Author Topic: Tourism and Hospitality Industry Development & Marketing in Kumaon & Garhwal (  (Read 26757 times)

Bhishma Kukreti

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सम्राट अशोक के  पगलपन से  भारत में  विज्ञान सोच समाप्त होना

     (पपर्यटन प्रबंध में निरंतरता की महत्ता )


( अशोक काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -23

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  23                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--128 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 128   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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 सम्राट अशोक की प्रशंसा में हजारों टन कागज लग चुका होगा।  अशोक का राज्य स्तर पर सामाजिक हित कार्य की प्रशंसा होनी ही चाहिए।  इतने बड़े राष्ट्र में लाटों , शिलालेखों व अन्य माध्यमों से अपनी मनशा को जन जन में पंहुचाने का  कार्य अपने आप में इन्नोवेटिव , मौलिक था।
     किंतु यदि अशोक के खाते में Credit है तो साथ में Debit भी है।

       बौद्ध धर्म प्रचार के ठसक  में कई लाख श्रुतियों का विनाश
   
     महात्मा बुद्ध यदि महात्मा बुद्ध बने तो उसमे केवल देव व्रत का व्यक्तिगत हाथ नहीं था अपितु भारत में हजारों साल से चली आ रही एक विशेष सोच का हाथ है।  महात्मा गांधी ने अहिंसा को स्वतंत्रता पाने हेतु  हथियार बनाने की बात की और भारतीय समाज ने चट से मान लिया तो उस मानसिकता के पीछे महाभारत से लेकर बुद्ध साहित्य , जैन साहित्य , भारतीय दर्शनों , पुराणों का हाथ था जो भारतीय मन में हजारों साल तक वैसे के वैसे जमा रही जो महाभारत के अंतिम खंडों में रचा गया था।
              सामंत अशोक के सम्राट बनने के बाद अशोक ने  अपने मानसिक हठ  ''एक राज्य -एक धर्म'' हेतु सनातन धर्म विरुद्ध वास्तव में एक हिंसात्मक व अंहिसात्मक युद्ध छेड़ दिया था।  इससे क्या हुआ ? जो विज्ञान , जो कला , कृषि शास्त्र आदि जो भी  शास्त्र श्रुति रूप में विद्यमान थे वे अशोक के 'हेतुवाद ' की बलि चढ़ गयी। महाभारत के कई खंड अशोक के बाद सम्पादित हुए।  महाभारत के वनपर्व 190 वे खंड में वर्णित है कि किस तरह अशोक के 'हेतुवाद'  प्रचार ने उन ब्राह्मणों को समाप्त किया जिनके मष्तिष्क में विभिन्न विज्ञान -शास्त्र सुरक्षित थे।  जिनके मष्तिष्क में विज्ञान व शास्त्र सुरक्षित थे उनको प्रताड़ित कर बौद्ध धर्मी बना दिया गया और उन मुनियों को शिष्य बनाने के सभी अवसर समाप्त कर दिए गए और विज्ञान -शास्त्र -कला की स्मृतियों -संहिताओं को सुरक्षित रखने वाले व उन्हें फिर आगे बढ़ाने वाले कोई न रहे।  जो भी ज्ञान था वह  अशोक के समय थम गया , अशोक काल व बाद में भी ज्ञान -विज्ञान में अन्वेषण करने हेतु सुविधा ही समाप्त कर दी गयी।  यह महाभारत के भीष्म मृत्यु खंड (इसका संपादन अशोक के बाद हुआ ) में उद्घृत भी है कि वृहस्पति के एक लाख श्लोक समाप्त कर दिए गए या खो गए।  याने वृहस्पति सिद्धांत के श्लोकों को कंठस्त करने के लिए जब शिष्य  मिले  ही नहीं होंगे तो वृहस्पति  विज्ञान शाखा ही समाप्त  हो गयी ।
             अशोक या उनके अनुचरों द्वारा हेतुवाद प्रचार की हठवादिता ने भारत वर्ष में जो भी विज्ञान अन्वेषित हुआ था उसका 80 प्रतिशत से अधिक  समाप्त कर दिया।  राज्य का संसाधन जब धर्म प्रसार में लग जाय तो भविष्य अन्धेरा ही होगा।  यदि हम ध्यान दें तो पाएंगे कि अशोक के समय या बाद में भारत में कृषि में , चिकित्सा , पशुपालन आदि विज्ञान में कोई उल्लेखनीय प्रगति अंग्रेजी शासन काल तक नहीं हुआ।  उसका कारण था श्रुतियों की समाप्ति।  जो भी चरक संहिता , व्याकरण , कौटिल्य का अर्थ शास्त्र , अनेक शास्त्र आदि रचे गए थे वे अशोक से पहले रचे (create ) गए थे और उनका संकलन -सम्पादन बाद में होता गया।  अशोक व उसके बाद रचना (Innovation and Practice ) तकरीबन समाप्त ही हो गए थे और विज्ञान शाखा ही समाप्त हो गयी। गुरुकुल समाप्ति का अर्थ है विचार उत्तपत्ति  , अन्वेषण , क्रियान्वतिकरण और परिणाम का प्रचार -प्रसार संस्कृति की समाप्ति।

                 उत्तराखडं  में स्थानीय भाषा समाप्ति से हानि

  इतिहास अपने को दोहराता है क्योंकि इतिहास से हम कुछ नहीं सीखते हैं।  अंग्रेजों ने उत्तराखंड में शिक्षा को जीवित किया किन्तु साथ में शिक्षा की हिंदी माध्यम ने स्थानीय भाषाओं को मृत प्रायः भी कर डाला।  यही कारण है कि कृषि , आयुर्विज्ञान आदि विषयक कथ्य (Phrases ) ही समाप्त हो गए।  इन कथ्यों में कई गंभीर सिद्धांत छुपे थे जॉब अब नहीं मिलते हैं।

         नारायण दत्त तिवारी का पर्यटन उद्यम योजनाएं और परवर्ती शासकों द्वारा निरंतरता का विनाश
   
       मेरी दृष्टि में नारायण दत्त तिवाड़ी एक दूरदृष्टि वाले राजनीतिज्ञ हैं जो उनकेउत्तराखंड  मुख्यमंत्री काल (2002 -2007 ) में बने पर्यटन योजनाओं में साफ़ दृष्टिगोचर होता है।  उनके काल में उत्तराखंड पर्यटन की योजनाओं की जो आधारशिला रखी गयीं और उन पर जो कार्य शुरू हुए और बाद के मुख्यमंत्रियों द्वारा स्वार्थी राजनीति के तहत अनुकरण न करने से वास्तव में पर्यटन उद्यम को सबसे अधिक नुक्सान हुआ।  पर्यटन उद्यम तभी फलता -फूलता है जब प्रशासनिक व राजनैतिक निरंतरता बनी रहे।  तिवाड़ी के बाद पर्यटन संबंधी  किसी मुख्यमंत्री की वह दूरदृष्टि थी ही नहीं कि उत्तराखंड पर्यटन को सही दिशा मिल सके।  फिर हर दो साल में मुख्यमंत्री बदलने से भी पर्यटन योजनाओं में निरंतरता में कमी आयी और आज भी उत्तराखंड में पर्यटन उद्यम  उस गति से नहीं विकसित हो रहा है जिस गति का उत्तराखंड पर्यटन हकदार है। 



Copyright @ Bhishma Kukreti  24 /2 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3, page 140- 200
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  Asoka broke continuity in science thinking , Loss in science thinking in Asoka time
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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शुंग -कण्व काल में उत्तराखंड पर्यटन का पुनर्जीवित  व पुष्ट होना

