Author Topic: Kailash Mansarovar - कैलाश मानसरोवर यात्रा:उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा  (Read 63893 times)

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Lipulekh pass:

Currently used by Indian pilgrims to visit Kailash Mansarovar in Tibet:






पंकज सिंह महर

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पिथौरागढ़: इस वर्ष कैलास मानसरोवर यात्रा एक जून से शुरू होगी तथा इसमें 16 यात्री दल जाएंगे। यात्रा के दौरान विभिन्न व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी विभागों को सौंप दी गयी है। मंगलवार को कैलास मानसरोवर यात्रा की तैयारी बैठक में जिलाधिकारी डा.पीएस गुंसाई ने बताया कि यात्रा का पहला दल इस वर्ष एक जून को रवाना होगा। यात्रा 22 सितम्बर को पूरी होगी। यात्रा मार्ग की स्थिति तथा व्यवस्थाओं को देखने के लिए अप्रैल में लोक निर्माण विभाग, राजस्व, एसएसबी, केएमवीएन और आईटीबीपी की संयुक्त टीम क्षेत्र में जाएगी। उन्होंने लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिये कि वह मई माह तक यात्रा मार्ग की मरम्मत और संवदेनशील स्थलों को चिह्नित कर लें। यात्रा के दौरान आईटीबीपी और पुलिस के वायरलेस सेटों से संचार व्यवस्था संचालित की जायेगी। साथ ही कुमाऊं मंडल विकास निगम हर पड़ाव पर सेटेलाइट फोन की व्यवस्था सुनिश्चित करेगा।
 

हेम पन्त

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KAILASH MANSROVAR YATRA will be of 28 days this year
« Reply #46 on: May 25, 2009, 10:39:10 AM »
Pithoragarh, May 23: Devotees undertaking the annual Kailash Mansarowar yatra will have to spend an additional two days as the pilgrimage duration has been extended to 28 days this year.

 One more camp has been set up at Pangla in addition to existing camps at Gala, Bundhi, Gunji, Kalapani and Nabhidhang en route to the holy place situated in northern Himalayas, KMVN, a nodal agency in-charge of organising the yatra, said today.

The decision to extend the pilgrimage was taken as devotees have to trek a treacherous eight-km alternative route between Chetalkot and Tawaghat after the original path was blocked by debris following a landslide at Chetalkot.

"Pilgrims will have to trek the eight-Km distance as debris due to a landslide at Chetalkot was not cleared yet. So we have arranged one more camp at Pangla keeping in mind the comforts of the pilgrims," Ashok Joshi, General Manager KMVN, said.

Chetalkot was hit by landslide on February 6th. With the debris still not cleared, devotees will have to cover the eight-Km distance on foot via a bypass route up to Tawaghat and reach Pangla by local Jeeps, he said.

The Yatra will commence from New Delhi on June 1st and culminate on 26th September when the 16th and last batch returns back to the national capital.

En route the pilgrimage, the pilgrims will spend 12 days, travelling throught the Chinese territory of Tibet

पंकज सिंह महर

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Rock sound faith
Tibetan Buddhists believe that a parikrama of the holy Kailash mountain washes away sins of one life,10 parikramas wash away sins of one kalpa and 108 result in nirvana 
BD Kasniyal


Pitthoragarh, May 27
Former Indian Prime Minister Jawaharlal Nehru regretted not visiting Kailash Mansarovar in Tibet. In the foreword of the book ‘Kailash Mansarowar’ written by Swami Pranavanand in 1949, Jawaharlal Nehru had wished that he visited Mount Kailash and Mansarovar.

Nehru died with this wish unfulfilled but hundreds of Indian pilgrims will be starting off for the 800-km arduous pilgrimage across the Himalayas from June 1.

According to Swami Pranavanand, the legendary explorer of the Himalayas who had visited the lake 26 times during the 1950s, Mount Kailash is at a height of 22,028 ft above sea level.

Sir Francis Young Husband, former chief of Royal Geographical of UK, said, “The Himalayas have a great contribution in sprouting religious feelings among the Hindus. Most Hindu pilgrim spots are situated in and around the Himalayan region and the Kailash Mansarovar pilgrimage is oldest among them.”

For Hindus, a pilgrimage to Kailash Mansarovar, known as the abode of Lord Shiva, is a lifelong dream. Since ages, people had been undertaking this sacred journey which was interrupted after the India-China conflict of 1962.

The pilgrimage was resumed in 1981 and since then, a limited number of pilgrims are allowed to visit Kailash Mansarovar.

Hindus are not the only community which considers Kailash as a sacred mountain. The Jains also believe that their first Tirthankar, Hrishabh Dev, took ‘samadhi’ at Mount Kailash near the Astapad peak.

