Author Topic: स्टीव जॉब एप्पल कम्पनी और मार्क ज़ुकरबर्ग फेसबुक के मालिक कैची मंदिर के भक्त  (Read 6695 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,


उत्तराखंड के भवाली के समीप कैची धाम स्थित है। यहाँ नीम किरोड़ी बाबा का भी मंदिर है। स्टीव जॉब एप्पल कम्पनी और मार्क ज़ुकरबर्ग फेसबुक के मालिक कैची मंदिर के भक्त है।  नीम किरोड़ी बाबा के भक्त काफी दूर से आते है। 

Kainchi Dham: The temple Steve Jobs advised Mark Zuckerberg to visit- Near Nainital, uttarakhand
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During the townhall meeting with PM Modi, Facebook CEO Mark Zuckerberg revealed that when his company was going through a rough patch, Steve Jobs advised him to visit a temple in India, where the Apple co-founder had also experienced life-changing spiritual reflection.

Deeply influenced by the Indian spiritualism in 70s, Jobs visited Kainchi Dham Ashram, in Nainital, in the state of Uttarakhand (the Ashram of Baba Neem Karoli or Baba Neeb Karori, considered a reincarnation of Lord Hanuman); and he is believed to have got the vision at this place to create Apple. (source - http://thenamopatrika.com/kainchi-dham-the-temple-steve-jo…/)

M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Here are some interesting facts to know about Kainchi Dham Ashram:
1- Kainchi is a mountain ashram located in the Kumoan Hills in Uttarakand, approximately 38 km from Naini Tal.

2- The first temple of Lord Hanuman was inaugurated in June 15, 1964.

3- In 1962, Maharajji (Baba Neem Karoli) built a chabootara (platform) around a place where two spiritual gurus Sadhu Premi Baba and Sombari Maharaj had performed Yagyas in Kainchi village.

4- The Hanuman temple was later built over the platform thus establishing the Kainchi Ashram.

5- Baba Neem Karoli died on September 10, 1973. A temple for him was subsequently built at the Ashram. His statue was consecrated on June 15, 1976.
6- Neem Karoli Baba left his home in 1958 when his youngest daughter was 11 years old. He wandered throughout northern India as a sadhu and was known by many names.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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7- Karoli Baba has temples in several places including Lucknow and an Ashram in Texas, US. According to his website, Maharajji established at least 108 temples.

8- Anyone who wants to visit the Ashram in Kainchi village needs to request prior permission.  After a reference from one of the older devotees, one can stay for three days. The ashram is closed for a large portion of the year as it becomes very cold there.

9- A lot of foreigners visit the Ashram. Spiritual leaders Ma Jaya, Ram Dass, musicians Jai Uttal and Krishna Das, humanitarian Larry Brilliant, scholar and writer Yvette Rosser and Daniel Goleman are among his devotees.

http://thenamopatrika.com/kainchi-dham-the-temple-steve-jobs-advised-mark-zuckerberg-to-visit/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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10- Apple founder Steve Jobs visited the Ashram to meet Neem Karoli Baba with his friend Dan Kottke. However, he could  not meet Baba who had died before his arrival.
http://thenamopatrika.com/kainchi-dham-the-temple-steve-jobs-advised-mark-zuckerberg-to-visit/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भवाली-अल्मोड़ा/रानीखेत राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित कैंची धाम अपनी स्थापना के बाद से ही लगातार जनमानस के लिए अपार श्रद्धा और आस्था का केंद्र रहा है। कैंची धाम और खासकर स्वर्गीय नीम करौली बाबा के भक्तों की यहां खूब आस्था है।

समय के साथ-साथ बाबा नीम करौली महाराज के भक्तों की संख्या में लगातार इजाफा होता गया, तो मंदिर के स्थापना दिवस ने किसी महोत्सव का रूप ले लिया। कैंची धाम के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा भाव है और ये श्रद्धा यूं ही नहीं है, बल्कि हकीकत यह है कि यहां सच्ची भक्ति और दिल से मांगी गई हर मुराद बाबा के आशीर्वाद से पूरी होती है।

