Author Topic: Nag Devta Temples In Uttarakhand - उत्तराखंड में नाग देवता के मंदिर  (Read 38671 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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थल, बेरीनाग में कभी था नागों का आधिपत्य! 
Story Update : Sunday, May 20, 2012    12:01 AM
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थल। थल, बेरीनाग, डीडीहाट और बागेश्वर जिले के कांडा-कमेड़ीदेवी क्षेत्र में कभी नागों का आधिपत्य था। इसके अवशेष अब भी देखने को मिल जाते हैं। थल के नजदीक बरसायत गांव में पिंगलनाग नामक एक सदाबहार नौला है, जिसमें पानी कभी भी कम नहीं होता, लेकिन चट्टानों की तलहटी में बने इस नौले के पानी को उपयोग में नहीं लाया जाता। इस इलाके में पुराण वर्णित नागों के 11 मंदिर हैं।
 
 नागिलागांव पांखू के पास बासुकीनाग तो जयनगर की चोटी में पिंगल नाग का मंदिर है। बरसायत, कांडेकिरौली और हीपा नामक स्थान पर पिंगल नाग के उप स्थान हैं। विजयपुर (कांडा बागेश्वर) की चोटी में धौलीनाग, कमेड़ीदेवी (बागेश्वर) में फेणीनाग, बेरीनाग में बेणीनाग, खपरचूला (डीडीहाट) में धुम्रीनाग, नापड़ (तल्लाजोहार) में सुंदरीनाग, पचार (धरमघर) के पास हरिनाग, खरई (बागेश्वर) में खरहरिनाग के प्राचीन मंदिर स्थापित हैं। थल के पास कालीनाग पर्वत में विषधर कालीनाग का प्राचीन मंदिर है। अन्य नाग मंदिरों की तरह ही इस नाग मंदिर में नाग पंचमी को विशेष पूजा की जाती है।
स्कंद पुराण के मानसखंड में नागों का विस्तार से वर्णन है। पिंगलनाग के पुजारी केदार दत्त पंत (77) बताते हैं कि बरसायत की चोटी में बनी पिंगलनाग की बावड़ी (नौला) 800 साल पुरानी है। वह बताते हैं कि प्राचीन समय में उक्त स्थल पर पिंगलाचार्य नामक ऋषि तपस्या कर रहे थे। दानवों की प्रताड़ना से मुक्ति दिलाने के लिए ईश्वर ने उन्हें नाग रूप में परिवर्तित दिया। तब से इस इलाके में नागों की पूजा की जाती है। उन्होंने पिंगलनाग के नौले को संरक्षित करने की जरूरत बताई। पिंगलनाग बावड़ी का जल ग्रहण न करने के संबंध में वह कहते हैं कि नाग का नौला होने की वजह से ही इस जल का प्रयोग नहीं किया जाता।


(Source - Amar Ujala)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नाकुरी, कमस्यार क्षेत्र में था नागों का निवास 


बागेश्वर। पौराणिक काल में नाकुरी, पुंगराऊ और कमस्यार में नागों का निवास था। कालिय नाग, फेनिल नाग और धवल जैसे श्रेष्ठ नागों के मंदिर आज भी यहां मौजूद हैं। भद्रकाली में मंदिर के नीचे एक गुफा को नागों और नाग कन्याओं का उपासना स्थल माना जाता है। इस क्षेत्र में नागों को इष्ट देवता की तरह पूजा जाता है।
 वर्तमान नाकुरी को मानस खंड में नागपुरी कहा गया है। कमेड़ी देवी के पास फेनिल नाग का मंदिर है, जिसे स्थानीय भाषा में फेणीनाग कहा जाता है। विजयपुर कांडा के समीप धवलनाग मंदिर को अब धौलीनाग कहा जाता है। मान्यता है कि नाग कन्याएं इसकी सेवा करती थी। तल्ला कमस्यार में कुलूर नदी के किनारे कालिय नाग के पुत्र भद्रनाग के  रहने की मान्यता है। जिसने आदिकाल में वहां अपने लिए एक भद्रपुर की रचना की थी। कालिय नाग का मंदिर सानी उडियार से बेरीनाग जाने वाली सड़क के पास है। भद्रकाली गांव में देवी भद्रवती मंदिर के नीचे एक विशाल गुफा है। मानस खंड में कहा गया है कि इस गुफा में नागों और नाग कन्याओं द्वारा भद्रवती देवी की पूजा की जाती थी। दुर्गा सप्तशती में वर्णित भद्रकाली को ही भद्रवती कहा जाता है। नाकुरी के पपोली गांव में हरिनाग का तथा खंतोली गांव में खर नाग का मंदिर विद्यमान है। बेरीनाग और बासुकी नाग के मंदिर पिथौरागढ़ जिले में हैं। मानस खंड में यह भी उल्लेख है कि कालिय नाग, तक्षक नाग, इलावर्त नाग और कर्कोटक नाग के पुत्र, पौत्र तथा वंशज यहां स्थित कण्व पर्वत पर रहते थे। इसी क्षेत्र में पिंगल नाग और नौलिंग नाग भी स्थित है। स्थानीय लोगों का मानना है कि नाग देवता उन्हें संकट से उबारते हैं। गाय या भैंस का पहला दूध तथा हर फसल का पहला अनाज नाग देवता को चढ़ाया जाता है। हर साल नाग पंचमी के दिन नाग मंदिरों में मेले लगते हैं, खीर का भोग लगाया जाता है। अक्तूबर की पंचमी को 22 हाथ लंबा चिराग जलाकर धौलीनाग मंदिर की परिक्रमा की जाती है। नागों के यह मंदिर प्राचीन काल के अन्य पाषाण मंदिरों की तरह ही थे। अब इनका आधुनिकीकरण हो चुका है किंतु नाग देवता के प्रति लोगों की आस्था आज भी कम नहीं हुई है।

