Author Topic: Nanda Raj Jat 2014 update -हिमालयी कुम्भ नंदा राज जात 18 अगस्त से 06 सितम्बर 14  (Read 8250 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देवता भी चुनते हैं अपनी पंसद का स्थान

शुक्रवार को मां नंदा अपने अंतिम बस्ती पड़ाव वाण में ठहरी। यहां पर भक्तों का रैला उमड़ पड़ा था। वाण गांव दूधिया रोशनी में नहा रहा था और नंदा के जयकारे और शंख की ध्वनि माहौल को भक्तिमय बना रही थी।

ऐसे में लाता की भगवती ने इस शोर-शराबे से दूर रहना ठीक समझा और वह गांव से डेढ़ किमी ऊपर अपने धर्म भाई लाटू के मंदिर में आ गई। देवी ने मंदिर में ही रात्रि विश्राम किया।

देवताओं की भी अपनी पसंद होती है। यह वाण में तब देखने को मिला, जब लाता की भगवती यहां पहुंची। भगवती ने अपने ठहरने के लिए स्थान चुना। दो बार वह गांव में घूमी और दो अलग-अलग स्थानों पर कुछ देर के लिए ठहरी भी लेकिन उसे यह स्थान पसंद नहीं आए।

यहां भक्तों की भीड़ और कीर्तन भजनों का शोर चरम पर था। भगवती यहां से उठ गई और रात को अपने भाई लाटू के मंदिर में आ गई। देवी ने भाई के निवास पर ही रात्रि विश्राम किया।

लोगों का कहना था कि भगवती को जो पसंद नहीं होता, वह उसे स्वीकार नहीं करती। वह अपनी इच्छा और पसंद से ही अपने बैठने और ठहरने के स्थान का चयन करती है। लाता से राजजात में 88 वर्ष बाद भगवती की डोली शामिल हुई है। http://www.dehradun.amarujala.com/feature/dehradun-local/city-hulchul-dun/god-also-decide-place-for-himself-hindi-news/

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नई शुरुआतः पहली बार बेदनी में रात रुकेगी नंदा

शिवधाम कैलास के लिए चली नंदा अब हिमालय क्षेत्र में पहुंच चुकी है। ससुराल क्षेत्र अब कुछ ही दूर है। रविवार की शाम नंदा गैरोली पातल से होते हुए अपने दूसरे निर्जन पड़ाव बेदनी पहुंचेगी। बेदनी को पहली बार 20वां पड़ाव बनाया गया है।

बेदनी में सोमवार को नंदा सप्तमी की पूजा होगी। हर वर्ष होने वाली मां नंदा की लोकजात और 12 वर्ष में होने वाली राजजात में बेदनी का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां पर नंदा भक्त और राजकुंवर कुंड में अपने पित्रों को तर्पण देते हैं।

कुंड में हिमालय का संपूर्ण प्रतिबिंब दिखाई देता है। मान्यता है कि यहां पर मां पार्वती के पुत्र भगवान गणेश जी ने वेद लिखे थे, इसलिए यहां का नाम बेदनी है।

समुद्रतल से 3450 सौ मीटर की ऊंचाई पर हिमालय की वादियों में कई मील तक खुले स्थान के रूप में बिखरा बेदनी बुग्याल के मध्य कुंड कई प्राचीन किवदंतियों को संजोए है।

मान्यता है कि नंदा ने महिषासुर मर्दिनी के रूप में महाकाली बनकर रक्तबीज दैंत्य का वध किया था। तब भगवान शिव ने उन्हें इसी कुंड में स्नान कराया था, जिससे वे पुन: महागौरी के रुप में आ गई थी।

मान्यता यह भी है कि 12 वर्ष या उससे अधिक समय में होने वाली नंदा की कैलास यात्रा में बेदनी पहुंचने पर भगवान शंकर और महागौरी का विवाह संस्कार किया जाता है।