शिप्रा नदी पर स्थित कैंची मंदिर के स्थापना के पीछे रोचक कहानी है। महाराज के मन में उठी मौज ही उनका संकल्प बन जाती थी। ऐसी ही मौज में बाबा ने कैंची धाम की स्थापना की। बुजुर्ग बताते हैं कि वर्ष 1942 में कैंची निवासी पूर्णानंद तिवारी सवारी के अभाव में नैनीताल से गेठिया होते हुए पैदल ही कैंची की ओर वापस लौट रहे थे, तभी एक स्थूलकाय व्यक्ति कंबल लपेटे हुए नजर आया तो पूर्णानंद डर गए।

उस व्यक्ति ने पूर्णानंद को उनका नाम लेकर पुकारा और इस समय उनके वहां पहुंचने का कारण भी बता दिया। यह कोई और नहीं बल्कि स्वयं बाबा नीम करौली महाराज थे। बाबा ने पूर्णानंद से कुछ और बातचीत की और निडर होकर आगे बढ़ने को कहा। तब पूर्णानंद ने बाबा से पूछा कि अब कब उनके दर्शन होंगे तो बाबा ने जवाब दिया कि 20 साल बाद। यह कहकर बाबा ओझल हो गए।

ठीक 20 साल बाद बाबा नीम करौली महाराज तुलाराम साह और श्री सिद्धि मां के साथ रानीखेत से नैनीताल जा रहे थे, तभी बाबा जी कैंची में उतर गए और कुछ देर तक पैराफिट में बैठे रहे, वहीं उन्होंने पुरानी याद ताजा की और वह स्थान देखने की इच्छा जताई जहां साधु प्रेमी बाबा और सोमवारी महाराज ने वास किया था।

24 मई 1962 को बाबा ने पावन चरण उस भूमि में रखे, जहां वर्तमान में कैंची मंदिर स्थित है। इस तरह बीस साल पुरानी मनसा शक्ति ने कैंची धाम की स्थापना की। तब बाबा ने कैंची धाम में उस समय घास और जंगल के बीच घिरे चबूतरे और हवन कुंड को ढकने को कहा।

(यह वही चबूतरा है जहां सोमवारी बाबा ने वास किया था) वर्तमान में इस स्थान पर हनुमान जी का मंदिर है। इसी में सोमवारी बाबा की धूनी के अवशेष आज भी सुरक्षित हैं। 15 जून 1964 को मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति की प्रतिष्ठा की गई और तभी से 15 जून को प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

15 जून को लगने वाले कैंची धाम में मेले की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं 12 जून से मंदिर में प्रसाद के रूप में बांटे जाने वाले मालपुए बनाने का काम शुरू हो गया है। इस दौरान अनवरत हनुमान चालीसा का पाठ होगा। गुरुवार को मेला प्रभारी कोतवाल हरीश पांडा ने मेला स्थल में पार्किंग स्थलों का जायजा लिया। 14 जून को मेले की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जाएगा।

http://uttaranchaltoday.com/h

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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अगाध आस्था और विस्वास का केन्द्र : नीम करोली बाबा का कैंची धाम ..

हिमालय की गोद में रचा बसा उत्तराखंड वास्तव में दिव्य लोक की अनुभूति कराता है यहाँ के कण कण में देवताओ का वास है पग पग पर देवालयों की भरमार है जिस कारन एक बार यहाँ का भ्रमण करने वाला पर्यटक दूसरी बार यहाँ घूमने की चाहत लिए यहाँ जाने की कामना करने लगता है यहाँ की शांत वादियों में घूमने मात्र से सांसारिक मायाजाल में घिरे मानव की सारी कठिनायियो का निदान हो जाता है उत्तराखंड के देवालयों में आने वाले सैलानियों की तादात दिनों दिन बदतीजा रही है तीर्थाटन की दृष्टीसे ऐसे मनोहारी स्थान राज्य के आर्थिक विकास में खासेउपयोगी है हाँ यह अलग बात है सरकारी उपेक्षा के चलते राज्य में अभी कई सुंदर स्थान ऐसे है जो सरकार की आँखों से ओझल है जिस कारन कई पर्यटक स्थलों का अपेक्चित लाभ हासिल नही हो पा रहा है

