Author Topic: Kotdwar,Uttarakhand,कोटद्वार उत्तराखंड का ब्यापारिक केंद्र  (Read 17356 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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कोटद्वार को पूर्व में खोह्द्वार भी कहा जाता रहा है :- जिसका अर्थ है खोह का द्वार , जिस नदी के तट पर यह स्थित है | कोटद्वार इसका परिवर्तित नाम है | यह शहर हमेशा से व्यापार का केंद्र रहा है | और गढ़वाल की पहाड़ियों की शुरुआत में स्थित होने के कारण, यहाँ से पहाड़ी नगरों पौड़ी, श्रीनगर, बद्रीनाथ, एवं केदारनाथ आदि को जरूरत की सामग्री की आपूर्ति की जाति है |

कोटद्वार किसी समय मौर्या शासकों (अशोक के अधीन), उसके बाद कत्युरी शासकों, एवं अंत में गढ़वाल के पंवार शासकों द्वारा आधिपत्य था  | इसके बाद नेपाल के गोरखा शासकों ने यहाँ १२ वर्ष तक राज्य किया, उसके बाद यह ब्रिटिश साम्राज्य के आधीन रहा |

 सन ११९२ में 'हिमालयन गाज़ेतीअर' में इ.टी. अत्किंस ने बताया की, यह खोह नदी के किनारे बसा हुआ तेजी से बढ़ता हुआ व्यापारिक केंद्र है | शहर में  किला भी हुआ करता था, जिसे की मैदानी इलाके के डाकुओं से रक्षा के लिए बनाया गया था |



 वह कहते हैं की, कोटद्वार बाज़ार तेजी से आगे बढ़ रहा है, क्योंकि इस क्षेत्र में कृषि को बढ़ावा दिया गया, एवं आवागमन की व्यवस्था में भी सुधार हुआ | पहाड़ी क्षेत्र के लोग यहाँ श्रीनगर से सामन खरीदने के बजाय यहाँ सस्ते दामों पे रोजमर्रा का सामान एवं जड़ी बूटियाँ आदि खरीदने के लिए आने लगे |

 उन्होंने आगे कहा की वन विभाग के बड़ी मात्र में लकड़ी और बांस की उपलब्धता है, एवं नहर के किनारे एक मिल है, जो नाज़ीमाबाद तथा नगीना से लाये गए अनाज को पीसने का काम करती है | उनके अनुसार यहाँ मंगलवार एवं शुक्रवार को लगने वाले वाले मेलों में भारी संख्या में लोग आते हैं |

 रेलवे एवं मोटर रोड की शुरुआत से पहले बैल गाड़ियों तथा घोड़े गाड़ियों द्वारा 'दुगड्डा' तक सामान ले जाया जाता था, जहाँ से इसे आगे पहाड़ी स्थानों तक खच्चरों व् गधों द्वारा ले जाया जाता था | सन १९१० में ह.जी. वाल्टन ने ब्रिटिश गढ़वाल में बताया की, लेंसडाउन में छावनी बसने एवं नजीमाबाद से कोटद्वार तक रेलवे मार्ग की स्थापना ने कोटद्वार के विकास में विशेष सहयोग किया |

सन १९२० में मेटल रोड बनने के बाद शहर का और विकास हुआ | अब मोटर वाहनों द्वारा कोटद्वार रेलवे स्टेशन से पहाड़ी शहरो / कस्बों को सामान की आपुर्ति होने लगी | दुगड्डा के व्यापारियों ने अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ एवं रिहायश कोटद्वार कर दी | भारत की आजादी के बाद, यह उत्तर प्रदेश के पौड़ी जिले का हिस्सा बना, एवं सन २००० में उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद  कोटद्वार को उत्तराखंड का अलग जिल्ला घोषित कर दिया गया है

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कोटद्वार उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित, शिवालिक पहाड़ियों से घिरा हुआ एक छोटा सा शहर है | यह तीन और से पहाड़ियों से घिरा है | कोटद्वार का अर्थ है देवभूमि का द्वार, क्योंकि यहाँ से भी केदारनाथ एवं बद्रीनाथ की पवित्र तीर्थयात्रा शुरू होती है | कोटद्वार तीन मौसमी नदियों खोह, मालिनी, एवं सुखरो के किनारे बसा हुआ है | यह इलाका संतों एवं ऋषियों में तपस्या एवं ध्यान के लिए अत्यंत प्रसिद्ध रहा है |