(Source Amar Ujala)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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अनंतम वासुकी शेषम पद्मनाभं च कम्बलम,
 शंखपालम दृष्ट्राषट्रम तक्षकं कालियम तथा..
 एतानि नव नामानि नागानाय च महत्तमं,
 प्रात:काले पठे नित्यं शायं काले च विशेषत:
 तस्य विषम भयं नासी सर्वत्र विजयी भवेत्...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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श्री नाग पंचमी के शुभ अवसर पर आपको लिए चलते हैं बागेश्वर जिले के विजयपुर नामक ग्राम में स्थित श्री धौलीनाग मंदिर ।
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उत्तराखंड की पवित्र
भूमि में आज भी ऐसे अनेक गुप्त एवं रहस्यमय देवस्थल हैं, जहां वास्तव में साक्षात देवताओं की उपस्थिति की अनुभूति होती
है। दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे दुर्लभ देवस्थलों का राज्य के
पर्यटन मानचित्र में आज तक कोई नामो-निशान नहीें है, जबकि
इन दुर्लभ देवस्थलों पर गहन शोध की आवश्यकता थी। इन्हीं गुप्त
देवस्थलों में से ऐक देवस्थल है ‘धौली नाग’।

नागाधिराज के नाम
से जाने जाने वाले इन धौली नाग देवता को धवलनाग या सफेदनाग के नाम से भी जाना जाता है।

धौलीनाग देवता का मन्दिर कुमाऊं मण्डल के बागेश्वर जनपद अन्तर्गत विजयपुर नामक स्थान से मात्र डेढ़ किमी. की दूरी पर ऊंचाई पर स्थित है। यहां के स्थानीय लोग इस नाग देवता को अपने आराध्य देव के रूप में पूजते हैं। क्षेत्रभर के लोगों में धौलीनाग के प्रति गहरी आस्था है और विश्वास तो उनके दिलों में जैसे कूट-कूट कर भरा है।

मंदिर के आस्थावान भक्त गोपाल धामी के अनुसार धौलीनाग देवता के इस मन्दिर की स्थापना लगभग 400 वर्ष पूर्व की गयी थी। उससे पहले धौलीनाग देवता यहां स्थित एक बांज के एक विशालकाय पेड़ पर निवास करते थे, जो आज भी यहां मौजूद है। यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि एक बार रात्रि के समय इस क्षेत्र के जंगल में अचानक भयंकर आग लग गयी। तब बांज के विशाल पेड़ पर विराजित धौलीनाग देवता ने ग्रामवासियों को आवाज लगा कर बताया कि जंगल में आग लग गयी, इसे बुझाने के लिए आओ, लेकिन कहा जाता है कि वह दिव्य आवाज किसी को नहीं सुनाई दी। देवता के बार-बार आवाज लगाये जाने पर सहसा वह आवाज क्षेत्र में ही निवास करने वाले अनुसूचित जाति के ‘भूल’ लोगों ने सुनी तो वे 22 हाथ लम्बी मशाल जलाकर रात्रि में ही आग बुझाने को निकल पड़े। देवता के जयकारे की आवाज जब यहीं के धपोला लोगों ने सुनी तो वे घरों से बाहर निकले और भूल लोगों से सारा वृतान्त सुनकर वे भी जलती मशाल लेकर उनके साथ चल दिये। देखते ही देखते चन्दोला वंशज के लोग भी मशाल हाथ में लेकर निकल पड़े और छुरमल देवता के मंदिर में सभी एकत्र हो गये। वहां से एक साथ जंगल की आग बुझाने निकले। मशाल लेकर चलने की परम्परा आज भी विभिन्न मेलों के अवसर पर चली आ रही है। साल में तीन बार यहां भव्य मेलों का आयोजन होता है, जिसमें धपोला व भूल लोग मिलकर बाईस हाथ लम्बी जलती मशाल लाते हैं। यह भव्य मंदिर हिमालय की तलहटी में चारों ओर बांज, बुरांश, चीड़, काफल, देवदार आदि के वनों से आच्छादित है। इस क्षेत्र में अनेक जाति के क्षत्रिय, ब्राह्मण एवं अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं। चन्दोला, धपोला, धामी, राणा, पन्त, पाण्डे, काण्डपाल, कम्र्याल, भूल आदि मिलाकर लगभग डेढ़ हजार परिवार धौली नाग देवता को अपना आराध्य देव मानते हैं। वर्ष में ऋषि पंचमी, नाग पंचमी और प्रत्येक नवरात्रि की पंचमी की रात्रि को यहां भव्य मेले लगते हैं, जिनमें हजारों लोग भाग लेते हैं। परम्परा के अनुसार इस मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना होती है। यहां के पुजारी धामी वंशज होते हैं।

