Author Topic: पूर्णागिरी मंदिर उत्तराखंड ,Purnagiri Temple Uttarakhand  (Read 138437 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
पूर्णागिरि धाम को ट्रस्ट बनाने की मांग
=====================

टनकपुर: देश के सुविख्यात मां पूर्णागिरि धाम को ट्रस्ट बनाने व शारदीय नवरात्र से पूर्व क्षतिग्रस्त पूर्णागिरि मार्ग ठीक किये जाने की मांग को लेकर हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी के नाम संबोधित ज्ञापन डिप्टी कलक्टर को सौंपा।

हिंजामं के प्रदेश मंत्री नवीन बिष्ट की अगुवाई में कार्यकर्ताओं ने डीएम के नाम संबोधित ज्ञापन डिप्टी कलेक्टर जगदीश चन्द्र कांडपाल को सौंपा। इसमें कहा है कि पूर्णागिरि धाम को ट्रस्ट बनाने की मांग को लेकर हिंजामं समय-समय पर आंदोलन करता रहा है।

 कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा ट्रस्ट की घोषणा भी की जा चुकी है। लेकिन अब तक ट्रस्ट की कार्रवाई शुरू नहीं हुई है। तीर्थयात्रियों की सुविधा, पर्यटन व क्षेत्र के विकास के लिए शीघ्र ट्रस्ट बनाने व क्षतिग्रस्त पूर्णागिरि मार्ग को शारदीय नवरात्र से पूर्व ठीक किये जाने की मांग की गई।

Dainik jagran

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
पूर्णागिरि में सुचारू हुई विद्युत व्यवस्था
=======================

पिछले पांच अगस्त से ठप पड़ी पूर्णागिरि क्षेत्र की विद्युत व्यवस्था को मंगलवार को सुचारू कर दिया गया है। विद्युत वितरण खंड के अधिशासी अभियंता चंदन सिंह बसनेत ने बताया कि भारी वर्षा के कारण यहां की व्यवस्था पांच अगस्त से पूरी तरह से ठप पड़ी हुई थी।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में पूरे क्षेत्र में बिजली के पोलों और तारों को दुरुस्त कर सप्लाई सुचारू कर दी गई है। जिससे पूर्णागिरि आने वाले श्रद्घालुओं को दिक्कतों का सामना नहीं करना पडे़गा।

Source dainik jagran

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
पूर्णागिरि क्षेत्र में लगाए जाएंगे सीसी कैमरे
======================

अगले माह से शुरू होने जा रहे सुविख्यात मां पूर्णागिरि धाम मेले कि तैयारियां जोर-शोर पर हैं। डीएम ने मेले क व्यवस्थाओं को लेकर पूर्णागिरि क्षेत्र का जायजा लिया।

मालूम हो कि पूर्णागिरि मेला होली पर्व के बाद से शुरू होने जा रहा है। मेले की व्यवस्थाओं को लेकर सोमवार को डीएम द्वारा चम्पावत में बैठक रखी गयी है। इधर डीएम आशीष जोशी ने मां पूर्णागिरि धाम तक जाकर अगले माह से शुरू होने जा रहे मेले की व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने मेले से पहले पानी, सडक, बिजली आदि व्यवस्था ठीक करने के संबंधित विभागों को निर्देश भी दिये। उन्होंने कहा कि सुरक्षा की दृष्टि से इस बार पूर्णागिरि मेले में जगह-जगह सीसी कैमरे भी लगाये जायेंगे। पूर्णागिरि मेला कमेटी के अध्यक्ष किशन चंद्र तिवारी ने पूर्णागिरि क्षेत्र में बिजली की लो वोल्टेज की समस्या उठाते हुए इसके निस्तारण की मांग की। इस मौके पर एसडीएम शिवचरण द्विवेदी, तहसीलदार वीएन शुक्ल, कोतवाल एलएम विश्वकर्मा आदि मौजूद थे।



Source Dainik jagran

विनोद सिंह गढ़िया

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 1,676
  • Karma: +21/-0
चम्पावत के टनकपुर तहसील से 22 किमी दूर समुद्र तल से करीब पांच हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित मां पूर्णागिरि धाम आस्था और शक्ति का प्रतीक है। मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की शक्ति स्वरूपा मां सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