Kotdwara is a small town, situated at the border of Uttarakhand and Uttar Pradesh, on the foothills of the Shivalik Range of Himalayan Mountains.[citation needed] It is locked in by hills from three sides. The name Kotdwara indicates the gateway (dwara) to the Abode of God (Dev Bhoomi),

since this is the place from where the pilgrimage to two famous temples Kedarnath (Lord Shiva) and Badrinath (Lord Vishnu) starts.[citation needed] It is situated on the banks of three seasonal rivers namely Kho, Malini, and Sukhro. This area was the place of meditation for many sages and rishi

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Kotdwara or Kotdwar was called Khohdwara initially;–meaning a gateway to the Khoh;–after river Khoh on whose banks itis located. Kotdwar is a transformation of this name. The town has always been a commercial centre;

 and being located on the foothills of Garhwal, it has played the important role of a supplier of essentials to the upper reaches of the hills, such as Pauri, Srinagar, Badrinath and KedarnathIn common with the rest of the region,

 Kotdwara was ruled by the Mauryan Empire under Ashok the Great, then by the Katyuri dynasty followed by the Panwar dynasty of Garhwal.

 The Gorkhas of Nepal followed for a brief 12 years and then the British colonists.Writing in 1882 in The Himalayan Gazetteer (Vol III, no II) E.T.


Atkins says that it was a small but rapidly increasing mart located on a flat piece of land on the left banks of the Khoh.[citation needed] There was a fort at the hill end of this flat land, to fend off robbers from the plains. Kotdwara’s bazaar, he says, was increasing in importance partly due to the recently introduced cultivation and because of “increased means of communication,

 as hill men, instead of purchasing cloth, gur, etc. from Srinagar now go direct to this place where they can procure all they want at cheaper rates, and also barter ghi, red pepper, turmeric, hempen cloth, ropes of different fibres, and a few barks and jungle products, for what they require for home consumption”.


 He adds that the forest department had a large amount of timber and bamboo cutting in the vicinity and that there was a large mill on the canal used for grinding grain from Najibabad and Nagina. According to him, two fairs were held here during the week on Tuesdays and Fridays, frequented by thousands of people.


 The town itself, he points out, “was peopled by petty traders from the Bijnaur district numbering 1,000 for 10 months a year, as a large number of traders form Najibabad and also the hills keep shops open during this period, only going away for the unhealthy months of August and September

http://en.wikipedia.org

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रसीली लीची के लिए भले ही देहरादून और रामनगर को जाना जाता हो पर देश का सबसे पुराना लीची का पेड़ कोटद्वार में है। 106 साल की उम्र का यह पेड़ चीन से लाया गया था। पंतनगर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इस पेड़ को अब राष्ट्रीय धरोहर घोषित करवाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं।
विश्वविद्यालय ने 2005 में इस वृक्ष का शताब्दी वर्ष भी मनाया था।लीची का यह महावृक्ष कोटद्वार के ग्रास्टन गंज में उद्यान विभाग के बगीचे में हैं। पंतनगर विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विजय प्रसाद डिमरी का कहना है कि, प्रोवेजन गवर्मेट ऑफ स्टेट के रजिस्ट्रर के रिकार्ड के अनुसार भारत में लीची सबसे पहले कोटद्वार में इंट्रोडय़ूज की गई। देहरादून में भी 70 से 75 वर्ष पुराने लीची के पेड़ हैं लेकिन कोटद्वार में 106 साल पुराना यह पेड़ अभी भी जिंदा है।


 डिमरी कहते हैं कि, रिकार्ड के अनुसार 1905 में गुड़ और नमक के लिए चीन गये व्यापारी लीची के इस पौधे को चीन से लेकर आए थे। 20 अगस्त 1905 को इसका रोपण किया गया था। तब इस स्थान को रामपुर खाम स्टेट के रूप में जाना जाता था।
राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के लिए एनआईआरडीए हैदराबाद ने इस वृक्ष का दो बार सर्वे भी कर दिया है। इस वृक्ष के निरीक्षण के लिए 2005 में चीन से भी वैज्ञानिकों की टीम आयी थी।

देहरादून एफआरआई से भी इस वृक्ष की उम्र की जांच की गयी। पंतनगर कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बीएस बिष्ट का कहना है कि, लीची के इस 106 वर्ष पुराने लीची के वृक्ष को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में घोषित करने के लिए कागजात केन्द्र सरकार को भेज दिए गए हैं।
 उम्मीद है कि 20 अगस्त तक यह वृक्ष राष्ट्रीय धरोहर के रूप में दर्ज कर लिया जाएगा। महावृक्ष के बारे मेंव्यापारी चीन से भेड़ में लाद कर लाए थे इस पेड़ कोविवि के शोधकर्ताओं ने वृक्ष को नाम रोज सैन्टेड ओल्ड नाम दिया है 1991 से अब तक इस पेड़ से दो लाख 56 हजार पांच सौ रुपये की लीची बेच दी गई है।


