादेव ज्योर्तिलिंग के रुप में पूजे जाते हैं। सबसे बड़े मंदिर जागीश्वर, मृत्युंजय और डंडेश्वर हैं, कहा जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने मृत्युंजय का मंदिर वहां आकर बनवाया था तथा सम्राट शालिवाहन ने जागीश्वर का मंदिर बनवाया। पश्चात में शंकराचार्य ने आकर इन तमाम मंदिरों की फिर से प्रतिष्ठा करवाई तथा कत्यूरी राजाओं ने भी इसका जीर्णोद्धार किया।..............जारी

पंकज सिंह महर

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #23 on: May 01, 2008, 02:24:37 PM »
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।

उज्जयिन्यां महाकालमोकांरममलेश्वरम् ।

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् ।

सेतुबंधे तु रामेशं नागेशं दारूकावने

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्रयंम्बकं गौतमीतटे ।

हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ।

ऐतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति


यहां पर "नागेशं दारुका वने" जो शब्द है, उसका संबंध जागेश्वर से है, क्योंकि दारुकवन देवदार के वन में जागेश्वर का मंदिर होना मानसखंड में माना गया है और चीनी यात्री हवेनसांग ने भी इसका जिक्र किया है।[/b][/color]

पंकज सिंह महर

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #24 on: May 01, 2008, 02:31:37 PM »
यहां पर अनेक कुंड भी हैं, मुख्य कुंड का नाम बह्म कुण्ड है, जिसमें स्नान करके मुक्ति मिलती है। अन्य कुंड नारद, सूर्य, ऋषि, कृमि, रेतु और वशिष्ठ है। बैशाख व कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेला लगता है, सावन में भी चतुर्दशी को पार्थिव पूजन होता है। यहां पंचामृत (दही, दूध, घी, मधु और चीनी) से पूजा होती है। इस मंदिर में पूजा से पुत्र लाभ की आशा की जाती है। यहां हाथ में दीपक लेकर स्त्रियां रातभर खड़ी रहती हैं।
      यहां एक चांदी की मूर्ति एक राजा की है, जो चिराग लिये हुये है, राजा दीपचंद और राजा त्रिमलचंद की भी मुर्तियां भी हैं।

पंकज सिंह महर

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #25 on: May 07, 2008, 11:13:47 AM »
शिव की जागेश्वर में तपस्या-उद्धरण कुमाऊं का इतिहास-श्री बद्रीद्त्त पाण्डे, पृष्ठ-१६४

पश्चात, दक्ष प्रजापति ने कनखल के समीप यग्य किया। वहां शिव के अतिरिक्त सबको बुलाया, शिव की पत्नी काली बिना बुलाये पिता के यहां गई और वहां अपना और अपने पति का तिरस्कार देखकर रोष से भस्म हो गई। शिव ने कैलाश से यह बात जान दक्ष प्रजापति का यग्य विध्वस  कर सबका नाश कर दिया और चिता की भस्म से शरीर को आच्छादित कर झांकर सैम ( जागेश्वर से करीब ५ कि०मी० गरुड़ाबांज नामक स्थान पर) में तपस्या की। झांकर सैम को तब भी देवदार वन से आच्छादित बताया गया है। झांकर सैम जागेश्वर पर्वत में है। कुमाऊं के इस वन में वशिष्ठ मुनि अपनी पत्नियों के साथ रहते थे। एक दिन स्त्रियों ने जंगल में कुशा और समिधा एकत्र करते हुये शिव को राख मले नग्नावस्था में तपस्या करते देखा, गले में सांप की माला थी, आंखें बंद, मौन धारण किये हुये, चित्त उनका काली के शोक से संतप्त था।
       स्त्रियां उनके सौन्दर्य को देखकर उनके चारों ओर एकत्र हो गईं, सप्तॠषियों की सातों स्त्रियां जब रात में ना लौटी तो वे प्रातःकाल उनको ढुंढने को गये, देखा तो शिव समाधि लिये बैठे है और स्त्रियां उनके चारों ओर बेहोश पड़ी हैं। ॠषियों ने यह विचार कर लिया कि शिव ने उनकी स्त्रियों की बेइज्जती की है और शिव को श्राप दिया कि "जिस इन्द्रिय यानी वस्तु से तुमने यह अनौचित्य किया है वह (लिंग) भूमि में गिर जायेगा" तब शिव ने कहा कि " तुमने मुझे अकारण ही श्राप दिया है, लेकिन तुमने मुझे सशंकित अवस्था में पाया है, इसलिये तुम्हारे श्राप का मैं विरोध नहीं करुंगा, मेरा लिंग पृथ्वी में गिरेगा। तुम सातों सप्तर्षि तारों के रुप में आकाश में चमकोगे।" अतः शिव ने श्राप के अनुसार अपने लिंग को पृथ्वी में गिराया, सारी पृथ्वी लिंग से ढक गई, गंधर्व व देवताओं ने महादेव की तपस्या की और उन्होंने लिंग का नाम यागीश या यागीश्वर कहा और वे ऋषि सप्तर्षि कहलाये।

पंकज सिंह महर

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #26 on: May 07, 2008, 11:15:50 AM »
उक्त से यह भी सिद्ध होता है कि महादेव की लिंग रुप में पूजा जागेश्वर से ही प्रारम्भ हुई।

हेम पन्त

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झांकर सैम का मन्दिर
« Reply #27 on: May 07, 2008, 12:12:51 PM »
पंकज दा! इस अति महत्वपूर्ण जानकारी के लिये आपका कोटि-2 धन्यवाद....

