Author Topic: Tourism and Hospitality Industry Development & Marketing in Kumaon & Garhwal (  (Read 24145 times)

Bhishma Kukreti

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मूत्र गुण  व चिकित्सा

 Urine Therapy Tourism
चिकित्सा पर्यटन विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास -1
Urine therapy for Medical Tourism Development -1


उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति - 264

Medical Tourism development Strategies -264 

उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 385

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -385

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती     

 

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             पशु मूत्र चिकित्सा
   भारत में स्वमूत्र (5000 वर्ष प्राचीन ) व पशु विशेषकर गौ मूत्र चिकित्सा 3000 व पहले से प्रसिद्ध चिकित्सा है।  पंचगावय घृत व गौ मूत्र मंत्रणा तो प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध है।
  चरक संहिता  सुश्रुत संहिता, भाव परकास में  मूत्र चिकित्सा हेतु विशेष अध्याय हैं। 
 चरक संहिता के सूत्रस्थानम भाग के 93 वे श्लोक  से 106 वे श्लोक तक मूत्र विवेचना है।  इसी तरह सुश्रुत संहिता बागभट्ट संहिता में बे पशु मूत्र की विवेचना की गयी है।
 चरक संहिता ने निम्न पशु मूत्र से चिकत्सा पद्धति बतलायी है -
१- भेड़  मूत्र
२- बकरी मूत्र
३-गौ मूत्र
४-भैंस मूत्र
५- हस्ती मूत्र
६- गर्दभ मूत्र
७-ऊंट  मूत्र
८-अश्व मूत्र
चरक ने मूत्र के गुण  इस प्रकार बताये हैं -
गरम
तीक्ष्ण

कटु

लवण युक्त
पशु मूत्र निम्न रूप से औषधियों में उपयोग होते हैं -
उत्सादन

आलेपन

प्रलेपन

आस्थापन में निरुह में
विरेचन

स्वेदन

नाड़ीस्वेद
अनाड़

विषनाशक

चरक ने प्रत्येक पशु मूत्र के गुण व रोग निदान का विवरण दिया है जो आज भी कार्यरूप में सही सिद्ध हुए हैं यथा ।
भेड़ मूत्र न पित्त बढ़ने देता है न शमन करता  है
अजमूत्र (बकरी ) त्रिदोष नाशक स्रान्तो में हितकारी
गौमूत्र -कुष्ठ , खाज ,कृमि नाशक , पेट व बात हेतु लाभकारी
भैंस मूत्र - बबासीर , उदर रोग , शोथ निवारण हेतु
हस्ती मूत्र -अवरुद्ध मल ,मूत्र रोग ,विषरोग , बबासीर में लाभकारी
ऊंट मूत्र - स्वास , खास , अर्श रोग नाशक

अश्व मूत्र -कुष्ट विष व व्रण रोग नाशक

गर्दभ मूत्र -मिर्गी आदि अप्पसार विनास में लाभकारी ,




आधुनिक चिकत्सा शास्त्री भी गौ मूत्र को चिकित्सा हेतु लाभकारी मानते हैं व गुलहन हर्षद व अन्य विअज्ञानिकों ने (इंटरनेशनल जॉर्नल ऑफ़ आयुर्वेदा फार्मा जिल्द 8 (5 ) 2017 में आधुनिक चिकत्स्कों द्वारा गौ मूत्र को निम्न रोगों हेतु लाभकारी माना  है -
कैंसर निरोधक
नुकसानदेय एन्टीबायटिक औषधियों की रजिस्टेंस रोक (प्रिवेंसन ऑफ एन्टीबायटिक रजिस्टेंस )
फंगीसाइड्स

एंटीसेप्टिक

ऐन्थेलमेंटिक ऐक्टिविटी
बायोइनहैंसर
इमिनो स्टीमुलेंट
घाव भरान  शक्ति
एंटी यूरोलिथिएटिक एफ्फेक्ट




















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Urine  Therapy for Medical Tourism development in Garhwal , Uttarakhand ;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in Chamoli Garhwal , Uttarakhand;   Urine  Therapy for Medical Tourism development in  Rudraprayag Garhwal , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in   Pauri Garhwal , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in   Tehri Garhwal , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in  Uttarkashi  Garhwal , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in   Dehradun Garhwal , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in    Haridwar Garhwal , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in  Pithoragarh  Kumaon , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in Champawat    Kumaon , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in   Almora Kumaon , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in Nainital   Kumaon , Uttarakhand;  Urine  Therapy for Medical Tourism development in  Udham Singh Nagar  Kumaon , Uttarakhand;



पौड़ी गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ; उधम सिंह नगर कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ;  चमोली गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास  ; नैनीताल कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ;  रुद्रप्रयाग गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ; अल्मोड़ा कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास  ; टिहरी   गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ; चम्पावत कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ;  उत्तरकाशी गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ; पिथौरागढ़ कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास;  देहरादून गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ; रानीखेत कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास; हरिद्वार  गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ; डीडीहाट  कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास ;   नैनीताल  कुमाऊं मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु मूत्र चिकित्सा विकास :


Bhishma Kukreti

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गाय गोबर मूत्र चिकत्सा पर्यटन विकास 

 Cow Dung  Therapy Tourism
चिकित्सा पर्यटन विकास हेतु गोबर मूत्र चिकित्सा विकास -2
Dung , Urine therapy for Medical Tourism Development -2


उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति - 265

Medical Tourism development Strategies -265 

उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 386

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -386

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती     

 

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गौ गोबर -मूत्र गुण  व चिकित्सा
 Cow Dung Urine Therapy Tourism
चिकित्सा पर्यटन विकास हेतु गाय गोबर मूत्र चिकित्सा विकास -1
Cow Dung Urine Therapy for Medical Tourism Development -1


उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति - 264

Medical Tourism development Strategies -264 

उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 385

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -385

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती     

 

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    किसी भी भूभाग में चिकित्सा पर्यटन विकास करना हो तो गाय गोबर व गाय मूत्र चिकित्सा विकास आवश्यक है। 