देश विदेश से प्रतिवर्ष यहां करीब तीस लाख श्रद्धालु मां के दर्शन करने पहुंचते हैं। नवरात्र में मेले के दौरान मां के भक्तों की यहां एक से दो किमी लंबी लाइन लग जाती है। बावजूद इसके घंटों इंतजार के बाद श्रद्धालु मां के दरबार में प्रसाद, लाल चुनरी, घंटियां, नारियल, सिंदूर आदि चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं। पूर्णागिरि धाम के नीचे काली मंदिर व भैरव मंदिर है। माता के दर्शन के बाद तीर्थयात्री यहां मां कालिका व भैरव बाबा के दर्शन करते हैं। मां की पहाड़ी के ठीक नीचे बह रही शारदा नदी और आसपास ऊंचे-ऊंचे पहाड़ प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम छटा बिखेरते हैं।

मान्यता है कि माता पार्वती द्वारा राजा प्रजापति के यज्ञ में आहुति देने के बाद भगवान शिव उनके शव को लेकर आकाश मार्ग से गुजरते हैं। माना जाता है कि 51 स्थानों पर पार्वती के अंग गिरे थे। इसमें पूर्णागिरी धाम में माता पार्वती की नाभि गिरी थी। आज भी मंदिर में नाभि स्थल को आसानी से देखा जा सकता है।


पौराणिकता : मां पूर्णागिरि धाम का इतिहास काफी पुराना है। मान्यता है कि गुजरात निवासी श्री चंद्र तिवारी ने संम्वत 1621 में यमनों के अत्याचार से दुखी होकर चम्पावत में चंद वंशीय राजा ज्ञान चंद के दरबार में शरण ली थी। उसी समय एक रात्रि उन्हें सपने में देवी मां पूर्णागिरि ने पूजा स्थल बनाने का आदेश दिया। मां के आदेश का पालन कर श्री तिवारी ने संम्वत 1632 में मां पूर्णागिरि धाम के मंदिर की स्थापना कर पूजा पाठ शुरू कर किया, जो आज भी चल रहा है। मां पूर्णागिरि धाम के दर्शन के बाद पड़ोसी देश नेपाल के महेन्द्र नगर व ब्रह्मदेव स्थित सिद्घनाथ मंदिर के दर्शन के बाद ही मां पूर्णागिरि धाम की यात्र सफल मानी जाती है। मान्यता है कि सिद्घनाथ बाबा मां पूर्णागिरि के अन्नय भक्त थे। उनकी भक्ति से खुश होकर मां पूर्णागिरि ने उन्हें वरदान दिया था कि उनके दर्शन के बाद सिद्घनाथ मंदिर के दर्शन पर ही धर्म यात्र सफल मानी जाएगी। इससे यहां यात्र पर आने वाले भक्त सिद्धनाथ जरूर जाते हैं।

साभार : दैनिक जागरण

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
पूर्णागिरि मेले में तीर्थयात्रियों की भीड़ बढ़ने लगी है। शनिवार को बुद्ध पूर्णिमा से बढ़ी भीड़ रविवार को भी बनी रही। करीब 35 हजार से अधिक भक्तों ने मां के दरबार में मत्था टेक पूजा-अर्चना की। 29 मार्च से शुरू हुआ पूर्णागिरि मेला 31 मई तक चलना था।

मेला समापन की तिथि नजदीक आते ही सरकारी व्यवस्थाएं समेटने की तैयारी शुरू होती, इससे पूर्व ही प्रशासन ने मेले की अवधि बढ़ाकर 15 जून कर दी है। शनिवार को बुद्ध पूर्णिमा से यात्रियों की आवक काफी बढ़ गई है।
रविवार को भी उत्तर भारत समेत देश के कोने-कोने से मां पूर्णागिरि के दर्शन को भक्तों की भीड़ उमड़ी। मेला प्रशासन के मुताबिक 24 घंटे में करीब 35 हजार से अधिक यात्री दर्शन को पहुंचे। दोपहर की झुलसाती गर्मी में भी यात्रियों की आवाजाही का क्रम बना रहा। सीओ प्रताप सिंह पांगती ने ठुलीगाड़ का दौरा कर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया।

Source Jagran

Pawan Pathak

  • Jr. Member
  • **
  • Posts: 81
  • Karma: +0/-0
पूर्णागिरि धाम में हैं आस्था के तीन और केंद्र,
पहले द्वार पर होती है मां के द्वारपाल बाबा भैरव नाथ की पूजा
चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है


