Poll

क्या पंचायतों में चुनी गयी महिला प्रतिनिधि पुरुषों की अपेक्षा अधिक विकास करवा पायेंगी?

yes
10 (47.6%)
No
7 (33.3%)
Can't Say
4 (19%)

Total Members Voted: 21

Voting closes: February 07, 2106, 11:58:15 AM

Author Topic: Panchayat Elections In Uttarakhand - उत्तराखंड मे पंचायत चुनाव  (Read 23542 times)

Risky Pathak

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Humaare whaa to aaj hi hai....


पंकज सिंह महर

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देहरादून, जागरण ब्यूरो: त्रिस्तरीय पंचायतों में पहले चरण का चुनाव कराने को आयोग ने कमर कस ली है। चूंकि सोमवार को पहले चरण में सभी जिलों के दूरस्थ क्षेत्रों को रखा गया है, इसलिए पहले ही इन क्षेत्रों के लिए पोलिंग पार्टियां रवाना हो चुकी हैं। राज्य निर्वाचन आयुक्त बीसी चंदोला ने बताया कि पहले चरण में बारह जिलों में 29 ब्लाकों में चुनाव हो रहे हैं। ये चुनाव कुल 2499 मतदान केंद्रों तथा 2872 मतदेय स्थलों पर होंगे। जैसे देहरादून जिले के सबसे दूरस्थ ब्लाकों कालसी के 112 मतदान केंद्रों तथा चकराता के 115 मतदान केंद्रों मतदान होंगे। पंचायतों के पहले चरण के लिए 16 आब्जर्बर निगरानी कार्य में जुटे हैं। श्री चंदोला ने बताया कि पहले चरण में 2343 ग्राम पंचायतों में ग्राम पंचायतों के वार्ड सदस्यों, ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत सदस्यों को चुनने के लिए मतदान होगा। उन्होंने बताया कि मतदान निकट आने के साथ बरसात में आई कमी से मतदान कार्य में जुटे अधिकारियों तथा कार्मिकों ने राहत की सांस ली है। हालांकि अभी कई क्षेत्रों में सड़क मार्गो के अवरुद्ध रहने के कारण मतदान कर्मियों को कई तरह की दिक्कतें भी आ रही हैं।
 

पंकज सिंह महर

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भाजपा हिट और कांग्रेस फिट को बेकरार

