Author Topic: Tourist Places Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के पर्यटक स्थल  (Read 38621 times)

विनोद सिंह गढ़िया

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पर्यटकों को आकर्षित करता चंद्रबनी



दून के निवासियों के साथ ही बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए चंद्रबनी मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र है। यह दून से तकरीबन छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ प्राचीन काल से स्थित गौतम कुंड के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा है। मान्यता है कि यहाँ महर्षि गौतम ने तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर माँ गंगा प्रकट हुई थीं। एक अन्य मान्यता के अनुसार किसी समय देवी अहिल्या अपनी पुत्री अंजना के साथ यहाँ आयी थीं। यह वही माँ अंजना हैं, जिनसे बाद में हनुमान जी की उत्पत्ति मानी जाती है। बैसाखी के मौके पर यहाँ तकरीबन दो से तीन दिन तक चलने वाले एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी गीत-नृत्यों की भरमार रहती है। मेले के आयोजन के लिए एक कमेटी का गठन किया गया है। इस मेले में राज्य भर से आये कलाकारों के अलावा स्थानीय कलाकारों का मजमा अपनी प्रस्तुतियाँ देने के लिए लगता है, जिसमें रफ़ल्मों के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्य पर आधारित प्रस्तुतियाँ भी आकर्षण का केंद्र होती हैं। दूर-दूर से आये हुए लोग इसमें शरीक होने के लिए पहुँचते हैं। गौतम कुंड में स्नान करने का अपना महत्व है। कहा जाता है कि इस कुंड में डुबकी लगाने से मनुष्य के समस्त कष्टों, पापों का नाश होता है।
प्रस्तुति: युवान ब्यूरो, देहरादून

C.S.Mehta

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                                                            जय माँ भगवती


pithodagad  जनपद के होकरा नामक गांव का एक नजारा है आप देख रहे है  गांव के बिच में पेड़ो का एक घेरा सा बना है जहाँ पर माँ भगवती माता का प्रशिद्ध मंदिर स्थित है जहाँ पर चेत के महीने में अष्टमी के दिन लोग हजारो की  संख्या में दर्शन करने के लिए आते है होकर गांव में स्थित इस मंदिर का शेत्रफल लगभग ५००  वर्ग मीटर  में फैला है और यह मंदिर चारो ओर से पेड़ो से ढका है बागेश्वर जनपद से लगभग ७० कीमी. की दूरी पर है

 

   