टनकपुर (चंपावत)। सुप्रसिद्ध मां पूर्णागिरि धाम में देवी के चमत्कारिक गाथा से जुड़े तीन और छोटे-छोटे मंदिर भी हैं जिन पर लोगों की अटूट आस्था है। पूर्णागिरि पर्वत चोटी पर विराजमान देवी ने कई ऐसे चमत्कार भी किए जो लोगों को मां पूर्णागिरि की दैवीय शक्ति का अहसास कराते हैं।
धाम की ओर रवाना होने से पहले देवी के द्वारपाल के रूप में भैरव मंदिर में बाबा भैरव नाथ की पूजा करने की परंपरा है। माना जाता है कि धाम के द्वार पर बाबा भैरवनाथ ही देवी के दर्शन के लिए जाने की अनुमति देते हैं। इसके बाद श्रद्धालु सीधे मुख्य मंदिर में देवी के दर्शन को रवाना होते हैं।
दर्शन कर लौटते वक्त रास्ते में स्थापित महाकाली और झूठा मंदिर की पूजा की जाती है। पुजारी बताते हैं कि पूर्व में पूर्णागिरि पर्वत सोने का था, जिसे लूटने आए मुगलों का देवी ने नाश कर पर्वत को पत्थर का बना दिया था।

राक्षस के वध को लिया था अवतार


धाम के पुजारी पुष्कर दत्त पांडेय का कहना है कि भगवान शिव की आराध्य देवी पूर्णागिरि के अनेकों-अनेक चत्मकारिक प्रमाण है, जिन पर लोगों की अटूट आस्था और श्रद्धा है। दर्शन को आने वाले हर भक्त की देवी मां मनोकामना अवश्य पूर्ण करती है। यहीं वजह है कि उत्तर भारत के अलावा देश के कोने-कोने और पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में मां पूर्णागिरि के दर्शन को पहुंचते हैं।
पूर्णागिरि धाम के टुन्यास नामक क्षेत्र में टुन्ना, शुंभ-निशुंभ नामक राक्षसों ने आतंक मचा रखा था। देवी-देवता भी राक्षसों के आतंक से आतंकित थे। तब मां पूर्णागिरि ने महाकाली का रूप धारण किया और टुन्ना राक्षस का वध कर देवताओं को उसके आतंक से निजात दिलाई थी। पूर्व मेें इस मंदिर में बकरे की बलि दी जाती थी, लेकिन प्रशासन की पहल पर अब बलि प्रथा पूर्णरूप से थम गई है। इसके बदले श्रद्धालु बकरे के बाल काटकर या फिर नारियल फोड़कर प्रतिकात्मक बलि की रस्म पूरी करते हैं।
मन्नत से जुड़ी है झूठा मंदिर की गाथा
मां पूर्णागिरि धाम में स्थापित झूठा मंदिर की गाथा मन्नत पर देवी के चमत्कार से जुड़ी है। कहते हैं कि एक सेठ ने पुत्र प्राप्ति के लिए देवी से मन्नत मांग और मन्नत पूरी होने पर सोने का मंदिर चढ़ाने का वचन दिया था। देवी की कृपा से सेठ को पुत्र प्राप्त हुआ, मगर सोने का मंदिर चढ़ाने में उसे लालच आ गया। वह तांबे के मंदिर में सोने की पालिश चढ़ाकर लाया। मंदिर ले जा रहे मजदूरों ने विश्राम के लिए रास्ते में मंदिर जमीन में रखा तो बाद में मंदिर किसी से नहीं उठाया जा सका और सेठ को मंदिर वहीं पर छोड़कर वापस लौटना पड़ा।
 सुप्रसिद्व मां पूर्णागिरि शक्तिपीठ का मंदिर।


Source-http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150317a_004115003&ileft=110&itop=75&zoomRatio=130&AN=20150317a_004115003

Pawan Pathak

  • Jr. Member
  • **
  • Posts: 81
  • Karma: +0/-0
पूर्णागिरी धाम में बिकता है कानपुर और बनारस का सिंदूर
अमर उजाला ब्यूरो
टनकपुर (चंपावत)। मां पूर्णागिरि धाम का मेला आस्था के अलावा कारोबारी नजरिए से भी महत्वपूर्ण है।
देश के तमाम हिस्सों से हर साल मेले में लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन को आते हैं। पिछले एक दशक से यात्रियों की आवाजाही हर बार बढ़ रही है। कानपुर और बनारस से आने वाले सिंदूर की खूब मांग रहती है।
मेले से परिवहन विभाग, रोडवेज और रेलवे की कमाई तो होती है, कई नौजवानों का रोजगार भी इस मेले पर निर्भर है। सैकड़ों टैक्सी मालिक और चालक कमाई कर सालभर की रोजी-रोटी का बंदोबस्त करते हैं। कानपुर, सोरों, बदायूं, पीलीभीत, कासगंज, एटा आदि से व्यापारी मेले में दुकानें लगाकर कारोबार करते हैं। प्रसाद और चढ़ावे की सामग्री के अलावा खिलौनों का कारोबार भी खूब होता है।