देवेंद्र सती, देहरादून त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव भले ही पार्टी सिंबल पर नहीं लड़े जा रहे, पर सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्ष दल कांग्रेस के लिए इन चुनावों के मायने कुछ और ही हैं। एक हिट तो दूसरा खुद को फिट करने को बेकरार है। पंचायत चुनावों की अहमियत इन दोनों दलों के लिए इस वजह से भी ज्यादा है कि लोकतंत्र के इस बुनियादी स्वरूप में श्रेष्ठता साबित होने से उनका आगे का सियासी सफर कुछ हद तक आसान हो जाएगा। सत्तारूढ़ भाजपा पर जहां अपनी दमदार उपस्थिति बरकरार रखने का दबाव है, वहीं कांग्रेस को फिर से अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका हाथ लगा है। राज्य में पिछले दो सालों के दरम्यान हुए नई सरकार के गठन से लेकर लोकसभा और विधानसभा उप चुनावों के साथ ही निकाय चुनावों में भाजपा हर मामले में कांग्रेस पर हावी रही। अगर यूं कहें कि कांग्रेस जीत का स्वाद चखने के लिए तरस रही है, तो शायद गलत नहीं होगा। यही वजह है कि उत्तराखंड में भाजपा- कांग्रेस दोनों पंचायत चुनावों को बेहद गंभीरता से ले रहे हंै। सही मायने में इन चुनावों के सहारे दोनों ही दल अपना जनाधार तलाशने को हाथ-पांव मार रहे हैं। वैसे तो पंचायत चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं लड़े जा रहे हंै, पर इनमें परोक्ष रूप से राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। दिग्गजों के चहेते ही चुनाव मैदान में डटे हैं। ऐसे में दलों के सामने अपना जनाधार साबित करने की भी चुनौती है। अगर वह किला फतह कर लेते हंै तो पार्टी नेतृत्व को जवाब देने से भी बच जाएंगे, अन्यथा कई किंतु-परंतु आगे भी टेंशन देते रहेंगे। राजनीतिक प्रेक्षक बुनियादी लोकतंत्र पर गंभीर होना इसलिए भी जरूरी मान रहे हंै कि क्योंकि यह वह सीढ़ी है, जहां राजनीतिक दलों का असल सियासी धरातल तैयार होता है। फिर भला कौन सा ऐसा दल होगा, जो इनमें अपने चहेतों को फिट नहीं करना चाहेगा। यही वजह है कि सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी कांग्रेस के साथ ही बाकी दलों के लिए भी इन चुनावों के नतीजे संजीवनी से कम नहीं होंगे। अभी जितनी मेहनत करेंगे, आगे का रास्ता उतना ही आसान हो जाएगा चूंकि, आने वाले कुछ महीनों बाद आम चुनाव की रणभेरी बजने वाली है। ऐसे में बुनियादी लोकतंत्र पर जिस पार्टी की पकड़ अच्छी होगी, निसंदेह आम चुनावों में उसे ज्यादा लाभ मिलेगा। इसीलिए राज्य में भाजपा और कांग्रेस इन चुनावों को एक प्रकार से रिहर्सल के रूप में ले रहे हैं। पार्टियों के अंदरूनी हालात पर नजर दौड़ाएं तो भाजपा-कांग्रेस दोनों की राह निष्कंटक नहीं मानी जा सकती। भाजपा में सरकार के मुखिया को बदलने को लेकर जो चिंगारी हालिया दिनों में सुलगी थी, वह सतही तौर पर बुझ जरूर गई, लेकिन ठंडी नहीं पड़ी। पंचायत चुनावों की मुहिम पर इसका असर दिखने लगा है। दूसरी तरफ कांग्रेस को अपनों से लोहा लेना पड़ रहा है। उसके पास भाजपा की नाराजगी को भुनाने का बेहतर मौका जरूर है, लेकिन भीतरी हालात इसमें रोड़ा बन रहे हैं। ऐसे में पंचायत चुनावों में अपनी बादशाहत का जलवा दिखाना दोनों को लिए बड़ी चुनौती से कम नहीं है।
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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My apologies!!!!!!!
 
 
this is really fact and understood that so many womens are eligible for this one in out uttaranchal.. I also appriciated them and their work
 
 
but nowadays this profession become a income source for so many slender minds.
 
this is an example of my village, there is a ticket for a women.. now 5-6 condidates are interesting to participate for the same., and I know about them and their habits, they all are related /inspired from "CHULHE KI RAJNEETI", also their contiburtion is so high for cheaper environment alongwith family members, they do not have manners how to speak others, they feel shy whenever the moment talk to other.  I dont know the sytem How it works, I recd the so many calls from them and their husband/guardian for voting.
 
 
Everybody knows there is min ratio of gram pradhan who's are really honest and straight forward, otherwise it is only for income cause.
 
 
Actually we need a basic things for any field, but it should be always POSITIVE.
 
 
Thanx and regards
Subbu
 
 
 
 
 

--- On Tue, 2/9/08, kavita Negi <kavita.prakashnegi@gmail.com> wrote:

From: kavita Negi <kavita.prakashnegi@gmail.com>
Subject: Re: [PGG-Regd Trust] Gram Pradhan Election in Uttaranchal: Women & development in Uttarakhand..!
To: PauriGarhwal@yahoogroups.com
Date: Tuesday, 2 September, 2008, 1:03 AM


Dear Sir,

 

