Author Topic: RELIGIOUS ASSOCIATION उत्तराखंड की प्रमुख धार्मिक संस्थाएं एवं धार्मिक विभूतियाँ  (Read 11650 times)

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७-रौखाडिया बाबा -नैनीताल के ठीक नीचे कालाढूंगी नाम ,स्थान मैं प्रशिध योगी रौखाडिया बाबा रहते थे, ये भी चमत्कारी बाबा थे !

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8-बाबा मस्तराम

बाबा मस्तराम मुनी की रेती के सुविख्यात और जाने-माने नाम है। इन्होंने अपना जीवन निस्वार्थ सेवा में बिता दिया। वर्ष 1987 में इनका निधन हो गया।

 गंगा तट पर स्थित जिस गुफा में वे आजीवन रहे, वह अब शहर का ऐतिहासिक स्थान है। उनके शिष्य और दर्शनार्थी इसे देखने आते हैं। यह कहा जाता है कि बाबा मस्तराम, जो गुफा में साधना करने में अपना समय बिताते थे, अपने मिलने वालों को समाज सेवा का पाठ पढ़ाया करते थे। वह गुफा से तभी बाहर निकलते थे जब नदी का पानी ऊपर चढ़ता था। तब, वे आश्रम में रहा करते थे।

बाबा ने सन् 1963 में आश्रम की स्थापना की थी। यह आश्रम अभी भी सत्कार्यों जैसे निर्धनों और जरुरतमंदों को खिलाना, गायों के लिए चारा देने में लगा हुआ है। यह अन्य प्रकार की सामाजिक सेवा में भी लगा हुआ है।

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९-माँ आनंदमयी
यह चैतन्य महाप्रभु एवं मीरा बाई कि भक्ति भावना से प्रेरित थीं ,तथा इन्हें आध्यात्मिक शक्ति संपन्न थी इसनकी साधना स्थली उत्तरकाशी थीं !देश कि कई महान विभूतियाँ इन्हें अपना आदर्श मानती हैं !देहरादून में माँ आनंदमयी
का आश्रम है !

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१०-स्वामी राम

स्वामी राम ने प्रारंभ में गंगोत्री में तपस्या की थी ,उनके विषय में कहा जाता है कि-वह अपने शारीर को साधना के बल पर हवा में उठा लेते थे !

तथा इच्छनुसार हिर्दय कि गति भी सत्रह सेकंड तक रोक लेते थे,उन्होंने ऋषिकेश के पास जौलीग्रांट में हिमालयन इन्स्त्युट अस्पताल एवं मेडिकल कालेज कि स्थापना की है !

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११-महत्मा शिवानन्द

दिव्य-जीवन-संघ के संस्थापक महात्मा शिवानन्द द्बारा ऋषिकेश के पास मुनि-की रेती (टेहरी गढ़वाल) मैं शिवानद आश्रम की स्थापना की गयी,महात्मा शिवानन्द ने ध्यान प्राणायाम ,कर्म एवं अध्यात्म सम्बन्धी उत्किर्ष्ट ग्रन्थों की रचना की एवं दिब्य जीवन संघ की स्थापना की !

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उत्तराखंड की धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक विभूतियों मैं भी होने लगी है जंग
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बाबा हठयोगी ने जताई जान पर खतरे की आशंका

हरिद्वार। महाकुंभ से पहले अखाड़ों की राजनीति में रोज नया मोड़ आ रहा है। बाबा हठयोगी, जिनका हुक्का-पानी बंद कर दिया गया है, ने अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञानदास, राष्ट्रीय महामंत्री हरिगिरी और महंत प्रेम गिरी से खुद को जान का खतरा बताकर सनसनी फैला दी है। बाबा हठयोगी ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को पत्र देकर तीनों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।

बृहस्पतिवार को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने बाबा हठयोगी सहित छह संतों का हुक्का-पानी बंद कर दिया था। ऐसे में बाबा हठयोगी ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को पत्र देकर सनसनी फैला दी है। बाबा हठयोगी का कहना है कि परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञानदास, राष्ट्रीय महामंत्री हरिगिरी और महंत प्रेम गिरी तीनों मिलकर उनकी हत्या करना चाहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोगों की वजह से महाकुंभ की शांति भंग हो सकती है।

उन्होंने तीनों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराने की मांग की है। बाबा ने आरोप लगाया है कि 1998 के कुंभ में महंत प्रेमगिरी, श्री महंत हरिगिरी के कारण निरंजनी अखाड़े के साथ शाही स्नान के दौरान खूनी संघर्ष हुआ। बाबा हठयोगी ने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञानदास पर सीधा हमला बोला है और पत्र में उन्हें आपराधिक छवि का बताया है।