Bhishma Kukreti

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      उत्तराखंड की झीलें (Lakes of Uttrakhand)
                                                                         (गढ़वाल क्षेत्र )
            [Lakes of Uttrakhand ;lakes of Chamoli Garhwal; lakes of Rudraprayag;lakes of Kedar valley;lakes of Tihri Garhwal ; lakes of Uttarkashi ; lakes of Dehradun; lakes of Haridwar ;lakes of Pithoragarh;lakes of Dwarhat; lakes of Champawat ; lakes of Udham Singh Nagar; lakes of Nainital;lakes of Bageshwar; lakes of Almora series]
                                                                       डा. बलबीर सिंह रावत
शुद्ध , साफ़, शीतल जल की झीलें किसी भी क्षेत्र की सुन्दरता को पूर्ण करती है. पर्वतीय क्षेत्रों की बदलती दृश्यावलियों में नीले, कांच सी साफ़, पारदर्शी, पानी वाली छोटी बड़ी झीलें तो इन दृश्यावलियों को स्वर्गीय आनद देने वाली  बना देती हैं. उत्तराखंड के उत्तरी भाग को प्राकृति ने झीलों से भरपूर बनाया है. अकेले उत्तरकाशी, चमोली और टेहरी जिलों में १८८० मीटर  से ५३५० मीटर  की ऊचाइयों पर १२ छोटी बड़ी झीलें स्थित हैं। इन में से सबसे बड़ी झील रूप कुण्ड है जो चमोली जनपद में, समुद्र ताल से ५३५० मीटर की ऊचाई पर स्थित है और इसका क्षेत्रफल ७० वर्ग किलोमीटर है. इस झील का पौराणिक और ऐतिहासिक
महत्व है. इसका अधिकांश भाग बर्फ से जमा रहता है, केवल एक छोटे से हिस्से में जल एक कुंड के रूप में दिखता है। यह झील हिमालय क्षेत्र के सौन्दर्यम स्थलों में से एक है। इस के किनारे सैकड़ों वर्ष पुराने नर कंकाल बिखरे पड़े हैं जिनके बारे में कुछ सटीक पता नहीं है की किनके है और वे यहाँ क्यों आये थे। यह स्थान नंदा जात यात्रा की पूजा का यह एक केंद्र बिंदु भी माना जाता है।पर्यटन की दृष्टि से  रूप कुंड एक ऐसी ट्रेल पर स्थित है जो बेदनी बुग्याल, ब्रह्म ताल, और भैन्कल ताल का क्षेत्र बनाता है। 
भैंकल  ताल २५०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर स्थित है। इस ताल का नाम नागदेव राजा भेन्क्ल के नाम पर रखा गया है और इसी लिए इसका पौराणिक महत्व भी है. झील के चारों और सघन बन हैं जिनमे भोज पत्र के , बुरांस के , देवदार के और रागा-थुनेर के बृक्ष खड़े हैं। पक्षियों का कलरव, शीतल हवा, नयनाभिराम दृश्यावलियां सुध बुध खोने की लिए इतनी अधिक हैं की मनुष्य अपने को भूल कर प्रकृति में खो जाने को विवश हो जाता है। इस झील के चारों और टूटे तीरों के असंख्य टुकड़े आज भी पड़े हुए दिखाई देते हैं, कई पेड़ों पर चुभे तीर भी देखे जा साकते हैं। . इस से यह साबित होता है की यहाँ पर कभी कोइ भीषण युद्ध लड़ा गया होगा जिसके बारे में कोइ जानकारी नहीं है। इस ताल में मछलिया हैं, पास में एक मंदिर भी है और एक पेड़ पर मनोती की घंटिया भी टंगी हैं।. इन सब से यह साबित होता है की यह स्थान प्राचीन काल से ही पूजा का स्थान रहा है। इस रमणीक झील से आगे तेलंगी बुग्याल है और उससे आगे बेदनी बुग्याल। इन बुग्यालों के मखमली घास, रंग बिरंगे फूल,औषधीय जड़ी -बूटियाँ प्रचुर मात्रा में पायी जाती हैं।
इस क्षेत्र में आने के लिए र्हिषिकेश , कोटद्वार और रामनगर से करणप्रयाग  होकर नंदप्रयाग अना होता है। यहाँ से आगे कनौल , सुतौल और मूना हो कर पहुंचा जा सकता है. अल्मोड़ा से ग्वालदम , बाण , मुन्दौली होकर तथा करण प्रयाग से थराली , देवाल बाण हो कर भी यहाँ पहुचा जा सकता है. मूना नमक स्थान पर एक डाक बँगला भी है जिसे अंग्रेज जिलाधीश श्री मर्नौड ने बनवाया था
इतने  सुन्दर प्राकृतिक दृश्यावलियों  और ऐतिहासिक - धार्मिक स्थलों के बारे में इतने कम जानकारी का होना हमारी सरकार और विश्वविद्यालयों की उदासीनता को उजागर करता है। आशा है की इस लेख को पढने के बाद इन स्थलों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन होगा और सही ऐतिहासिक जानकारी जुताई जा सकेगी . साथ ही इस प्रकार पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा की स्थलों की सुन्दरता और प्राकृतिक परिवेश पर कोइ हानिकारक प्रभाव नहीं पडेगा। ( इस लेख को लिखने के लिए डा. रणबीर सिंह चौहान जे की पुस्तक "गढ़वाल के गढ़ों का इतिहास  एवं पर्यटन के सौन्दर्य स्थल " से जानकारी, साभार , ली गई है)
dr.bsrawat26@gmail.com      .

-- Lakes of Uttrakhand ;lakes of Chamoli Garhwal; lakes of Rudraprayag;lakes of Kedar valley;lakes of Tihri Garhwal ; lakes of Uttarkashi ; lakes of Dehradun; lakes of Haridwar ;lakes of Pithoragarh;lakes of Dwarhat; lakes of Champawat ; lakes of Udham Singh Nagar; lakes of Nainital;lakes of Bageshwar; lakes of Almora series to be continued...