(उत्तराखंडी इंटरनेट लेखकों व पत्रकारों का विशेष उत्तरदायित्व )


(  शुंग काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -24

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  24                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--129 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 129   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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                   सम्राट अशोक की मृत्यु पश्चात उसके उत्तराधिकारियों मध्य राष्ट्र शासन हेतु लड़ाई व बाद में यवन आक्रमण व उनके  शासन (232 -184 B. C . ) से समस्त भारत में मौर्यों के सामंतों या अन्यों ने क्षेत्रीय राज संभाल लिए व समस्त भारत में राजनैतिक अस्थिरता छा गयी  . अशोक के उत्तराधिकारी सेना को बलशाली होने के स्थान पर बौद्ध या जैन धर्मों के महत्व समझाते रहते थे (जैन , जैन आगम साहित्य में भारतीय समाज पृ 523 -24 ) .
  उत्तराखंड में भी राजनैतिक अस्थिरता रही और निर्माण -निर्यात -आयात पर आघात लगने से टूरिज्म पर बुरा प्रभाव पड़ा।  गिल्ड जैसे  संस्थानों के कमजोर होने से भी पश्चिम देशों  के साथ व्यापार निष्प्राण हो गया।  अस्थिरता से उत्तराखंड में शरणार्थी पर्यटन बढ़ गया।
            शुंग काल (185 -73 B . C. ) मौर्य आमात्य पुष्य मित्र  (185 -149 B C. ) द्वारा मौर्य राजा वृहद्रथ की हत्या के बाद शुरू हुआ। पुष्य मित्र ने उत्तर भारत पर विजय प्राप्त कर साम्राज्य वृद्धि की। शुंग शासन का अंतिम शासक देवभूति था व उसके पश्चात पाटलिपुत्र पर कण्वों का शासन चला (73 -28 B C )।
      शुंग शासन से यवन आक्रांताओं का आक्रमण रुका।
                उत्तराखंड पर शुंग शासन की पुष्टि देहरादून में पायी गयी मृणमुद्रा से होती है जिस पर 'भद्र मित्रस्य द्रोणी घाटे ' से होती है।  (जयचंद्र , प्राचीन पंजाब व उसका पास पड़ोस पृ 6 ) . 
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                सनातन वाद व संस्कृत का पुनर्रोथान

   अशोक के समय संस्कृत साहित्य व सनातन पंथ को जो नुक्सान हुआ था व् शुंग काल में पुनर्र्जीवित हुआ।  पतंजलि या पाणनि  जो पुष्यमित्र के आमात्य भी थे और श्रुघ्न नगर के प्रेमी थे।  पाणनि ने इस काल के बारे में महाभाष्य रचा। महाभाष्य में उस काल की कई दशाओं का सजीव चित्रण मिलता है। पाणनि साहित्य से उत्तराखंड विशेषकर भाभर क्षेत्र की जानकारी भी मिलती है।
          शंग शासन काल में महाभारत का संकलन व सम्पादन हुआ।  इसी काल -शुंग- कण्व काल में मनुस्मृति संकलन (200 B  स - 200 AD ) की शुरुवात हुयी।  कई पुराण इसी समय रचे व संपादित हुए।  शैव्य वैष्णव वाद की वास्तविक शुरुवात शुंग काल में हुयी व कई प्रतीक, जीव -जंतु व वृक्ष शैव्य -वैष्णव पंथ से जुड़े। कृष्ण का भगवान पद इसी काल की दें है और गीता का महाभारत व वैष्णवों के मध्य प्रवेश भी विकास इसी काल में हुआ।   (200 BC से शुरुवात ) .
      भाष का साहित्य भी कण्व काल में रचा गया , अश्वघोष ने  भी इसी समय साहित्य रचा।  नाट्यशास्त्र भी इसी समय रचा गया।
    शैव्य पंथ विकास , शैव्य पंथ पुराण , महाभारत के दक्षिण भाग व अन्य पुराणों के संकलन से उत्तराखंड एक महवत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की धारणाओं को अत्यंत बल मिला और सारे जम्बूद्वीप में उत्तराखंड धार्मिक पर्यटन हेतु रास्तों को पुष्ट करने में शुंग -कण्व काल का उत्तराखंड के लिए महत्वपूर्ण युग माना जाता है।  महाभारत रचना काल (मन ही मन में ) ने उत्तराखंड धार्मिक पर्यटन की आधारशिला रखी तो शुंग काल ने उत्तराखंड धार्मिक स्थल को विस्तार व संबल दिया।
               बौद्ध साहित्य व जैन साहित्य को संस्कृत में लिखने की वास्तविक शुरुवात व विकास शुंग काल की देन  है और कई उत्कृष्ट साहित्य इस काल में रचे गए। ( उपरोक्त -वी डी  महाजन की पुस्तक ऐनसियंट इण्डिया , पृष्ठ -360 -372 आधारित ).     
                        व्यासाश्रम व उत्तराखंड की धार्मिक प्रतिष्ठा में वृद्धि

       महाभारत क दक्षिण भारतीय पाठ व कतिपय पुराणों का सम्पादन उत्तराखंड के व्यासाश्रमों में हुआ।  जो इस बात का द्योतक है कि ऋषि -मुनि शान्ति पूर्वक लिखने/रचने हेतु उत्तराखंड पसंद करने लगे थे।  भोजपत्र सरलता से मिलने के कारण भी मुनि /साहित्य रचयिता व उनके शिष्य यहां आये होंगे।  और इससे उत्तराखंड को नए प्रकार के पर्यटन तो मिले ही उत्तराखंड को धार्मिक क्षेत्र बनने की प्रक्रिया को अधिक बल मिला। शुंग व आगे के काल में मैदानों में लिखे गए साहित्य में उत्तराखंड के धार्मिक ओहदा व प्रतिष्ठा बढ़ी ही और एक उत्कृष्ट व प्रतिष्ठित धार्मिक स्थल के रूप में उत्तराखंड को और भी बल मिला।  इस समय के साहित्य से उत्तराखंड में पर्यटन बढ़ा ही।
      इसके अतिरिक्त ऋषि मुनियों व उनके शिष्यों के उत्तराखंड भ्रमण व अन्य धार्मिक पर्यटकों से  उत्तराखंड की सांस्कृतिक स्थिति में बदलाव भी आने शुरू हुए और बहुत से देवी देवता समाज में स्थान पाने लगे जिसने अलग से पर्यटन को प्रभावित भी किया ही होगा।
                 
                                 आर्थिक स्थिति

   शुंग काल में पश्चिमी देशों से व्यापर भी खूब चला तो उत्तराखंड से भी निर्यात होता रहा होगा याने व्यापारिक पर्यटन भी इस काल में अपनी जगह दुबारा स्थापित हुआ।

           उत्तराखंड में कुणिंद नरेशों का शासन
  उत्तराखंड में श्रुघ्न पर 232 BC से 60 BC, व(इसके अतिरिक्त अल्मोड़ा में अलग कुणिंद शासन 60  BC से 20  AD  ) तक कुणिंद शासन रहा और इस शासन काल में उपरोक्त सभी गतिविधिया रहीं।

            शरणार्थी पर्यटन

     मैदानी भागों में उथल पुथल होने से बहुत से लोग पर्वतों की ओर पलायन भी करने लगे और शरणार्थी पर्यटन को संबल मिलने लगा। ये शरणार्थी भी समाज में बदलाव लाये ही होंगे। 
 
       निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि शुंग -कण्व  काल उत्तराखंड पर्यटन का एक महत्वपूर्ण काल है जिसमे शैव्य धर्म , धार्मिक साहित्य आदि  से  उत्तराखंड पर्यटन  को नई ऊंचाइयां मिलीं और  पर्यटन स्थल प्रसिद्धि से भविष्य पथ और भी साफ़ हुआ। 

