Author Topic: Spiritual Places of Uttarakhand - विभिन्न स्थानों से जुड़ी धार्मिक मान्यतायें  (Read 10806 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ट्रोटकाचार्य गुफा एवं ज्योतिर्मठ (JOSHIMATH)

स्वामी शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के कार्यालय एवं आवास में ज्योतिर्मठ के अंदर गुफा स्थित है। यही वह गुफा है जहां आदि शंकराचार्य के चार सबसे विद्वान एवं पसंदीदा शिष्यों में से एक ट्रोटका ने आराधाना की थी। आदि गुरू ने बाद में इन्हें ज्योतिर्मठ का प्रथम शंकराचार्य बना दिया।

 

मठ 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में निर्मित हाल का मंदिर है। मूल मठ पहाड़ी के ऊपर है तथा शंकराचार्य नाम के एक दावेदार के नियंत्रण में है। जोशीमठ से 25 किलोमीटर दूर एक संस्कृत महाविद्यालय तथा भवन के अंदर एक आश्रम, मठ द्वारा चलाया जाता है।

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ज्योतेश्वर महादेव मंदिर (JOSHIMATH)

यह मंदिर कल्पवृक्ष के एक ओर स्थित है। कहा जाता है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद आदि शंकराचार्य ने यहां के एक प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग की पूजा की थी। यहां के गर्भगृह में पीढ़ियों से एक दीया (दीप) प्रज्वलित है।


 

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श्री विष्णु मंदिर
यह मंदिर धौली गंगा एवं अलकनंदा के संगम पर है जो बद्रीनाथ सड़क पर 10 किलोमीटर दूर पर नगरपालिका क्षेत्र के अंतर्गत है। यह अलकनंदा नदी पर अंतिम पंच प्रयागों में है।

कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना आदि शंकराचार्य ने तब की थी जब उन्हें एक स्वप्न आया कि भगवान विष्णु की एक अन्य प्रतिमा अलकनंदा नदी में तैर रही थी। इस मंदिर का प्रशासन बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के हाथों में है।
 




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नरसिंह मंदिर (JOSHIMATH)

राजतरंगिणी के अनुसार 8वीं सदी में कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ द्वारा अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान प्राचीन नरसिंह मंदिर का निर्माण उग्र नरसिंह की पूजा के लिये हुआ जो विष्णु का नरसिंहावतार है। जिनका परंतु इसकी स्थापना से संबद्ध अन्य मत भी हैं। कुछ कहते हैं कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी, जब वे स्वर्गरोहिणी की अंतिम यात्रा पर थे। दूसरे मत के अनुसार इसकी स्थापना आदि गुरू शंकराचार्य ने की क्योंकि वे नरसिंह को अपना ईष्ट मानते थे।

इस मंदिर की वास्तुकला में वह नागर शैली या कत्यूरी शैली का इस्तेमाल नहीं दिखता है जो गढ़वाल एवं कुमाऊं में आम बात है। यह एक आवासीय परिसर की तरह ही दिखता है जहां पत्थरों के दो-मंजिले भवन हैं, जिनके ऊपर परंपरागत गढ़वाली शैली में एक आंगन के चारों ओर स्लेटों की छतें हैं। यहां के पुजारी मदन मोहन डिमरी के अनुसार संभवत: इसी जगह शंकराचार्य के शिष्य रहा करते थे तथा भवन का निर्माण ट्रोटकाचार्य ने किया जो ज्योतिर्मठ के प्रथम शंकराचार्य थे। परिसर का प्रवेश द्वार यद्यपि थोड़ा नीचे है, पर लकड़ी के दरवाजों पर प्रभावी नक्काशी है जिसे चमकीले लाल एवं पीले रंगों से रंगा गया है।

परिसर के भीतर एक भवन में एक कलात्मक स्वरूप प्राचीन नरसिंह रूपी शालीग्राम को रखा गया है। ईटी. एटकिंस वर्ष 1882 के दी हिमालयन गजेटियर में इस मंदिर का उज्ज्वल वर्णन किया है। एक अत्युत्तम कारीगरी के नमूने की तरह विष्णु की प्रस्तर प्रतिमा गढ़ित है। यह लगभग 7 फीट ऊंची है जो चार महिला आकृतियों द्वारा उठाया हुआ है। पंख सहित एक पीतल की एक अन्य प्रतिमा भी है जो ब्राह्मणों का जनेऊ धारण किये हुए है, जिसे कुछ लोग बैक्ट्रीयाई ग्रीक कारगरी होना मानते हैं। 2 फीट ऊंची गणेश की प्रतिमा अच्छी तरह गढ़ी एवं चमकीली है। मंदिर में लक्ष्मी, भगवान राम, लक्ष्मण, जानकी, कुबेर, गरूड़ और श्री बद्रीनाथ की मूर्तियां भी हैं।

नरसिंह मूर्त्ति के लिए आम विश्वास है कि प्रत्येक दिन इसकी एक कलाई पतली होती जाती है और जिस दिन पूरी गायब होगी, वह दिन बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण होगा। नर एवं नारायण पर्वत जो बद्रीनाथ के प्रहरी हैं, कभी एक-दूसरे से टकराकर बद्रीनाथ मंदिर का मार्ग हमेशा के लिये अवरूद्ध कर देंगे।