एक सूत (धागे) को फेर कर सात फेरे लगाए जाते हैं। बेदनी प्रकृति की अनुपम धरोहर के रूप में भी विख्यात है, लेकिन बेदनी कुछ समय से प्रकृति की मार झेल रहा है। वर्ष 2011 से भूस्खलन से बुग्याल कई जगहों पर दरक रहा है। कुंड के बाहरी ओर भी गहरी दरारें पड़ी हैं, जो लगातार बढ़ रही हैं। कुंड से पानी रिस रहा है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Himalayee Kumbh Nanda Raj Jaat concluded -कैलास के लिए विदा हुई नंदा, छह खाडू गए साथ -वापसी के पहले पड़ाव चंदनियाघाट लौटी यात्रा
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नंदा राजजात यात्रा में बुधवार को वह घड़ी आ गई, जब मां नंदा का 14 वर्ष का लंबा इंतजार आखिरकार खत्म हुआ। मां नंदा अब अपने पति परमेश्वर भगवान आशुतोष (शिव) की नगरी और अपनी ससुराल कैलास के लिए विदा हो गईं।

वैदिक अनुष्ठानों के बीच परंपरानुसार छोटा होमकुंड में पूजा-अर्चना के साथ चौसिंग्या खाडू को हिमालय के लिए विदा किया गया। करीब बारह हजार नंदा भक्त इस शुभ घड़ी के साक्षी बने।

त्रिशूली पर्वत की तलहटी पर स्थित इस पावन क्षेत्र में कुछ पलों के लिए भक्ति और उल्लास के माहौल ने हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं और हमेशा शांत रहने वाली वादियों को भी नंदा की स्तुति और जयकारों से गुंजायमान कर दिया।

एसडीआरएफ के डीआईजी संजय गुंज्याल और नौटी के ब्राह्मण सभी छह चौसिंग्या खाडुओं को कुछ दूरी तक भेजने भी गए। जबकि अन्य ब्राह्मण नंदा डोलियों के साथ लौट गए।

राजछंतोलियां छोटा होमकुंड में ही विसर्जित कर दी गई। दोपहर में करीब ढाई बजे यात्रा चंदनियाघाट पहुंच गई हैं, जबकि हजारों यात्री इससे पहले लाता कोपड़ी और जामुनडाली पहुंच गए। इससे पहले सुबह करीब 7.30 बजे यात्रा शिलासमुद्र से होमकुंड के लिए रवाना हुई। सिद्धपीठ कुरूड़ की मां भगवती की डोली की अगुवाई में राजछत्र, चौसिंग्या खाडू और यात्रा में शामिल अन्य देवी-देवताओं की छंतोलियां और निशान करीब 11-10 बजे छोटा होमकुंड पहुंचे।

यहां पर नौटी के राजगुरुओं ने शुभ मुहूर्त के अनुसार पूर्वाह्न 11.20 बजे पूजा शुरू की। राजगुरु दीपक नौटियाल, अतुल नौटियाल ने राजकुंवर परिवार के कुंवर तेजेंद्र सिंह के हाथों राजजात की मुख्य पूजा संपन्न कराई। विशेष पूजा-अर्चना के साथ यज्ञ अनुष्ठान किया गया।

रिंगाल की छंतोलियों को मां नंदा को अर्पित कर होमकुंड में विसर्जित करते हुए प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। दोपहर 12 बजे नंदा की यात्रा के पथ प्रदर्शक चौसिंग्या खाडू की पीठ पर फंची (पोटली) बांधी गई।

इस फंची में देवी के मायके की समलौंण के साथ नंदा की स्वर्ण प्रतिमा, अन्य आभूषण, अनाज, मौसमी फल-फूल और सब्जी व अन्य जरूरी वस्तुओं बांधकर उसे कुछ आगे तक जाकर हिमालय के लिए नम आंखों से विदा किया गया। इस मौके पर कई नंदा भक्त भावुक हो गए।

