Author Topic: Tourist Places Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के पर्यटक स्थल  (Read 38278 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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बूढा केदार     


यह भूमि टिहरी से उत्तर की और 60 किलोमीटर की दूरी पर मोटर मार्ग से जुडी है। इस तीर्थ को शास्त्रों से वृद्धकेदार के नाम से वर्णित किया गया है। बालगंगा और धर्मगंगा के संगम पर स्थित यहॉ बूढा केदारनाथ जी का मन्दिर है। इस अत्यन्त प्राचीन मंन्दिर में पाण्डवों के चित्रों से अंकित विशाल लिंगनुमा शिला है। इस पर शिव पार्वती के चित्र अंकित है। इस स्थान पर शक्ति का प्रतीक प्राचीन त्रिशूल है जो पाण्डवकालीन बताया जाता है। इस मन्दिर के परम्परागत पुजारी नाथ सम्प्रदाय के लोग है, जो मन्दिर के समीपवर्ती गॉवों में बसे है।

हेम पन्त

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Sir,
Khatling kaun se district mein padhta hai... aur yahan jane ka route kya hai?

खतलिंग     
भिलंग क्षेत्र में, खतलिंग एवं धार्मिक एवं संस्कृति प्रधान स्थान है। जनश्रुतियों के अनुसार प्राचीन काल में यहॉ पर एक विशाल शिवलिंग था, इसलिए इस क्षेत्र को खतलिंग के नाम से पुकारते है। यह क्षेत्र वन सम्पदा से काफी सम्पन्न है। यहॉ सूर्योदय सौन्दर्य देखने योग्य होता है। खतलिंग से आगे का क्षेत्र निर्जन है तथा इसका ऊपरी भाग सदैव हिमाच्छादित रहता है।



पंकज सिंह महर

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रीठा साहिब-REETHA SHAHIB

रीठा साहिब चम्पावत जिले में आता है, चम्पावत से इसकी दूरी ७२ कि०मी० है, यह सिक्खों का पवित्र धार्मिक स्थान है। कहा जाता है कि सिक्ख धर्म के प्रवर्तक नानक देव जी महाराज आध्यात्म की खोज में यहां पहुंचे तथा गोरखपंथी जोगियों के साथ विचार-विमर्श किया। जब वे अपने शिष्यों के साथ एक रीठे के पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे तो शिष्यों को भूख लगी तो उन्होंने गुरु जी से भोजन का आग्रह किया, बियाबान जंगल में गुरु जी भी भोजन कहां से लाते, उन्होंने उसी रीठे के पेड़ पर हाथ लगाया और कहा कि जाओ रीठे खा लो। यह सुनकर शिष्य अचकचा गये, लेकिन गुरु के आदेशानुसार जब उन्होंने रीठे खाये तो ये मीठे निकले। तभी से इस जगह का नाम रीठासाहिब हो गया, 1960  में सिख समाज द्वारा यहां पर दियूरी गांव में लधिया और रतिया नदियों के संगम पर गुरुद्वारे का निर्माण कराया गया, बैशाखी पूर्णिमा पर यहां एक विशाल मेला लगता है, जिसमें देश-विदेश से सिख शिरकत करते हैं।
       यहां तक पहुंचने के लिये आपको लोहाघाट से देवीधूरा मार्ग पर चलना होगा, इसी मार्ग पर ७२ कि०मी० की दूरी पर रीठासाहिब के दर्शन होंगे। आजकल रीठासाहिब में ही सिख समाज द्वारा मीठे रीठों की एक नर्सरी भी संचालित की जा रही है।



पंकज सिंह महर

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Sir,
Khatling kaun se district mein padhta hai... aur yahan jane ka route kya hai?