         इंटरनेट लेखकों , साहित्यकारों व पत्रकारों की नई भूमिका

          उत्तराखंड राज्य बनने के पश्चात भी उत्तराखंड पर्यटन वः ऊंचाई नहीं पा सका जिसका उत्तराखंड हकदार है।  अशोक काल के बाद की स्थितियां व शुंग -कण्व काल धाद  देता है कि उत्तराखंडी पत्रकारों , लेखकों , साहित्यकारों का उत्तरदाईत्व बनता है कि इंटरनेट के जरिये नए पर्यटन प्रोडक्टों के बारे में इंटरनेट के जरिये साड़ी दुनिया को अवगत कराएं।  इंटरनेट पर पर्यटन वृद्धिकारक साहित्य पोस्टिकरण से यह सम्भव है।
    भारत में किसी भी स्थल प्रसिद्धि हेतु मुख्य चौषठ कलाओं को आधार माना गया है (शुक्रनीति, काम शास्त्र आदि )  . अतः लेखकों /पत्रकारों को उत्तराखंड की इन कलाओं को इंटरनेट माध्यम से प्रसिद्धि दिलाना आवश्यक है। 
         
               

Copyright @ Bhishma Kukreti  25 /2 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3, pages 136-150
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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इंटरनेट माध्यम के  उत्तराखंड पर्यटन वृधिकारक कुछ लेखक-पत्रकार 


(  शुंग कण्व काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -25

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 Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  25                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--130 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 130   

 

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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इंटरनेट माध्यम के  उत्तराखंड पर्यटन वृधिकारक कुछ लेखक-पत्रकार 

 

    उत्तराखंड वास्तव में लेखकों व पत्रकारों की खान है . उत्तराखंड विशेष रूप से पहाड़ों में इतनी कम जनसंख्या के बाबजूद सानुपातिक हिसाब से पत्रकार व लेखक  अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक हैं .अधिक ल्र्ख्क –पत्रकार स्तिथि वास्तव में उत्तराखंड प्रयत्न हेतु सकारात्मक स्तिथि है .

                 उत्तराखंड पर्यटन हेतु सबसे अधिक कार्य प्रचार –प्रसार व जन सम्पर्क का होता है कि अन्य क्षेत्रों के पर्यटकों को उत्तराखंड के बारे में सूचना ही न मिले अपितु परोक्ष व अपरोक्ष रूप से पर्यटकों को प्रेरित भी किया जाय . फेसबुक में मेरे कुछ निम्न पत्रकार लेखक Friends उत्तराखंड पर्यटन को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से लाभ पंहुचा रहे हैं –

 श्री महिपाल मेहता उर्फ़ ‘माही मेहता ‘ – श्री माही मेहता वास्तव में उत्तराखंड के इनसाइक्लोपीडीया हैं . मेरापहाड़ .कॉम में उन्होंने उत्तराखंड संबंधी हर क्षेत्र की सूचना मुहय्या करवाई है और उत्तराखंड पर्यटन संबंधी साहित्य को नया आयाम दिया है . यदि कोई पर्यटक उत्तराखंड के बारे में जानना चाहता है तो उसे मेरा पहाड़ .कौम में बहुत कुछ वांछित सूचना मिल जाती है .

 श्री डी ऐन बडोला – कई सालों से  श्री डी ऐन बडोला  मेरापहाड़.कौम में लगातार रानीखेत के बारे में अंग्रेजी में लिखते थे . उनकी पाठक संख्या व नियमित पाठक संख्या भी काफी  अच्छी है . स्थान छवि करण का सराहनीय उदाहरण है श्री बडोला जी  . मेरी उनसे सदा प्रार्थना रहती है कि वे फेसबुक में भी रानीखेत साहित्य पोस्ट करें .

श्री विनोद गडरिया – श्री मेहता की भाँती श्री गडरिया ने भी उत्तराखंड विषयक सैकड़ों सूचनाएं मेरा पहाड़ .कौम में दीं हैं .

श्री हेम पन्त – हेम पन्त अधिकतर कुमाऊं की सांस्कृतिक धरोहरों की सूचना मेरा पहाड़ ,कौम में देते हैं और उत्तराखंड पर्यटन को उर्जावान बनाते  हैं .

श्रीमती हेमा उनियाल – श्रीमती हेमा उनियाल सोसल मीडिया छोड़कर इंटरनेट पर कम दिखतीं हैं किन्तु श्रीमती उनियाल की दो पुस्तकें ‘केदारखंड ‘ व ‘मानसखंड ‘ धार्मिक पर्यटन साहित्य में अद्वितीय साहित्य है . सोसल मीडिया में भी श्रीमती हेमा जहां जातीं हैं  वहां की सांस्कृतिक –ऐतिहासिक सूचना देकर पाठकों को पर्यटन हेतु प्रेरित करती हैं .

 

श्री मनोज इष्टवाल -  श्री मनोज इष्टवाल कई प्रकार के धार्मिक स्थलों , सांस्कृतिक व सामाजिक स्थलों की सूचना पारम्परिक व इंटरनेट माध्यम से देकर उत्तराखंड पर्यटन को लाभ पंहुचाने में सफल हैं . मनोज इष्टवाल की वेब साईट हिमालय डिस्कवर भी उत्तराखंड पर्यटन की सहभागी बनने में सकारात्मक भूमिका निभा रहा है . श्री मनोज की लेखमाला  श्रृंखला ‘विलोम पलायन ‘ आंतरिक पर्यटन वर्धक है .

श्री धर्मेन्द्र पन्त – श्री धर्मेन्द्र पन्त यद्यपि खेल पत्रकार हैं तथापि उनके कई लेख उत्तराखंड पर्यटन सहभागी हैं . उनकी वेब साईट भी पर्यटन वर्धक साईट है .

श्री दिनेश कंडवाल – उनकी पत्रिका देहरादून डिस्कवर तो पर्यटन वर्धक पत्रिका है ही . सोसल मीडिया में उनके पशु –पक्षी –वनस्पति –स्थान चित्र वास्तव में आंतरिक पर्यटन वर्धक सिद्ध होते हैं . श्री दिनेश कंडवाल यदि इन चित्रों को संगठित रूप से साथ में अंग्रेजी में टिप्पणी देकर इंटरनेट में प्रकाशित करेंगे तो उत्तराखंड को वाह्य प्रयत्न विकास में सहयोग मिलेगा .

श्री वेदउनियाल – श्री वेद उनियाल की ‘हिमालयी आपदा ‘ पुस्तक वास्तव में पर्यटन सहभागी पुस्तक है .

श्री सुनील नेगी – उनके अंग्रेजी लेख उत्तराखंड पर्यटन हेतु आवश्यक अवयव हैं . श्री सुनील नेगी द्वारा श्री वेद उनुयल की पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद एक मील का पत्थर है जो अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों प्रेरित करने हेतु कामयाब पुस्तक है .

रमाकांत बेंजवाल - रमाकांत बेंजवाल की पुस्तक 'गढ़वाल हिमालय ' उत्तराखंड पर्यटन हेतु एक सम्बल है।

श्री कमल जखमोला – यायावारी संस्मरण वास्तव में यात्रा विकास उद्यम की रीढ़ की हड्डी होती हैं . सोसल मीडिया में श्री कमल जखमोला का यात्रा वृत्तांत वास्तव में आंतरिक पर्यटन  वृद्धि कारक लेख हैं . श्री जखमोला को इन लेखों को संगठित रूप से चित्रों के साथ मेरा पहाड़ जैसी वेब साईट में प्रकाशित करवाना चाहिए .