यहां पर पीछे मुड़कर न देखने की परंपरा का निर्वहन करते हुए सिद्धपीठ कुरुड़ की भगवती की डोली के साथ राजजात यात्रा अन्य देवी-देवताओं के निशान के साथ चंदनियाघाट के लिए वापस हो गई।

सुबह- 7.30� शिला समुद्र से यात्रा प्रस्थान
सुबह- 11.10 यात्रा छोटा होमकुंड पहुंची
सुबह- 11.20� छोटा होमकुंड में हवन-पूजा
सुबह- 11.53� नंदा और शिव का पूजा संपन्न
दोपहर- 12.00 चौसिंग्या खाडू की कैलास विदाई
दोपहर- 12.05 यात्रा चंदनियाघाट के लिए रवाना

छोटा होमकुंड में ही हुई राजजात
कर्णप्रयाग। राजजात समिति के महामंत्री भुवन नौटियाल ने बताया कि पहले मुख्य होमकुंड में राजजात होनी थी। रास्ता दुर्गम होने से छोटा होमकुंड में ही इस बार भी पूजा का निर्णय लिया गया।

वर्ष 1987 और वर्ष 2000 में छोटा होमकुंड में ही राजजात की गई थी। उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद पहली बार आयोजित नंदा की होमकुंड में हुई सफल यात्रा पर राजजात समिति सहित प्रशासन ने राहत की सांस ली है

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नंदा ससुराल रवाना, राजजात यात्रा की वापसी शुरू
Posted On September - 4 - 2014

देहरादून, 4 सितंबर (भाषा)
उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित होमकुंड से कल परंपरागत रीति रिवाजों और विधि विधान के साथ कल नंदा देवी को उनके पति भगवान शिव के घर कैलाश रवाना कर दिया गया जिसके बाद 17 दिन पहले शुरू हुई इस विशाल राजजात यात्रा की वापसी शुरू हो गई।
हिमालयी महाकुम्भ के नाम से प्रसिद्ध नंदादेवी राजजात यात्रा कल अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शिलासमुद्र से होमकुंड पहुंची जहां विशेष पूजा अर्चना करने के बाद नंदा देवी को दी गई भेंट, जेवर, श्रृंगार सामग्री चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाली भेड़) की पीठ पर बांधकर उसे अनन्त कैलाश की ओर विदा किया गया।  साथ ही होमकुंड में देवी की प्रतिमा और राजछतोली का विसर्जन कर होमकुंड के जल से भरे घड़े को लेकर यात्रा की वापसी आरम्भ हुई। घड़े में भरे जल को राजकुंवरों को प्रसाद के रूप में दिया गया। इस जल को लेकर राजवंश के प्रतिनिधि अपने गांव कांसवा तथा राजगुरूओं के गांव नौटी लाकर देवी देवताओं को समर्पित करेंगे।
इसके बाद यात्रा अपने 17वें पड़ाव चन्दनियांघाट पहुंची। 18 अगस्त को नौटी से प्रारम्भ हुई यह यात्रा अब तक लगभग 175 किलोमीटर से अधिक दूरी तय कर चुकी है।  नौटी, इड़ाबधाणी, कांसुआ, सेम, कोटी, भगोती, कुलसारी, चेपडिय़ूं, नन्दकेशरी, फल्दियागांव, मुन्दोली, वाण के यात्रा पड़ाव आबादी वाले क्षेत्रों में थे, जबकि गैरोलीपातल, वेदनी, पातरनचौणियां, शिलासमुद्र तथा चन्दनियांघाट यात्रा के निर्जन पड़ाव रहे। चन्दनियांघाट के पश्चात यात्रा का अगला पड़ाव सुतोल होगा।
गौरतलब है कि नंदा राजजात यात्रा हर 12 साल में एक बार आयोजित की जाती है और मां नंदा को मायके से ससुराल विदा करने के लिए देश विदेश के हजारों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं।
उत्तराखंड सरकार के अनुसार, इस बार भी इस यात्रा में 50,000 से एक लाख श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।

http://dainiktribuneonline.com/2014/09/%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4/