 

इसके बाद इनकी पूजा भविष्य बद्री में सुभाय गांव में होगी जो तपोवन से 5 किलोमीटर दूर होगा और तपोवन जोशीमठ से 18 किलोमीटर दूर है। यहां एक विष्णु मंदिर है। कहा जाता है कि अगस्त मुनि ने यहां तप किया था और तब से ही भगवान बद्री यहां रहते हैं। वास्तव में प्रतिमा की कलाई को देख पाना संभव नहीं होता, क्योंकि नरसिंह की मूर्ति सुंदर परिधानों से सजी होती है जो भक्तों द्वारा चढ़ाये जाते हैं, परंतु पुजारी के अनुसार यह एक बाल की चौड़ाई के समान पतली है।

वह भवन जहां आदि गुरू शंकराचार्य की धार्मिक गद्दी स्थित है, वह भी नरसिंह मंदिर परिसर का एक भाग है। प्राचीन भवन वह स्थान है जहां जाड़ों में मंदिर का कपाट बंद हो जाने पर, बद्री विशाल के प्रतीक रावल की गद्दी को बड़े धूम-धाम एवं समारोह पूर्वक यहां रखा जाता है, जब तक कि गर्मी में कपाट फिर से नहीं खुल जाता। यहां इसे भगवान विष्णु का प्रतिनिधि मानकर श्रद्धापूर्वक इसकी देखभाल की जाती है।

 

बीते दिनों, टिहरी के राजा द्वारा प्रदत्त नाम, बद्रीनाथ का रावल बड़ा शक्तिशाली होता था। उसे कर संग्रह करने, न्याय करने तथा अपराधियों को सजा देने तक का अधिकार होता था। यह अधिकार उसे एक स्वर्ण कंगन पहनने तथा उसकी गद्दी के कारण मिला था। किसी समय टिहरी के राजा एवं रावल में झगड़ा हो गया तथा कंगन को नदी में फेंक दिया गया। राजा ने उसका अभिषेक भी नहीं किया और गद्दी पर बैठने का उसका अधिकार एवं अन्य शक्तियां भी चली गयीं तथा आज गद्दी को भगवान विष्णु का प्रतीक मानकर रावल उसकी रक्षा करता है।

यह भवन ही जाड़े में बद्रीनाथ के रावल का निवास भी होता है। परंतु वह यहां कभी-कभी ही ठहरता है तथा इन दिनों दक्षिण की यात्रा पर होता है।

नरसिंह मंदिर पर भक्तों द्वारा विशेष पूजा भी की जा सकती है। इनमें विशेष पूजा (351 रूपये), अभिषेक पूजा (251 रूपये), सहस्त्रकमल (75 रूपये) तथा नित्य भोग (351 रूपये) शामिल हैं। मंदिर परिसर में फोटो खींचने की सख्त मनाही है एवं मंदिर की देखभाल बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का प्रशासन संभालती है।
 

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धारचूला को कैलाश-मानसरोवर यात्रा का प्रवेश द्वार माना जाता है तथा इस क्षेत्र को सदैव ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त क्षेत्र माना गया है। कई प्राचीन मुनियों ने इसे अपनी तपोस्थली, बनाया जिनमें व्यासमुनि सर्वाधिक विख्यात थे। वास्तव में, इस शहर का नाम भी मुनि की किंवदन्ती से ही जुड़ा हुआ है। धारचूला दो शब्दों से बना है "धार" या किनारा/पर्वत एवं चूला या चुल्हा या स्टोव। कहा जाता है कि जब व्यास मुनि अपना भोजन पकाते थे तो धारचूला के इर्द-गिर्द तीन पर्वतों के बीच अपना चुल्हा जलाते थे और इसीलिये यह नाम पड़ा।

कहा जाता है कि पांडव भी अपनी 14 वर्ष के वनवास की अवधि में यहां आये थे।

इससे संबद्ध एक अन्य पौराणिक कथा कंगदाली उत्सव से जुड़ी है, जो शौका या रंग भोटिया लोगों द्वारा मनाया जाता है एवं जिनका धारचूला में सबसे बड़ा आवास है। कथा है कि अपने फोड़े पर एक बालक ने कंग-दाली झाड़ी की जड़ों के लेप का इस्तेमाल किया और उसकी मृत्यु हो गयी। क्रोधित होकर उसकी मां ने जड़ी को शापित किया तथा शौका-महिलाओं को आदेश दिया कि वे कंग-दाली पौधे की जड़ों को उखाड़ फेंकें, जब वह पूर्ण-रूप से पल्लवित हो, जो 12 वर्षों में एक बार होता है।

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Tarakund (Paurigarwal)

Situated at a height of 2200 mts Tarakund is a small Picturesque spot amidst lofty mountains in the Chariserh Development Area. A small lake and an ancient temple adorn the place. The Teej festival is celebrated with great gaiety when the local people come here to worship and pay homage to God.