गाय मूत्र के गुण पिछले अध्याय में उल्लेख हो चूका है।  वैसे बहुत से प्राकृतिक चिकित्सा  स्पा  में गाय गोबर व गौ मूत्र चिकित्सा का उपयोग होता है।
गौ गोबर हानिकारक सूक्ष्म जीवाणुओं व कीटों का नाश करता है व भगाता है।  कृषि खाद में गौ गोबर इसी लिए प्रयोग होता है कि गाय गोबर पेड़ पौधों को भोजन के अतिरिक्त  जीवाणु -कीट नाशक शक्ति भी देता है।
फ़ूड प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों में प्रदूषण हटाने हेतु गाय गोबर ही प्रयोग किया जाता है। भोज समय भोजन स्थल में गाय गोबर छिड़काव के पीछे गाय गोबर की कीट नाशक शक्ति ही मुख्य कारण है।
 प्राचीन काल में गौशाला में प्रसव करवाने के पीछे  मुख्य  कारण गे गोबर का चिकित्सा गुण ही था
प्राचीन काल ही नहीं कुछ साल पहले तक मकान के दीवारों व फर्श लिपाई गोबर से की जाती थी तो कारण गोबर के बैक्टीरिया विरोधी गुण ही था।
गौ मूत्र व गोबर को पीने के पीछे गोबर मूत्र का चिकित्सा गुण ही उत्तरदायी था।
पंचगाव्य में गोबर , मूत्र , घी गुड़ आदि होता है जिससे चिकित्सा की जाती है।
मच्छारों  , झांझ व अन्य कीटों को भगाने हेतु गुपळ या उपल जलाने के पीछे भी मुख्य कारण गोबर की चिकित्सा शक्ति ही है।
अब आधुनिक युग में गोबर व गौ मूत्र से से निम्न उत्पाद चिकित्सा व उपभोग हेतु निर्मित किये जाने लगे हैं -
फर्श सफाई पदार्थ
टूथ पेस्ट
नहाने का साबुन
हाथ धोने हेतु हैण्ड वाश
मुख हेतु फेस वाश क्रीम
शैम्पू

तैल

अगरबत्ती

उपरोक्त पदार्थों का विपणन , प्रचार प्रसार मेडिकल टूरिज्म का भाग बनना चाहिए।
यदि अन्वेषण हो तो लाल मिट्टी  के साथ गोबर व मूत्र का संगम कर अन्य पदार्थ भी बन सकते हैं।








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Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in Garhwal , Uttarakhand ;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in Chamoli Garhwal , Uttarakhand;   Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in  Rudraprayag Garhwal , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in   Pauri Garhwal , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in   Tehri Garhwal , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in  Uttarkashi  Garhwal , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in   Dehradun Garhwal , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in    Haridwar Garhwal , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in  Pithoragarh  Kumaon , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in Champawat    Kumaon , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in   Almora Kumaon , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in Nainital   Kumaon , Uttarakhand;  Medical Tourism Development by Cow Dung Urine Therapy in  Udham Singh Nagar  Kumaon , Uttarakhand;



पौड़ी गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ; उधम सिंह नगर कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ;  चमोली गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान    ; नैनीताल कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ;  रुद्रप्रयाग गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ; अल्मोड़ा कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान    ; टिहरी   गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ; चम्पावत कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ;  उत्तरकाशी गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ; पिथौरागढ़ कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान  ;  देहरादून गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ; रानीखेत कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान  ; हरिद्वार  गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ; डीडीहाट  कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   ;   नैनीताल  कुमाऊं मेडिकल टूरिज्म विकास में गाय गोबर व मूत्र चिकित्सा योगदान   :


Bhishma Kukreti

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केवल भोजन से पर्यटन विकास 
 
      भोजन पर्यटन विकास -1
Food /Culinary  Tourism Development -1
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 387

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -387 

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती     

 

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               भोजन का पर्यटन में कई प्रकार के उपयोग
  भोजन को पर्यटन दृष्टि से निम्न प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है
१- पर्यटन में भोजन सहायक भूमिका में - सभी प्रकार के पर्यटन में पर्यटक स्थल में कई प्रकार के भोज्य पदार्थ आवश्यक है और इस पर पिछले अध्यायों में चर्चा भी हो चुकी है।
२- भोजन से चिकित्सा पर्यटन - आयुर्वेद सिद्धांत का आधार है कि सारी बीमारियों का  जड़ भोजन ही है।  जलवायु या पृथ्वी के भौतिक परिवर्तन के साथ भी भोजन परिवर्तन आवश्यक है जैसे पहाड़ी गढ़वाल व कुमाऊं में  ग्रीष्म ऋतू में मर्सू की रोटी नहीं खायी जाती या रात को दही , उड़द की दाल व दही , छाछ उपयोग नहीं होता था।  या बर्फ पड़ी हो तो भट्ट (सोयाबीन ) भुजकर चबाने की रीति थी , बने गरम ग्रामं भट्ट से जुकाम आदि नहीं होता है। 
३- केवल भोजन से पर्यटन व्यापर करना - मुंबई  के निकट मीरा रोड , वसई , थाने , रायगढ़ जिलों में कई ढाबे या भोजनालय मुंबई के पर्यटकों को आकर्षित कर पर्यटन अवसर पैदा करते हैं।  ऋषिकेश या हरिद्वार के लोग शराब व मांश मच्छी भोजन हेतु रायवाला भर्मण पर निकलते हैं या ढांगू के माळा बिजनी की यात्रा करते है।
          अगले कुछ अध्याओं में केवल भोजन से पर्यटन विकास पर चर्चा होगी।
             भोजन पर्यटन की परिभाषाएं
  भोजन पर्यटन की कई तरह से व्यख्या की गयी है।

अपने निकटवर्ती स्थल छोड़ अपनी रूचि अनुसार  भोजन पाने हेतु पर्यटन करना भोजन पर्यटन कहलाया जाता है।  जब कोई मानव केवल भोजन या पेय हेतु मसूरी भर्मण हेतु जाय तो वः भोजन पर्यटन कहलाया जाता है।

 






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Bhishma Kukreti

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उत्तराखंडी  पर्यटन उद्यम से क्यों लाभ नहीं उठा पाए ?