Hisalu

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पांडवखोली
में हैं पांडवों की स्मृतियां

रानीखेत। द्वाराहाट के कुकूछीना से मात्र साढ़े तीन किलोमीटर चढ़ाई पर स्थित पांडवखोली में पांडवों के अज्ञातवास की स्मृतियां मौजूद हैं। अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां 13 दिन गुजारे थे, लेकिन सरकार की अनदेखी से आज तक पांडवखोली को पर्यटन के लिहाज से वह दर्जा नहीं मिल पाया है जो रानीखेत, कौसानी और नैनीताल को है। हालांकि पथ भ्रमण संघ के सहयोग से विदेशी श्रद्धालुओं की आवाजाही यहां जरूर बढ़ी है।
पांडवखोली रानीखेत से 60 किमी तो द्वाराहाट से लगभग 22 किमी दूरी पर स्थित है। पांडवखोली के लिए द्वाराहाट से बस या छोटे वाहनों से करीब 18 किमी कुकूछीना जाना पड़ता है। कुकूछीना से साढ़े तीन किमी की खड़ी पैदल चढ़ाई चढ़ने के बाद दिव्य और एकांत स्थल पांडवखोली के दर्शन होते हैं। किवदंती है कि द्वापर युग में जुए में राजपाट हारने के बाद जब पांडवों को अज्ञातवास हुआ तो वे द्रोपदी के साथ यहां भी आए और करीब 13 दिन तक रहे। पांडवों के प्रवास के चलते ही इसका नाम पांडवखोली पड़ा। यहां पर बुग्यालनुमा स्थल (ऊंचाई वाले इलाकों में घास के मैदान) भी है जिसे भीम की गुदड़ी कहा जाता है। इसी स्थल पर भीम आराम करते थे।
नेशनल इंटर कालेज के वरिष्ठ प्रवक्ता ओम प्रकाश शाह ने बताया कि कुमाऊं के इतिहास में लेखक बद्री दत्त ने पांडवखोली का जिक्र किया है। जिसमें कहा गया है कि अज्ञातवास के दौरान भीम ने चौखुटिया के पास तड़ागताल में अपना बिस्तर धोया और सुखाने के लिए उसे पांडवखोली के जंगल में डाल दिया जिसने बाद में बुग्याल का रूप ले लिया।
करीब 50 साल पहले महंत बलवंत गिरि महाराज ने यहां बने एक मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। इस मंदिर से हिमालय और सूर्योदय-सूर्यास्त के मनभावन दृश्य देखने को मिलते हैं। शांत वातावरण होने के कारण बलवंत गिरि महाराज और उनके शिष्य यहां ध्यान लगाते थे। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद पथ भ्रमण संघ ने इस क्षेत्र को अपने प्रयासों से थोड़ा विकसित किया। महंत बलवंत गिरि की पुण्यतिथि पर हर साल यहां विशाल भंडारे और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पथ भ्रमण संघ के अध्यक्ष हरीश शाह का कहना है कि लोगों के सहयोग से यहां ध्यान मठ टावर, ध्यान मठ कुटिया आदि का निर्माण किया गया है। पथ भ्रमण संघ के लोग रानीखेत आने वाले देशी-विदेशी श्रद्धालुओं को पांडवखोली के बारे में बताते हैं। जिससे श्रद्धालु एक बार वहां जाते हैं तो अगली बार स्वयं ही पहुंच जाते हैं। इस तरह वहां विदेशी श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ी है।
नैनीताल, रानीखेत समेत पर्यटन शहरों में कुमाऊं मंडल विकास निगम की ओर से देशी-विदेशी पर्यटकों को उत्तराखंड के प्रसिद्ध स्थलों की जानकारी दी जाती है। उनके पास पर्यटन स्थलों का एक मानचित्र होता है। जिसमें आसपास के सभी पर्यटन स्थलों की विशेषता के बारे में दर्शाया जाता है। पर्यटक इस मानचित्र के आधार पर क्षेत्र भ्रमण करते हैं। लेकिन मानचित्र में पांडवखोली का नाम दर्ज नहीं होने से पर्यटक और श्रद्धालु रानीखेत से सीधे अल्मोड़ा या कौसानी निकल जाते हैं।
पांडवखोली में पर्यटन विभाग ने रैन बसेरा और ध्यान मठ केंद्र बनाए हैं। इसे पथ भ्रमण संघ को हस्तांतरित कर दिया गया है। पर्यटन विकास के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
- टीएस चम्याल, सहायक पर्यटन अधिकारी, रानीखेत।
पथ भ्रमण संघ अध्यक्ष हरीश शाह ने कहा कि वे लोग कुकूछीना से रोपवे लगाने की मांग लंबे समय से कर रहे हैं। साथ ही कुकूछीना से पांडवखोली तक साढ़े तीन किमी चढ़ाई का जो रास्ता है वह काफी पथरीला और खतरनाक है। जिससे लोग यहां आने से कतराते हैं।