According to Buddhist scriptures, Kailash is called Kang-Rim-Pochhe. Buddhists believe that 500 Bodhisattvas reside on Kailash.

Tibetan Buddhists believe that one circumambulation (parikrama) of the holy mountain washes away the sins of one life. Ten ‘parikramas’ wash away the sins of one ‘kalpa’ while 108 ‘parikramas’ secure Nirvana (salvation).

Besides Hindus, Jains and Buddhists, pre-Buddhist Bonpas of Tibet consider Mount Kailash to be the sacred nine-storey peak situated at the center of the earth.

Nowadays, the Kailash Mansarovar Yatra has become a package tour. It begins from New Delhi in the first week of June.

The yatra groups reach base camp Dharchula in Pitthoragarh in Uttarakhand from where they start trekking towards Lipulekh Pass (16,912 ft above sea level) from where they cross into Tibet.

The batches of pilgrims reach Lipulekh after resting at the camps of the Kumaon Mandal Vikas Nigam at Gala (2,398 m), Bundi (2740 m), Gunji (3,200 m), Kalapani (3,570 m) and Nabhidhang (4,200 m).

This year, a new camp at Pangla has been set up as the pilgrims will have to travel 8 km extra on foot from Chenhetalkot to Tawaghat due to a landslide on the route.

After the pilgrims cross over to Tibet, they reach the rest houses at Taklakot in the Tnangri province of western Tibet.

Thereafter, pilgrims are divided into two groups and each group is taken to Kailash and Mansarovar separately.

In their Tibetan sojourn, Indian pilgrims stay at Taklakot, Qugu, Zaidi, Parkha, Darchen, Deraphuk and Zongzerbu. After spending 12 days in Tibet, they trek back to Lipulekh pass.

Though after the resumption of the pilgrimage in 1981, the Kumaon Mandal Vikas Nigam has been made the nodal agency, the Pitthoragarh district administration and Indo-Tibetan Border Police personnel also help in managing the pilgrimage.

More than 8,000 pilgrims have undertaken the pilgrimage during the past 25 years.

— The writer is a freelance journalist from Pitthoragarh


पंकज सिंह महर

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कैलाश-मानसरोवर यात्रा
तिब्बत में हिमालयी सीमा के उत्तर 6,740 मीटर ऊंचा शिखर कैलाश अवस्थित है। यहां चार महान धर्मों का आध्यात्मिक केंद्र है, और ये है: तिब्बती-बौद्ध धर्म, हिन्दू धर्म, जैन धर्म, तथा बौद्ध-पूर्व चेतन धर्म-बोनयो।


हिंदू कैलाश शिखर को पौराणिक मेरू शिखर मानते हैं जो ब्रह्मांड का धार्मिक केंद्र है तथा जिसके इर्द-गिर्द संपूर्ण सृष्टि घूमती है। प्राचीन लेखों में इसका वर्णन एक अलौकिक विश्व स्तंभ के रूप में है, जिसकी जड़ें पाताल में हैं तथा जिसकी ऊंचाई आकाश को छुती है। इसके नीचे पवित्र मानसरोवर प्रवाहित है जो ब्रह्मा के मस्तिष्क से जन्मा है। माना जाता है कि कैलाश की मात्र एक परिक्रमा से एक युग के पापों से मुक्ति मिल जाती है जबकि धार्मिक संख्या 108 निर्वाण सुनिश्चित करती है। मानसरोवर झील का व्यास 55 किलोमीटर एवं चौड़ाई 15 किलोमीटर है। इसके नीलमणि जैसे जल में अद्भुत आरोग्य-गुण हैं।


बौद्धों के लिए शिखर कैलाश कांग रींगपोक एक मूल्यवान बर्फीला-पर्वत की तरह है। उनके लिये यह शिखर एक विशाल प्राकृतिक तत्व है जो तंत्र विद्या का नाभि-केन्द्र है। बौद्धों का विश्वास है कि बुद्ध की माता रानी माया को देवों ने बुद्ध के जन्म से पहले यहां लाकर स्नान कराया था। उन्होंने लद्दाख, भूटान, नेपाल, मंगोलिया एवं तिब्बत के प्रत्येक कोने की कठिन यात्रा को यहां पहुंचने के लिए जैन धर्म में कैलाश शिखर को अष्टपद शिखर माना गया है। जैन धर्म के संस्थापक ऋषभदेव को इसी शिखर पर आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त हुई थी। तिब्बत के बौद्ध-पूर्व बोनपो के विश्वासानुसार यह "नौकथा स्वास्तिका पर्वत" है जो संपूर्ण क्षेत्र का रहस्यमयी आत्मा है।


कब जायें:
मध्य-मई से मध्य-अक्टूबर के बीच कैलाश-मानसरोवर की यात्रा का सर्वोत्तम समय है। इस समय के दौरान मौसम प्रायः स्थिर और अवलोकन शक्ति सर्वोत्तम रहती है। दिन में तापमान ठंडा और रात में शून्य डिग्री से भी कम रहता है।