 पेड़ ने विलुप्त प्रजाति की चींटियों तथा चमगादड़ोंको भी संरक्षित किया है। पंतनगर विवि के वैज्ञानिक हर वर्ष इस पेड़ के स्वास्थ्य की जांच करते हैं। एफआरआई से भी वृक्ष की उम्र की जांच कराई गई हैचीन के वैज्ञानिक भी इस पेड़ का निरीक्षण करने कोटद्वार आ चुके हैं।

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लेंसडाउन :कोटद्वार

लेंसडाउन अन्य हिल स्टेशन की तरह मोटर रोड से जुड़ा हुआ, लेकिन अपने आप में अलग शांत जगह है | लेंसडाउन भारत वर्ष के अत्यंत शांत हिल स्टशनों में से एक है, एवं ब्रिटिश काल के समय से ही प्रसिद्ध है |

यह समुद्र ताल से १७०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, एवं चीड व् देवदार के वृक्षों से घिरा हुआ है | लेंसडाउन, कोटद्वार शहर से ४० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है | छावनी होने के कारण यहाँ सीमित होटल हैं | लेंसडाउन घूमने से पहले ही होटल की बुकिंग करवाना उचित है |

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ताड़केश्वर महादेव कोटद्वार

यह मंदिर भगवन शिव को समर्पित है | यह उन लोगों के लिए अत्यंत उपयुक्त स्थल है, जो की प्रकृति की गोद में शांति का अनुभव लेना चाहते हैं | यह स्थल चीड एवं देवदार के वृक्षों से घिरा हुआ है, एवं यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य बिखरा हुआ है | कोटद्वार शहर से इसकी दूरी ७० किलोमीटर के आसपास है |

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कोटद्वार उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल संभाग के अंतर्गत पौड़ी गढ़वाल जनपद का तहसील मुख्यालय है. यहाँ पर हनुमान जी के सिद्धबली मंदिर में दूर-दूर से भक्त दर्शनार्थ आते हैं, जो कि खोह नदी के बाएं तट पर एक ऊंची चट्टान पर स्थित है. राज्य सरकार के अनेक विभागों के अतिरिक्त भारत सरकार का उपक्रम 'भारत इलेक्ट्रिकल लिमिटेड ' भी यहाँ पर है. ठहरने हेतु कण्वाश्रम विश्राम गृह के अतिरिक्त गढ़वाल मंडल विकास निगम का 'पनियाली विश्राम गृह ' भी है. वन विभाग का भी पनियाली में विश्राम गृह है. इसके अतिरिक्त पी० डब्लू० डी० का व पेय जल निगम का भी गेस्ट हॉउस है तथा देवयानी, पैराडाईज व राज आदि होटल में ठहरा जा सकता है. दिल्ली से लगभग 250 किलोमीटर व हरिद्वार से 75 किलोमीटर दूरी पर कोटद्वार सड़क व रेल मार्ग से भली भांति जुड़ा हुआ है.   

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कोटद्वार नगर में रविवार की शाम पूरी तरह लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के नाम रही। क्षेत्रीय जनता ने श्री नेगी के गीतों का भरपूर आनंद उठाया। मौका था बलूनी एजूकेशनल सोसाइटी के तत्वावधान में बलूनी पब्लिक स्कूल के भूमि पूजन समारोह का।

यहां नजीबाबाद रोड पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी की ओर से प्रस्तुत मां भगवती की आराधना 'तेरा मंदिर मा दियू बल्यूं..' से हुआ। इसके बाद श्री नेगी 'हरिभर सार-सार पड़िगे..', 'माछू पाणि पेंडली दिखे..', 'भीना रे बजार्या भीना..', आदि गीतों की प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमुदाय को झूमने पर मजबूर कर दिया। कार्यक्रम में जहां नरेंद्र सिंह नेगी व उनके पुत्र अभिलाष नेगी की प्रस्तुति को भी लोगों ने काफी सराहा।


लोक गायक अनिल बिष्ट ने भी अपनी प्रस्तुति से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। हास्य कलाकार घनानंद ने उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था, पहाड़ में बढ़ते शराब के प्रचलन पर व्यंग्य सुना लोगों को खूब गुदगुदाया। संगीत पक्ष में विनोद चौहान (आर्गन), सुभाष पांडे (तबले), सतेंद्र सिंह (ढोलक), रवि थापा (पैड), द्वारिका नौटियाल (पैड) ने संभाला।