Source: http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20140129a_004115022&ileft=227&itop=230&zoomRatio=136&AN=20140129a_004115022

अन्नू रावत (9871264699)

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Lansdowne is the nearest hill station from Delhi and can be reached from Delhi by either road or train. The nearest railway station is Kotdwara at a distance of 41 km and about 250 km from Delhi thus making it a perfect weekend getaway during whole year.

The relaxing ambience and big terraces at rooftops at Lansdowne Hotels provides you an enchanting experience in the lap of nature where you can set yourself free from the maddening rush of the cities.


Bhishma Kukreti

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             Manaskhand: A Must Book for Every Uttarakhandi

Review of book Manaskhand (Kumaon Itihas, Dharm, Sanskriti, Vastushilp evam Parytan) by Hema Uniyal

                 Reviewer: Bhishma Kukreti

         ‘Manaskhand ‘is third book of eminent Uttarakhand cultural, architectural structure expert Dr. Hema Uniyal. Before this publication well-read scholar Hema published Kumaon ke Prasidh Mandir (2005) and Kedarkhand (2011). Her all the books got appreciations from academicians and general readers with same enthusiasm and zeal.
         Hema Uniyal wrote the book after her visit to all major temples of Kumaon. The present book ‘Manaskhand’ takes readers to whole of Kumaon in terms of important temples with archeological structure with tour perspective too. The reader can get historical glimpses and historical-cultural aspects of Kumaon from ‘Manaskhand’. Hema Uniyal has been careful enough to offer today’s pattern of rituals to the reader about each temple she visited and described in this book. One of the remarkable researchers of Uttarakhand Dr Uniyal presents knowledge of more than one thousand temples of Kumaon in this volume.
            Before, Kumaon, Kurmachal became poplar names for east Uttarakhand, the region was called Manaskhand.
 The book has following chapters those provide the insight of Manaskhan-
1-Manaskhand ka Pauranik Avlokan or Review of Epic Period of Kumaon
2-Janpad Nainital ke Pramukh Mandir va Darshniya Sthal or Important Temples of Nainital and tourist places
3- Janpad Udham Singh Nagar ke Pramukh Mandir va Darshniya Sthal or Important Temples of Udham Singh Nagar Nainital and tourist places
4- Janpad Almora ke Pramukh Mandir va Darshniya Sthal or Important Temples of Almora and tourist places
5-- Janpad Bageshwar ke Pramukh Mandir va Darshniya Sthal or Important Temples of Bageshwar and tourist places
6- Janpad Pithoragarh ke Pramukh Mandir va Darshniya Sthal or Important Temples of  Pithoragarh and tourist places
7-- Janpad Champawat ke Pramukh Mandir va Darshniya Sthal or Important Temples of Champawat and tourist places
  Dr Hema Uniyal provides the folklore aspects, historical brief and its importance in history; architectural concise of each major temple in each district of Kumaon. She also provides the ritual performance system or custom and present priests of the temple. Dr Uniyal provides for all important knowledge about tour value as reaching and lodging facilities in the region. The tourist aimed information compels the readers to think for visiting the region.
         The biggest draw back in other books related to temples of Kumaon is that readers are confused by reading complex historian’s theories and architectural terms of temple. However, Hema Uniyal has been successful in using simple and easy to understand phrases that book becomes very interesting to finish from first page to the last page. The temple photographs and her date wise visit detailing of to each temple make the book more reliable. 
 All praises are for D. Hema Uniyal for offering such knowledgeable informative volume.
 The book is important for cultural, history research scholars and common people. This reviewer recommends every Uttarakhandi should read ‘Manaskhand’. 