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यात्रा के दौरान उठे विवाद से घाट भी अछूता नहीं रहा। यहां भी वाण और सुतोल के बीच हुए झगड़े और सुतोल में नंदा राजराजेश्वरी की डोली के न पहुंचने को लेकर बातचीत होती रही। कुरुड़ के लोग भी मान रहे हैं कि नंदा राजराजेश्वरी को सुतोल न जाने देना एक तरह से परंपरा की अनदेखी ही है।

कुरुड़ के मुंशीराम गौड़ के मुताबिक अब तक तीन जात में राजराजेश्वरी की डोली सुतोल जाती रही है। सुतोल को ही एक तरह से नंदा की मायके वापसी का संकेत माना जाता है। यहां से डोली वाण की ओर बढ़ती है पर वाण गांव में नहीं जाती। वाण नंदा का ससुराल क्षेत्र है। वाण की बजाय डोली कुलिंग होते हुए देवराड़ा पहुंचती है।

पर वापसी के पड़ाव घाट में यात्रा के अंतिम चरण की थकान भी देखने को मिली। नंदा के बीत और जागर घाट में गूंज रहे हैं पर यात्रा के शुरुआती दिनों का उत्साह यहां नहीं है। पिछली चार जात से लगातार भंडारे का आयोजन कर रहे राधाकृष्ण भट्ट के मुताबिक पिछले तीन दिन में घाट से होकर करीब 15 हजार यात्री वापस लौट चुके हैं। 1968 की जात में कुल 250 यात्री ही यहां से होकर वापस लौटे थे। वर्ष 2000 की जात में करीब 5000 यात्री यहां से वापस लौटे थे।

http://www.dehradun.amarujala.com/feature/city-hulchul-dun/nand-doli-back-to-its-origin-hindi-news/?page=1

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गोपेश्वर: नंदा देवी राजजात शुक्रवार को 19वें पड़ाव में घाट पहुंची। इस दौरान यहां श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर मनौती मांगी।

नंदा देवी राजजात के समापन से एक दिन पहले सुतोल गांव से द्यो सिंह देवता की पूजा अर्चना के बाद प्रात: आठ बजे रवाना हुई। डोली रवाना होने से पहले राजा की ओर से झगुली पागुड़ी (वस्त्र और पगड़ी) का परंपरानुसार दस्तूर (रस्म) दिया गया। मां नंदा की डोली पेरी, पल्टिंगधार, गेरी, सितेल, गुलाड़ी, वादुक सहित अन्य गांवों से होते हुए घाट के कुमारतोली पहुंची। यहां गुरु रामराय विद्यालय में नंदा देवी राजजात का 19वां पड़ाव है। देवी नंदा के साथ दशमद्वार व ल्वाणी की ज्वाल्पा की डोलियां व ईराणी की छंतोली, भूम्याल की छंतोली सहित अन्य छंतोलियां भी शामिल हैं। नंदा देवी राजजात की इस यात्रा जिस पथ से गुजरी वहां श्रद्धालुओं ने मां नंदा की पूजा अर्चना कर मनौतियां मांगी। साथ ही जागर गीत गाकर मां नंदा को विदा किया। नंदा देवी राजजात के इस पथ पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के चलते वाहनों का भी अकाल रहा। वाहन न मिलने से लोग ट्रकों, पैदल ही सफर करते देखे गए। शनिवार को प्रात: आठ बजे मां नंदा की राजजात घाट से नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग होते नौटी पहुंचेगी। जो यात्रा का अंतिम पड़ाव है। दूसरी ओर बधाण की राज राजेश्वरी की डोली वाण पहुंची। यह डोली शनिवार को कुलिंग जाएगी। (dainik jagran)

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Manoj Istwal
1 hr · Edited ·

