Author Topic: Nanda Raj Jat Story - नंदा राज जात की कहानी  (Read 123826 times)

पंकज सिंह महर

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दसवां पड़ाव- फल्दिया गांव

नन्दकेशरी से फल्दिया गांव के लिये प्रस्थान करते समय रास्ते में पूर्णाशेरा पर भेकल झाड़ी में देवी की यात्रा का विशेष महत्व माना जाता है। कहा जाता है कि जब देवी कैलाश जा रही थी तब दैत्यों से बचने के लिये भागते हुये लहलहाते हुये खेतों में रास्ता बनाकर बालियों के बीच छिप गईं, दैत्यों के द्वारा देख और पहचान लिये जाने पर देवी क्रोधित हो गयी और उस स्थान पर कभी भी फसल हरी न होने का श्राप दे डाला। मार्ग में देवाल विकास खण्ड का शिव मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र रहता है, मन्दिर के पास ही राजजात के दौरान एक वृहद मेला लगता है। उसके बाद यात्रा में सम्मिलित विभिन्न देवी-देवताओं की छ्तोलियां हाट कल्याणी उलंगरा में पूजा पाकर फल्दिया गांव पहुंचती हैं।



पंकज सिंह महर

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ग्यारहवां पड़ाव-मुन्दोली

फल्दिया गांव से आगे पिलफाड़ा मन्दिर में बड़ा मेला लगता है, यहां पर भगवती ने शस्त्रों से पिलवा दैत्य को फाड़ डाला था, इसलिये इस स्थान का नाम पिलफाड़ा पड़ा। ल्वाणी, बगरीगाड़ में पूजा स्वागत पाते हुये यात्रा रात्रि विश्राम हेतु मुन्दोली पहुंचती है। मुन्दोली के ऊपर लोहाजंग की तरफ गांव की परम्परा है कि जिसका वंश मिटता है या जिसके कोई पुत्र-संतान नहीं होती है, वही इस स्थान पर सुरई का पेड़ लगाता है और चबूतरा बनवाता है और यह चबूतरा उसी व्यक्ति के नाम से प्रसिद्ध हो जाता है। जो यात्री सम्पूर्ण राजजात में भाग नहीं ले पाते और दुर्गम हिमालय की यात्रा करना चाहते हैं या जिनके पास समय की कमी होती है, वे सीधे मुन्दोली पहुंचकर घाट तक एक सप्ताह तक की कठिन और दुर्गम यात्रा में सम्मिलित होते हैं।

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वाण गांव में लाटू देवता का मंदिर


बारहवां पड़ाव- वाण

मुन्दोली से आगे लोहाजंग  से हिमालय काफी नजदीक दिखाई देता है, लोकगीतों के अनुसार यहां पर देवी ने लोहासर नाम के दैत्य का वध किया था, उसके साथ हुई जंग के कारण इस स्थान को लोहाजंग या ल्वाजिंग कहते हैं। ल्वाजिंग में काली व नन्दादेवी के मंदिर हैं।
     वाण में दशोली कुरुड़ की नन्दामय लाटू, हिण्डोली, दशमद्वार की नन्दामय लाटू, मोठा का लाटू, केदारु पौल्यां, नौना दशोली की नन्दादेवी, नौली का लाटू, बालम्पा देवी, कुमजुग से ज्वाल्पा देवी की डोली, ल्वाणी से लासी का जाख, खैनुरी का जाख, मझौटी की नन्दा, फर्सवाण फाट के जाख, जैसिंग देवता, काण्डई लांखी का रुप दानू, बूरा का द्यौसिंह, जस्यारा, कनखुल, कपीरी, बदरीश पंचायत, बदरीनाथ की छतोली, उमट्टा, डिम्मर, द्यौसिंह, सुतोल, कोट, डंगोली की कटार स्यारी, भेंटी की भगवती, बूरा की नन्दा, रामणी का त्यूण, रजकोटी, लाटू, चन्दनिय्यां, पैनखण्डा आदि २०० से अधिक देवी-देवताओं का मिलन होता है। दशोली, दशमद्वार, लाता, अल्मोड़ा, कुरुड़, बधाण की नन्दादेवियां डोलियों में सजकर आती है और जात में शामिल होती हैं।
       वाण से लाटू देवता की अगुवाई में चौसिंग्या खाड़ू के साथ यात्रा आगे बढ़्ती है। जाख देवता का अद्भुत कटार भेद दर्शन भी यहां पर होता है, यहां स्वर्का का केदारु, मैखुरा की चण्डिका, घाट कनोल होकर तथा रैंस असेड़ सिमली, डुंगरी, सणकोट, नाखाली व जुनेर की छलोलियां चार ताल व चार बुग्यालों को पार करके वाण में राजजात में शामिल होती हैं। वाण में देवदार के पेड़ों से घिरा लाटू देवता का मंदिर है।