                            Book Details
Manaskhand (Kumaon Itihas, Dharm, Sanskriti, Vastushilp evam Parytan)
Pages-512
Writer: Hema Uniyal
                  uniyalhema@gmail.com

Year of Publication: 2014
Publisher: Uttara Books
B4/310 C Keshav Puram,
New Delhi -110035
Phone: 01127103051
Price- Rs 1100/-

Copyright@ Bhishma Kukreti 18/62014
Email Id bckukreti@gmail.com

Review of Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Nainital Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Almora Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Champawat Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Ranikhet Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Bageshwar Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Dwarhat Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Didihat Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Ramganga valley Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Kaliganga valley Kumaon, Uttarakhand, South Asia; Book on Culture, Religion, Architect, Tourism of Mansarovar road region Kumaon, Uttarakhand, South Asia;   
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कई गाँवों की प्यास बुझाता है मोइला टॉप का यह भेडाल ताल! (मनोज इष्टवाल) (24-07-2017) दिखने में मुश्किल से 20 से 30 मीटर का यह ताल जोकि लगभग 2 किमी. फैले बुधेर गुफा व मोइला टॉप के लगभग बीचों बीच केन्द्रित है.जौनसार बावर के लोहखंडी से 3.50 किमी. दूरी पर बुधेर वन बिश्राम गृह तक आप अपने निजी वाहन से पहुंचकर देवदार के घने जंगल को पार कर जब 2.50 किमी. दूरी पैदल पार कर जब आप इस बुग्याल में पहुँचते हैं तो दूर दूर तक फैली मखमली बुग्याल ऐसे लगती है जैसे बाँहें फैलाकर कह रही हो. आ मेरे आगोश में समा जा जाने कितने दिनों से तेरा ही आने का इन्तजार कर रही थी मैं! यूँ तो बुधेर गुफा और मोइला टॉप तक का मैं दो बार पूर्व में भी भ्रमण कर चुका हूँ. पहली बार मेरे साथ देहरादून डिस्कवर के सम्पादक दिनेश कंडवाल, शंखनाद के सम्पादक शिब प्रसाद सती व समाजसेवी सुमन डोभाल थी. दुबारा जब आये तब दिल्ली दूरदर्शन के डिप्टी डायरेक्टर प्रोग्राम मणिकांत ठाकुर, लोकसभा के सुभाष त्रेहान व पलायन एक चिंतन के प्रेणता रतन सिंह असवाल थे. जबकि इस बार जी न्यूज़ के खोजी पत्रकार संदीप गुसाईं व कैमरामैन गोबिंद सिंह हैं. विगत बार मैंने सिर्फ बुधेर गुफा, मोइला टॉप व परियों के तिलिस्म से घिरे इस क्षेत्र पर अपनी खोजबीन की थी लेकिन इस बार उस उपेक्षित ताल पर नजर पड़ी जिसे ग्रामीणों ने या फिर बन विभाग ने कभी कोई तबज्जो नहीं दी. यह ताल दिखने का जितना छोटा है उतनी ही इसकी खूबियाँ हैं. इसे मैंने ही भेडाल ताल का नाम दिया है उसका कारण यह है कि यहाँ गर्मियों में हजारों की संख्यां में भेड़ बकरियां चुगने