श्री रतन सिंह असवाल – श्री रतन सिंह असवाल द्वारा कई यात्राओं की चित्रात्मक आलेख आंतरिक पर्यटन को ऊर्जा देते हैं . विलोम पलायन संबंधी कई सूचनाएं आंतरिक पर्यटन को बढ़ावा देते हैं . असवाल स्यूं के एक मिर्चोड़ा गाँव को उन्होंने प्रसिद्ध करवा दिया यह एक उदाहरण है कि किस तरह प्लेस ब्रैंडिंग की जाती है .

इस कोंसेप्ट को टूरिज्म ब्रैंडिंग  में फ़ोकस ऑन ए पार्टिकुलर प्लेस कहते हैं . याने यदि किसी स्थान को बार बार सूचना पटल पर लाया जाय तो वह  विशेस स्थान बन जाता है . श्री दिनेश कंडवाल द्वारा साइकल वाडी –किम्सार की सूचना देकर उदयपुर पट्टी को प्रसिद्धि दिला रहे हैं .

श्री सतेश्वर प्रसाद जोशी – श्री सतेश्वर प्रसाद जोशी द्वारा बार बार थल नदी क्षेत्र के गेंद मेले की सूचना देकर स्थान छविकरण का अच्छा उदाहरण दिया है .

  असंगठित रूप से सोसल मीडिया में श्री नरेंद्र गौनियाल द्वारा धूमाकोट की सूचनाएं देना, श्री रूप चंद जखमोला द्वारा ढांगू की सूचनाएं पोस्ट करना , श्री नवीन  कंडवाल द्वारा योग केंद्र , श्री नरेश उनियाल द्वारा राठ, देवेश आदमी की रीठाखाल की सूचनाएं वास्तव में प्लेस ब्रैंडिंग के उदाहरण हैं .  फेसबुक में श्री सतीस कुकरेती द्वारा द्वारीखाल ब्लौक के धार्मिक स्थान ग्रुप वास्तव में प्लेस ब्रैंडिंग का प्रशंसनीय प्रयास है .

 

 

उत्तराखंड में पर्यटन पत्रकारों –लेखकों की भूमिका जारी रहेगी   ....






Copyright @ Bhishma Kukreti  26 /2 //2018   




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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
-

 
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;     

Bhishma Kukreti

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सिक्कों के आगमन से पर्यटन में नई संस्कृति व देवप्रयाग के तीर्थ यात्री


(  यवन , कुणिंद , शक  व कुशाण  काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )
 Uttarakhand Medical Tourism in Bactrian  Greece to Kushan Periods  -


उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -26-


   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  26                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--131 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 131   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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     शुंग काल से मुद्रा प्रचलन बढ़ गया था।  वास्तव में छोटे -बड़े शासक मुद्रा निर्माण अपनी सिक्की व दिखाने हेतु करते थे कि उनका नाम बढ़ता जाय व साथ में सिक्के विनियम के माध्यम भी थे।  उत्तराखंड के श्रुघ्न व अल्मोड़ा के कुणिंद राजाओं ( 232 BC -20 AD ) के सिक्के भाभरी  क्षेत्र व पहाड़ों में मिलने , शक -पहलवियों  (200 BCE -400 ADE ) के सिक्के व मैदानी उत्तराखंड पर अधिकार  , कुशाण राजा का अधिकार (घृषमैन, ईरान  ) सिद्ध करते हैं कि उत्तराखंड में सिक्कों का निर्यात -आयात व्यापार में प्रचलन शुरू हो गया था।  इस काल में पहाड़ी उत्तराखंड इतिहास पर सामग्री उपलब्ध नहीं है तो इतिहासकारों को  मैदानी भाग में उपलब्ध सामग्री से ही काम चलाना होता है।
      घृषमैन के अनुसार कुशाण वंशी विम ने दक्षिण उत्तराखंड पर अधिकार कर लिया था।  कनिंघम के अनुसार उसने हरिद्वार में एक सुदृढ़ किला बनाया था जिसके अवशेष 1867 तक शेष थे।  भाभर क्षेत्र में कुशाण कालीन सिक्के मिलने से भी सिद्ध होता है कि दक्षिण उत्तराखंड पर तो कुशाणों  का अधिकार था। (पुरी , इण्डिया अंडर कुशाणाज़ ).  कनिष्क सबसे अधिक प्रसिद्ध कुशाण शासक सिद्ध हुआ।   कुशाणों के शासन  (30 -375 AD ) से पता चलता है कि कुषाणों का उद्देश्य राज करने का रहा व लूट कर अपनी पैतृक मातृभूमि का भंडार भरना नहीं रहा था।  इसलिए निर्यात व आयात व्यापार में पूर्वकाल  से कमी नहीं आयी।
    कुछ भागों पर कुणिंद  अथवा सबंधियों का राज भी रहा।

                 कुशाण युग में पर्यटनोगामी व्यापारिक केंद्र

      श्रुघ्न , कालसी , बेहट , वीरभद्र , कनखल , ब्रह्मपुर व गोविषाण बड़ी मंडियां थीं व इन  मंडियोन का मथुरा व पाटलिपुत्र मार्ग से सुगमता से जुड़ने के कारण उत्तराखंड में निर्यात -आयात सुगम था। इसके अतिरिक्त  अन्य व्यापारिक केंद्र भी थे (डबराल (उखण्ड का इतिहास -3 , पृ 231 -234 व मुखर्जी , हिस्ट्री ऑफ इंडियन शिपिंग )


                  निर्यातित वस्तुएं
      तिब्बत व उत्तराखंड से शीतकाल में व्यापारी माल लेकर भाभर की उपरोक्त मंडियों में पंहुचते थे और निर्यात की वस्तुएं बेचते थे व उत्तराखंड व तिब्बत की आवश्यकताओं की वस्तुओं खरीदते थे।
    निम्न वस्तुओं का निर्यात होता था -
     तिब्बत का सुहागा , स्वर्णचूर्ण व विभिन्न रत्न व उप रत्न की सबसे अधिक मांग थी जो ब्रिटिश काल तक बनी रही।
     तिब्बत से आयातित लैपिसलजूली , मरगज , स्फटिक , अफीक , संग अजूबा , संगीशत्व , संगसुलैमानी व उत्तराखंड की जिप्सम , सेलखड़ी , अलावस्टर।  स्वर्णमक्षिका , अनेक प्रकार के रंगीन पत्थर।
              ऊनी व खाल वस्त्र निर्यात
 उत्तराखंड के व्यापारी तिब्बत व उत्तराखंड के बहुमूल्य समूर खाल , ऊनी वस्त्र , उन से बनी कई वस्तुएं भाभर प्रदेश ले जाते थे व बेचते थे।  रोम व यूनान में इन वस्तुओं को खरीदने हेतु धनिकों में होड़ लगी रहती थी व उत्तराखंड एक ब्रैंड था। भारत में भी इन वस्तुओं की भारी खपत थी (मोतीचंद्र , भारतीय वेशभूषा ) .
      साधुओं के आसन , तंत्र -मंत्र प्रयोजन , घर व रथ  भागों को ढकने हेतु बाघ , हिरण   की खालें निरीटात होतीं थीं (डबराल , उखण्ड के भोटान्तिक पृ 29   )

              बनैले पशु अंग व मेडिकल टूरिज्म
       सजावट ही नहीं अपितु रंग रोगन , औषधि हेतु कई उत्तराखंडी पशुओं के अंगों की मांग अन्यत्र व पश्चिम देशों में बराबर रही है।  तिब्बत व पहाड़ों से बनैले पशुओं की खाल , अंग भष्म , अंग सुक्सा जैसे हड्डियों का चूरा , सींग व सींग चूरा आदि का निर्यात भी खूब था