     भोजन पर्यटन विकास -2
Food /Culinary  Tourism Development 2
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 388

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -388 

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती     

 

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  उत्तराखंड हजारों साल से भारतीय समाज को पर्यटन हेतु आकर्षित करता रहा है और शुरू से ही धार्मिक पर्यटन मुख्य पर्यटन रहा है।  हमारे पास पर्यटन इतिहास तो मिलता है किंतु आर्थिक पर्यटन इतिहास नहीं मिलता है।.अशोक साहित्य व कौटल्य या चरक संहिता, कालिदास  जैसे साहित्य में  कुछ संदर्भ मिलते हैं  ब्रिटिश अधिकारी अपने कार्यों व प्रशासन का रिकॉर्ड रखते थे तो ब्रिटिश शासन के बाद हमारे पास आर्थिक दृष्टि से पर्यटन लाभ इतिहास मिल जाता है।
   यह सत्य है कि ब्रिटिश शासन में यात्रा पंक्तियों में स्वास्थ्य चिकित्सा विकास व सरकारी मशीनरी नियंत्रण से पर्यटन को काफी बल मिला।  ब्रिटिश शासन तक उत्तराखंडियों हेतु रयटन उद्यम लाभकारी उद्यम रहा था किन्तु ब्रिटिश काल अंतिम काल में पर्यटन विकसित अवश्य हुआ स्वतंत्रता उपरान्त भी उत्तराखंड का पर्यटन में वृद्धि हुयी और उत्तराखंडियों के  लिए  लाभांश में गिरावट आती गयी।  उत्तराखंड बनने के पश्चात पर्यटन में आशातीत वृद्धि हुयी किन्तु लाभांश में और गिरावट आयी याने पर्यटन पलायन न रोक सका।
   ब्रिटिश शासन में पौड़ी के गढ़वाल जिले निर्माण होने या लैंसडाउन छवनी स्तापित होने या चमोली गढ़वाल में उप प्रशासनिक कार्यालय खुलने के बाद भी गढ़वाल को पर्यटन से वह लाभ न मिल स्का जो मिलना चाहिए था तो उसके पीछे सबसे मुख्य कारण था पर्यटन हेतु स्थानीय वस्तुओं की अपेक्षा आयातित वस्तुओं  का अधिक उपयोग -
मध्य ब्रिटिश काल  तक में निम्न वस्तुएं स्थानीय होतीं थीं
१- दूध , घी , सब्जी , स्थानीय शिल्पकारों द्वारा निर्मित कई वस्तुएं जैसे बर्तन , मूर्तियां टोकरियाँ सौगात वस्तुएं
२- स्थानीय बिस्तर आदि
३- चिकित्सा हेतु स्थानीय वैद्य व गढ़वाल में उगे स्थानीय औषध पादपों से निर्मित औषधियां -बाबा काली कमली वाले , शिवा नंद आश्रम , गुरुकुल कांगड़ी की औषधियां
४- होटल व्यवसाय पर गढ़वाली कुमाऊंनियों का एकाधिकार
५- पैदल मार्ग होने से चट्टी संस्कृति के कारण पर्यटन से प्रत्येक क्षेत्र में लाभ वितरण
६- चट्टियों के आवास निवास घर में स्थानीय वस्तु व श्रमिक उपयोग
फिर निम्न वस्तुएं आयातित होने लगे
गेंहू , चावल दाल , मिष्ठान , फल फूल, बर्तन व कई सौगात वस्तुएं 
ब्रिटिश शासन के अंतिम दशकों व स्वत्रंत्रता के पश्चात निम्न परिवर्तन आये
१- भोजन सामग्री जैसे गेंहू , चावल , दाल , मसाले , तेल गुड़ , शक्कर के आयात में वृद्धि
२- दूध , घी , सब्जियों का अधिकांश हिस्सा आयात वृद्धि
३- आवास सुविधा वस्तुओं का आयात जैसे बिछौने आदि
४- ऐलोपैथी ने आयुर्वेद को धराशायी किया
५-सौगात वस्तुएं आयात , फास्ट फ़ूड संस्कृति से स्थानीयता का सर्वथा उखड़ना

६- मोटर सड़कों से पर्यटन खरीदी खर्च कुछ केंद्रों में सिमटना व लाभ वितरण  कुछ केंद्रों तक सीमित होना
७- श्रीनगर से बद्रीनाथ तक काला , फूलचट्टी से देवप्रयाग तक की छतियों में बड़थ्वाल , भट, बिष्ट , नेगी  आदि लोग जो चट्टीयों में व्यवसाय करते थे उनका पर्यटन  उद्योग से बाहर हो जाना
८- फल फूलों , मिठाईयों ,गुड़  शरवत पेय पदार्थों , शराब , का सत प्रतिशत सर्वथा आयात
९- होटल उद्यम पर बाहरी लोगों का अधिपत्य
१० होटल बनाने हेतु कच्चा सामान पूर्णतया आयत निर्भरता
उत्तराखंड निर्माण पश्चात तो आयात में दोगुना चौगुना वृद्धि हुयी होगी। 


            पर्यटन भोजन में स्थानीयता का नगण्य योगदान


 ब्रिटिश काल से ही गेंहू , चावल व अन्य सब्जियों (नई )  आकर्षण के कारण स्थानीय उत्पादन जैसे मोटा अनाज , स्थानीय सब्जी , वन सब्जी आदि की मांग नेपथ्य में चली गयी और स्थानीय निर्मित वस्तुओं की मांग बिलकुल नगण्य हो गयी तो पर्यटन से लाभ सम्पूर्ण पहाड़ी भाग को न मिल सका।  शिल्प मांग में भी भयंकर गिरावट आ गयी। 

   धीरे धीरे पहाड़ी भोजन व पहाड़ी वस्तुएं केवल इतिहास पुस्तकों तक सीमित हो गए।  पर्यटन विकसित हुआ किन्तु पहाड़ियों को लाभांश नहीं मिला व पहाड़ी पर्यटन उद्यम से बाहर होते गए। 

  धीरे धीरे कोटद्वार , हल्द्वानी , ऋषिकेश , नैनीताल , मसूरी , देहरादून, हरिद्वार  में होटल साइन बोर्डों में पंजाबी फ़ूड , साउथ इंडियन फ़ूड, कॉन्टिनेंटल  लिखा जाने लगा तो गढ़वाली , उत्तराखंडी फ़ूड को खुद पहाड़ी ही बिसर गए। उदाहरण चाउ माउ की मांग बढ़ी है किन्तु नोड्यूल्स पहाड़ों में नहीं बनते अपितु आयात होते हैं।  इडली की मांग बढ़ी है किन्तु चावल आयात होता है। 
   उधर श्रमिक मजदूरी सिद्धांत के चलते कृषि में लाभ के स्थान पर हानि  होने लगी व कृषि भी चौपट होने लगी तो  पर्यटन भोजन हेतु स्थानीय भोज्य सामग्री की मांग संस्कृति ही ध्वस्त हो गयी।  पलायन इतना बढ़ गया कि मांग हुयी भी तो मांग पूर्ति हेतु गाँवों में पूर्ति कर्ता  ही नहीं रहे  ।

