Tourism in Uttarakhand > Tourism Places Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के पर्यटन स्थलों से सम्बन्धित जानकारी

Lohaghat : Hill Station - लोहाघाट

(1/25) > >>

सुधीर चतुर्वेदी:
                                  Lohaghat :Hill Station

भारतीय स्वाधीनता से पहले कुमाऊं के शेष भाग की तरह लोहाघाट भी कई रजवाड़े वंशों द्वारा शासित रहा है। 6ठी सदी से पहले यहां कुनिनदों ने शासन किया। उसके बाद खासों तथा नंदों एवं मौर्यों का शासन हुआ। माना जाता है कि बिंदुसार के शासन काल में खासों ने विद्रोह कर दिया था जिसे उसके पुत्र सम्राट अशोक ने दबाया। इस काल में कुमाऊं में कई छोटे-मोटे सरदारों तथा राजाओं का शासन था।
यह 6ठी से 12वीं सदी के दौरान संभव हो पाया कि एक वंश शक्तिशाली बना और इस समय अधिकांश समय यहां कत्यूरियों का शासन रहा।

परंतु इस दौरान भी चंद शासकों ने चंपावत पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया। उस समय चंपावत के निकट होने के कारण लोहाघाट एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र था।

12वीं सदी में चंद वंश को प्रधानता मिली, जब उन्होंने अपना अधिकार विस्तृत कर अधिकांश कुमाऊं पर शासन किया और वर्ष 1790 तक शासन करते रहे। अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिये उन्होंने कई छोटे-मोटे प्रमुखों को पराजित किया तथा पड़ोसी राज्यों से युद्ध भी किया। इस वंश के शासन काल में एकमात्र विराम तब आया जब गढ़वाल के पंवार राजा प्रद्युम्न शाह, कुमाऊं का राजा बना यहां जो प्रद्युम्न चंद के नाम से जाना लगा। वर्ष 1790 में स्थानीय रूप से गोरखियोल कहे जाने वाले गोरखों ने कुमाऊं पर कब्जा कर लिया और चंदों के शासन का अंत कर दिया। वास्तव में प्रथम गोरखा आक्रमण लोहाघाट पर ही हुआ।

गोरखों का शोषण भरा शासन वर्ष 1815 में समाप्त हो गया जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें परास्त कर कुमाऊं पर अधिकार कर लिया। द हिमालयन गजेटियर (वॉल्युम III, भाग I, वर्ष 1882) में ई टी एटकिंस ने लिखा है कि वर्ष 1881 में लोहाघाट की आबादी 64 महिलाओं सहित कुल 154 ही थी। वह यह भी बताता है कि लोहाघाट सैनिकों की छावनी भी रहा था पर उसे पहुंच, की समस्या के कारण हटा दिया गया।

तिब्बत के प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर होने के कारण लोहाघाट का प्रमुख व्यापारिक शहर होना सुनिश्चित हुआ। तिब्बत से भारत, पहाड़ी रास्तों को पार करने में निपुण भोटिया लोग प्रमुख व्यापारी थे जो लोहाघाट के बाजार में ऊन भेड़/बकरी, बोरेक्स एवं नमक बेचने के लिये आते तथा तिब्बत के लिये मोटे कपड़े, चीनी (खासकर गुड़) मसाले एवं तंबाकू खरीदकर ले जाते। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के कारण यह व्यापारिक कार्य एकाएक ठप्प पड़ गया और फलस्वरूप दोनों देशों के बीच व्यापारिक दृष्टि से लोहाघाट का महत्व कम हो गया।

लोहाघाट का इतिहास स्वामी विवेकानंद से भी संबद्घ है, जिन्हें पास ही मायावती में एक अद्वैत आश्रम की स्थापना करने का श्रेय जाता है। यहां वे कई बार आये तथा वर्ष 1901 में दो सप्ताह से अधिक दिनों तक रूके। उन्होंने इस क्षेत्र के बारे में कहा, “यही वह जगह है, जिसका सपना मैं बचपन से देखा करता था। मैने बार-बार सदैव यहां रहने का प्रयास किया पर इसके लिये उपयुक्त समय नहीं मिल सका तथा कार्य व्यस्तता के कारण मुझे इस धार्मिक स्थान से दूर जाना पड़ा। मैं अंतर्मन से प्रार्थना एवं आशा करता हूं और विश्वस्त भी हूं कि मेरे अंतिम दिन यही बीतेंगे। पृथ्वी के सभी स्थानों में हमारी जाति की सर्वोत्तम यादें इन्हीं पर्वतों से संबद्ध हैं।”

अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन से भारत के स्वाधीन होने पर कुमाऊं, उत्तर प्रदेश का एक भाग बना। वर्ष 1972 में अल्मोड़ा जिला का चंपावत तहसील पिथौरागढ़ में शासन किया गया तथा सितंबर 15, 1997 को चंपावत जिला को स्वतंत्र पहचान मिली और लोहाघाट इसका एक हिस्सा बना। वर्ष 2000 में लोहाघाट वर्तमान नये राज्य उत्तराखंड का भाग बना जो तब उत्तरांचल कहलाता था।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय:
Source: http://en.wikipedia.org/wiki/Lohaghat

Lohaghat on the banks of Lohawati River in champawat district is one of the important places for its beautiful temples. Located at an altitude of 1706 mts, Lohaghat is a few kilometers from Pithoragarh. This ancient town of Lohaghat has immense historical and mythological importance which attracts a number of tourists. Mostly devotees and pilgrims from all over drop into Lohaghat before visiting Advaita Ashram which is also called the Mayawati Ashram. A sleepy little town of Uttaranchal it shot to fame because of the beautiful temples and fascinating locales near by.