हेम दा, खतलिंग एक ग्लेशियर है, यह टिहरी गढ़्वाल में पड़ता है, इस ग्लेशियर से भिलंगना नदी निकलती है। यहां तक पहुंचने के लिये आपको घुत्तू-घनशाली तक मोटर मार्ग मिलेगा, इससे आगे लगभग ४५ कि०मी० पैदल चलने पर आपको खतलिंग ग्लेशियर मिलेगा। इस स्थान की खोज उत्तराखण्ड के गांधी स्व० इन्द्रमणि बडोनी जी ने की थी।

Devbhoomi,Uttarakhand

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गढ़वाल  प्राकृतिक  और सांस्कृतिक  विविधता  से संपन्न  क्षेत्र  है। यह  कई विशिष्ट  पर्यटन  के विकास  के लिए  भरपूर  अवसर प्रदान  करता है।  राज्य  में पर्यटन  विकास  की जिम्मेदारी  पर्यटन  विभाग, उत्तराखण्ड  सरकार  की है।  गढ़वाल  और कुमाऊं  क्षेत्रों  के पर्यटन  विकास  के लिए  दो पर्यटन  निगम हैं।  ये निगम  तीर्थयात्रा, पर्वतारोहण, ट्रेकिंग, व्हाइट  वाटर रैफ्टिंग, वाटर स्पोटर्स, स्कीइंग  और वन्य  जीवन संबंधी  पर्यटनों  का विशेष  आयोजन  करता है।  इसके लिए  ऑनलाइन  आरक्षण  की सुविधा  है। गढ़वाल  में पर्यटन  विकास  के लिए  प्रमुख  एजेंसी  गढ़वाल  मण्डल  विकास  निगम (जीएमवीएन) का गठन  31 मार्च  1976 में हुआ  था। वर्तमान  में इसके  75 अतिथि  गृह और  गढ़वाल  क्षेत्र  में कई  बंगले  हैं। इसके  अतिरिक्त  यहां अनगिनत  छोटी-बड़ी  निजी पर्यटन  कम्पनियां  हैं जो  गढ़वाल  पर्यटन  की सुविधा  देते हैं।

नवीन जोशी

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आदि गुरु शंकराचार्य का उत्तराखंड में प्रथम पड़ाव: कालीचौड़ मंदिरदेवभूमि के कण-कण में देवत्व होने की बात यूँ ही नहीं कही जाती। अब इन दो स्थानों को ही लीजिये, यह नैनीताल जिले में हल्द्वानी के निकट खेड़ा गौलापार से अन्दर सुरम्य बेहद घने वन में स्थित कालीचौड़ मंदिर है। यहाँ महिषासुर मर्दिनी मां काली की आदमकद मूर्ति सहित दर्जनों मूर्तियाँ मंदिर के स्थान से ही धरती से निकलीं। कहते हैं कि आदि गुरु शंकराचार्य अपने देवभूमि उत्तराखंड आगमन के दौरान सर्वप्रथम इस स्थान पर आये थे। उन्होंने यहाँ आध्यात्मिक ओजस्व प्राप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने यहाँ काफी समय तक आध्यात्मिक चिंतन किया। बाद में कोलकाता के एक महंत ने यहाँ मंदिर बनवाया। इसके आगे की कथा भी कम रोचक नहीं है, हल्द्वानी के एक मुस्लिम चूड़ी कारोबारी को इस स्थान से ऐसा अध्यात्मिक लगाव हुआ कि बर्षों तक उन्होंने ही इस मंदिर की व्यवस्थाएं संभालीं। इधर किच्छा के एक सिख (अशोक बावा के) परिवार ने अपने मृत बच्चे को यहाँ मां के दरबार में यह कहकर समर्पित कर दिया कि मां चाहे जो करे, अब वह मां का है। इस पर वह बच्चा फिर से जी उठा, आज करीब 30 वर्षीय वही बालक और उसका परिवार मंदिर में पिछले कई वर्षों से भंडार चलाये हुए है।

नवीन जोशी

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स्वामी विवेकानंद का 'बोध गया' : काकड़ीघाटSomvaaree Baba Ashram Kaakadeeghat, Nainital height=353यह दूसरा स्थान भी नैनीताल जिले का अल्मोड़ा रोड पर काकड़ीघाट धाम है। इस स्थान के बारे में कहा जाता कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद का कुमाऊं आगमन इसी स्थान से प्रारंभ हुआ। यहीं उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। स्वयं उन्होंने इस स्थान के बारे में लिखा है कि यहाँ आकर उन्हें लगा कि उनके भीतर की समस्त समस्याओं का समाधान हो गया, और उन्हें पूरे ब्रह्माण्ड के एक अणु में दर्शन हुए। महान तत्वदर्शी सोमवारी बाबा ने भी यहाँ लम्बे समय तक तपस्या की।