देवभूमि के ऐसे ही रमणीय स्थानों में बाबा नीम करोली महाराज का कैची धाम है जो राज्य में आने वाले पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है यहाँ पहुचकर सुकून की प्राप्ति होती है और सारे बिगडे काम नीम करोली बाबा की किरपा से बन जाते है

सरोवर नगरी नैनीताल से २० किलोमीटर की दूरी पर अल्मोडा राजमार्ग पर हरी भरी घाटियों पर स्थित इस धाम में यू तो वर्ष भर सेलानियो का ताँता लगा रहता है लेकिन १५ जून का यहाँ पर खासा महत्त्व है इस दिन यहाँ पर विशेष भंडारे का आयोजन होता है जिसमे कुमाऊ के इलाकों के साथ साथ बहार से भी पर्यटक पहुचते है जो बाबा नीम करोली के शरण में शीश नवाते है इस दिन भारी जन सेलाब की मौजूदगी में पूजा अर्चना और अनुष्ठान के कार्यक्रम संपन्न होते है

नीम करोलीबाबा की महिमा बड़ी न्यारी है भक्तजनों की माने तो बाबा की किरपा से बिगडे काम बन जाते है यही कारन है की बाबा के द्वारा बनाये गए सारे मंदिरों में भक्तो का जन सेलाब उमड़ पड़ता है इस नीम करोली धाम को बनाने के सम्बन्ध में कई रोचक कथाये प्रचलित है बताया जाता है की १९६२ में जब बाबा ने यहाँ की भूमि पर अपने कदम रखे तो जनमानस को हतप्रभ कर दिया एक कथा के अनुसार माता सिद्धि और तुला राम के साथ बाबा किसी वहां से रानीखेत से नैनीताल जा रहे थे , तब वह अचानक कैंची धाम के पास उतर गए इसी बीच उन्होंने तुलाराम को बताया की"श्यामलाल अच्छा आदमी था " तुलाराम को यह बात अच्छी नही लगी , क्युकी श्यामलाल उनके समधी थे भाषा में "थे" के प्रयोग से वह बहुत बेरुखे हो गए और अपने गंतव्य स्थान की और चल दिए बाद में कुछ समय के बाद उनको जानकारी मिली की उनके समधी का हिरदय गति रुकने से निधन हो गया कितना दिव्य चमत्कार था यह बाबा का जो उन्होंने दूर से ही यह जान लिया की उनके समधी का अब बुलावा आ गया है

इसी प्रकार एक दूसरी चमत्कारिक घटना के अनुसार १५ जून को आयोजित विशाल भंडारे के दौरान "घी " की कमी पड़ गई बाबा जी के आदेशो पर पास में बहने वाली नधी की धारा से पानी कनस्तरों में निकालकर प्रसाद बनने के प्रयोग में लाया गया जब वह पानी प्रसाद के लिए डाला गया तो वह अपने आप "घी" में परिणित हो गया इसे चमत्कार से भक्त जन नतमस्तक ही गए तभी से उनकी आस्था और विस्वास नीम करोली बाबा के प्रति बना हुआ है जो आज दूना हो गया है

http://boltikalam.blogspot.in/2009/01/blog-post_09.html

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Kainchi Ashram

Kainchi is a beautiful secluded mountain ashram located in the Kumoan Hills in Uttarakand. The first temple was inaugurated in June 1964. It is approximately 38 km from Naini Tal. Many hundreds of people visit the temples here every day, in season. Each year, during the June 15th bhandara, reportedly, more than one lakh (100,000) people are fed. Beautiful Gardens.