शुभ माना जाता है मां के धाम से खरीदा गया सिंदूर
कंदमूल के नाम पर बिकती है रामबांस की जड़
मेले में रत्नों की भी होती है बिक्री

टनकपुर। पूर्णागिरि मेले में रत्नों की बिक्री भी खूब होती है। बांदा जिले के रत्न कारोबारी लकेश कुमार सोनी करीब दो दशक से यहां रत्नों की दुकान लगा रहे हैं। धार्मिक मेलों में ही रत्न और पूजा की सामग्री ज्यादा बिकती है। रत्नों की सबसे बड़ी मंडी जयपुर से वे रत्न लाकर बेचते हैं।
भक्ति गीतों के कैसेट भी लुभाते हैं
टनकपुर। मेले में भक्तों गीतों की आडियो-वीडियो कैसेट्सों का भी अच्छा कारोबार होता है। रेलवे बाजार में कैसेट की दुकान लगाए स्थानीय व्यापारी भूरा के मुताबिक स्थानीय और बाहर के कुछ लोग भक्तिगीतों की आडियो-वीडियो कैसेट दिल्ली से मिक्सिंग करा कर लाते हैं। अब तक करीब धाम पर 12 से अधिक अलग-अलग आडियो-वीडियो कैसेट्स बन चुकी है।

मेले में बाहरी जिलों से आते हैं कारोबारी
टनकपुर। सिंदूर बेच रहे बदायूं के राजाराम का कहना है कि डेढ़ दशक से पूर्णागिरि मेले में दुकान लगा रहे हैं। वे कानपुर और बनारस से सिंदूर लाकर बेचते हैं। ओम, भालू और शंक तीन तरह का सिंदूर आता है। भालू क्वालिटी का सिंदूर महंगा बिकता है। महिलाएं (खासकर देहाती) मां के धाम में बिकने वाले सिंदूर को शुभ मानती है।
टनकपुर। कानपुर के जंगलों का कथित कंदमूल फल भी मेले में मिलता है। पीलीभीत आदि जगह के करीब 12 व्यापारी इस फल को बेच रहे हैं। पीलीभीत के राजू के मुताबिक इस फल को भगवान राम ने वनवास के दौरान खाया था। यह कानपुर के जंगलों में मिलता है। वे वहीं से लाकर इसे बेचते हैं। वहीं कुछ लोग इसे कंदमूल के बजाय रामबांस की जड़ बताते हैं।


Source -http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150320a_003115012&ileft=227&itop=316&zoomRatio=276&AN=20150320a_003115012

Pawan Pathak

  • Jr. Member
  • **
  • Posts: 81
  • Karma: +0/-0
देवी की नाभि से स्थापित यह शक्तिपीठ नाभि स्थली के रूप में भी विख्यात है।

टनकपुर। देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शुमार मां पूर्णागिरि शक्तिपीठ देवी सती के अंगों से स्थापित शक्तिपीठों में से एक है। पूर्णागिरि में हर साल लाखों की तादात में श्रद्धालु तीर्थयात्रा पर आते हैं। देवी की नाभि स्थली के दर्शन को उत्तर भारत के कोने-कोने से बड़ी तादात से लोग पहुंचते हैं। नेपाल से लगी सीमा पर होने के कारण नेपाल से भी दर्शन के लिए वर्षभर काफी संख्या में लोगों की आवाजाही बनी रहती है। इस शक्तिपीठ की स्थापना भी देवी सती के अंगों से स्थापित शक्तिपीठों से जुड़ी है। प्रचलित किवदंती के अनुसार मां पार्वती के पिता राजा दक्ष ने हरिद्वार के पास कनखल में महायज्ञ का आयोजन किया। तमाम देवी देवता, राजा, ब्राह्मण एवं संतों को महायज्ञ में आमंत्रित किया गया, परंतु देवी पार्वती के पति भगवान भोले शंकर को आमंत्रित नहीं किया। पति के इस अपमान के प्रतिशोध में देवी पार्वती ने यज्ञ के हवन कुंड में कूदकर खुद को अग्निदेवता को समर्पित कर दिया। भगवान शंकर को पार्वती के सती होने का पता चला तो वे क्रोध में सती पार्वती का शव लेकर ब्रह्मांड में चक्कर काटने लगे। शिव के इस रौद्र रूप से देवी-देवता चिंतित हो गए। देवी-देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, जहां-जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। माना जाता है कि पूर्णागिरि पर्वत में देवी सती की नाभि गिरने से यहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई है।
Source- http://earchive.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20110504a_005115011&ileft=573&itop=90&zoomRatio=130&AN=20110504a_005115011