के लिए आती है व यहाँ इन्हें चुगाने वाले भेडालों के डेरे होते हैं. एक मात्र इसी तालाब से जहाँ भेड़ बकरियां अपनी प्यास बुझाते हैं वहीँ स्रोतों से निकलकर यही पानी भेडालों की दिनचर्या का आम हिस्सा है. बर्षा ऋतु में इस बुग्याल में दर्जनों गाँव के गाय/ बैल घोड़े खच्चर आते हैं और इन्हीं बुग्यालों में निश्चिन्त होकर अपनी दिनचर्या में बुग्यालों की कीमती पौष्टिक दूब चुगकर तथा रात को खुले आसमान में रात्री जुगारी में गुजारते हैं. लेकिन उपेक्षित इस ताल पर कभी भी किसी पर्यटक या अधिकारी की नजर नहीं गयी. जबकि इसी ताल ने खत कांड़ोई व खत मसक के एक ऐसे अघोषित स्वाभिमान का इतिहास लिख डाला जिसकी हारुल में आज भी कांड़ोई का सितलू जीवित है. ज्ञात हो कि भेड़ बकरी पालन हमेशा ही जौनसार बावर की आअर्थिकि का मजबूत स्तम्भ रहा है ऐसे में सितलू की हारुल भी उसी से जुडी एक गाथा है. चूंकि मोइला बुग्याल रजाणु गाँव की सरहद का हिस्सा है अत: पूर्व में इस वुग्याल पर रजाणु के लोग कोदो (मंडूवे) की खेती किया करते थे. कहते हैं कि कांड़ोई के सितलू की भेड़ें यहाँ सारा मंडुवा चुग गयी जिस पर रजाणु के व्यक्ति ने आपति दर्ज की लेकिन सितलू नहीं माना अंत में यह घटना युद्ध में बदल गयी और सितलू नामक भेडाल ने रजाणु के व्यक्ति की अपने डांगरे गर्दन काट दी और यह उन्माद इतना बढ़ा कि बाद में मसक खत्त के लोगों ने कांडोई जाकर सितलू के साथ कई और लोगों की गर्दन काट डाली बदले में फिर यही कांडोई के लोगों ने की. अतीत का काला अध्याय भले ही पूर्व में वीरता से जोड़कर देखा जाता रहा हो लेकिन सभ्य समाज के लोग अब काफी कुछ सीख गए हैं. रजाणु केमहावीर शर्मा बताते हैं कि अब इस थात (बुग्याल) में रजाणु, मसक, संताड, हरताड, बिन्सोन, गोर्छा, कुनवा, पिंगवा, ठारठा, कांड़ोई इत्यादि के सभी जानवर आते हैं. बरसात में ज्यादातर गाँव के लोग अपने पालतू जानवरों को यहीं छोड़ जाते हैं ताकि वे यहाँ की पौष्टिक घास के साथ हृष्ट पुष्ट हो सकें. महावीर बताते हैं कि इसी ताल से जिसका कोई नाम नहीं है अधिकतर गाँवों में पानी पहुँचता है व साल भर इसी ताल का जल सबकी प्यास बुझाता है. भेडाल सितलू की हारुल से प्रसिद्ध यह ताल रजानु गाँव की सरहद में पड़ता है लेकिन आजतक इसका कोई नामकरण नहीं था. मैं अपने शोधी स्वभाव के साथ इसे भेदालों की दुनिया से जोड़कर इसका नाम भेडाल ताल दे रहा हूँ. उम्मीद है आप सबको पसंद आएगा. इस बार जी हिन्दुस्तान की यह टीम परियों के तिलिस्म व बुधेर गुफा के आदि न अंत पर संदीप गुसाईं की स्पेशल रिपोर्ट लेकर इस क्षेत्र को हाई लाइट कर रहा है उम्मीद है आप इस जगाहाने को जरुर उत्सुक होंगे.
http://himalayandiscover.com/

Bhishma Kukreti

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[b]All Season Tourism Potentiality in Uttarakhand

By: Ashwini Gaur
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उत्तराखंड का बारामासी पर्यटन पर यक्ष प्रश्न –

