Author Topic: Untracked Tourist Spot In Uttarakhand - अविदित पर्यटक स्थल  (Read 53641 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,904
  • Karma: +76/-0
Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #80 on: September 05, 2008, 04:13:14 PM »


I have heard about this place but this is not popularly known. Tourism Dept of UK must look into this aspect.
लखुडियार



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,904
  • Karma: +76/-0
Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #81 on: September 05, 2008, 04:15:26 PM »

Bhainsori


Bhainsori is a small settlement in Almora District of Uttaranchal. It is situated near the state highway connecting Almora and Takula. Binsar, Manruriya, and Hawalbagh are the nearby places.
Some of the nearest tourist attractions are Govind Vallabh Pant Public Museum, Tripura Sundari Devi Temple and Siddha Narsimha Temple.

Regular bus services connect Bainsori with Almora. The nearest airport is Pant Nagar Airport. Kathgodam Railway Station at Kathgodam serves this area.

हेम पन्त

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 4,326
  • Karma: +44/-1
श्रोत - http://in.jagran.yahoo.com/news/travel/general/16_36_343/

गढवाल के अधिकांश सौंदर्य स्थल दुर्गम पर्वतों में स्थित हैं जहां पहुंचना सबके लिए आसान नहीं है। यही वजह है कि प्रकृति प्रेमी पर्यटक इन जगहों पर पहुंच नहीं पाते हैं। लेकिन ऐसे भी अनेक पर्यटक स्थल हैं जहां सभी प्राकृतिक विषमता और दुरुहता खत्म हो जाती है। वहां पहुंचना सहज और सुगम है। यही कारण है कि इन सुविधापूर्ण प्राकृतिक स्थलों पर ज्यादा पर्यटक पहुंचते हैं। प्रकृति की एक ऐसा ही एक खूबसूरत उपत्यका है हरसिल।

   उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग के मध्य स्थित हरसिल समुद्री सतह से 7860 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। हरसिल उत्तरकाशी से 73 किलोमीटर आगे और गंगोत्री से 25 किलोमीटर पीछे सघन हरियाली से आच्छादित है। घाटी के सीने पर भागीरथी का शांत और अविरल प्रवाह हर किसी को आनंदित करता है। पूरी घाटी में नदी-नालों और जल प्रपातों की भरमार है। जहां देखिए दूधिया जल धाराएं इस घाटी का मौन तोडने में डटी हैं। नदी झरनों के सौंदर्य के साथ-साथ इस घाटी के सघन देवदार के जंगल मन को मोहते हैं। जहां निगाह डालिए इन पेडों का जमघट लगा है। यहां पहुंचकर पर्यटक इन पेडों की छांव तले अपनी थकान को मिटाता है। जंगलों से थोडा ऊपर निगाह पडते ही आंखें खुली की खुली रह जाती है। हिमाच्छादित पर्वतों का आकर्षण तो कहने ही क्या। ढलानों पर फैले ग्लेशियरों की छटा तो दिलकश है ही।

   इस स्थान की खूबसूरती का जादू अपने जमाने की सुपरहिट फिल्म राम तेरी गंगा मैली में देखा जा सकता है। बॉलीवुड के सबसे बडे शोमैन रहे राजकपूर एक बार जब गंगोत्री घूमने आए थे तो हरसिल का जादुई आकर्षण उन्हें ऐसा भाया कि उन्होंने यहां की वादियों में फिल्म ही बना डाली-राम तेरी गंगा मैली। इस फिल्म में हरसिल की वादियों का जिस सजीवता से दिखाया गया है वो देखते ही बनता है। यहीं के एक झरने में फिल्म की नायिका मंदाकिनी को नहाते हुए दिखाया गया है। तब से इस झरने का नाम मंदाकिनी फॉल है पड गया। इस घाटी से इतिहास के रोचक पहलू भी जुडे हैं। एक गोरे साहब थे फेडरिक विल्सन जो ईस्ट इंडिया कंपनी में कर्मचारी थे। वह थे तो इंग्लैंड वासी लेकिन एक बार जब वह मसूरी घूमने आए तो हरसिल की वादियों में पहुंच गए। उन्हें यह जगह इतनी भायी कि उन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड दी और यहीं बसने का मन बना लिया। स्थानीय लोगों के साथ वह जल्द ही घुल-मिल गए और गढवाली बोली भी सीख ली। उन्होंने अपने रहने के लिए यहां एक बंगला भी बनाया। नजदीक के मुखबा गांव के एक लडकी से उन्होंने शादी भी कर डाली। विल्सन ने यहां इंग्लैंड से सेब के पौधे मंगाकर लगाए जो खूब फले-फूले। आज भी यहां सेब की एक प्रजाति विल्सन के नाम से प्रसिद्ध है।