नंदा राज जात स्पेशल-
मित्रों कोशिश कर रहा हूँ वह सत्य दिखाने की जिसे हम हलके में ले लेते हैं और इसे यूँही छोड़ देते हैं.
क्या आप ने भी देखि जौंलमंगरी........?
नील गंगा से जब आप गैरोली पाताल की खड़ी चढ़ाई चढ़ते है तब आप गैरोली पातळ से लगभग ३०० मीटर या ४०० मीटर पहले एक स्थान में बैठते हैं. अकस्मात ही आप वहां थकान को कम कने बैठ जाते है. यहाँ पर आपको शुद्ध हवा का लुफ्त लेने को भी मिलता है. यही एक जौंल मंगरी है (पानी का धारा/पनघट)
कहा जाता है कि वाण गॉव की सरहद रणकधार में रणका सुर का संहार करने के पश्चात माँ नंदा गुस्से में यहाँ तक आ पहुंची और जब गुस्सा उतरा तो उन्हे प्यास लगने लगी ..उन्होंने अपने भाई लाटू से इस संभंध में इच्छा ब्यक्त की तब लाटू ने अपने त्रिशूल को जमीन पर गाड़ा और वहां से पानी की दो धाराएं फूट पड़ी. माँ नन्दा ने यहाँ असुर संहार के बाद स्नान किया और गैरोली पातळ के लिए आगे बढ़ गई.
आज भी यहाँ वह पानी का धारा मौजूद ऐ. लेकिन अब एक ही धारा रह गई क्योकि दूसरी को चोर चुरा कर देवाल के आस-पास कहीं ले गए हैं.
मित्रों यह खबर बहुत कम के पास है और बहुत कम लोग इस रहस्य को जानते हैं. मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे एक ऐसा पुराना व्यक्ति उसी जगह मिल गया जहाँ पर यह धारा है..लेकिन आज भी यह रहस्य मेरे साथ है कि जब तक मैं धारा कि फोटो खींचकर पलटकर देखता और उनसे कुछ और पूछता वह बुजुर्ग जाने कहाँ चले गए.

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धर्म की राह में स‌द‌ियों पुराना नरकंकालों का टीला - नेशनल जियोग्राफी चैनल, ऑक्सफोर्ड यूनि. ने किया शोध

हिमालयी कुंभ के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड की श्रीनंदा राजजात यात्रा 14 साल बाद एक बार फिर रूपकुंड से होकर गुजरी। राजजात के हजारों यात्रियों ने रूपकुंड में और उसके आसपास पड़े सैकड़ों नरकंकालों को देखकर दांतों तले अंगुली दबा ली। सदियों से रहस्य-रोमांच के आवरण में लिपटे रूपकुंड के नरकंकालों पर काल (वक्त) भारी पड़ने लगा है।

ग्लोबल वार्मिंग के चलते कम बर्फबारी, ग्लेशियरों के सिकुड़ते जाने से जनपद के सीमांत क्षेत्र में स्थित रूपकुंड भी सूखने के कगार पर है। इसलिए बर्फ और ठंडे पानी में कुदरती तौर पर संरक्षित कंकाल क्षरित होने लगे हैं। अगर इनके संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई तो बहुत जल्द ये अतीत बन जाएंगे।��

दोगुने कद के रहे होंगे उस वक्त के लोग

रूपकुंड में पाए गए कंकालों में से पूरी तरह साबुत तो नहीं बचे हैं लेकिन हाथ-पैर और दूसरे अंगों की लंबाई मौजूदा मानव से दोगुनी है। अनुमान लगाया गया है कि जिन लोगों के कंकाल हैं उनकी औसत लंबाई 10 से 12 फीट के बीच रही
होगी।