बड़े लोगों के इशारे पर खेल रहे हठयोगी

हरिद्वार। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ज्ञानदास का कहना था कि बाबा हठयोगी ने उनके साथ ऐसा कुछ किया ही नहीं है जिससे उन्हें परेशान किया जाए या धमकी दी जाए।

 हठयोगी जो आरोप लगा रहे हैं वह निराधार हैं। बाबा हठयोगी को तो परिषद सहित सभी जानते हैं कि वह किसके इशारे पर काम कर रहे हैं। परिषद उन लोगों को अच्छी तरह पहचान चुकी है जो हठयोगी को मोहरा बनाकर कार्य कर रहे हैं। यह सारी राजनीति अखाड़े में शामिल करने को लेकर की जा रही है।



http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5939722.html

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पूर्णागिरि धाम को ट्रस्ट बनाये जाने की मांग

SOURCE DAINIK JAGRAN

टनकपुर(चंपावत): देश के सुविख्यात मां पूर्णागिरि धाम को ट्रस्ट का दर्जा दिलाये जाने की मांग एक बार फिर मुखर हो उठी है। हिन्दू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं ने इस मांग को लेकर पूर्व राज्य मंत्री व विधायक बीना महराना को ज्ञापन सौंपा।

मालूम हो कि पिछले लंबे समय से हिजामं द्वारा मां पूर्णागिरि धाम को ट्रस्ट बनाये जाने की मांग उठाई जा रही है। यहां तक कि इस मांग को लेकर हिजामं कार्यकर्ताओं ने इस बार पूर्णागिरि मेले के दौरान श्रद्घालुओं के साथ क्षेत्र के लोगों के बीच जाकर हस्ताक्षर अभियान चलाया था एवं इसकी प्रतिलिपि शासन प्रशासन को भेजी गई थी।

इधर शनिवार को हिजामं के प्रदेश संयोजक नवीन बिष्ट की अगुवाई में कार्यकर्ताओं ने मेले के विस्तार व तीर्थयात्रियों की सुविधा को देखते हुए पूर्णागिरि धाम को ट्रस्ट बनाये जाने की मांग का ज्ञापन विधायक बीना महराना को सौंपा।

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दस अखाड़ों ने ठुकराया महामंडलेश्वर नगर

महामंडलेश्वर नगर बसाने को कछुआ गति से चल रहे कार्यो को लेकर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और दस अखाड़ों के श्री महंतों का पारा मंगलवार को सातवें आसमान पर पहुंच गया। चंडीघाट पुल के नीचे अचानक दसों अखाड़ों के श्री महंत धरने पर बैठ गए। संतों के धरने पर बैठने की खबर से हड़कंप मच गया।

 मेला प्रशासन की ओर से उप मेलाधिकारी मौके पर पहुंचे। यहीं पर उनके सामने श्री महंतों ने महामंडलेश्वर की व्यवस्था से नाखुश होकर महामंडलेश्वर नगर के लिए मेला प्रशासन की ओर से आवंटित जमीन को ठुकरा दिया। श्री महंतों ने अब अखाड़ों के समीप जमीन मांगी है, जो मेला प्रशासन के लिए बड़ी परेशानी पैदा कर सकती है।

चंडीघाट पुल के नीचे बसने वाले महामंडलेश्वर नगर को लेकर संतों का धैर्य आज जवाब दे गया।

मंगलवार की शाम अचानक अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री और जूना अखाड़े के श्री महंत श्री हरि गिरी महाराज, महानिर्वाणी के श्री महंत रविन्द्र पुरी, उदासीन अखाड़े के श्री महंत राजेन्द्र दास, निरंजनी अखाड़े के श्री महंत त्रियंबक भारती, आह्वान अखाड़े के श्री महंत शिव शंकर गिरी, अग्नि के श्री महंत गोविंदानंद ब्रह्मचारी और अच्युतानंद ब्रह्मचारी सहित दस अखाड़ों के श्री महंत चंडीघाट पुल के नीचे पहुंचे और मेला प्रशासन से नाराज होकर धरने पर बैठ गए। मेला प्रशासन की ओर से तत्काल उप मेलाधिकारी हरबीर सिंह मौके पर पहुंचे।

 श्री महंतों का गुस्सा उन पर फूट पड़ा। अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री हरि गिरी महाराज ने कहा कि पन्द्रह दिसंबर तक महामंडलेश्वर नगर बस जाना चाहिए था, लेकिन यहां तो अभी केवल 20 प्रतिशत ही कार्य हुआ है।

 बिजली, पानी तक की व्यवस्था नहीं हुई है। समतलीकरण तक नहीं कराया गया है। जिस जगह महामंडलेश्वर नगर बसना है, वहां पर अब भी खैर के पेड़ खड़े हैं। दसों अखाड़ों के नाराज श्री महंतों ने उप मेलाधिकारी हरबीर सिंह की मौजूदगी में महामंडलेश्वर नगर की जमीन को मेला प्रशासन से लेने से इंकार कर दिया।