Some westerners are permitted to stay at this ashram. A letter of introduction and prior arrangement with the ashram are a must if you wish to stay in this impeccable ashram. Most people stay in Naini Tal or Bhowali or outside the ashram and visit the temples during the day.

Rules are strictly enforced and individuals staying at the ashram are required to participate in morning and evening arati. The ashram is closed for a large portion of the year, because it becomes very cold.

If you are intending to visit Kainchi Dham, Maharaji-ji’s Ashram in India, you must first write to the manager and request permission for your stay. Generally people are allowed to stay three days. You need a reference note from one of the older devotees and you can send it along with your request to stay, and a picture to This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it..">kainchidham@gmail.com.

Shri Kainchi Hanuman Mandir and Ashram, P. O. Kainchi Dham, Nainital Jila, Uttaranchal (UA) India. No telephone is available.

It was some time in 1962 when Maharajji called for Shri Poornanand of Kainchi village while he himself waited sitting on parapet wall by the road side near Kainchi. When he came, they refreshed the memories of their first meeting which they had 20 years back in 1942. They discussed about the place around. Maharajji wanted to see the place where Sadhu Premi Baba and Sombari Maharaj had lived and performed Yagyas. The forest was cleared and Maharajji asked for the construction of a Chabootara (rectangular platform) covering the Yagyashala. Maharajji contacted the then "conservator of forests" and took possession of the requisite land on lease.

The Hanuman temple is built over the platform mentioned above. His devotees started coming from different places and a chain of bhandaras, kirtans, bhajans started. The Pran-Pratishtha of idols of Hanumanji and others was performed on 15th June in different years. Thus, 15th June is celebrated every year as Pratishtha Divas when a large number of devotees come to Kainchi and get Prasad. The number of devotees and the associated vehicular traffic is so large that the district administration has to make special arrangement to regulate the same. Accordingly some changes have been made in the whole complex so that people do not face any difficulty in movement.

Kainchi temple is of a special importance in each and every devotee's life. It was here that Ram Dass and other westerners spent a lot of good time with Maharajji. All devotees should pay a visit to this temple at least once.
http://maharajji.com/Kainchi/kainchi-ashram.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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From Premavatar

Construction of Maharajji's Temple at Kainchi

Babaji left His physical body in the night of 10 September 1973. The Kalash containing His ashes was already installed in Shri Kainchi dham.Then, without any plan and design the construction work of Baba's temple began in 1974. All His devotees cooperated (voluntarily).

The artisans and masons engaged in the construction work has an early bath and wearing clean clothes began work, reciting Hanuman Chalissa and chanting "Maharajji Ki Jai" (glory to Maharajji). When the construction work was on, the devotees also recited Hanuman Chalissaand did Kirtan by singing (Shri Rama - Jai Rama - Jai Jai Rama), Mothers also writing "Ramnam" on the bricks passed them on to the workers. The whole atmosphere vibrated with the chanting of "Baba Neem Karoli Maharaj Ki Jai". Influenced by the ardent devotion of the Mothers for Babaji, the workers also developed the same feeling of devotion, faith, reverance and love. It was Babaji's lila that he infused these workers with the qualities of Vishwakarma (the architect of Gods) and they remained busy with the construction work.

Now came 15th June 1976, the day for installation and consecration of Maharajji's murti. Maharajji Himself had fixed June 15th as the consecration of Kainchidham.