कितने पुराने, क्या है मान्यता, हकीकत क्या

कार्बन डेटिंग में विद्वानों ने कंकालों को 600 से 800 साल पुराना पाया है। कुछ विद्वान एक साथ इतने कंकालों को पाए जाने को सामूहिक खुदकुशी अथवा कुदरत के कहर से जोड़ते हैं। स्थानीय मान्यता इसे चौदहवीं सदी में संपन्न हुई श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा के� साक्ष्य के रूप में देखती है।

स्थानीय लोग बताते हैं कि 14वीं सदी में कन्नौज के राजा जसधवल एवं रानी बल्लभा ने देवी दोष निवारण के लिए श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा की थी। यात्रा में राजा ने पवित्रता का ध्यान नहीं रखा इसलिए उसे देवी के कहर से महारानियों और अनुचरों समेत रूपकुंड के पास अपनी जान गंवानी पड़ी।

कुछ ऐसे भी हैं जो रूपकुंड को स्वर्ग के मार्ग के तौर पर बताते हुए इन कंकालों को पांडवों के स्वर्गारोहण से जोड़ते हैं। अब इसमें कौन सा दावा सही है ये तो नहीं कहा जा सकता है पर इन कंकालों की अपनी कोई न कोई कहानी तो होगी ही।

1956 में रूपकुंड के ट्रैकऔर कंकालों पर शोध शुरू हुए। कार्बन डेटिंग में कंकाल 500-600 वर्ष पुराने पाए गए। हालांकि बाद में नेशनल जियोग्रैफी चैनल के विद्वानों और आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध करके इन्हें करीब 800 साल पुराना बताया।

मानव विकास संग्रहालय के पूर्व निदेशक प्रोफेसर आरएस नेगी कहते हैं कि अगर नंदा रातजात यात्रा उस दौर में होती थी तो इन्हें उससे जोड़ा जा सकता है।

कुदरती सौंदर्य के बीच स्थित रूपकुंड उपेक्षा का शिकार

बर्फीली चोटियों और शानदार कुदरती नजारों के बीच स्थित रूपकुंड का आकर्षण सैलानियों को बरबस ही अपनी ओर खींचता है। कंकालों का रहस्य और उससे गुंफित अनेक गाथाओं को जानने की उत्सुकता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। लेकिन इन कंकालों के संरक्षण की दिशा में शासन स्तर पर कुछ भी नहीं किया गया।

नर कंकालों के संरक्षण के लिए पूर्व में राज्य सरकार से वार्ता हुई लेकिन सरकार ने किसी संस्था अथवा व्यक्ति को इसकी जिम्मेदारी नहीं सौंपी। कंकालों पर शोध जारी है।
-डॉ. विनोद कौल कार्यालय अध्यक्ष भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण देहरादून।

मृत जीव अपघटक जैविक प्रक्रिया के तहत नष्ट होते हैं।� यह प्रक्रिया भी कंकालों को नुकसान पहुंचा रही है। पहले वर्ष भर क्षेत्र हिमाच्छादित रहता था जिस वजह से कंकाल सुरक्षित थे। लेकिन अब ग्लोबल वार्मिंग के चलते इस क्षेत्र में� सिर्फ छह माह ही बर्फ रहती है। संरक्षण के लिए कंकालों पर रासायनिक लेप लगाने के अलावा रूपकुंड को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा सकता है।

-डॉ. राजेश नौटियाल, विभागाध्यक्ष, भूगोल राजकीय महाविद्यालय कर्णप्रयाग।

रूपकुंड में मौजूद नरकंकालों को विश्व धरोहर घोषित करने की मांग की जा रही है। इनके संरक्षण के लिए जल्द प्रयास किए जाएंगे और सरकार से बात की जाएगी।
-डॉ. अनुसूया प्रसाद मैखुरी, विधायक कर्णप्रयाग।

http://www.dehradun.amarujala.com/feature/city-news-dun/800-years-old-man-skeleton-in-nanda-raj-jat-track-hindi-news/?