 श्री महंतों ने नाराजगी जताई कि महामंडलेश्वर नगर की प्रगति को लेकर शासन, प्रशासन और मेलाधिकारी को महीनों पहले अवगत कराया जा चुका था। इसके बावजूद महामंडलेश्वर नगर के कार्यो पर ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि शासन, प्रशासन और मेला प्रशासन कुंभ मेला को सकुशल निपटाने में कतई सहयोग नहीं करना चाहता।

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दयानंद आश्रम , ऋषिकेश

स्वामी दयानंद आश्रम का बुनियादी कार्य स्वामी दयानंद स्वरस्वती (19वीं सदी के महान सुधारक के नाम पर रखा गया जिन्होंने आर्य समाज की स्थापना की) द्वारा वर्ष 1963 में शुरु किया गया तथा वर्ष 1982 में इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ। मुनी की रेती में पुरानी झाड़ी या शीशम झाड़ी में अवस्थित यह आश्रम वैदिक शिक्षण के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के धर्मार्थ कार्यकलापों का केन्द्र रहा है।

आश्रम में वर्षभर स्वामी जी के शिष्यों के लिए वेदान्त पर लघु एवं दीर्घकालीन पाठ्यक्रमों का नियमित रूप से आयोजन किया जाता है। साथ ही, आध्यात्मिक कक्षाओं और शिविरों का भी आयोजन किया जाता है। परिसर के भीतर भगवान श्री गंगाधरेश्वर मंदिर अवस्थित है।

 इसका मुख गंगा नदी की तरफ है। यहां साधुओं द्वारा प्रतिदिन पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्मचारीगण और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए हुए भक्तजन प्रतिदिन प्रातः और सान्ध्य प्रार्थना में भाग लेते हैं।

आश्रम में साधुओं और दर्शनार्थी भक्तजनों के लिए भंडारा (मुफ्त भोजन) का प्रबंध भी किया जाता है और धर्मार्थ औषधालय भी चलाया जाता है जिसमें इस क्षेत्र में रह रहीं महिलाओं, बच्चों और वृद्धजनों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का निशुल्क निवारण किया जाता है। साथ ही साथ, उन्हें स्वच्छता के महत्व से भी अवगत कराया जाता है।

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                             त्रेता युग से हैं वैष्णव अखाड़े 
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हरिद्वार। महाकुंभ में आने वाले वैष्णव मत के अखाड़ों का जो विशाल वृक्ष लहरायेगा, असल में उसका बीज रामायण काल में बोया गया था। हालांकि द्वापर काल में इनका क्रम टूट गया था। इसके बाद 11वीं सदी में जगतगुरु रामानंदाचार्य के शिष्यों ने वैष्णव अखाड़ों का पुनर्गठन किया।

इसी वैष्णव मत के तीन अणियों के नेतृत्व में इस बार 18 अखाड़ों के लाखों वैष्णव कुंभ में स्नान करेंगे। वैष्णव मत के अनुसार भगवान श्रीराम ने वैष्णवों की चार अणियों की स्थापना की थी। द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम ने एक अणि के नेता द्विविद का वध कर दिया तो अणियों की यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गई।

वैष्णव मतानुसार जगद्गुरु रामानंदाचार्य के शिष्यों ने दोबारा से वैष्णव अखाड़ों और तीन अणियों को पुनर्गठित किया। नवीं सदी में रामानंदाचार्य का जन्म प्रयागराज में हुआ। 12 वर्ष की अल्पायु में ही पूरे देश में उनकी ख्याति फैल गई। संत कबीर इन्हीं के शिष्य थे। इसके बाद संत रविदास, राजस्थान के राजा पीपाजी, पीपाजी की पत्‍‌नी रानी पद्मावती, सेन नाई और प्रसिद्ध भक्त धन्ना, बालानंदाचार्य और अनुभवानंदाचार्य भी संत रामानंदाचार्य के शिष्य बन गये। इस तरह कुल 12 शिष्य बने।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास बताते हैं कि इन 12 शिष्यों ने 36 द्वाराचारे स्थापित किये। इन लोगों ने 11वीं सदी में वैष्णवों की स्थगित अणियों का पुनर्गठन वृंदावन में वंशीवट के नीचे किया। बाद में श्यामानंदी मत के निंबार्काचार्य, विष्णुस्वामी उर्फ बल्लभाचार्य और मद्यगौड़ेश्वर भी इस मत में शामिल हो गए।

इन तीनों संप्रदायों ने भी 16 द्वाराचारे स्थापित किये। इस तरह वैष्णव मत के कुल 52 द्वाराचारे और 18 अखाड़े स्थापित हुए। महंत ज्ञानदास बताते हैं कि तब से वैष्णव अखाड़ों का यही स्वरूप है।

 

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