        भोटिया कुत्तों की मांग

  भोटिया कुत्तों की मांग बाह्य देशों के व भारत के धनिकों में खूब थी।  भोटिया कुत्तों का मालिक होना सम्मान सूचक माध्यम था।  उत्तराखंड से इन कुत्तों का भी निर्यात होता था।
                उपरोक्त निर्यात साफ़ बतलाता है कि उस समय उत्तराखंडियों को बनैले व घरेलू पशुओं के प्रजनन से लेकर उनके स्वास्थ्य व अंग प्रयोग का पूरा ज्ञान था और वे इस ज्ञान  को व्यापारियों द्वारा सदूर अन्य क्षेत्रों में पँहुचाते थे।  प्रोडक्ट नॉलेज , प्रोडक्ट निर्माण ज्ञान के बगैर निर्यात नहीं होता है।
   
          मौर्य काल के बाद    उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म के स्तम्भ
   हिमालयी जड़ी बूटियों के मांग भारत व अन्य देशों में काल से ही रही है।

     वैद्य व किरातों की भागीदारी

     अत्रिदेव ' आयुर्वेद के इतिहास' (पृ -79 ) में लिखते हैं कि चरक आदि वैद्य हिमालय निवासी किरातों की सहायता लेकर हिमालय की ऊँची श्रेणियों में उपलब्ध जड़ी बूटियों को पहचानते थे व उन्हें प्राप्त करते थे।  इसी तरह अन्य जड़ी भी स्थानीय लोग पहचनते थे व उन्हें उपयोग करने तक साधते भी थे।

              मौर्य काल से कुषाण काल तक जड़ी बुशन का व्यापार
   यूनान व रोम में जटामासी , कुषण बच , मोथा , गुग्गल , कस्तूरी आदि की भारी मांग थी जो उत्तराखंड से भी पूरी होती थी (मुखर्जी , हिस्ट्री ऑफ इण्डिया पृष्ठ 67 )
     अत्रिदेव  आयुर्वेद के इतिहास (133 )  में लिखते हैं कि गंधमादन के मीठाविष , कालकूट विष , हलाहाल , वत्सनाभ , मेष श्रृंगी , संख्या अदि विषों की भारी मांग थी और सोने से भी अधिक मंहगे थे।

             मेडिकल टूरिज्म व औषधि निर्माण की प्रक्रिया

      उत्तराखंड से उपरोक्त औषधियां व जड़ी बूटियों के निर्यात साक्ष्य बताते हैं कि उत्तराखंड निवासियों के मध्य जड़ी बूटी पहचानने , उन पौधों का संरक्षण , उन्हें तरीके से उखाड़ने , आवश्यकता पड़ने पर उन जड़ी बूटियों  शोधन उनका  औषधि अवयव परिवर्तन विधि , सुक्सा बनाने की विधि , उनका ग्राहक तक सुरक्षित पंहुचाने का पूरा ज्ञान था।  मेडिकल टूरिज्म के हर अंग व भागिदार अपना कार्य बखूबी करता था।  जब व्यापार होता है तो निर्माता व ट्रेडर्स को वास्तु ज्ञान /प्रोडक्ट नॉलेज व वस्तु उपभोग सभी ज्ञान होने आवश्यक होते हैं।  उपरोक्त साहित्य सिद्ध करते हैं कि उत्तराखंड वासी मेडिकल टूरिज्म सिद्धांत को पूरा अनुसरण करते थे।
   चूँकि उत्तराखंड से औषधि निर्यात होता था तो अवश्य ही वैद्यों व ट्रेडर्सों का उत्तराखंड भ्रमण आवश्यक रहा ही होगा । 
         
        देवप्रयाग के तीर्थ यात्री
 
         देव प्रयाग में रघुनाथ मंदिर के सामने शिलालेख है जो डा छाबड़ा  (एपिग्राफिया इंडिका vol 33 पृ 133 व 135 )  के अनुसार ये शिलालेख 2 से 5 वीं सदी तक हैं व इनमे यात्रियों के नाम खुदे हैं व डा पार्थ सारथि  डबराल इन्हे यात्रियों के नाम नहीं अपितु वंशावली  (पल्ल्व वंश ) की मान्यता देते हैं  ( देव प्रयाग के ब्राह्मी नाम लेख , गढ़वाल की जीवित विभूतियाँ पृ 236  से 240 ) .
     शिलालेख व इन नामों की व्याख्या और  व अन्य विश्लेषणों से पता चलता है कि चंडीघाट से देव प्रयाग तक धार्मिक यात्रा बहुप्रचलित हो गयी थी तथापि  साहसी यात्री  माणा व मानसरोवर की यात्रा भी करते थे। 
              और जहां यात्रा वहां अपने आप यात्रा मार्ग पर चिकित्सा  सुविधाएं भी सुलभ होने  लगती हैं जो आंतरिक   मेडिकल  टूरिज्म को संवारने में उपयोगी सिद्ध होता है। 



Copyright @ Bhishma Kukreti   27/2 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3 कुणिंद , शक , कुशाण काल का इतिहास खंड
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;       



Bhishma Kukreti

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कुणिंद  कालों में नई धार्मिक पर्यटन उपलब्धि


( कुणिंद   काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )
 Kartikeya and  Tourism in Kunind Rules

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -27

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  27                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--132 )   


      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 132 

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  कुणिंद  अवसान काल  350 ईश्वी माना जाता है  और कुशाण साम्रज्य के बाद फिर से 243 ईश्वी के बाद कुणिंदों  का राज रहा।  माना जाता कि 250 ईश्वी  निकट कुशाण राज समाप्त  गया।  इससे पहले ही 176  ईश्वी से कुणिंद  व अन्य क्षत्रप (वास्तव में राजा किन्तु कुशाण आधीन ) स्वतंत्र होते गए।
    डा डबराल लिखते हैं कि सतलज से पश्चिम के राजा यौधेयों व अन्य संघों से से समझौता हुआ।  दोनों गणों की मुद्राओं के विश्लेषण से भी लगता है कि कुणिंद - यौधेयों के मध्य सहयोग हुआ।

             धार्मिक पर्यटन में एक और उपलब्धि

  शैव्य पंथ विकास व शैव्य साहित्य वर्धन से दक्ष , शिव , उमा -हैमवती का संबंध उत्तराखंड के कनखल व गंधमादन पर्वत से जुड़ गया।  तो स्वयमेव उत्तराखंड  कार्तिकेय व गणेश की जन्मस्थली घोषित हो गयी। कार्तिकेय व परुशराम ने माणा पर्वत /क्रौंचरन्ध्र पार किया था।   यौधेयों  की  मुद्राओं में षडानन कार्तिकेय, कार्तिकेय , षष्ठी -कार्तिकेयानी , शूल , व शिव चित्रांकित हैं, जिनका बाद में कुणिंद  शाशकों ने अनुशरण किया और अपनी  मुद्राओं में कार्तिकेय व शिव को स्थान दिया।

             कौंचद्वार  (माणा ) के पदतल  में कार्तिकेय नगर बसा था अष्टाध्यायी आदि साहित्य में कत्रि , प्रयागप्रशस्ति लेख में कर्तृपुर , पूर्व व कत्यूरी नरेशों साहित्य में इसे कार्तिकेयपुर नाम दिया गया है।