वहां कैसे पहुंचे:
यात्रा का संचालन उत्तरांखण्ड सरकार तथा कुमाऊं मंडल विकास निगम एवं विदेश मंत्रालय के सहयोग से करते हैं। लिपु लेख पास तक सभी व्यवस्था कुमाऊं मंडल विकास निगम करता है, जिसमें सभी रात्रि के दौरान विश्राम की व्यवस्था टीन की छाया में करना शामिल होता है। साथ ही जेनरेटर द्वारा बिजली की आपूर्ति, साधारण निरामिष भोजन, आदि की भी कीमत कुमाऊं मंडल विकास मंडल के पैकेज में शामिल हैं। सभी प्रकार की स्वास्थ्य एवं सुरक्षा सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। उत्तराखण्ड प्रांतीय सुरक्षा दल तथा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस सभी आवश्यक सेवाएं तीर्थ यात्रियों को मुहैया कराती है। यात्रियों की सुविधा के लिए खच्चरों तथा कुलियों की भी व्यवस्था होती है।


लिपु लेख पास के बाद चीनी अधिकारी कार्यभार ग्रहण कर सभी आवश्यक सुविधाएं जुटाते हैं। परिक्रमा के दौरान चीनी अधिकारी भोजन का प्रबंध नहीं करते हैं। इसलिए यात्रियों को तिब्बत में अपना सामान ले जाना चाहिए।


भारत से यात्रा करने के लिए विदेश मंत्रालय के आवेदन कर्त्ताओं के बीच लगभग 200 यात्रियों का चयन ही प्रत्येक वर्ष हो पाता है। यात्रा के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता स्वास्थ्य-सक्षमता प्रमाणपत्र की जांच होती है। जांच में खरा उतरना ही होता हैं जिसमें लगभग 20,000 फीट की कठिन पैदल यात्रा शामिल है। इस उद्देश्य के लिए यात्रियों की शारीरिक अवस्था की डॉक्टरी जांच दो दिनों तक होती है।


उसके बाद वीजा एवं विदेशी मुद्रा विनिमय की औपचारिकता पूरी करनी होती है। यात्रा के लिए यात्रियों को 500 अमरीकी डॉलर की व्यवस्था करनी होती है, जिसमें से 400 अमरीकी डॉलर चीनी अधिकारियों को दी जाती है, जिससे आवास, परिवहन, कुली आदि का खर्च पूरा होता है।


अवधि
दिल्ली से संपूर्ण यात्रा 32 दिनों की होती है जिसमें केवल प्रथम एक दिन तथा अंतिम दो दिन बस में बिताना पड़ता है। पूरी यात्रा विदेश मंत्रालय एवं कुमाऊं विकास मंडल निगम की देखरेख में पूर्ण होती है।


रास्ता
नयी दिल्ली से रास्ते में बस यात्रा एवं पर्वत की ऊंची चढ़ाई दोनों शामिल हैं। बस का रास्ता निम्न प्रकार का हैं -


दिल्ली-गजरौला-काठगोदाम-नैनीताल-भोपाली-अलमोड़ा-कौसानी-बागेश्वर-चौवाकाटी-डीडीहाट-धारचूला (जौलजीबि होकर) तवाघाट


पैदल यात्रा में निम्नलिखित शामिल हैं जो कई सुंदर मैदानों एवं रास्तों से गुजरते है:


तवाघाट-थानीदार-पॉगू-सोसा-नारायण आश्रम-शिरखा-रंगलिंग शिखर-सिमखोला-गाला-जिप्ती-मालपा-गुधी, गुजी - गारम्यांग-कालापानी-अविधाग-लिपु-लेखपास-पाला-टकलाकोट


परिक्रमा
कैलाश शिखर की परिक्रमा बारचेन से ही शुरू और यहीं समाप्त होती है। बारचेन से तीर्थयात्रियों की परिक्रमा लहाछु घाटी (देवनदी) में प्रवेश करती है जो पर्वत के पश्चिमी सिरे के नीचे का एक अद्भुत स्थल है। उत्तरी दिशा में पथ डोलमा पास (18,600 फीट) की चढ़ाई पर जाता है और फिर शीघ्रता से लहाम छू खापेर घाटी में तारचेन वापस आने से पहले उतर जाता है। कैलाश शिखर की यह परिक्रमा 52 किलोमीटर की होती है।


मानसरोवर की परिक्रमा हुरौर, चुगु एवं जैदी होकर लगभग 75 किलोमीटर की दूरी से गुजरती है।
 
 

पंकज सिंह महर

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कैलाश पर्वत:जहां विराजते हैं शिव


 

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