पर्यटन का सिद्धांत है स्थानीय कि वस्तु आपूर्ति किन्तु उत्तराखंड में स्थानीय वस्तु आपूर्ति संस्कृति ही नहीं पनपी तो पर्यटन विकास से पहाड़ियों   को कोई लाभ नहीं मिल सका। 
किसी भी उद्यम का अर्थशास्त्रीय सिद्धांत है उद्यम के  लाभ का वितरण किन्तु उत्तराखंड में लाभ वितरण उल्टा हुआ पहाड़ों के स्थान पर मैदान को लाभ।  यही कारण है स्थानीय व प्रवासी पर्यटन को तबज्जो नहीं देते हैं। 


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भोजन केंद्रित पर्यटन याने स्वाद पर्यटन को समझना

Defining Food Tourism
     भोजन केंद्रित या स्वाद पर्यटन विकास -3
Food /Culinary  Tourism Development 3-
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 389

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -389 

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती     

 

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 भोजन केंद्रित पर्यटन या फ़ूड टूरिज्म शब्द नया शब्द ही है और अभी भी टूरिज्म विपणन या टूरिज्म में भ्रूणावस्था में ही कहा जाएगा।  चूँकि टूरिज्म में बगैर भोजन -पेय -चबेना के टूरिज्म की कल्पना की ही नहीं जा सकती अतः केवल भोजन हेतु पर्यटन नेपथ्य में चला जाता है। यद्यपि 1931 में इटली में गाइडा गैस्ट्रोनॉमिका द इटालिया पुस्तक छपी थी जो वास्तव में अपने किस्म की प्रथम पुस्तक थी जिसमे फ़ूड टूरिज्म का गाइड प्रकाशित हुआ था।  अब भी पत्र पत्रिकाओं में भोजन कहाँ मिलेगा आदि पर पोस्ट प्रकाशित होती हैं किन्तु मार्केटिंग वालों ने फ़ूड टूरिज्म या केवल भोजन हेतु पर्यटन , या भोजन केंद्रित पर्यटन पर विपणीय दृष्टि से कम ही खोजें की हैं और जो खोजें हुईं हैं उनका एकमुश्त  प्रकाशन कम ही हुआ है।  इसीलिए विद्वान् फ़ूड टूरिज्म को बाल्य अवस्था की स्थिति में मानते हैं। 

 फ़ूड टूरिज्म में पर्यटन का एकमात्र ध्येय फ़ूड या स्वाद होता है बाकी कारक गौण होते हैं। जबकि अन्य पर्यटन में भोजन पर्यटन का केवल एक भाग होता है हाँ महत्वपूर्ण कारक होता है। 

 किसी स्थान के फ़ूड या टेस्ट या स्वाद को ध्यान म ेरख कर जब पर्यटन हो तो उस ेभोजन केंद्रित पर्यटन या फ़ूड टूरिज्म कहा जाता है।

फ़ूड टूरिज्म में टूरिस्ट पर्यटक स्थान की पहचान या संभावनाएं टटोलने का कार्य भोजन को केंद्र में रखता है या स्थान का भाव भोजन से पाता  है, ना की अन्य कारकों से । भोजन यात्रा में पर्यटक हेतु स्थल में प्राप्त सभी प्रकार  के भोज्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं या कोई विशेष भोज्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं।

यात्रा का मुख्य ध्येय भोजन होता है ना की अन्य दृश्यात्मक कारक या मनोरंजन।  भोजन व पेय पदार्थ दोनों भोजन केंद्रित पर्यटन के अंग होते हैं।  आजकल शहरों से गाँव की ओर भोजन हेतु पर्यटन नहीं होता अपितु ग्रामीण भी विशेष भोजन व पेय हेतु भ्रमण पर निकलते हैं इसीलिए आजकल हाइवेज या स्टेटवेज में ढाबे खुब्ब चल रहे हैं क्योंकि कई निकट वा दूर के गाँवों से ढाबों में भोजन व सुरा पीने आते हैं।

            बड़े शहरों में फ़ूड टूर या भोजन टूर

मेट्रो शहरों में अब एक नया रिवाज आ गया है जिसे फ़ूड टूर नाम दिया गया है जैसे मुंबई में कोंकणी फ़ूड टूर या लंदन में भारतीय भोजन टूर या न्यू यॉर्क में चीनी , इटालियन या क्यूबन भोजन टूर। 

कुकिंग क्लासेज भी फ़ूड टूरिज्म का एक अहम हिस्सा है जिसमे बाहर से पर्यटक हिस्सा लेते हैं जैसे विदेशियों को गढ़वाली भोजन की ट्रेनिंग देना आदि आदि

फ़ूड फेस्टिवल्स से भी भोजन केंद्रित पर्यटन पैदा होता है।  सूरत से अहमदाबाद हाइवे में जब बाजरे -जवारी की ऊमी  जगह जगह पर मिलते है तो बहुत से लोग कार से सूरत से बड़ोदा या बड़ोदा से सूरत  भ्रमण पर निकल पड़ते हैं और जगह जगह पर बाजरे ज्वार की ऊमी का स्वाद चखते हैं. ये भ्रमणकारी केवल ज्वार बाजरे के पोक (ऊमी) हेतु ही भ्रमण पर निकलते हैं इसे ही भोजन केंद्रित  पर्यटन कहते हैं महाराष्ट्र में भी बाजरा या जवार की ऊमी भोजन केंद्रित पर्यटन कारक है।  कई व्यवसायी कई प्रकार के ऊमी भोज्य पदार्थ बनवाते हैं और दूसरे शहरों से अपने रिश्तेदारों , व्यापारी , राजनैतिक मित्रों को न्योता देते हैं।  औरंगाबाद में वीडिओकोन  के मालिक यह कार्यक्रम हर साल रखते थे । 

 गढ़वाल में मैंने फ़ूड टूरिज्म का दूसरा रूप देखा है।  धरती की ऊंचाई व जल उपलब्धि के कारण गढ़वाल में अगा व् पछा मकई उगाई जातीं थीं तो रिस्तेदार केवल मकई हेतु पछा वाले अगा मकई वाले गाँव में आते थे व बाद में अगा वाले पछा मकई के गाँव आते थे।  यह भी भोजन केंद्रित पर्यटन का उदाहरण है।

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पौड़ी गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; उधम सिंह नगर कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास ;  चमोली गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास  ; नैनीताल कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास ;  रुद्रप्रयाग गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; अल्मोड़ा कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास  ; टिहरी   गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; चम्पावत कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास ;  उत्तरकाशी गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; पिथौरागढ़ कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास;  देहरादून गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; रानीखेत कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास; हरिद्वार  गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; डीडीहाट  कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास ;   नैनीताल  कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास :


   

 


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'ढाकर ' भोजन पर्यटन ही था

भोजन पर्यटन के कुछ उदाहरण

 Examples of Food Tourism
     भोजन पर्यटन विकास -3
Food /Culinary  Tourism Development 3
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 389