       कुणिंदों के विभिन्न कालों  की यह धार्मिक उपलब्धि उत्तराखंड के लिए आज भी एक विशेष उपलब्धि मानी जाती है। भारत में  शैव्य पंथ (  शिव ,नंदी , उमा , गणेश , कार्तिकेय )फैलता गया और उत्तराखंड का नाम धार्मिक स्थलों में और भी प्रसिद्ध होता गया।  शिव की प्रसिद्धि याने उत्तराखंड की प्रसिद्धि।  कार्तिकेय दक्षिण में मुरुगन, सुब्रमणियम नाम से प्रसिद्ध हुए तो भी उत्तराखंड केंद्र में ही रहा।  महाराष्ट्र में गणेश गणपति नाम से प्रसिद्ध हुए तो भी उत्तराखंड केंद्र में रहा।

कुशाण राजा हुविष्का , कुणिंदों  व यौधेयों की मुद्राओं में कार्तिकेय -शिव चित्रांकन ने भी उत्तराखंड को और भी प्रसिद्ध किया।

  पांचवीं सदी के हरियाणा कार्तिकेय मंदिर ने भी उत्तराखंड प्रसिद्धि में योगदान दिया ही होगा।


        दक्षिण में कार्तिकेय या मुरुगन


       महाभारत व स्कन्द पुराण ने कार्तिकेय को दक्षिण में प्रसिद्ध किया।

      आंध्र के नागार्जुन घाटी में तीसरी चौथी सदी के प्राचीनतम चार कार्तिकेय मंदिर  (एक देवसेना ) भी द्योतक है कि कार्तिकेय देव स्थापना से उत्तराखंड को लाभ पंहुचा।

  चालुक्य राजाों  के आराध्य कार्तिकेय ही थे। 

       मध्ययुगीन तमिल  साहित्य के अंतर्गत नक्कीरार रचित 'तिरुमुरुगत्रपदार ' व अरुणागिरी नटार रचित 'तिरुप्पुगज:' जैसे साहित्य ने दक्षिण में उत्तराखंड  की धार्मिक स्थल प्रसिद्धि को और आगे बढ़ाया। 

 

 तमिल समाज में कार्तिकेय की प्रथम पत्नी देवसेना (तेवयानी ) व द्वितीय पत्नी 'वाली' देवी रूप में प्रसिद्ध होने से भी उत्तराखंड धार्मिक स्थल को बल मिला। 

           डा हरिप्रिया रंगराजन ने कार्तिकेय से मुरुगन बनने की प्रक्रिया पर गहन शोध किया है ( Images of Skanda-Kartikeya-Murugan : An Iconographic Study) । 


Copyright @ Bhishma Kukreti   28/2 //2018 



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3 पृ 240  -265
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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दक्षिण के कार्तिकेय मदिर और प्रवासियों द्वारा स्थापित बद्रीनाथ मंदिरों का महत्व
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( कुणिंद काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )
  (Medical Tourism in Kuninda /Kulinda Period)
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -28

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  ( Tourism History  )     -  28                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--133 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 133 

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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    शैव्य पंथ आने से शिव , पार्वती , दक्ष , हिमालय , गणेश , कार्तिकेय , गण , नंदी आदि भारतीयों के आराध्य बने।  शिव उत्तराखंड हिमालय वासी  थे और  विभिन्न पुराणों व मान्यताओं अनुसार गणेश व कार्तिकेय का जन्म उत्तराखंड में हुआ। ज्यों ज्यों ये सभी मान्यताएं प्रसारित होती गयीं त्यों त्यों भारतीयों के मन में धार्मिक उत्ताराखंड हह्वी गहराती गयी ।  ज्यों ज्यों शिव संबंधी मंदिर बनते गए त्यों त्यों धार्मिक उत्तराखंड की छवि वर्धन होता गया।  शिव पूजा वास्तव में उत्तराखंड छविकरण का ब्रैंड अम्बैसेडर बनता गया।  आज भी शिव उत्तराखंड हिमालय निवासी ही माने जाते हैं।

             कार्तिकेय मंदिर

पिछले अध्याय में बताया गया कि किस तरह स्कन्द पुराण की शुरवाती विचार ने कार्तिकेय को आराध्य बनाया और राज  मुद्राओं में कार्तिकेय मुख्य देव बने व कार्तिकेय दक्षिण में आराध्य बन गए।  कार्तिकेय (मुरुगन , सुब्रमणियम ) के दक्षिण में आराध्य बनने से मंदिर बनने लगे और उत्तराखंड धार्मिक पर्यटन को एक नया ब्रैंड अम्बैसेडर मिल गया।

            आधुनिक काल में   प्रवासियों द्वारा बद्रीनाथ मंदिर निर्माण

  आधुनिक युग में भी यह रिलिजियस टूरिज्म ब्रैंडिंग कार्य हो ही रहा है।  उत्तराखंड प्रवासी अपनी मातृभूमि को भूल नहीं सकते और मातृभूमि ऋण चुकाने कई अभिनव कार्य करते जाते हैं।  प्रवासियों द्वारा बिभिन्न श्रोण में बद्रीनाथ मंदिर बनना भी एक अभिनव व प्रशंसनीय कार्य है।
    भारत राजधानी दिल्ली में बद्रीनाथ मंदिर है जो दिल्ली वासियों को उत्तराखंड की याद दिलाता रहता है और दिल्ली वासियों को उत्तराखंड पर्यटन हेतु प्रेरित करता रहता है।
     महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे /पूना में श्री जगदीश प्रसाद बहगुणा आदि प्रवासियों के अथक प्रयत्न से बद्रीनाथ मंदिर स्थापित किया गया है। पुणे का बदरनाथ मंदिर में महाराष्ट्र से यात्री दर्शन करने जाते हैं और पुणे का बद्रीनाथ मंदिर धार्मिक उत्तराखंड का ब्रैंड अम्बैसेडर कार्य बखूबी निभा रहा है।
    मुंबई के उपनगर वसई में बद्रीनाथ मंदिर निर्माण कार्य जोरों पर है।  उत्तराखंड वसई मित्र मंडल के सदस्यों की जितनी प्रशसा की जाय कम है।  निर्माण कार्य में ही कुछ सालों से मित्र मंडल प्रति वर्ष भागवत पूजा व भंडारा करते हैं और धार्मिक उत्तराखंड नाम को प्रसारित करते रहते हैं।  गैर उत्तराखंडी भी बद्रीनाथ मंदिर निर्माण में बड़े जोर शोर से भाग ले रहे हैं।  बद्रीनाथ मंदिर वसई बिभिन्न समुदायों को उत्तराखंड जाने के लिए प्रेरणा स्रोत्र बनता जा रहा है। लेखक के मित्र दसौनी जी , नैलवाल जी , नेगी जी , पांडे जी , जखवाल जी , बिष्ट जी , रावत जी आदि का कार्य प्रसंसनीय है।
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       उत्तराखंड से बाहर बद्रीनाथ मंदिरों  का महत्व

     उत्तराखंड से बाहर बद्रीनाथ मंदिरों के कई महत्व हैं।
   प्रवास में जन्मे पीला प्रवासी यवाओं को उत्तराखंड से जोड़े रखने का सबसे कठिन कार्य ये मंदिर करते हैं।
  बद्रीनाथ जैसे मंदिर उत्तराखंड के धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत के जीते जागते उदाहरण रूप में गैर उत्तराखंडियों के मन में उत्तराखंड की छवि बरकरार रखते हैं।
   बद्रीनाथ मंदिर सभी को उत्तराखंड भ्रमण की प्रेरणा देते रहते हैं।

