Author Topic: Sun Temple Of Katarmal - कटारमल का सूर्य मंदिर  (Read 29323 times)

पंकज सिंह महर

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पंकज सिंह महर

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Devbhoomi,Uttarakhand

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विनोद सिंह गढ़िया

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11 सदी बाद मिला कटारमल सूर्य मंदिर का प्रवेश द्वार

11वीं शताब्दी में बना अल्मोड़ा के कटारमल सूर्य मन्दिर के भीतर अब ढलते सूरज की किरणें नहीं, उगते सूरज की लाली बिखरने लगी है। पुरातत्वविदों ने कोणार्क से भी 200 साल पुराने इस मंदिर के पूरब दिशा के उस दरवाजे को खोल दिया है, जो सदियों से दीवार के अंदर दबा था। 11वीं शताब्दी में बना अल्मोड़ा का कटारमल पहला ऐसा सूर्य मन्दिर है जिसका प्रवेशद्वार पश्चिम में था। श्रद्धालु इसी से मंदिर में प्रवेश करते थे। पुरातत्वविद् हमेशा से यह मानने को तैयार नहीं थे कि किसी सूर्य मंदिर का का प्रवेशद्वार पूरब दिशा में न हो। विशेषज्ञों को आशंका थी कि पूरब दिशा का दरवाजा कहीं दबा है। पिछले साल विभाग ने यह जानने में सफल रहा कि कटारमल का मुख्य द्वार पश्चिम नहीं, पूरब दिशा में है। अधीक्षण पुरातत्वविद् डा. डीएन डिमरी ने बताया कि एक साल की कड़ी मशक्कत के बाद दरवाजे के बाहर चुनी गई दीवार को हटा दिया गया है। इस काम को अंजाम देने में काफी सावधानी बरती गई। क्योंकि दीवार ध्वस्त करते समय जरा सी लापरवाही दरवाजे को क्षति पहुंचा सकती थी। यह मन्दिर इस लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है कि इसका इतिहास कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी करीब 200 साल पुराना है। आर्कियोलॉजिस्ट डा. डिमरी के मुताबिक कटारमल सूर्य मन्दिर को 11वीं शताब्दी का माना जाता है। मगर, कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिससे कह सकते हैं कि यहां पर सूर्य मन्दिर आठवीं-नवीं शताब्दी में भी था। उस समय के कुछ लकड़ी के गुंबद पहले खोजे जा चुके हैं। जिन्हें दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखा गया है। हो सकता है कि इसके बाद भी यहां पर मन्दिर का पुनर्निर्माण किया गया हो। ऐसा है पूरब का प्रवेशद्वार : लंबाई: पत्थर की आठ सीढि़यां (हर सीढ़ी के बीच में एक फीट का अंतर), चौड़ाई: करीब दो मीटर।


Source : Jagran e paper

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी दो सौ साल पुराना है ये मंदिर -कटारमल सूर्य मन्दिर उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा के 'कटारमल' नामक स्थान पर स्थित है
कटारमल सूर्य मन्दिर उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा के 'कटारमल' नामक स्थान पर स्थित है। इस कारण इसे 'कटारमल सूर्य मंदिर' कहा जाता है। यह सूर्य मन्दिर न सिर्फ़ समूचे कुमाऊँ मंडल का सबसे विशाल, ऊँचा और अनूठा मन्दिर है, बल्कि उड़ीसा के 'कोणार्क सूर्य मन्दिर' के बाद एकमात्र प्राचीन सूर्य मन्दिर भी है। सूर्य देव प्रधान देवताओं की श्रेणी में आते हैं। वे समस्त सृष्टि के आधार स्वरूप हैं। संपूर्ण भारत में भगवान सूर्य देव की पूजा, अराधना बहुत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ की जाती है। इस सूर्य मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। यह मंदिर कोणार्क के विश्वविख्यात सूर्य मंदिर से लगभग दो सौ वर्ष पुराना माना गया है। मंदिर नौवीं या ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित हुआ माना जाता है। इस मंदिर की स्थापना के विषय में विद्वानों में कई मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार समय-समय पर होता रहा है। यह सूर्य मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कटरामल के एक राजा ने करवाया था। प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में कुमाऊँ में कत्यूरी राजवंश का शासन था, जिन्होंने इस मंदिर के निर्माण में योगदान दिया था। इस सूर्य मन्दिर को "बड़ आदित्य सूर्य मन्दिर" भी कहा जाता है। इस मन्दिर में भगवान आदित्य की मूर्ति किसी पत्थर अथवा धातु की नहीं अपितु बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। मन्दिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार भी उत्कीर्ण की हुई लकड़ी का ही था, जो इस समय दिल्ली के 'राष्ट्रीय संग्रहालय' की दीर्घा में रखा हुआ है। पूर्व दिशा की ओर मुख वाले इस मन्दिर के बारे में माना जाता है कि के इसे मध्य काल में कत्यूरी वंशज राजा कटारमल ने बनवाया था, जो उस समय मध्य हिमालय में शासन करते थे। मुख्य मन्दिर की संरचना त्रिरथ है, जो वर्गाकार गर्भगृह के साथ नागर शैली के वक्र रेखी शिखर सहित निर्मित है। मन्दिर में पहुंचते ही इसकी विशालता और वास्तु शिल्प बरबस ही पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। (Source amar ujala)

 

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