The Bhagwat saptah and yajna etc. were completed before the installation and consecration ceremony. The devotees installed Kalash and hoisted flag on the temple with the sound of bells, gongs, drums and conches.The sky vibrated with the sound of clapping. Kirtan and slogans of glory to Babaji. The atmosphere was ecstatic and everyone had the feeling of Babaji Maharaj's physical presence. Then with recitation of hymns from Vedas and with the specified method of consecration ceremony and worship, Maharajji's murti was installed. In this way, Babaji Maharaj in the form of a murti is seated in Shri Kainchi Dham.
http://maharajji.com/Kainchi/kainchi-ashram.html

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ये हैं जुकरबर्ग (Owner of Facebook) की ज‌िंदगी बदलने वाले नीम करोली बाबा

उत्तराखंड में भवाली-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित कैंची धाम स्थापना के बाद से जनमानस के लिए अपार श्रद्धा और आस्था का केंद्र रहा है। यहीं पर आकर बदली थी स्टीव जॉब्स और जुकरबर्ग जैसी हस्त‌ियों की तकदीर! नीम करोली बाबा द्वारा स्थाप‌ित कैंची धाम के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा यूं ही नहीं, बल्कि हकीकत यह है कि यहां सच्ची भक्ति और दिल से मांगी गई हर मुराद बाबा के आशीर्वाद से पूरी होती है। यही नहीं दुनिया कई दिग्गज हस्तियां नीम करोली बाबा की शिष्य रही हैं। एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक के सीईओ जुकरबर्ग की तकदीर बाबा के आश्रम में आकर ही बदली। दोनों ने खुद ये बात स्वीकारी। पिछले दिनों पीएम मोदी के अमेरिका दौरे में फेसबुक के संस्थापक जुकरबर्ग ने प्रधानमंत्री से बाबा के आश्रम में आने की बात बताई थी। जुकरबर्ग ने पीएम मोदी से बताया क‌ि फेसबुक अच्छी स्थिति में नहीं था और वे बहुत निराश थे। तभी उनके गुरु और दिग्गज तकनीकी कंपनी एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत में रहकर अध्यात्म की शरण में जाने की सलाह दी थी। ज‌िसके बाद वे नीम करौरी बाबा के कैंची आश्रम में आए। (Source amar ujala)

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नैनीताल जिले में शिप्रा नदी के तट पर स्थित कैंची मंदिर के स्थापना के पीछे रोचक कथा है। महाराज के मन में उठी मौज ही उनका संकल्प बन जाती थी। बुजुर्ग बताते हैं कि वर्ष 1942 में कैंची निवासी पूर्णानंद तिवारी सवारी के अभाव में नैनीताल से गेठिया होते हुए पैदल ही कैंची की ओर वापस लौट रहे थे, तभी एक स्थूलकाय व्यक्ति कंबल लपेटे हुए नजर आया तो पूर्णानंद डर गए। उस व्यक्ति ने पूर्णानंद को उनका नाम लेकर पुकारा और इस समय उनके वहां पहुंचने का कारण भी बता दिया। यह कोई और नहीं बल्कि स्वयं बाबा नीम करौली महाराज थे। बाबा ने पूर्णानंद से कुछ और बातचीत की और निडर होकर आगे बढ़ने को कहा। तब पूर्णानंद ने बाबा से पूछा कि अब कब उनके दर्शन होंगे तो बाबा ने तपाक से जवाब दिया कि 20 साल बाद। यह कहकर बाबा ओझल हो गए। ठीक 20 साल बाद बाबा नीम करौली महाराज तुलाराम साह और श्री सिद्धि मां के साथ रानीखेत से नैनीताल जा रहे थे, तभी बाबा जी कैंची में उतर गए और कुछ देर तक पैराफिट में बैठे रहे वहीं उन्होंने पुरानी याद ताजा की और वह स्थान देखने की इच्छा जताई जहां साधु प्रेमी बाबा और सोमवारी महाराज ने वास किया था। 24 मई 1962 को बाबा के पावन चरण उस भूमि में रखे जहां वर्तमान में कैंची मंदिर स्थित है। इस तरह बीस साल पुरानी मनसा शक्ति ने कैंची धाम की स्थापना की। तब बाबा ने कैंची धाम में उस समय घास और जंगल के बीच घिरे चबूतरे और हवन कुंड को ढकने को कहा। (यह वही चबूतरा है जहां सोमवारी बाबा ने वास किया था)

 

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