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -389 

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती      

 

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   कभी कभी सामन्य पर्यटन व भोजन पर्यटन एक दूसरे से इस तरह मिल जाते हैं कि निखालिस भोजन पर्यटन को सामन्य पर्यटन से अलग करना कठिन हो जाता है।  बिखोत मेले में जाया जाता था गंगा स्नान हेतु किन्तु ध्यान होता था जलेबियों व रिस्तेदार द्वारा लाये गए स्वाळ भूडों पर।  गेंद मेला देख कर आया यात्री गेन के बारे में कम छ्वीं लगाता दिखता था अपितु जलेबी , अंदरखी , बूढ़ी के बाल के स्वादों की प्रशंसा अधिक करता था।  नव भोजन या सामन्यतया अपने रहने के स्थान में अप्राप्य भोजन की इच्छा से भी पर्यटन किया जाता था जो सामन्य धर्मी , मेला पर्यटन भी था व भोजन पर्यटन भी। 


      आलू प्याज खरीदने दूसरे गाँव जाना भी भोजन पर्यटन उदाहरण  है
 उत्तराखंड के पहाड़ी गावों की विशेषता है कि एक ही छोटे क्षेत्र में जल या मिट्टी उपलब्धि के कारण अलग अलग गाँवों में विशेष फसल या सब्जी होती हैं।  आलू प्याज वहीँ होता था जहां स्यारों में प्रचुर जल उपलब्ध हो। जब एक गाँव निवासी आलू , प्याज , दाल, पौध , बीज  क्रय हेतु दूसरे गाँव जाते हैं तो वह भोजन पर्यटन ही है।



  मैदानों में साप्ताहिक हाट आयोजन भी भोजन पर्यटन है


   भारत ही नहीं अन्य देशों में कस्बों या शहरों में किसी निश्चित दिन /वार को भोजन /अनाज हाट आज भी लगते हैं। महाराष्ट्र के पुणे शहर में वार के नाम से गलियां या बजार हैं जैसे बुधवार  पेठ , गुरूवार पेठ  , मंगल पेठ या शनिवार वाड़ा।  इन पेठों  /बजारों में निश्चित वार को हाट लगता था।  इन हाटों में निकटवर्ती या दूरस्थ स्थलों से किसान अपनी फसल , सब्जी , फल , पालतू जंतु जैसे बकरी , बैल , मुर्गियां , अंडे , चकोर , शहद  , जंगली सब्जी , जंगली फल  , कृषि यंत्र , कृषि सहयोगी वस्तुएं बेचने आते थे व व निकटवर्ती उपभोक्ता अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु आवश्यक वस्तु  क्रय करते थे। कुछ काल पहले हाटों का मुख्य उद्देश्य अनाज व सब्जी क्रय विक्रय होता था और अब अन्य वस्तुएं भी क्रय -विक्रय होती हैं।  जड़ी बूटी भी क्रय विक्रय होते थे।
   मुम्बई में शनिवार को अँधेरी पूर्व में मरोल जे बी नगर मध्य सब्जी बजार लगता है और उपभोक्ता क्रय हेतु आते हैं।
    आढ़त सब्जी मंडी तो आधुनिक भोजन पर्यटन का उम्दा उदाहरण है।


        राशन दूकान भी भोजन पर्यटन उदाहरण है


कुछ समय पहले भारत में राशन मिलना कठिन थे उत्पादन मांग से कहीं कम था तो सरकारी गल्लों की दुकाने भी कम थी तो जिस गाँव में राशन की दुकान होती थी दूसरे गाँव वाले राशन क्रय हेतु आते थे यह भोजन पर्यटन ही था।


            मुंबई के निकट बसई में भोजन पर्यटन


सन 80 लगभग , एक समय था जब चावल , अनाज एक प्रदेश से दूसरे पदेश में लाने हेतु पाबंदी थी।  मुंबई में चावल नहीं मिलता था।  मुम्बई निकट बसई में चावल की खेती अच्छी होती थी।  मुम्बई वासी हर हफ्ते बसई चावल खरीदने बसई जाते थे।  ट्रेन में 5 किलो से अधिक चावल नहीं लाया जा सकता था तो परिवार के दो तीन जन चावल खरीदने वसई जाते थे।  साथ में बसई से स्थानीय सब्जी भी खरीदते थे।  भोजन पर्यटन का अच्छा उदाहरण है। सन 1974 में मेरी बहिन की शादी थी हमारे परिवार वाले लगभग  हर सप्ताह बसई से चावल लाने जाते थे। हर बार एकाद सब्जी भी लाते थे।
     

                     पहाड़ों में ढाकर


 उत्तराखंड के पहाड़ों में लूण -गुड़ ,  उत्पाद नहीं होता व तेल की भी कमी होती थी। सूती वस्त्र भी अनुपलब्ध थे।  तो पहाड़ के लोग  स्वतंत्रता या मोटर सड़क अनुपलब्ध तक लूण -गुड़ , तेल , आदि क्रय हेतु दुगड्डा , रामनगर , हल्द्वानी , ऋषिकेश , देहरादून जाते थे।  तब पैसों का भी अकाल था तो जाते समय हल्दी , अदरक , मरसु , तैड़ू , शहद , वन खाद्य पदार्थ , वन मसाले व औषधि पादप, रेशे   दुग्गड्डा  आदि ले जाते थे व बदले में लूण , गुड़ , काली मिर्च , इमली , कृषि यंत्र , लोहा , पीतल आदि मुंड में ढोकर लाते थे।  यह ढाकर संस्कृति भोजन पर्यटन का बहुत ही नायब उदाहरण है।




             

       

 



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  गूमखाळ , सतपुळी  , सिलोगी , घट्टू गाड , माळा बिजनी में भोजन पर्यटन उदाहरण

भोजन , स्वाद केंद्रित पर्यटन वृद्धि के कारण

Gumkhal, Beeronkhal , Silogi examples of Food Tourism
भोजन पर्यटन विकास -4
Food /Culinary  Tourism Development 4
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 390 

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -390 

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती      

 