झांकर सैम का मन्दिर भी अति प्राचीन और महत्वपूर्ण है. कहा जाता है कि इस शिव लिंग के ऊपर जंगल में चरने वाली गाय अपने थनों से स्वतः ही दूध चढा देती थी.

अब भी इस मन्दिर में लोग भारी संख्या में जाते हैं. यह मन्दिर इतने घने जंगल में बसा है कि रात में शेर तथा अन्य जंगली जानवर मन्दिर के आस-पास सामान्य रूप से दिखायी देते हैं.

पंकज सिंह महर

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #28 on: May 07, 2008, 02:54:17 PM »
शिव की जागेश्वर में तपस्या-उद्धरण कुमाऊं का इतिहास-श्री बद्रीद्त्त पाण्डे, पृष्ठ-१६४-१६५

श्राप के कारण शिव का लिंग जमीन पर गिर गया और सारी पृथ्वी लिंग के भार से दबने लगी, तब ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सूर्य, चंद्र और अन्य देवगण  जो जागेश्व्र में शिव की क्तुति कर रहे थे, अपना-अपना अंश और शक्तियां वहां छोड़्कर चले गयेआ तब देवताओं ने लिंग का आदि अन्त जानने का प्रयास किया, ब्रह्मा, विष्णु और कपिल मुनि भी इसका उत्तर न दे सके, विष्णु पाताल तक भी गये लेकिन उसका अंत न पा सके, तब विष्णु शिव के पास गये औए उनसे अनुनय विनय के बाद यह निश्चय हुआ कि विष्णु लिंग को सुदर्शन चक्र से काटें और उसे तमाम खंडों एस बांट दें। अंततः जागेश्वर में लिंग को काटा गया और उसे नौ खंडों में बांटा गया।
१-हिमाद्रि खंड
२- मानस खंड
३- केदार खंड
४- पाताल खंड - जहां नाग लोग लिंग की पूजा करते हैं।
५- कैलाश खंड
६- काशी खंड- जहां विश्वनाथ जी हैं, बनारस
७- रेवा खंड- जहां रेवा नदी है. जहां पर नारदेश्वर के रुप में लिंग पूजा होती है, शिवलिंग का नाम  रामेश्वरम है।
८- ब्रह्मोत्तर खंड- जहां गोकर्णेश्वर महादेव हैं, कनारा जिला मुंबई।
९- नगर खंड- जिसमें उज्जैन नगरी है।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Re: जागेश्वर मंदिर: JAGESHWAR TEMPLE
« Reply #29 on: May 07, 2008, 03:18:51 PM »
Yahi kuch wahan pai Pujari ji bhi bata rahe the ki Dandeshwar main Bholenaath ji ko Dandswarup aana pada tha.

शिव की जागेश्वर में तपस्या-उद्धरण कुमाऊं का इतिहास-श्री बद्रीद्त्त पाण्डे, पृष्ठ-१६४-१६५

श्राप के कारण शिव का लिंग जमीन पर गिर गया और सारी पृथ्वी लिंग के भार से दबने लगी, तब ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सूर्य, चंद्र और अन्य देवगण  जो जागेश्व्र में शिव की क्तुति कर रहे थे, अपना-अपना अंश और शक्तियां वहां छोड़्कर चले गयेआ तब देवताओं ने लिंग का आदि अन्त जानने का प्रयास किया, ब्रह्मा, विष्णु और कपिल मुनि भी इसका उत्तर न दे सके, विष्णु पाताल तक भी गये लेकिन उसका अंत न पा सके, तब विष्णु शिव के पास गये औए उनसे अनुनय विनय के बाद यह निश्चय हुआ कि विष्णु लिंग को सुदर्शन चक्र से काटें और उसे तमाम खंडों एस बांट दें। अंततः जागेश्वर में लिंग को काटा गया और उसे नौ खंडों में बांटा गया।
१-हिमाद्रि खंड
२- मानस खंड
३- केदार खंड
४- पाताल खंड - जहां नाग लोग लिंग की पूजा करते हैं।
५- कैलाश खंड
६- काशी खंड- जहां विश्वनाथ जी हैं, बनारस
७- रेवा खंड- जहां रेवा नदी है. जहां पर नारदेश्वर के रुप में लिंग पूजा होती है, शिवलिंग का नाम  रामेश्वरम है।
८- ब्रह्मोत्तर खंड- जहां गोकर्णेश्वर महादेव हैं, कनारा जिला मुंबई।
९- नगर खंड- जिसमें उज्जैन नगरी है।


 

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