देवभूमि उत्तराखंड देश ही ना दुनिया मा अपडि अलग पछांण रखदु।
एक तरफ नैसर्गिक सौन्दर्य, गैरी-गैरी घाटी केदारखंड त हैकि तरफा सीधी लंबी श्रृंखला कु कूर्मांचल।
पूरू अस्कोट बटि आराकोट तक पर्यटन घुमक्कडी की अथाह संभावना।
कखि तीर्थ स्थल, योग नगरी, गोल्जू माराज, बैजनाथ, त हैकि तरफा हरियाली अर वन्य जीव संसाधनों की असीम दुन्यां।
हर साल लाखों लोग पर्यटक घूमण पहाड़ औंदा, अर यखा भला मयादार सीदा मनख्यूं, मनख्यात देखी नमन भी कर्दा देवभूमि तै।
पर्यटन मा चार धाम बद्रीविशाल, केदारनाथ, गंगोत्री अर यमुनोत्री च त सिख लोखूं हेमकुंड साहिब,देरादूण गुरुराम राय दरबार जन बड़ा मठ छिन जख हर साल कै तीर्थयात्री औंदन।
एशिया कु पैलु नेशनल पार्क जिम कार्बेट पार्क नैनीताल हो, या राजाजी नेशनल पार्क हरिद्वार देरादूण आखिर पर्यटकों तै खींची ही ल्योंदा उत्तराखंड।
कांचुला खर्क की बात हो या विश्व विरासत फूलों की घाटी, ईं भूमि तै देवभूमि बणौण मा प्रकृति कि क्वे कमी कसर नी छोडी।
एशिया कु सबसे ऊंचाई पर थर्प्यूं मंदिर भगवान तुंगनाथ जी का बुंग्याल अर रौंतेलि डांडी कांठयूं बटि जब सैलानी धरती कु श्रृंगार देखदा त स्वर्ग की कल्पना मन मा अमिट हवे जांदि।
पंच बद्री, पंच केदार दगडि बावन गढ की या धरती पंच भै पांडवों अर वीर भडों की साक्षात गवै देंदि
पातालभुवनेश्वरी कु रहस्य, बैजनाथ कु इतिहास,
पंवार अर चंद वंश का राजौ विरासत, दगडि धार खाळ मा रोचक लोककथा, आंणा-भ्वींणा से खूब भर्यू पहाड़।
त्रियुगीनारायण जी की अखंड धुनी, ऊषा अनिरूद्ध परिणय स्थली ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ की काष्ठ कला नक्काशी हमारी अखंड लोक विरासत छिन।
लाखामंडल का मंदिर, अर जीवंत लाक्षागृह प्रमाण, कालसी का अशोक शिलालेख, मलेथा का सैरा,
देवलगढ का स्तूप,
क्या क्या विरासत नि छिन यख!
कैप्टन यंग की बसांई मसूरी हो या पौडी, लैंसडौन, खिर्सू, चोपता, जखोली,ग्वालदम, हर्षिल, मोरी, रामनगर, कौसानी, हर जगह असीम संभावना छिन पर्यटन की।
महासू चालदा देवता हनोल, आराकोट, लखवाड, धनोल्टी, जोशीमठ हर जगा पर्यटन मा विविधता---'डायवर्सिटि' दिखेंदि।
रंवाई जोनसार-जौनपुर की संस्कृति, नागपुर कु पांडव नृत्य, जौनसारी हारुल, तांदी,चौंफला, हर दृष्टि बटि हम भौत समृद्ध लोग छा।
पर्यावरण मा चिपको जन आंदोलन हो या पाणी बचाओ आंदोलन हमारु प्रतिनिधित्व च कर्यू हर क्षेत्र मा।
ईं सांस्कृतिक-सामाजिक, प्राकृतिक, धार्मिक, धरती मा पर्यटन की त, भौत बड़ी संभावना छिन।
टीरी डैम जन परियोजना भी त पर्यटन का कै द्वार खोली सकदि।
बीस साल का ये उत्तराखंड मा ना त सांस्कृतिक विविधता तै पर्यटन कु आधार बणांई गै, ना पारंपरिक धरोहरों तै।
पारंपरिक धरोहरों मा होम स्टे जन कारगर योजना पर बडु काम हवे सकदु, कखि शुरुआत भी होंणी च।
हर गौं मुलक मा अपडि खास पछांण की नक्काशी मकान तिबार रिंगाल ढुंग्गा पर दिखेंदि ये तै हम सरकार दगडि मिलितै पर्यटन आधार बणै सकदा,