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तेरहवां पड़ाव- गैरोली पाताल

वाण से आगे रणकी धार में भगवती नन्दा ने अपने यात्रा पथ के अंतिम दैत्य का संहार किया था, वाण के लाटू देवता के शौर्य और निष्ठा से प्रसन्न होकर देवी ने अपने गणों से कहा था कि अब वाण का लाटू मेरी यात्रा का पथ प्रदर्शक होगा। वाण में लाटू ने यात्रा की पवित्रता के लिये अनेक प्रतिबंधों का वचन देवी से लिया था। रणकीधार से आगे कैलगंग में यात्री स्नान करते हैं और तिलपात्र करते हैं, यहां पर गाढ़े के कपड़े का थान नदी में डाल कर पार किया जाता है। प्राचीन मान्यता है कि इस नदी में चाहे जितना भी पानी हो, वाण के लाटू देवता अपना निशान डालकर इसके जल स्तर को इतना कम कर देते हैं कि यात्री इसे आसानी से पार कर लेते हैं। रात्रि विश्राम गैरोली पाताल में होता है।

पंकज सिंह महर

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चौदहवां पड़ाव- पातर नचौणियां

गैरोली पाताल से यात्रा दल वैतरणी पहुंचता है, जिसे अब वेदनी बुग्याल कहा जाता है। यहां पर हिमालय की तलहटी में स्थित सुन्दर कुण्ड को वेदनी कुण्ड कहा जाता है, यहां से पेड़ अब नाममात्र के ही होते हैं, अधिक ऊंचाई के कारण यहां से आगे पेड़ कम हैं।
   वेदनी कुण्ड से यात्रा दल पातर नचौणियां पहुंचता है, यहीं पर पूजा के बाद विश्राम किया जाता है। इस स्थान का नाम पहले निरालीधार था, माना जाता है कि चौदहवीं शताब्दी में कन्नौज के राजा जसधवल ने यात्रा की परम्पराओं का उल्लंघन करते हुये राजजात में शामिल होकर यहां पर नर्तकियों से नाच करवाया था, जो देवी श्राप के कारण शिलारुप हो गईं, तभी से इस स्थान का नाम पातर नचौणियां पड़ा। इस क्षेत्र से जड़ी-बूटी, फूल और ब्रह्मकमल की खुशबू का नशा यात्रियों को महसूस होने लगता है।

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पन्द्रहवां पड़ाव- शिला समुद्र

पातर नचौणियां से तेज चढ़ाई पार कर यात्रा कैलवा विनायक पहुंचती है, यहां पर गणेश जी की भव्य पाषाण मूर्ति है। यहां से नन्दा घुंघटी व त्रिशूली पर्वत के दर्शन होते हैं, कैलवा विनायक में द्यौसिंह देवी की अगवानी करते हैं, यहां से उसका क्षेत्र आरम्भ होता है। बताया जाता है कि यहां पर कैलवा नाम का गण था, जिसे देवी ने वरदान दिया था कि राजजात में तुमको रवाजा (च्यूड़े) आदि चढ़ाये जायेंगे। कैलवा विनायक से आगे यात्रा बगुवाबासा पहुंचती है, भगवती के वाहन शेर का निवास होने के कारण इस जगह का नाम बगुवाबासा पड़ा। यहां पर स्वामी प्रणवानन्द जी की बनवाई एक धर्मशाला है, जिसे अब बल्लभा स्वेलड़ा (बल्लभा का प्रसूतिगृह) कहा जाता है, यहीं पर कन्नौज के राजा जसधवल की पत्नी को राजजात के दौरान प्रसव हुआ थाम जो शापित हुआ।
      यहां से आगे यात्रा रुपकुंड पहुंचती है, यहां पर आज भी सैकड़ों अस्थिपंजर पड़े हैं, यह अस्थिपंजर किसके है, अलग-अलग इतिहासकारों के अलग मत हैं। लेकिन हमारी लोकश्रुति है कि कन्नौज के राजा जसधवल ने जब अपनी सेना से साथ चौदहवीं शताब्दी में परम्परा के विरुद्ध राजजात की, तो यहां पर उसकी सेना सहित अंत हो गया और यह उन्हीं के कंकाल हैं। १६२०० फिट की ऊंचाई पर बसे रुपकुंड से आगे ज्यूंरागली धार तक पूरे यात्रा मार्ग का सबसे कठिन भाग है। शिलासमुद्र पहुंचने के लिये इस चोटी को पार करना जरुरी होता है, लाटू देवता ने यहां पर राजजात यात्रियों को पार कराने वाला टैक्स देने का प्रावधान बनाया था, जो आज भी लागू है। ग्लेशियर शिलाओं, समुद्रनुमा बीरान स्थान शिलासमुद्र पर जात रात्रि विश्राम करती है। यहां पर सूर्योदय से पहले नन्दा घुंघटी पर्वत पर तीन दीपक और धूप की लौ दिखाई देती है।