Spread over an areas of 4.5 sq km, Lohaghat is one of the most beautiful places in Uttaranchal specially made popular because of its historical and mythological associations.

Situated 14 km from Champawat, and 62 km away from Pithoragarh on way to Tanakpur. Lohaghar is close several tourist spots in the region, Shyamla Taal, Devidhura, Gurudwara Ritha Sahib, Abbot Mount (8 km), Varansur fort (Vanasur-Ka-Kila) (7 km), Mayawati Ashram (Advaita Ashrama) (9 km), Galchaura, Suin(Pawa), and the Forti viilage.

It is famous for Bagwal fight carnival which takes place at Devidhura (Maa Baarahi temple) on auspicious day of Raksha bandhan day. [4] Near by Ritha-sahib is famous for Sikh gurudwara and sweet Rithas that are unique in world and Pancheshwar is famous for river-rafting and adventurous sports. 20 km far from Lohaghat, there is scenic tourist spot called Pati.

Nearest Railhead :- Tanakpur Railway station is 89 km away from Lohaghat.

Tourist Attractions of Lohaghat:

Mayawati Ashram :- Located at a distance of 9 km from Lohaghat this is famous for the Advaita Ashram which attracts pilgrims and tourists from all over the world.

Abbot Mount :- Situated at a distance of 8 km from Lohaghat this is one of the most serene locales near by Lohaghat. Spend a few moments amidst serenity in Abbot Mount.

Anubhav / अनुभव उपाध्याय:


Places of Worship:

Rikeshwar Mahadev Mandir
On the road to Champawat, 1 km from Town

Anubhav / अनुभव उपाध्याय:
लोहाघाट लंबे देवदार एवं बुराँज पेड़ों के बीच लोहावती नदी के किनारे स्थित है तथा चंपावत जिले के सर्वाधिक सौंदर्यपूर्ण स्थलों में से एक है। यह एक ग्रामीण स्थल है, जहां शहर के कोलाहल से दूर छुट्टी बितायी जा सकती है। आपको फिर से जोश से भर देने में शहर की प्राकृतिक सुंदरता के साथ शिथिल पुराने सांसारिक परिवेश का अद्भुत योगदान होगा। पड़ोसी क्षेत्रों में कुछ घूमने योग्य स्थान भी हैं जहां रहस्य, ऐतिहासिक तथा साहसिक कार्यों का मिश्रण देखने को मिलता है।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय:
लोहाघाट की पौराणिकता पास ही स्थित बाणासुर किले की संबद्धता से है। हिन्दू दर्शन के अनुसार बाणासुर हजार हाथों वाला एक राक्षस था जो बाली का पुत्र एवं रावण का वंशज था। बाणासुर एक शक्तिशाली, भयानक असुर तथा भगवान शिव का उपासक था।

बाणासुर की सुंदर पुत्री ऊषा सपने में ही श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध के प्रति आसक्त हो गयी। अपनी सखियों की सहायता से उसने द्वारका से अनिरूद्घ का अपहरण कराकर चुपके से विवाह कर लिया। जब बाणासुर को यह पता लगा तो उसने अनिरूद्ध को बंदी बनाकर सांपों के बंधन में डाल दिया। जिसके कारण एक बड़ी सेना के साथ भगवान श्रीकृष्ण ने उस पर आक्रमण कर दिया। यह युद्ध वर्षों तक चलता रहा और निरसता में इसका अंत हो गया क्योंकि भगवान शिव ने बाणासुर की सहायता की। युद्ध में कई देवों एवं दानवों की मृत्यु हुई और यही कारण है कि लोहाघाट के आस-पास की मिट्टी का रंग लाल है तथा उनके रक्तपात से ही लोहावती नदी का नाम भी ऐसा पड़ा। लोहाघाट का अपना नाम भी इसी किंवदन्ती पर आधारित है।

नीरस युद्ध की समाप्ति भगवान शिव के अनुरोध पर भगवान श्रीकृष्ण की उस स्वीकृति से हुई, जिसके अनुसार उन्होंने बाणासुर के चार हाथ काटकर उसे जीवन दान दे दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने ऊषा के साथ अनिरूद्ध का विवाह कर दिया और उन्हें द्वारका ले आये। बाणासुर हिमालय चला गया और उसने भगवान शिव की आराधना में शेष जीवन बिताया।

Navigation

[0] Message Index

[#] Next page

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 
Go to full version