नवीन जोशी

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देवीधुरा
देवीधुरा यानी "देवी के वन" नाम का छोटा सा कश्बा उत्तराखंड के चंपावत ज़िले में कुमाऊं मंडल के तीन जिलों अल्मोडा, नैनीताल और चंपावत की सीमा पर समद्रतल से लगभग 2,400 मीटर (लगभग 6,500 फिट) की ऊंचाई पर लोहाघाट से 45 किमी तथा चम्पावत से 61 किमी की दूरी पर स्थित है । यहाँ ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और नैसर्गिक सौंदर्य की त्रिवेणी के रूप में मां बाराही देवी का मंदिर स्थित है, जिसे शक्तिपीठ की मान्यता प्राप्त है।
इस स्थान का महाभारतकालीन इतिहास भी बताया जाता है, कहते हैं कि यहाँ पहाड़ी के छोर पर खेल-खेल में भीम ने शिलायें फेंकी थी। ग्रेनाइट की इन विशाल शिलाओं में से दो आज भी मन्दिर के निकट मौजूद हैं। इनमें से एक को राम शिला कहा जाता है। जन श्रुति है कि यहां पर पाण्डवों ने जुआ खेला था, दूसरी शिला पर हाथों के भी निशान हैं।इन्हीं मां बाराही की पवित्र भूमि पर उल्लास, वैभव एवं उमंग से भरपूर सावन के महीने में जब हरीतिमा की सादी ओढ़ प्रकृति स्वयं पर इठलाने लगती हैं, आकाश में मेघ गरजते हैं, दामिनी दमकती है और धरती पर नदियां एवं झरने नव जीवन के संगीत की स्वर लहरियां गुंजा देते हैं, बरसात की फुहारें प्राणिमात्र में नव स्पंदन भर देती हैं तथा खेत और वनों में हरियाली लहलहा उठती है। ऐसे परिवेश में देवीधूरा में प्राचीनकाल से भाई-बहन के पवित्र प्रेम के पर्व रक्षाबंधन से कृष्ण जन्माटष्मी तक आषाड़ी कौतिक (मेला) मनाया जाता है, वर्तमान में इसे बग्वाल मेले के नाम से अधिक प्रसिद्धि प्राप्त है। कौतिक के दौरान श्रावणी पूर्णिमा को ‘पाषाण युद्ध’ का उत्सव मनाया जाता है। एक-दूसरे पर पत्थर बरसाती वीरों की टोलियां,  वीरों की जयकार और वीर रस के गीतों से गूंजता वातावरण, हवा में तैरते पत्थर ही पत्थर और उनकी मार से बचने के लिये हाथों में बांस के फर्रे लिये युद्ध करते वीर। सब चाहते हैं कि उनकी टोली जीते, लेकिन साथ ही जिसका जितना खून बहता है वो उतना ही ख़ुशक़िस्मत भी समझा जाता है. इसका मतलब होता है कि देवी ने उनकी पूजा स्वीकार कर ली। आस-पास के पेड़ों, पहाड़ों औऱ घर की छतों से हजारों लोग सांस रोके पाषाण युद्ध के इस रोमांचकारी दृश्य को देखते हैं। कभी कोई पत्थर की चोट से घायल हो जाता है तो तुरंत उसे पास ही बने स्वास्थ्य शिविर में ले जाया जाता है। युद्धभूमि में खून बहने लगता है, लेकिन यह सिलसिला थमता नहीं। साल-दर-साल चलता रहता है, हर साल हजारों लोग दूर-दूर से इस उत्सव में शामिल होने आते हैं।

Devbhoomi,Uttarakhand

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भोजबासा

 भोजपत्र पेड़ों की अधिकता के कारण भोजबासा गंगोत्री से 14 किलोमीटर दूर है। यह जाट गंगा तथा भागीरथी नदी के संगम पर है। गौमुख जाते हुए इसका उपयोग पड़ाव की तरह होता है।

 मूल रूप से लाल बाबा द्वारा निर्मित एक आश्रम में मुफ्त भोजन का लंगर चलाता है तथा गढ़वाल मंडल विकास निगम का विश्राम गृह, आवास प्रदान करता है। रास्ते में आप किंवदन्त धार्मिक फूल ब्रह्मकमल देख सकते है जो ब्रह्मा का आसन है।



Devbhoomi,Uttarakhand

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Bhojbasa through Bhagirathi Valley


 

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