पंकज सिंह महर

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सोलहवां पड़ाव- चनणियां घट

शिला समुद्र से प्रातः यात्री दल होमकुण्ड के लिये रवाना होता है, शिला समुद्र में पिण्ड तर्पण किये जाते हैं। थोड़ी दूर चलने पर घी-थोपिया पर देवी ने शिला खड़ी की है, इसके बाहर एक रेखा से भी खिंची हुई है, यहां पर यात्रा में थोड़ा मनोरंजन का भी प्रावधान है। कहा जाता है कि जो यात्री रेखा से बाहर होकर घी फेंकेगा और जिसका घी शिला पर नहीं चिपकेगा, वह वर्णशंकर होगा  ;D इसके बाद यात्री दल होमकुण्ड पहुंचकर होमकुण्ड यग्य स्थल के दर्शन करता है। पवित्र कुण्ड के यहां स्थित होने के कारण ही इसका नाम होमकुण्ड पड़ा है। यहां पर सभी मायके वाले अपनी छतोलियों को विसर्जित कर देते हैं और ससुराल क्षेत्र की भोजपत्र से बनी छतोलियां और देवी डोलियां वापस चली आती हैं। यग्य होता है, चौसिंग्या खाडू, देवी और उसके साथ आये २०० से अधिक देवी-देवताओं की पूजा होती है। फिर चार सींग के मेढे़ (चौसिंग्या खाडू) को अनन्त कैलाश के लिये विदा किया जाता है। होमकुण्ड में यात्रा विसर्जन के बाद यात्री दल वापस चन्दनियां घट पहुंचता है। यह स्थान देवी के गण चन्णियां का है, यहीं पर यात्रा रात्रि विश्राम करती है।

पंकज सिंह महर

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सत्रहवां पड़ाव-सुतोल

चनणियां घट से सुतोल आने के लिये रिंगाल, देवदार और सुरई के घनघोर जंगल हैं, इसे पार करके यात्री सुतोल गांव पहुंचते हैं। पांच दिन के बाद यात्रियों को गांव और आबादी के दर्शन होते हैं, रुपगंगा और नन्दाकिनी के संगम के दाहिनी ओर बसे सुतोल गांव के लोग यात्रियों की आवभगत करते हैं। यहां पर बधाण की नन्दा व कुरुड़ की नन्दा के पुजारी सभी यात्रियों को सुफल देते हैं। इस स्थान से सभी देवता अपने-अपने गांवों, घरों और थानों को प्रस्थान करते हैं।

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अठारहवां पड़ाव- घाट

सुतोल से चलकर राजछ्तोली वाला यात्री दल घाट पहुंचता है और वहां पर विश्राम करने के बाद अगले दिन बस द्वारा नौटी वापस पहुंचता है और यात्रा पूर्ण होती है।

इस प्रकार १९ पड़ाव पार कर नन्दा राजजात यात्रा पूर्ण होती है।

पंकज सिंह महर

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इस यात्रा के दौरान हर पड़ाव और हर मंदिर पर नन्दा की जागर भी लगाई जाती है और जागर में यात्रा मार्ग का भी परिचय कराया जाता है। इसका उदाहरण नीचे प्रस्तुत है-

जब यात्रा छतरुवा खाल की धार में पहुंचती है तो शंख ध्वनि के साथ जागर लगाई जाती है-


ये आई पहुंची धरम्या बैंलो वै छतरुखा खाल,
ये नोल्या भढ़ धरम्या बैंलो वै सुदव्यूजा हेग्या।
नौल्या भढ़ धरम्या बैंलो वै सुदविजा हेग्या,
ये नोल्या भढ़ हर्या धरम्या बैंलो वै नन्दा की जात,
ये मिलत जाण धरम्या बैंलो वै नन्दा की जात॥

 

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