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   भोजन साम्य पर्यटन को भी प्रभावित करता है और भोजन स्थान को छवि प्रदान भी करता है।  भोजन केंद्रित पर्यटन में वृद्धि हो रही है।  विश्व  भर में भोजन केंद्रित या भोजन स्वाद हेतु पर्यटन विकास के मुख्य कारक निम्न हैं -
१ अमेरिका , कनाडा या यूरोप में वृद्ध जनसंख्या वृद्धि और इन वृद्धों के पास व्यर्थ व्यय हेतु धन उपलब्धि और इन्हे नई साखी जनरेसन हेतु धन निड़ाने की कोई चिंता नहीं है तो वे स्वाद इन्द्रिय तृप्ति हेतु  धन व्यय करते रहते हैं।
२-एशियाई देशों में युवा जनसंख्या वृद्धि , परिवार में डबल इनकम याने मिंया बीबी कमाई वाले परिवारों में वृद्धि ; देशों में सामन्य तौर पर आय  वृद्धि और परिवारों के पास व्यर्थ व्यय हेतु धन उपलब्धि ,
 3 - भारत में राशन में कम कीमत पर राशन , ग्रामीण भारत  मनरेगा व अन्य सरकारी स्कीमों से समाज में धन वितरण, धन  चक्री घूमन  (Money circulation )  से भोजन पर्यटन या स्वाद  पर्यटन प्रभावित होना
४-  आय वृद्धि से भारत के प्रवासियों की अपने पैतृक स्थलों में निवेश विशेषतः भूमि मकान निवेश में वृद्धि होना व आय वृद्धि , परिहवन साधन वृद्धि से प्रवासियों का पैतृक स्थान दर्शन , भ्रमण में अचानक वृद्धि होना।
     उपरोक्त कारणों से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भी भोजन या स्वाद केंद्रित पर्यटन में वृद्धि हुयी है।

  उपरोक्त पर्यटन वृद्धि कारक  उत्तराखंड में भी वृद्धिकारक सिद्ध हुए हैं।
               आंतरिक  वाह्य पर्यटकों के कारण सतपुली , गुमखाल , सिलोगी , माळा बिजनी में भोजन पर्यटन वृद्धि
   पहाड़ी प्रवासियों के आने -जाने (यात्राएं ) से  सड़कों पर स्थित मुख्य बजारों में भोजन व विभिन्न भोजन उपलब्ध होने लगा है जैसे गुम खाळ ,  बीरों खाळ , पाबो , ब्यासी , चम्बा , सतपुली , धुमाकोट सिलोगी आदि ।  इन ग्रामीण बजारों में नास्ता , भोजन ही उपलब्ध नहीं  हो रहा है अपितु  पैकिंग शैली भी विकसित हो चुकी है।  विभिन्न किस्मों के भोजन उपलब्धि ने  आस पास के निकटवर्ती गाँवों से इन बजारों में पर्यटकों का भ्रमण बढ़ गया है।  अब इन बजारों में निम्न भोजन पर्यटन आकर्षित करने वाले सामग्री भी उपलब्ध हो गयी है -
१- प्रवासियों -हेतु पहाड़ी दाल , अनाज , गीन्ठी अचार , शहद , बेडु , तिमलु , तैड़ू , मूळा , सुक्सा , लिंगड़ -खुँतड़, हिसर , काफळ, बुरांस रस   आदि उपलब्धि से सामन्य पर्यटन साधन उपलब्धि को बल मिला है।  गूमखाळ जैसा बजार तो इन अनाज दाल हेतु बड़ा बजार बन गया है।  कोई भी बस खड़ी होती है तो प्रवासी पर्यटक इन विशेष अनाज दाल , सब्जी खरीदते ही हैं। 

२- इन ग्रामीण बजारों में सब्जी फल भंडार भी उपलब्ध हो गए हैं तो निकटवर्ती ग्रामीण सब्जी खरीदने बजार आते हैं इसे आंतरिक भोजन पर्यटन कहा जाता है।

३- इन बजारों में शराब के ठेके  खुलने से निकटवर्ती ग्रामीणों का आवागमन बढ़ गया है।  जब किसी गाँव में सामूहिक भोज भंडारा हो तो इन बजारों से शराब उपलब्ध होती है।

४- लगभग हर बजार में मुर्गी , बकरे , मच्छी शिकार उपलब्धिकरण से आंतरिक पर्यटन बढ़ा है।

५- दूध विक्री - इन बजारों से आस पास के गाँवों में दूध  बितरण होता है।
६- कैटररों  दुकाने - गाँवों में अब सहकारिता कमजोर पद गयी है व युवाओं के न होने से अब सामूहिक भोज या शादी विवाहों , श्रीमद भगवद सप्ताह , में भोजन पकाने हेतु अब वाह्य सर्यूळों व  कारीगरों की आवश्यकता पड़ने लगी है।  मांग बढ़ने से इन बजारों में कैटरर की दुकाने भी खुल गयी हैं जो वास्तव में भोजन पर्यटन के ही  अंग हैं।
७- श्रीमद भागवद सप्ताह , चंडी पाठ , आदि कर्मकांड  कराने वाले पंडितों द्वारा कोटद्वार -ऋषिकेश , हल्द्वानी के कैटररों के साथ भागीदारी या सहयोग भी भोजन या स्वाद पर्यटन अंग ही है
८- आइस क्रीम बेचने वाले गाँव गाँव घूमते हैं वह भी स्वाद पर्यटन व्यापार ही है।
९- उपरोक्त बजारों में अब ग्रामीण अपने फसल , फल , सब्जी , मुर्गी , बकरे ,मच्छी बेचने आते हैं  तो वह कुछ नहीं भोजन या स्वाद तृप्ति पर्यटन के साधन  और भोजन या स्वाद  पर्यटन के अभिन्न अंग हैं।
१० - रिखणी खाळ ब्लॉक के देवेश रावत आदमी द्वारा देहरादून में व ढांगू के रूप चंद्र जखमोला द्वारा ऋषिकेश में पहाड़ी अनाज की ट्रेडिंग /दूकान खोलने से अलग तरह का पर्यटन बढ़ा है या तो इन्हे गाँव खरीदी हेतु आना पड़ता है या गाँव के लोगों को सामग्री लेकर शहर आना पड़ता है तो यह भोजन या स्वाद पर्यटन ही है 
               शिवपुरी निकट घट्टू गाड , माळा बिजनी क्षेत्र के रिजॉर्ट्स
  शिवपुरी के निकट , घट्टू गाड बिछला ढांगू या उदयपुर पट्टी में भी भोजन पर्यटन वृद्धि हुयी है।  ऋषिकेश , देहरादून के कई पर्यटक इन क्षेत्रों में मांशाहारी भोजन व शराब हेतु आते हैं और स्वाद क्षुधा तृप्ति कर चले जाते हैं।  इस क्षेत्र में आवास, स्वादिष्ट भोजन  व शराब उपलब्धि ने ग्रामीण  पर्यटन विकास को संबल दिया है।   






 






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भोजन केंद्रित पर्यटन विकास से स्थानीय आर्थिक लाभ