उदाहरण जन आप चंडीगढ़ मा नेक चंद सैनी का डिजाइन कर्या राॅक गाॅर्डन तै देखा, कखि घट्ट च त कखि मूर्ति डिजाइन साधारण वेस्ट मेटेरियल से करीं। लोग खूब पसंद भी कर्दा यन अलग चीजों तै।
त हमारी भी परंपरागत मकान तिबार, डंडयाली धुर्पळि आकर्षक लुक दगडि गैस्ट हाऊस का तौर पर विकसित कर्ये सकेंदि।
चारधाम यात्रा सीजनल च,यानी हम बारामासी पर्यटन पर चर्चा करुन, पहल करुन, ये वास्ता ग्रामसभा स्तर पर सरकार प्रोत्साहित करु, गौं का मठ मंदिर सिमेंटिकरण की बजाय परंपरागत स्वरूप मा ही विकसित किए जौन। गौं का बजट मा विसेस ध्यान पर्यटन की तरफां दिए जो।
धारा पंध्येरा पाणी छलबल बगदू रौ, स्थानीय उत्पाद कोदू झंगोरु बारनाज तै हम अपडा होटल-मोटल, रेस्ट्रां मा परोसुन, जब हम गुजरात मा सांभर डोसा, महाराष्ट्र मा इडली, खै सकदा त उत्तराखंड मा पर्यटन दगडि हम अपडा पहाड़ी उत्पादों तै प्रोत्साहन किलै नि दी सकदा?
बारामासी पर्यटन बढोण का खातिर सडक ब्यवस्था भी बारामासी मजबूत कन पडली, सडक का अगल बगल भरपूर हैर्याळी पोजौण पडली।
मसूरी मा ही भौत सारा लोग पर्यटक औंदा अर सैर का परदूषण से बचण का वास्ता जब डाक्टर शुद्ध पाणी शुद्ध हवा की बात कर्दा त भौत सारा लोग गरम्यूं भम्माण मा मसूरी ही रै जांदन द्वी तीन मैना।
हमारी सरकार प्रतिनिधियों अगर मजबूत इरादा ह्वौन त तस्वीर बदलि जौ?
पहाड़ बिजली पैदा कन अर डाळयूं चिरान की ही सामर्थ्य नि रखदा यख बारामासी फल पैदा होंदा, अनार, आडू, कीवी, माल्टा, संतरा, कटहल, लीची, सेब , आंवला, क्या पर्यटन दगडि हम अपडा उत्पाद नि जोडी सकदा?
बुरांश, टेमरु, घिघोरु, काफल, जन लकदक बण क्या पर्यटन तै न्यूती नि सकदा?
नैसर्गिक चाल-खाल अर छोटा बड़ा ताल, जन बधाणीताल, देवरियाताल आंछरी ताल क्या चारधाम बै इतर बारामासी पर्यटन नि ठेलि सकदा?
पहाड़ का गौं गौं मा पर्यटन की गैरी गैरी संभावना छिन, जै खातिर सबसे पैलि हमारी सरकारों तै अस्सी फीसदी भूभाग का पहाड़ कु बजट बढायूं चैंदु जबकि यूँ संभावनाओं बै ध्यान हटे जनप्रतिनिधि सरकार सब लोग मैदानी भाग की तरफा भाजणां।
जब पहाड़ मा ही मसूरी नैनीताल
पर्यटन कु भौत बडु विकल्प हवे सकदु, त जोशीमठ, ऊखीमठ, जखोली, बसुकेदार, खिर्सू, मक्कूमठ, देवाल, पोखरी, चिरबटिया, जन कै विकल्प किलै खडा नि हवे सकदा ?
ज्वान होंदा उत्तराखंड मा जरूर औंण वौळी पीढ़ी वोट मंगदरा नेताओं तै पूछली कि बिजली- पाणी, माटू-बौंण, बिकोण का अलावा बारामासी पर्यटन की तरफा किलै नि सोची?
हमतै पर्यटन अर पर्यावरण द्वीयूं तै बरौबर मिलेतै विकसित कनै तरफा काम कर्यू चैंद किलैकि विकास दगडि कखि हम रूखा सूखा सैर ही ना खडु करौन बलकन हर्या-भर्या पर्यटन की सकारात्मक दिशा मा काम करुन।
--@-अश्विनी गौड 'दानकोट रूद्रप्रयाग------



 

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