           हर मंदिर  में उत्तराखंड प्रदर्शनी केंद्र

  मेरी राय में प्रत्येक ऐसे मंदिर में उत्तराखंड साहित्य व् अन्य वस्तुओं का सग्रहालय समय की मांग है। 


Copyright @ Bhishma Kukreti   1/3 //2018 



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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  Murugan Temples and Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;  Murugan Temples and  Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Murugan Temples and  Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Murugan Temples and Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;  Murugan Temples and  Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;   Murugan Temples and Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; Murugan Temples and  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; Murugan Temples and  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Murugan Temples and  Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Murugan Temples and  Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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कुणिंद / कुलिंद अवसान काल याने प्रभावकारी पर्यटन काल


(  कुणिंद / कुलिंद अवसान काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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 (Uttarakhand Tourism in End  Kunind/ Kulind  Period

उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -29

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  29                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--134 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 134 

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  कुणिंद /कुलिंद व सबंधी राजाओं का अवसान काल 206 -350 ईश्वी व 400 तक भी  ठहराया जाता है (डबराल उत्तराखंड का इतिहास -भाग 3 ) जिसमे वासुदेव , छत्रेश्वर , भानु , रावण अश्वमेध यज्ञ कर्ता -शिव भवानी , पोण वंशज व शील वर्मन हुए।  गोविषाण (उधम सिंह नगर इलाका ) में मित्र वंश (50 -250 ईश्वी ) राज्य भी था।
     जौनसार भाभर में जयदास व उनके वंशजों का समृद्ध राज 350 -460 तक माना जाता है।

                    भाभर क्षेत्र में दुर्ग , स्तूप निर्माण

   डा डबराल ने उपरोक्त पुस्तक में कई पुरातत्व अन्वेषणों का संदर्भ देते हुए लिख कि सहारनपुर से उधम सिंह नगर तक इस काल में कई दुर्ग निर्मित हुए।  दुर्ग याने सुरक्षा की नई तकनीक उपयोग व प्रयोग. नई तकनीक व दुर्ग निर्माण से साफ़ जाहिर है कि दक्षिण उत्तररखण्ड में पर्यटन उस काल में विकसित स्थिति की और चल रहा था।  जब भी दुर्ग जैसा कोई स्थाप्य इमारत बनती है तो वाणिज्य व तकनीक का आदान प्रदान होता है जो बिना पर्यटन उद्यम विकसित हुए संभव नहीं है।  इस काल में दक्षिण उत्तरखंड में संगठित (Organized ) पर्यटन के सभी प्रमाण मौजूद मिलते हैं। उधम सिंह नगर में स्तूप निर्माण भी पर्यटन वृद्धिकारक घटक ही है।  बौद्ध धर्मियों हेतु उधम सिंह नगर एक पवित्र धर्म स्थल बनने से पर्यटन विकसित ही हुआ।
     पांडुवाला (गढ़वाल भाभर -हरिद्वार रोड ) में भी स्तूप निर्माण इसी काल में हुआ।  पांडुवाला स्तूप ने भी पर्यटन को ऊंचाई दी।  स्तूपों में विद्वानों के आने जाने से कई ज्ञानों का आदान प्रदान से भी पर्यटन को नया मार्ग मिलता है।

           भाभर क्षेत्र (सहारनपुर से लेकर उधम सिंह नगर व बिजनौर तक ) में मंदिर निर्माण

     कुणिंद / कुलिंद अवसान युग में कई मंदिरों का निर्माण भी हुआ।
 गोविषाण में द्रोण  सागर निर्माण , कई मंदिरों  का निर्माण भी द्रोण सागर के पास वहां हुआ। वहीं दुर्ग में भीम गदा नाम से प्रसिद्ध स्थान में विशाल मंदिर भी निर्मित हुआ।  जागेश्वर मंदिर के निकट स्तूप व मंदिर भी निर्मित हुए।
   लाखामंडल में कई मंदिर व  इस काल में निर्मित हुए। मंदिर बनाने हेतु भी तकनीक ज्ञान के लिए भी कई प्रकार के पर्यटन बढ़े होंगे। 
     इस काल में मंदिर , मूर्तियां व स्तूप निर्माण ने आंतरिक व वाह्य दोनों प्रकार के टूरिज्म को विकसित किया।
       
                   युगशैल राजाओं द्वारा अश्वमेध यज्ञ
 
          जौनसार भाभर -देहरादून में इस काल में युगशैल राजाओं का राज भी रहा  (301 -400 ईश्वी  )  युगशैल के राजाओं में से शिव भवानी ने एक , शीलवर्मन ने चार अश्वमेध यज्ञ किये।  यज्ञ इस बात के द्योतक हैं कि क्षेत्र में व्यापार (निर्यात ) से प्रचुर लाभ हुआ।  व्यापार अपने आप में पर्यटन कारी घटक है।
        अश्वमेध यज्ञ तो पर्यटन विकास की ही कहानी के प्रमाण हैं।  यज्ञ दर्शन व प्रवचन सुनने बाह्य प्रदेशों से गण मान्य व्यक्ति व पंडित आये होंगे तो पर्यटन को नया आयाम ही मिला होगा। अश्वमेध यज्ञ से क्षेत्र को प्रचुर प्रचार मिला ही होगा।

                  मुद्रा विनियम विकास  काल

            कुणिंद अवसान काल की  मुद्राएं बेहट , देहरादून , गढ़वाल   ( कालाओं के गाँव सुमाड़ी व भैड़ गाँव (डाडामंडी ) में सबसे अधिक मिलीं ), काली गंगा आदि स्थानों में मिली हैं।  मुद्राएं ताम्र व रजत मुद्राओं के मिलने व   हर काल में मुद्रा निर्माण में विकास झलकता है।
       मुद्रा निर्माण से साफ़ प्रमाण मिलता है कि उत्तराखंड में व्यापार विकसित था और आधुनिक विनियम हेतु मुद्राएं आवश्यक हो गयीं थीं।   आधुनिक विनियम माध्यम निर्यात व आयत वृद्धि द्योतक होते हैं । 
       
  निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कुणिंद / कुलिंद अवसान काल   (206 -350 -400 ) में धार्मिक , व्यापारिक,  भवन निर्माण , मुद्रा निर्माण , शिला कोरने , मूर्ति निर्माण आदि घटकों के कारण उत्तराखंड में पर्यटन विशेषतः भाभर क्षेत्र में भूतकाल से अधिक विकसित हुआ।   


Copyright @ Bhishma Kukreti   2/3 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
-

 
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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कालिदास साहित्य में उत्तराखंड पर्यटन

Uttarakhand Tourism in Kalidas Literature
(  कालिदास साहित्य में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  30

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  30                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--135 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 135 

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
--

    कालिदास साहित्य गुप्त काल (275 -495 ई . ) में रचा गया।  शिव प्रसाद डबराल अनुसार उत्तराखंड में तब कर्तृपुर के खसाधिपति वंशजों का राज (350 -380 ) था व फिर उत्तराखंड गुप्तों के अधीन रहा (380 -470 ) इसके उपरांत सर्वनाग वंश (465 -485 ) व फिर नागवंशी  नरेशों (485 -576 ) का राज रहा।
         कालिदास व उसके जन्म स्थल पर विद्वानों में एक राय नहीं है।  नेपाल , कुमाऊं , गढ़वाल , हिमाचल  प्रदेश व कश्मीर विद्वान् कालिदास को अपने क्षेत्र का प्रवासी सिद्ध करते रहते हैं।  कई अन्य गैर पहाड़ी क्षेत्र वाले भी कालिदास को अपने क्षेत्र का जनमवासी सिद्ध करते हैं।  इस लेखक ने भी सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि कालिदास उत्तराखंडी प्रवासी था।
         कालिदास गढ़वाल का था या नहीं किन्तु कालिदास साहित्य में  उत्तराखंड ही मिलता है।  महाभारत , पुराणों के बाद कालिदास साहित्य में उत्तराखंड का सर्वाधिक वर्णन मिलता है।  शायद उसके बाद आज तक किसी अन्य साहित्य में उत्तराखंड वर्णन इतना  अधिक नहीं मिलता है।