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BHAGWAN VISHU KURMA AVTAR IN CHAMPAWAT


Champwat is believed to the place where the Kurmavtar (the turtle incarnation of Lord Vishnu) took place.

 Fort and the capital city of Kali Kumaon, Champawat, 1815.Champwat was formerly the capital of the Chand dynasty rulers. The Baleshwar Temple built by the Chand rulers in 16th century is an excellent monument with marvelous stone carving works.

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Bhagirath Shila is a slab stone found near the temple of Gangotri.
« Reply #27 on: August 01, 2008, 03:30:34 PM »
Bhagirath Shila
A Sacred Stone

Bhagirath Shila is a slab stone found near the temple of Gangotri. It is the spot where Raja Bhagirath used to worship Lord Shiva. A natural rock shivlinga was found from the river Ganges. Lord Shiva is said to have sat here when he received the Goddess Ganga in his matted locks.

Devbhoomi,Uttarakhand

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भैरों घाटी,

भैरों घाटी , जध जाह्नवी गंगा तथा भागीरथी के संगम पर स्थित है। यहां तेज बहाव से भागीरथी गहरी घाटियों में बहती है, जिसकी आवाज कानों में गर्जती है। वर्ष 1985 से पहले जब संसार के सर्वोच्च जाधगंगा पर झूला पुल सहित गंगोत्री तक मोटर गाड़ियों के लिये सड़क का निर्माण नहीं हुआ था, तीर्थयात्री लंका से भैरों घाटी तक घने देवदारों के बीच पैदल आते थे और फिर गंगोत्री जाते थे। भैरों घाटी हिमालय का एक मनोरम दर्शन कराता है, जहां से आप भृगु पर्वत श्रृंखला, सुदर्शन, मातृ तथा चीड़वासा चोटियों के दर्शन कर सकते हैं

राजा विलसन द्वारा निर्मित जाह्नवी नदी पर एक रस्सी-पुल हुआ करता था जो विश्व का सर्वोच्च झूला-पुल था, जिसपर से आप बहुत नीचे नदी को भ्रमित करने वाला दृश्य निहार सकते थे। अब यहां दो कगारों से लटकते हुए कुछ रस्सियों के टुकड़े ही बचे हैं। परंतु ई.टी. एटकिंसन ने वर्ष 1882 के अपने द हिमालयन गजेटियर (भाग -1, वोल्युम- 3) में बताया है कि यहां एक झूला-पुल था, जिसे “वनाधिकारी श्री. ओ. कैलाघन द्वारा जाधगंगा पर एक हल्के लोहे के पुल का निर्माण कर बदल दिया गया।” उस 380 फीट लंबे तथा 3 फीट चौड़े पुल को तीर्थयात्री रेंगते हुए पार करते थे।

जाह्नवी के स्रोत का प्रथम खोजकर्त्ता हॉगसन भैरों घाटी के प्रभावशाली सौंदर्य को देखता रह गया! विशाल चट्टानों, खड़ी दीवारें, ऊंचे देवदार के पेड़ तथा कोलाहली भागीरथी सबों को निहारता रहा। उसने इस जगह को “सबसे भयानक तथा डरावनी जगह बताया है, जिसके ऊपर एक बड़ा चट्टान आगे तक बढ़ा हुआ है।”

प्रसिद्ध जर्मन पर्वतारोही हेनरिक हैरियर भैरों घाटी से जाह्नवी के किनारे-किनारे तिब्बत गया था। तिब्बत में वह दलाई लामा का शिक्षक बन गया तथा उसने अपनी कृति ‘तिब्बत में सात वर्ष’ में अपने अनुभवों को बताया।

हिमालयन गजेटियर में उदधृत फ्रेजर के अनुसार पुल पार करने तथा देवदार के घने जंगलों से गुजरने के बाद आप “एक छोटे मंदिर भैरों के समतल सफेद भवन पहुंचते हैं, जिसे अमर सिंह गोरखाली के आदेश पर बनाया गया तथा जिसे सड़क की मरम्मत तथा गंगोत्री की पूजा के लिये स्थान निर्मित करने के लिये धन दिया।”

गंगोत्री मंदिर तक पहुंचने से पहले इस प्राचीन भैरव नाथ मंदिर का दर्शन अवश्य करना चाहिये।

Devbhoomi,Uttarakhand

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स्वामी शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के कार्यालय एवं आवास में ज्योतिर्मठ के अंदर गुफा स्थित है। यही वह गुफा है जहां आदि शंकराचार्य के चार सबसे विद्वान एवं पसंदीदा शिष्यों में से एक ट्रोटका ने आराधाना की थी। आदि गुरू ने बाद में इन्हें ज्योतिर्मठ का प्रथम शंकराचार्य बना दिया। मठ 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में निर्मित हाल का मंदिर है। मूल मठ पहाड़ी के ऊपर है तथा शंकराचार्य नाम के एक दावेदार के नियंत्रण में है। जोशीमठ से 25 किलोमीटर दूर एक संस्कृत महाविद्यालय तथा भवन के अंदर एक आश्रम, मठ द्वारा चलाया जाता है।

 

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