   ऋषिकेश से हरसिल की लंबी यात्रा के बाद हरसिल की वादियों का बसेरा किसी के लिए भी अविस्मरणीय यादगार बन जाता है। भोजपत्र के पेड और देवदार के खूबसूरत जंगलों की तलहटी में बसे हरसिल की सुंदरता पर बगल में बहती भागीरथी और आसपास के झरने चार चांद लगा देते हैं। गंगोत्री जाने वाले ज्यादातर तीर्थ यात्री हरसिल की इस खूबसूरती का लुत्फ उठाने के लिए यहां रुकते हैं। अप्रैल से अक्टूबर तक हरसिल आना आसान है लेकिन बर्फबारी के चलते नवंबर से मार्च तक यहां इक्के-दुक्के सैलानी ही पहुंच पाते हैं। हरसिल की वादियों का सौंदर्य इन्हीं महीनों में खिलता है। जब यहां की पहाडियां और पेड बर्फ से लकदक रहते हैं, गोमुख से निकलने वाली भागीरथी का शांत स्वभाव यहां देखने लायक है। यहां से कुछ ही दूरी पर डोडीताल है इस ताल में रंगीन मछलियां ट्राडा भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। इन ट्राडा मछलियों को लाने का श्रेय भी विल्सन को ही जाता है। बगोरी, घराली, मुखबा, झाला और पुराली गांव इस इलाके की समृद्ध संस्कृति और इतिहास को समेटे हैं। हरसिल देश की सुरक्षा के नाम पर खींची गई इनर लाइन में रखा गया है जहां विदेशी पर्यटकों के ठहरने पर प्रतिबंध है। विदेशी पर्यटक हरसिल होकर गंगोत्री, गोमुख और तपोवन सहित हिमालय की चोटियो में तो जा सकते हैं लेकिन हरसिल में नहीं ठहर सकते हैं। हरसिल से सात किलोमीटर की दूरी पर सात तालों का दृश्य विस्मयकारी है। इन्हें साताल कहा जाता है। हिमालय की गोद मे एक श्रृखंला पर पंक्तिबद्ध फैली इन झीलों के दमकते दर्पण में पर्वत, आसमान और बादलों की परछाइयां कंपकपाती सी दिखती हैं। ये झील 9000 फीट की ऊंचाई पर फैली हैं। इन झीलों तक पहुंचने के रास्ते मे प्रकृति का आप नया ही रूप देख सकते है। यहां पहुंचकर आप प्रकृति का संगीत सुनते हुए झील के विस्तृत सुनहरे किनारों पर घूम सकते हैं।

जारी है...

हेम पन्त

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 4,326
  • Karma: +44/-1
हरसिल कैसे पहुंचे

हरसिल की खूबसूरत वादियों तक पहुंचने के लिए सैलानियों को सबसे पहले ऋषिकेश पहुंचना होता है। ऋषिकेश देश के हर कोने से रेल और बस मार्ग से जुडा है। ऋषिकेश पहुंचने के बाद आप बस या टैक्सी द्वारा 218 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद यहां पहुंच सकते हैं।

   अगर आप हवाई मार्ग से आना चाहें तो नजदीकी हवाईअड्डा जौलीग्रांट है। जौलीग्रांट से बस या टैक्सी द्वारा 235 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यहां पहुंचा जा सकता है

   समय और सीजन

   यूं तो बरसात के बाद जब प्रकृति अपने नये रूप में खिली होती है तब यहां का लुत्फ उठाया जा सकता है। लेकिन नवंबर-दिसंबर के महीने में जब यहां बर्फ की चादर जमी होती है तो यहां का सौंदर्य और भी खिल उठता है। बर्फबारी के शौकीन इन दिनों यहां पहुंचते हैं।

   पर्यटकों को यात्रा के दौरान इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि समय और जो भी हो, हरदम गरम कपडे साथ होने चाहिए। यहां पर खाने-पीने के लिए साफ और सस्ते होटल आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं जो आपके बजट के अनुरूप होते हैं।

   हरसिल में ठहरने के लिए लोकनिर्माण विभाग का एक बंगला, पर्यटक आवास गृह और स्थानीय निजी होटल हैं। यहां खाने-पीने की पर्याप्त सुविधाएं हैं। गंगोत्री जाने वाले यात्री कुछ देर यहां रुककर अपनी थकान मिटाते हैं और हरसिल के सौंदर्य का लुत्फ लेते हैं।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,904
  • Karma: +76/-0
Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #84 on: December 09, 2008, 12:04:53 PM »

Kalpavriksha
A favorite spots for sages who come here to meditate, following the precedent of Arghya who performed austerities and created the celebrated nymph, Urvashi, here, and the irascible Durvasha who meditated under the wish fulfilling tree, Kalpavriksha, Pilgrims pray at the small rock temple at a height of 2,134 mts. before the matted tresses of Shiva enshrined in rock in the sanctum sanctorum. The sanctum is preceded by a natural cave passage. Surrounded by thick forests and terraced fields in the Urgam valley, the temple is reached following a 10 km. long trek.