                  कालिदास रचित रघुवंश में उत्तराखंड वर्णन
 

उत्तराखंड में वशिष्ठ आश्रम - रघुवंश के प्रथम सर्ग में महारज दिलीप अपने कुलगुरु वशिष्ठ के आश्रम में पुत्र प्राप्ति आशीर्वाद हेतु उत्तराखंड जाता  हैं। वशिष्ठ आश्रम गंगा तट पर गौरीगुरु (पार्वती के पिता ) पर था।  आश्रम के निकट वन में देवदारु वृक्ष थे जहां दिलीप नंदनी चराता है। (रघुवंश , 1 /48 )


वशिष्ठ आश्रम की घटनाएं -  कालिदास कृत रघुवंश के प्रथम सर्ग के अंतिम 48 श्लोकों व द्वितीय सर्ग के प्राथमिक 71 श्लोकों में सभी घटनाएं वशिष्ठ आश्रम में हुईं और उत्तराखंड संबंधी कई सूचनाएं देने में समर्थ हैं। ( रव 2 )


दिलीप का उत्तराखंड पर आक्रमण -  कालिदास रचित रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में दिग्विजय हेतु महाराज दिलीप काम्बोज जीतकर 'गौरीगुरु पर्वत पर आक्रमण करता है।  दिलीप की सेना पर्वतीय गणों के नाराचों से जूझती है। पर्वतीय वीर शिलाखंड फेंक कर दिलीप के सेना का सामना करते हैं (रघुवंश 4 /71 व 4 /77 )


पर्वतीय गणों द्वारा भेंट - रघुवंश के 4 सर्ग के 71 -7 9 श्लोकों में घोर युद्ध वर्णन है और किसी की भी जीत या हार नहीं हुयी।  रघु को विदा करते समय पर्वतीय गण दिलीप को भेंट देते हैं।  इन भेंटों में उत्तराखंड की कई वस्तुओं का वर्णन है।  हिमालय वासियों को मैदानी सेना चातुर्य व दिलीप को पाख पख्यड़ में पारम्परिक रणनीति से लड़ने की युद्ध समस्या का ज्ञान होता है।



Copyright Bhishma Kukreti   3/3 //2018 



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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कुमारसम्भव में उत्तराखंड

Uttarakhand in Kumarsambhav by Kalidas
(  कालिदास साहित्य में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -31

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  31               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--136 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 136 

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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 ऐसा लगता है कुमारसम्भव महाकाव्य अधूरा छूट गया था ।  कुमारसम्भव वास्तव में  कुमार (कार्तिकेय ) जन्म कथा होनी चाहिए किन्तु शिव पार्वती विवाह तक सीमित रह गया है (अमितेश कुमार ) .यद्यपि 17 सर्गों में कुमार सम्भव मिलता है किन्तु विद्वानों का मत है कालिदास  8 सर्ग तक ही रच सके थे।
   कुमारसम्भव के प्रथम सर्ग के 14 श्लोकों में हिमालय प्रकृति वर्णन व हिमालय संबंधी कई पौराणिक वर्णन मिलते हैं।
     कुमारसम्भव के प्रथम सर्ग के 15 वें सर्ग से भगीरथी -गंगा स्थलों व देवदारु वाले क्षेत्रों का वर्णन है।
    कुमारसम्भव के तीसरे सर्ग में गंधमादन के निकटस्त क्षेत्र का वर्णन मिलता है।  इस सर्ग में प्राकृतिक छटा का कम वर्णन मिलता है।
   कुमारसम्भव के छटे सर्ग में हिमालय का जंगम महामानव रूप में सुंदर वर्णन है। प्रकृति का जैसे देवदारु , गेरू शिलायें,  पटाळ , शिलायें , अदि मानवीकृत रूप में वर्णन है।
    कुमारसम्भव के सातवें , आठवें सर्ग में घटनाएँ औषधिप्रस्थ और निकट के स्थान मन्दराचल , गन्धमादन में घटित होती  हैं।  हिमालय प्रकृति छटा वर्णन यदा कदा मिलता है।
   वाचस्पति मैठाणी  (गढवाल हिमालय की देव संस्कृति , 2004) ने कुमारसम्भव में उत्तराखंड वर्णन का विश्लेषण किया है।  कुंवर सिंह नेगी ने (महाकवि कालिदास की जन्मस्थली की खोज) में कालिदास जन्म गढ़वाल में सिद्ध करने हेतु कुमारसम्भव के इन सर्गों का भी संदर्भ दिया है जो कालिदास ने रचे ही नहीं।
   औषधिप्रस्थ वास्तव में एक सर्वथा काल्पनिक नगर है जहां जड़ी बूटियों की चमक से रात्रि जगमगाया करती थीं। इस नगर की पहचान आज के संदर्भ में अनिश्चित है। 



Copyright @ Bhishma Kukreti  4 /3 //2018 



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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मेघदूत , अभिज्ञानशाकुंतलम , विक्रमोर्वशीयम में उत्तराखंड

Uttarakhand in Meghdoot , Abhigyanshakuntalam, Vikramorvarshiyam  by Kalidas
(  कालिदास साहित्य में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -32

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  32                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--137 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 137 

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  कालिदास साहित्य आज भी उत्तराखंड पर्यटन ब्रिंग में एक सहयोगी घटक है , दुनिया भर के छात्र, अन्वेषक  व विद्वान् कालिदास साहित्य अध्ययन करते हैं और कालिदास साहित्य में वर्णित उत्तराखंड अथवा हिमालय के प्रति आकर्षित होते रहते हैं।
            कालिदास कृत मेघदूत में उत्तराखंड
   कालिदास कृत पूर्वमेघ में यक्ष मेघ से कुरुक्षेत्र से कनखल तक जाने की प्रार्थना करता है (पूर्व मेदू 53 ) . आगे कनखल से गंगास्रोत्र यात्रा की कथा है और गंगा स्रोत्र में शिलाओं में कस्तूरमृग बैठे दिखाए हैं (पूर्व मेदू 56  )
मेघदूत पूर्व के 57 से 67 श्लोकों में गंगा जी से कैलास , अलकापुरी वर्णन है।
     उत्तरमेघ में अलकापुरी वर्णन है

      कालिदास कृत नाटक अभिज्ञानशाकुंतलम में उत्तराखंड

     अभिज्ञानशाकुंतलम के प्रथम अंक में गंगा की सहायक नदी मालनी तट का वर्णन मिलता है।
    द्वितीय से चतुर्थ अंक में सभी घटनाएं कण्वाश्रम में घटित होती हैं और उत्तराखंड की सामाजिक , सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का ज्ञान मिलता है।
   सातवें अंक की घटनाये कश्यप आश्रम -मंदाकिनी घाटी में स्थित हेमकूट की हैं।

         कालिदास कृत नाटक विक्रमोर्वशीयम में उत्तराखंड
 
   विक्रमोर्वशीयम के प्रथम अंक की घटना हेमकूट में घटित होती हैं तो चौथे अंक की घटनाएं मंदाकिनी तट गंधमादन  में घटित होती हैं।
    पुरुरवा द्वारा उर्वशी खोज में हिमालय वर्णन है।



Copyright @ Bhishma Kukreti  5 /3 //2018 



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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