Pawan Pathak

  • Jr. Member
  • **
  • Posts: 81
  • Karma: +0/-0
पूर्णागिरि : अभिन्न हिस्सा है देवी का चरण मंदिर
पूर्णागिरि(चंपावत)। मां पूर्णागिरि का चरण मंदिर पूर्णागिरि तीर्थयात्रा का अभिन्न हिस्सा है लेकिन जानकारी के अभाव में बहुत कम लोग देवी के चरण मंदिर के दर्शन कर पाते हैं।
देवी सती की नाभि स्थली के रूप में विख्यात मां पूर्णागिरि शक्तिपीठ में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जो देवी की चमत्कारिक शक्ति का प्रमाण देते हैं। प्रचार-प्रसार के अभाव में बहुत कम लोगों को मां पूर्णागिरि की गाथा से जुड़े झूठे का मंदिर, बाबा भैरव नाथ मंदिर, बाबा सिद्धनाथ मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों के महत्व की जानकारी मिल पाती है। आस्था से जुड़ा ऐसा ही एक स्थल है देवी का चरण मंदिर। ठुलीगाड़ से करीब तीन किलोमीटर दूर शारदा नदी में तट पर स्थित मंदिर को देवी पूर्णागिरि के चरण मंदिर में रूप में जाना है। पूर्णागिरि पर्वत के ठीक नीचे स्थापित इस मंदिर की खासियत यह है कि इस स्थान पर शारदा नदी बहुत खामोशी से प्रवाहित होती है। वहां पहुंचने पर नदी की कलकल सुनाई नहीं पड़ती है। पं. भुवन चंद्र पांडेय बताते हैं कि देवी पूर्णागिरि के प्रसिद्ध उपासक पं. सज्जन तिवारी अल्मोड़ा से आकर इसी स्थान स्नान कर देवी की उपासना करते थे। वहीं इसी स्थान से प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट को दिव्य ज्योति के साक्षात दर्शन हुए थे। इसका उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक द मेन इटर्स आफ कुमाऊं में किया है। पं. पांडेय का कहना है कि प्रचार प्रसार के अभाव में पूर्णागिरि से जुड़े कई धार्मिक स्थलों की जानकारी लोगों को नही मिल पाती।
•जानकारी के अभाव में कम लोग कर पाते हैं दर्शन
•जिम कार्बेट को दिव्य ज्योति के साक्षात दर्शन हुए थे
•शारदा नदी का शांति से बहना भी है खासियत

Source-
http://earchive.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20110506a_002115008&ileft=-5&itop=1182&zoomRatio=130&AN=20110506a_002115008

Pawan Pathak

  • Jr. Member
  • **
  • Posts: 81
  • Karma: +0/-0
लड़ीधुरा में मां पूर्णागिरि के रूप में पूजी जाती है भगवती
लोहाघाट (चंपावत)। नवरात्रों में लोहाघाट से 13 किमी दूर बाराकोट के लड़ीधुरा की पहाड़ी में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है। बांज, चीड़ आदि वृक्षों से आच्छादित इस पहाड़ी से नगाधिराज हिमालय का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। यहां के लड़ीधुरा मंदिर में विद्यमान मां भगवती को लोग मां पूर्णागिरि के रूप में शताब्दियों से पूजते रहे हैं। कहा जाता है कि सिमल्टा के पांडे पुरोहित और उनके ढुंगाजोशी के यजमान को मां पूर्णागिरि ने स्वप्न में दर्शन दिए। कहा कि मैं यहां के शिखर में बैठी हूं। दूसरे दिन ग्रामीण वहां पहुंचे तो। स्वप्न के अनुसार ठीक उसी स्थान में देवी विराजमान थी। दोनों उन्हें उठाकर श्रद्धा के साथ बाराकोट ले आए। क्वांरकाली के पास जब दोनों रुके तो इसी बीच देवी अंतर्ध्यान हो गई। दूसरे दिन देवी ने स्वप्न में अपनी उपस्थिति का अहसास कराया। तब से यह स्थान देवी के उपासकों के लिए श्रद्धा, आस्था का केंद्र बन गया है। लड़ीधुरा देवी के नाम से बाराकोट के लोगों ने पिछले कुछ वर्षों से लड़ीधुरा महोत्सव की शुरुआत किए जाने से इस मंदिर की ख्याति दूर तक पहुंच चुकी है। ब्यूरो
Source-http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20151018a_007115011&ileft=-5&itop=543&zoomRatio=182&AN=20151018a_007115011

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22