हेम पन्त

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 4,326
  • Karma: +44/-1
Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #85 on: February 02, 2009, 11:12:06 AM »
घनसाली (टिहरी गढ़वाल)। भिलंगना ब्लाक के उपेक्षित पर्यटक स्थल सरकार के पर्यटन विकास के तमाम दावों की पोल खोल रहे हैं।

जिले के सबसे बड़े ब्लाक भिलंगना में सहस्त्रताल, महासरताल, पवाली कांठा, खतलिंग, विश्वनाथ, कुशकल्याणी, जगदीशिला आदि पर्यटन स्थल नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण होने के बावजूद प्रचार-प्रसार व देखरेख के अभाव में उपेक्षित है। इन पर्यटक स्थलों के प्रचार-प्रसार के लिए क्षेत्रीय जनता द्वारा यहां समय-समय पर मेलों का आयोजन करने के साथ ही पैदल यात्रा भी की जाती है, लेकिन यह प्रयास नाकाफी है। इन पर्यटक स्थलों तक पहुंचने को लंबा पैदल सफर तय करना पड़ता है। यहां पर धार्मिक व साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाएं है। यदि इन पर्यटक स्थलों का नियोजित ढंग से विकास किया जाए तो भविष्य में यहां पर पर्यटकों की आमद बढ़ने के साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेगा। डा. एसडी जोशी ने अपनी किताब के माध्यम इन स्थलों को प्रचारित करने का प्रयास किया है।

umeshbani

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 137
  • Karma: +3/-0
Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #86 on: February 02, 2009, 02:52:42 PM »
***********पर्यटक स्थल सरकार के पर्यटन विकास के तमाम दावों की पोल खोल रहे हैं। *********
बिल्कुल सही लिखा पन्त जी आपने हिमांचल और उत्तरांचल में यही सबसे बड़ा अन्तर है वहां बहुत पर्यटक आते है और एक झरने  को भी साईट  सीन  बना दिया है और उसे देखने खूब पर्यटक  आ रहे हैं और उत्तरांचल मे ........
सरकार पता नही ...... कर रही है हिमांचल मे एक चाय वाले का भी रोजगार बहुत अच्छा चल रहा है .....
कहते है palyaan rokenge मगर kese .............??????????

umeshbani

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 137
  • Karma: +3/-0
Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #87 on: February 02, 2009, 02:53:19 PM »
***********पर्यटक स्थल सरकार के पर्यटन विकास के तमाम दावों की पोल खोल रहे हैं। *********
बिल्कुल सही लिखा पन्त जी आपने हिमांचल और उत्तरांचल में यही सबसे बड़ा अन्तर है वहां बहुत पर्यटक आते है और एक झरने  को भी साईट  सीन  बना दिया है और उसे देखने खूब पर्यटक  आ रहे हैं और उत्तरांचल मे ........
सरकार पता नही ...... कर रही है हिमांचल मे एक चाय वाले का भी रोजगार बहुत अच्छा चल रहा है .....
कहते है palyaan rokenge मगर kese .............?????????? जो ek bar NH से jata है पता नही कब तक yaad rakhata  है delhi से haldwani तक के सफर मे कही puliya tuti है to kahni रोड ka बहुत बुरा haal है ..... जाम का तो कोई पता नही कभी विलासपुर तो कभी ....???
जब हम हल्द्वानी तक ही सही सलामत पहुंचे तो आगे का सफर ............   

पंकज सिंह महर

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 7,401
  • Karma: +83/-0
विमाण्डेश्वर, द्वाराहाट (कुमाऊं की काशी)



यह द्वाराहाट से 10 किलोमीटर की दूरी पर है। यह मंदिर नंदिनी, सुरभि और सरस्वती (जमीन के नीचे) नदियों के संगम पर स्थित है। कथानक के अनुसार भगवान शिव एक शादी के सिलसिले में जाते हुए धूनी रमाने के लिए यहां पर रात भर रुके थे। यह जगह कुमायूं क्षेत्र का काशी कहा जाता है।

पंकज सिंह महर

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 7,401
  • Karma: +83/-0


कुकूछीनाः एक साल के अज्ञात के दौरान जब पांडव अपनी पहचान छुपाने के लिए एक जगह से दूसरी जगह की खाक छान रहे थे, कौरव इस क्षेत्र की पहाड़ियों में उनका पीछा कर रहे थे। कहा जाता है कि कुकूछीना अंतिम स्थल था जहां तक कौरव पांडवों को खोजने के लिए आए थे। इसके बाद वे वापस लौट गए थे। इसलिए इस जगह का नाम कौरावछीना रखा गया जिसे बाद में कुकूछीना कहा गया। यहां से 5 किलोमीटर पर पांण्डुखोली है। माना जाता है कि तड़ागताल का निर्माण पांडवों द्वारा कराया गया था। यह महज 3 किलोमीटर पर है। इन दोनों जगहों पर सिर्फ पैदल पहुंचा जा सकता है।

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22