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नौटी में होगा नंदा राजजात का समापन

18 अगस्त से शुरू हुए हिमालयी सचल महाकुंभ श्रीनंदा देवी राजजात में शामिल बारह थोकी ब्राह्मणों और कुमाऊं के राजवंशियों ने शनिवार को विदा ले ली है।

संगम पर हुआ शुद्धिकरण
अलकनंदा और पिंडर के पवित्र संगम पर हवन और स्नान के बाद मां गंगा को प्रणाम कर ब्राह्मणों, राजवंशियों सहित श्रद्धालुओं ने अपनी राह पकड़ी। घाट से नौटी पंहुचने से पहले राजकुंवरों, कुमाऊं के राजवंशियों और बारह थोकी ब्राह्मणों का यहां संगम पर शुद्धिकरण हुआ।

राजजात यात्रा के मुख्य पुजारी अनुसूया प्रसाद कोठियाल के अनुसार यात्रा के दौरान अशुद्धियों, आसुरी शक्तियों सहित गलतियों की क्षमा याचना के लिए गंगा स्वरूपा अलकंनदा और पिंडर के प्रयाग पर यह यज्ञ किया जाता है।

यहां राजवंशी कुंवर, कुमाऊं के राजवंशी, राज गुरु और श्रद्धालु स्नान कर जनेऊ बदलते हैं जिसके बाद मां गंगा और मां उमा को प्रणाम कर कुमाऊं के राजवंशी और बारह थोकी ब्राह्मण राजकुंवरों और राजगुरुओं से विदा लेते हैं।

शनिवार को प्रयाग पर करीब हवन आदि अनुष्ठान किए गए जिसमें राजकुंवर डा. राकेश सिंह, कुंवर तेजेंद्र सिंह, कुमाऊं के राजवंशियों के प्रतिनिधि विधायक ललित फर्स्वाण, राजगुरु भुवन नौटियाल, दीपक नौटियाल, डॉ. अतुल नौटियाल, राकेश रतूड़ी सहित 12 थोकी ब्राह्मण शामिल रहे।

भुवन नौटियाल ने बताया कि रविवार को नौटी से राजकुंवरों की विदाई के बाद राजजात यात्रा का समापन होगा। इस धार्मिक उत्सव को देखने सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु संगम पर पहुंचे।

मंदिर में प्रवेश करेगी दशमद्वार की नंदा
नंदा को कैलास विदा कर दशमद्वार की मां नंदा की डोली शनिवार को बांतोली पहुंची। अंतिम पड़ाव बांतोली में ग्रामीणों ने अपनी आराध्य देवी का भव्य स्वागत किया। बांतोली में विश्राम के बाद रविवार को नंदा भाई लाटू और स्वर्का के भूमियाल (केदारू) देवता भी विदा होंगे जबकि नंदा की डोली हिंडोली स्थित मंदिर में प्रवेश करेगी।

नंदा को कैलास विदा करने के लिए दशमद्वार की नंदा की डोली 22 अगस्त को कैलास के लिए रवाना हुई थी। 29 अगस्त को वाण में राजजात में शामिल हुई। होमकुंड में पूजा अर्चना के बाद शुक्रवार को घाट और शनिवार को घाट से करीब 19 किमी दूर बांतोली पंहुची।

पुजारी प्रेमबल्लभ पंत के अनुसार बांतोली में रात्रि विश्राम के बाद मां नंदा अपने भाई नौली के लाटू और स्वर्का के भूमियाल देवता से विदा होगी। यहां पर इस धार्मिक उत्सव को भव्य रूप से मनाया जाता है।

स्थानीय ग्रामीण लक्ष्मण सिंह बिष्ट, महिपाल सिंह, भरत सिंह, जितेंद्र सिंह आदि के अनुसार रविवार को मां नंदा के मंदिर में प्रवेश की भव्य तैयारियां की जा रही http://www.dehradun.amarujala.com/news/city-hulchul-dun/nanda-raj-jat-yatra-closing-hindi-news/

 

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