Food /Culinary Tourism :  Local Economic Development and Local Image Building
भोजन पर्यटन विकास -5
Food /Culinary  Tourism Development 5
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 391

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -391

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती     



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  भोजन केंद्रित पर्यटन दिन प्रति दिन प्रगति पथ पर है अतः भारत में इस विषय पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।  भोजन पर्यटन केवल पर्यटकों द्वारा भोजन भक्षण तक सीमित नहीं है अपितु कई आयाम व्यापार है। 
 भोजन केंद्रित पर्यटन विकास से कई प्रकार स्थानीय आर्थिक विकास की संभावनाएं बढ़ जाती हैं कुछ लाभ इस प्रकार हैं लाभ मिलते हैं
१- स्थान छवि -भोजन स्थान छवि विकसित करता है जिससे अन्य पर्यटन की संभावनाएं बढ़ जाती है।
२- स्थानीय रोजगार - भोजन पर्यटन विकास से स्थानीय लोगों को निकट ही रोजगार के अवसर मिल जाते हैं।
३- कमजोर वर्ग को आर्थिक लाभ - हर स्थान में शारीरिक रूप से , शिक्षा दृष्टि से या मानसिक कमजोरी (दृढ इच्छा शक्ति या बाह्य आयामों को न झेल पाना , ) रूप से कमजोर व्यक्ति होते हैं। भोजन पर्यटन विकास से इस तरह के कमजोर व्यक्तियों को रोजगार मिल जाता है।  जैसे हाई वे में किसी ढाबे का पर्यटक स्थल स्थापित हो जाने से स्थानीय स्त्रियों , शारीरिक दिव्यांगों को कई तरह के कार्य मिल जाते हैं

४- छुवाछूत मिटाने में सहायक - भोजन पर्यटन वास्तव में छुवाछूत मिटाने में सक्षम है।  पर्यटक भोजनालय  कर्मचारी से   यह नहीं पूछता कि तुम किस जाती के हो।
५- स्थानीय भोज्य सामग्री की मांग - भोजन पर्यटन से स्थानीय भोजन सामग्री जैसे अनाज , सब्जी , मसाले , बकरे , मुर्गियां , मच्छियों , सूअरों , की जबरदस्त मांग बढ़ जाती है और स्थानीय कृषि को लाभ मिलता है। ६- जब कृषि में व्यापार प्रवेश करता है तो कृषक आधुनिकता की ओर अग्रसर  होने लगता है। 
७- जब भोजन पर्यटन से कृषक के पास कई खाद्य समाग्री की  मांग आती है तो कृषक भूमि का उपयोग बढ़ाने लगता है. एक एक इंच का दोहन करने लगता है।   जैसे हर समय नीम्बू , धनिया , लहसुन , प्याज , हरी मिर्च उत्पादन में रम जाता जाता है जो अन्य स्थिति में नहीं हो पाता  है।

७अ - स्थानीय फूल व फल संस्कृति पनपना
८- किसी स्थान में भोजन पर्यटन वृद्धि से किसान अन्य कृषि सहयोगी कार्य में भी संलग्न हो जाता है जैसे मुर्गी पालन , बकरी पालन , मधुमखी पालन

९- स्थानीय भोजन पर्यटन विकास से कृषक अन्य शिल्प कार्य में भी कार्यरत हो जाता है जैसे स्थानीय टोकरी , टोपी , लकड़ी बर्तन सौगात सामग्री उत्पादन 

१० -किसी स्थान के भोजन पर्यटक स्थल प्रसिद्ध हो  जाने से  स्थान के कई लोग व्यापार करने लगते हैं जो विकास की असली पहचान है।
१२- भोजन पर्यटन अन्य उद्योगों को भी जन्म देता है जैसे परिहवन , मनोरंजन , स्थानीय कला उद्यमों का जन्म जिससे कई नए उद्योग फलने फूलने लगते हैं।
१३- कई वन भोजन सामग्री या वन सामग्री की भी मांग होने लगती है और स्थानीय लोगों को लाभ पंहुचता है








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भोजन पर्यटन का एक ही उद्देश्य : स्थानीय उत्पादों  की उन्नति
 

Aim of Food Tourism:Promotion of  Local Products   
भोजन पर्यटन विकास -6
Food /Culinary  Tourism Development 6
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 392

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -392

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती   



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   आज पर्यटन उद्यम या विचार आमूल -चूल परिवर्तन की सीढ़ी पर है। उपभोक्ता कुछ नया अनुभव की खोज में पर्यटन को महत्व दे रहा है। इसीलिए भोजन केंद्रित पर्यटन  विचार /कंसेप्ट तेजी से विकसित हो रहा है और विपणन विचारक भोजन पर्यटन विकास को अति महत्व दे रहे हैं।  भोजन पर्यटन स्थल विकास से कई लाभ मिलते हैं जिनकी चर्चा पिछले अध्याय में हो चुकी है।

    भोजन पर्यटन के मुख्य  उद्देश्य निम्न हैं -

१- स्थानीय भोजन व स्वाद को समृद्ध किया जाय ना कि बाह्य स्वाद को।

२- भोजन पर्यटन स्थानीय भोज्य सामग्री पर ही निर्भर हो   

३- भोजन पर्यटन से स्थानीय कृषि व स्थनीय कृषि सहायक उद्यमों में समृद्धि आवश्यक है

४- भोजन पर्यटन के सहायक कारकों में स्थानीय संस्कृति को महत्व दिया जाय जैसे धार्मिक अनुष्ठान आदि  होने चाहिए

५- भोजन पर्यटन में सहायक कारक जैसे मनोरंजन में स्थानीय कला ही का समावेश हो -स्थानीय गीत संगीत , खेल का समावेश निश्चित करना

६- भोजन पर्यटन को संबल देने वाले अन्य कारक जैसे श्रमिक स्थानीय ही हों

७- भोजन पकाने पाठशाला म स्थानीय भोजन पाठ्य क्रम अवश्य शामिल हो

८- भोजन पर्यटन से स्थानीय कलाओं का विकास हो  ना कि भोजन पर्यटक स्थल चीन का सामन बोक्ने वाला कुरियर ब्वाय बन जाय।

९- भोजन पर्यटन से कृषि पर्यटन को बल मिलना चाहिए 

१० - सौगात भोजन पदार्थ भी स्थानीय ही हो जैसे अन्य सौगात वस्तु

   मैंने पिछले एक अध्याय में लिखा कि उत्तराखंड में पर्यटन समृद्ध हुआ किन्तु स्थानीय उत्पादों के प्रयोग न होने से उत्तराखंड को समुचित लाभ न मिल सका।  अतः बहपजं पर्यटन विकसित करने के लिए उपरोक्त उद्देश्यों पर  ध्यान देना आवश्यक होना चाहिए