कार्यक्रम में बलूनी एजूकेशन सोसाइटी के निदेशक डॉ.नवीन बलूनी, विपिन बलूनी, पूर्व काबीना मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी, अभिलाषा भारद्वाज, रोशन भारद्वाज, अमित पटेल आदि गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन गणेश कुकशाल ने किया।
बलूनी पब्लिक स्कूल का भूमिपूजन समारोहपूर्वक संपन्न


कोटद्वार : बलूनी एजुकेशन सोसाइटी के तत्वावधान में नगर में खुल रहे बलूनी पब्लिक स्कूल का भूमिपूजन पं.हरीश कुकरेती के दिशा-निर्देशन में वैदिक मंत्रोच्चारों के साथ संपन्न हुआ। सोसाइटी के निदेशक डॉ. नवीन बलूनी व विपिन बलूनी ने कहा कि उनका उद्देश्य नौनिहालों को उत्तराखंड की संस्कृति व पंरपरा के अनुरूप विनम्र बनाने के साथ ही उनके समर्पण, सहयोग, त्याग आदि की भावनाओं को विकसित करना है। भूमि पूजन कार्यक्रम में बलूनी परिवार व बलूनी क्लासेस स्टाफ के साथ ही कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

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कोटद्वार। यहां से सटे बिजनौर जिले के मोरध्वज किला क्षेत्र से पुरातत्व महत्व की मूर्तियों के मिलने का सिलसिला जारी है। अभी कुछ दिन पहले ही यहां से कई मूर्तियां मिली थीं। ग्रामीणों को खुदाई में अब एक विशालकाय शिवलिंग मिला है। इसे देखने के लिए इलाके में लोगों की भीड़ लग रही है। वन विभाग के अफसरों ने भी मौका मुआयना किया है।


मोरध्वज किला के बिजारखाता क्षेत्र से मिला शिवलिंग पांच फीट लंबा बताया जा रहा है। यह जमीन में गहरे तक दबा हुआ है। इसके नीचे फिट की गई सिल्लियां भी मिली हैं। मोरध्वज किले के जंगल क्षेत्र से की गई खुदाई में भी शिवलिंग का चबूतरा मिला है। हालांकि यह खंडित अवस्था में मिला है। एक अन्य जगह में चंदन घोटने वाली शिला भी मिली है।

खुदाई में मिल रहे पुरातत्व अवशेष को लेकर लोगों में बेहद उत्सुकता बनी हुई है। सिद्धबली मंदिर समिति कोटद्वार के पदाधिकारियों ने भी -ं पहुंचकर शिवलिंग का निरीक्षण किया है। वन विभाग की कौड़िया रेंज के डीएफओ आरपी यादव ने भी खुदाई स्थल का निरीक्षण किया है। इससे पहले भी यहां कई शिवलिंग मिल चुके हैं।
इतिहास में मोरध्वज

लोगों की रायइस पूरे क्षेत्र में पुरातत्व महत्व की सामग्री भरी पड़ी है। मगर सरकारी मशीनरी का उपेक्षित रवैया बना हुआ है। बडे़-बडे़ दावे जरूर किए जाते हैं, मगर ईमानदारी से काम नहीं होता।

-सुशील प्रसाद डुकलान, क्षेत्रीय ग्रामीणपुरातत्व अवशेष के संरक्षण के लिए ग्रामीण अपने स्तर से प्रयास कर रहे हैं। सरकार और उसके जिम्मेदार विभाग निष्क्रियता अपनाए हुए हैं। -मनोज कंडवाल, क्षेत्रीय ग्रामीण

सरकार यदि ध्यान दे, तो इस पूरे क्षेत्र से पुरातत्व महत्व की जितनी सामग्री मिल रही है, उससे बहुत शानदार संग्रहालय बनाया जा सकता है। -लक्ष्मण रावत, क्षेत्रीय ग्रामीण चांदपुर गढ़ी राज्य               बनने के दौरान मारेध्वज भी आया था अस्तित्व में कत्यूरी शासन के                  दौरान मोरध्वज राजा का                ये  निवास रहा मोरध्वज ने कोटद्वार               और नजीबाबाद के बीच किला बढ़ाया यहां के निर्माण में टेराकोटा आर्ट के इस्तेमाल के प्रमाण यूनिवर्सिटी की टीम का अब भी इंतजार

कोटद्वार। मोरध्वज किला क्षेत्र में मिल रही मूर्तियों की जांच के लिए गढ़वाल यूनिवर्सिटी की टीम अभी नहीं पहुंच पाई है। क्षेत्रवासी इसका इंतजार कर रहे हैं। गढ़वाल यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विभाग के प्रो.विनोद नौटियाल ने कुछ दिन पहले कहा था, कि बहुत जल्द यूनिवर्सिटी की टीम मौके पर जाएगी।



 

Amarujala
 

 

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