वर्तमान में अमर सिंह धामी व गुमान सिंह धामी इस मंदिर में पुजारी का दायित्व संभाले हैं।

(by Manoj Bhatt)

Bhishma Kukreti

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नागदेव मंदिर पौड़ी गढ़वाल
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सरोज शर्मा-गढ़वाली जन प्रिय साहित्यकार
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पौडी बस स्टेशन से लगभग तीन किलोमीटर दूर कंडोलिया बुबाखाल मार्ग पर स्थित च, घैणा जंगल का बीच म नागदेव मंदिर स्थित च। प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण घैणा बांज बुरांस, गगनचुम्बी देवदार, चीड़ क पेड़ो से छणैक आंदि सूर्य कि किरण,और मंद मंद सुगंधित बयार भकजनो क हृदय मा शीतलता प्रदान करद,
मंदिर क नजदीक प्राकृतिक स्रोत क ठंडु पाणि पर्यटको कु संजीवनि क काम करद,
नगर म स्थित नागदेवता क मंदिर उत्तराखंड म गढ़वाल क नागवंशियों क प्रवास थैं सिद्ध करद, यै मंदिर कि स्थापना क बार मा अनेक मत छन, पर धार्मिक आस्था से जु कहानि उभरि कि आय, वू इन च
नागदेवता मूलरूप से डोभाल वंश कु देवता मने जांद, पौडी से लगभग 11 किलोमीटर दूर पौडी श्रीनगर राजमार्ग पर नादलस्यूं पट्टी म स्थित च, डोभ गांव का आसपास डोभाल जाति का लोग रैंदिन, ब्वलेजांद कि लगभग 200 बरस पैल डोभ गौं का डोभाल वंश म एक बच्चा ह्वै जैकु ऊपरी भाग मनुष्य क और कमर क ताल सर्प छाई जैकु नागरूप ब्वले ग्या, यू बालक जन्म से हि ब्वलदु छाई अपण जन्म क बाद वैल अपण बुबा से ब्वाल मि थैं लैंसडौन क्षेत्र मा भैरव गढ़ी मंदिर क पास कंडी मा लिजैकि स्थापित कैर दयाव। साथ ही इन ब्वाल कि कंडी लिजांद दा भयां म न रखे जा मि थैं वखी उतरयां जख मेरी स्थापना ह्वैलि। ब्वलेजांद कि डोभाल वंश, गर्ग गोत्र क वे बालक थै कंडि मा लेकि चलिन और डोभ गांव, प्रेम नगर चोपड़ा, झण्डीधार ह्वै की निकलीं, झण्डीधार से थ्वड़ा ताल ऊन भूलवश कंडी जमीन मा धैर दयाई, जैक बाद अर्ध नागेश्वर न कंडी छूण से और उठाण से मना कैर दयाई, वै बालक न कुछ दूरी पर जमीन ख्वदण क ब्वाल, देवबालक क बतयै स्थान म खुदै से शीतल जलधार निकल,,वै बालक क आदेश से वै जल म स्नान कैरिक बालक कि पूजा अर्चना कैरिक वखि स्थापित कैर द्या, तभि बटिक यू स्थान नागदेवता ब्वलेजांद, खुदै कैरिक निकलयूं वु प्राकृतिक जल स्रोत अब भि मंदिर क समीप च, और नागदेवता पत्थर शिला क रूप म दृष्टिगोचर हुंदिन।


 

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