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पौड़ी गढ़वाल में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ; उधम सिंह नगर कुमाऊं  में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ;  चमोली गढ़वाल में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति  ; नैनीताल कुमाऊं  में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ;  रुद्रप्रयाग गढ़वाल में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ; अल्मोड़ा कुमाऊं  में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति  ; टिहरी   गढ़वाल में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ; चम्पावत कुमाऊं  में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ;  उत्तरकाशी गढ़वाल में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ; पिथौरागढ़ कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास;  देहरादून गढ़वाल में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ; रानीखेत कुमाऊं  में भोजन पर्यटन विकास; हरिद्वार  गढ़वाल में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ; डीडीहाट  कुमाऊं  में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति ;   नैनीताल  कुमाऊं में भोजन पर्यटन  विकास का उद्देश्य  स्थानीय उत्पाद उन्नति :

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Bhishma Kukreti

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 'पलायन एक चिंतन' आयोजित  निखालिश भोजन पर्यटन
और
देवेश आदमी , रूपचंद जखमोला के अनाज दाल व्यापार  पर्यटन सहायक माध्यम


Difference between Food Tourism and Food as  Tourism Assisting Medium
भोजन पर्यटन विकास -7
Food /Culinary  Tourism Development 7
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 393

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -393

 

आलेख -      विपणन आचार्य  भीष्म कुकरेती   



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 भोजन पर्यटन व पर्यटकों हेतु भोजन अनाज , यंत्र प्राप्ति सेवा में अंतर् जानना आवश्यक है।



       पलायन एक चिंतन का ' शीला -बांघाट ' क्षेत्र में 'ऑर्गेनिक किचन '  भोजन पर्यटन उदाहरण



अजय रावत द्वारा उन्ही की वाल में फेसबुक में 14 फरवरी 2019 की पोस्ट में एक सूचना मिलती है कि पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड के दोनों नयार संगम  तटीय क्षेत्र शीला -बांघाट  क्षेत्र में पलायन एक चिंतन संगठन ने 'ऑर्गेनिक व ट्रेडिशनल किचन ' का शुभारम्भ किया व शीला बलूण  तोक क्षेत्र में बंजर पड़ी जमीन में जैविक कृषि कर इस किचन में ऑर्गेनिक भोजन परोसेंगे।  इस प्रयत्नो गामी कृत में स्वयं अजय रावत , रत्न सिंह असवाल , अनिल बहगुणा , राकेश बिजल्वाण व कृष्ण काला शामिल हैं।

          जैविक कृषि अपने आप में पर्यटन गामी माध्यम है और जैविक अनाज दाल , सब्जी से बना भोजन पर्यटकों को परोसना अति विशेष भोजन पर्यटन कहलाया जाता है। ऐसे किचन में अभी अधिकांशतः विदेशी पर्यटक व धनी पर्यटक ही एते हैं जिन्हे जैविक भोजन की महत्ता ज्ञात है।  इसे निश मार्केटिंग  तहत निश टूरिज्म भी कहा जाता है।  सामन्य पर्यटक  किचन में भोजन नहीं करेंगे व जैविक पादप खेतों में नहीं घूमेंगे केवल जैविक कृषि प्रेमी ही आनंद लेंगे इसलिए ऐसा कार्य अति विशेष भोजन पर्यटन श्रेणी में आएगा।

     रतन  सिंह असवाल व अजय रावत के पोस्टों से अनुमान लगता है वे   शीला बलूण तोक (मनियार स्यूं ) में जैविक प्रेमी पर्यटकों हेतु विलेज टूरिज्म हेतु सुविधा जुटाएंगे।  फ़ूड टूरिज्म का आधार व उद्देश्य विलेज टूरिज्म विकसित करना ही होता है।

रतन सिंह असवाल , अजय रावत के सोशल मीडिया में पहाड़ी भोजन चित्र व विवरण किस तरह विलेज टूरिज्म का प्रचार प्रसार करना चाहिए के प्रशंसनीय उदाहरण  हैं

उपरोक्त पर्यटन निखालिश भोजन पर्यटन की श्रेणी का श्रेष्ठ उदाहरण है।

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      देवेश आदमी व रूपचंद जखमोला द्वारा पहाड़ी अनाज दाल  व्यापार निखालिश भोजन पर्यटन नहीं है

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पैनों पट्टी के देवेश रव्वत 'आदमी ' देहरादून में बालावाला स्थान में पहाड़ी अनाज , दाल भाजी के  व्यापार में संलग्न हैं व गाँवों में ग्रामीण क्राफ्ट विकास व प्रचार प्रसार हेतु कार्यरत हैं जैसे पादप पत्तल व शिल्पकारों द्वारा निर्मित क्राफ्ट्स /शिल्प वस्तुओं की प्रदर्शनी व प्रचार आदि आदि। 

  इसी तरह मल्ला ढांगू के रूपचंद जखमोला भी ऋषिकेश में पहाड़ी अनाज , दाल , भाजी सुक्सा आदि का व्यापर करते हैं।

इसी तरह देहरादून में युगवाणी के पास निखालिश पहाड़ी अनाज दूकान , रेवती हॉस्पिटल निकट , हरिद्वार रोड धर्मपुर देहरादून में सेमवाल स्टोर द्वारा पहाड़ी अनाज दाल सुक्सा , बड़ी व्यापार भी पर्यटनोगामी हैं। देवेश रावत आदमी , रूपचंद , सेमवाल स्टोर के कृत्य  वास्तव में उत्तराखंडी प्रवासी पर्यटकों को आकर्षित करने वाले भोजन संबंधी कृत्य तो हैं किन्तु निखालिश भोजन पर्यटन श्रेणी में नहीं आते।  धर्मपुर देहरादून में ही सेमवाल स्टोर के पास कलसी कुठार (मल्ला ढांगू ) के रावत का 'रावत सीड्स स्टोर' वास्तव में भोजन-कृषि  पर्यटन का एक उदाहरण है।  इस स्टोर में उत्तराखंड पहाड़ों के कृषक पहाड़ी बीज , कृषि यंत्र क्रय हेतु गाँवों से आते हैं तथापि दूसरे शहरों के प्रवासी भी पहाड़ी बीज व कृषि यंत्र क्रय हेतु आते हैं। 

         सभी भोजन दाल व्यापार निखालिश भोजन पर्यटन नहीं कहलाया जा सकता है।  हाँ यह व्यापार पर्यटन विकासोन्मुखी अवश्य होता है।

   





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