I would like to put my views towards the question who should be the Gram Pradhan? Now a days there in no discrimination between men and women. Women are successful equal to men along with the household responsibilities. They have achieved a remarkable position in society but at the same time I do accept that this is restricted to cities only. The women in small towns and villages are still under the same pathetic circumstances. I had been to 2 – 3 villages, but honestly speaking I found around 80 -85% of the male inhabitants drinking, sitting idle. Playing cards and beating their wives. So, the only earner and care taker is the women. I am not criticizing anyone and the %  may vary from village to village. Narendra Singh Negi's words from his song " Surya ast, garhwal mast' is actually true to major extent. I had seen that the women are actually working hard, ploughing, going to forests for wood, cattles, fields, earning, taking care of the family and lots of more tasks they are performing. U all are garhwalis, so u must be aware of the hard work that a village lady do. This shows that they are physically and mentally strong than anyone. Despite of all this, they are satisfied with their lives. This gives the prowess of their tolerance. Hats off to the ladies !!! I personally apologize if I am hurting anyone's feeling. Even, I am a Garhwali and I proud to be what I am and the state I belong to. So, we can't neglect her strength and power.  The question is who should be the gram pradhan, it may be a women or men but the person must be capable of taking the responsibilities of development of the village or area where he or she is elected from. I would definitely appreciate if a women becomes the pradhan and let the development be in her own way and strategies. If she is allowed to work independently… . Then that will definitely be an achievement. I don't want a women who is a pradhan just for the public and her works are handled by her husband or some other member.  At last, Men or women is not the issue but the thing is the person who is enough strong and actually think for development of the villagers and village not for his own benefit.

 

Thanks a lot for giving me a chance to highlight my views on this. You all are welcome to give feedbacks or comments at my email id.

 

I again apologize if someone is finds anything wrong that hurts his feelings.

 


On Tue, Sep 2, 2008 at 9:44 AM, K.S. RAWAT <sooni_ksr00@ hotmail.com> wrote:

Dear All:
 
A close look at the social, economic and political aspects of developemnt in the Uttarakhand clearly indicates that women remain a neglected lot. This is partly because they have not been considered an important component in development because of their poor social status. If we examine social attitudes towards owmen in general we find that not only their work in society overlooked but their basic needs and aspiration are also ignored.Traditional norms also devalue women and exclude them from decision-making and place them in a secondary position. As a result development has failed to bring about significant changes in quality of life of the women in the most of the remote areas.
 
Actually, there is very little understanding about the basic needs of women and there is no appropriate strategy to give them an equitable share in the fruits of development.
 
In your view, who should be choosen as GRAM PRADHAN?
 
1) Men
2) Women
3) Men Or Women who works for the village/people
 
Thanks & Regards,
 
K.S.RAWAT
Moderator - PG Group!!
New Delhi/09818007070
http://www.paurigar hwal.com/ women/women. htm

हेम पन्त

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उत्तराखण्ड मे त्रिस्तरीय (ग्राम, ब्लाक, जिला) चुनाव तीन चरणों मे होने हैं. कल १ सितम्बर को पहले चरण के मत डाले जा चुके हैं. 5 व 10 सितम्बर को दूसरे व तीसरे चरण के वोट डाले जायेंगे.चुनाव ड्यूटी में लगे सभी कर्मचारियो को वोट डालने का मौका मिले इसके लिये सभी जिले तीन भागों (block wise) में विभाजित किये गये हैं और उनमें अलग-२ तिथियों को मतदान होगा. लगभग हर गांव में मतदान होना है. इतनी EVM Machines उपलब्ध होना सम्भव नहीं इस लिये मतपत्र पर मुहर लगा कर ही मतदान होगा.

मतों की गिनती 13 सितम्बर को होगी.



i believe today is voting there for gram pradhan.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Uttarakhand ke Chunaav aayog  Ne ajeeb se chunav chihan candidates to diye hai jo wahan ke logo ne dekha hai hai hai .. Jaise “Pine Apple”,    

हेम पन्त

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एक चुनाव चिन्ह "आइस्क्रीम" भी है. दूरस्थ पहाङी गांव में शायद ही किसी ने कभी "आइस्क्रीम" खायी या देखी होगी.

पंकज सिंह महर

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चुनाव आयोग को उत्तराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में चुनाव-चिन्ह आवंटित करने चाहिये, वैसे भी चुनाव चिन्ह वह होना चाहिये, जो हमारे आस-पास हो, जिससे हम और आम मतदाता परिचित हो।
अब दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रो में इन चुनाव चिन्हों को कौन पहचानेगा, दिक्कत तो प्रत्याशी को है कि वह अपने चुनाव चिन्ह को समझाये कैसे------

अन्नानास
ईंट
टोकरी
खजूर का पेड़
आईसक्रीम
कटहल
गैस सिलेंडर

पंकज सिंह महर

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प्रादेशिक डेस्क, हल्द्वानी: त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के पहले चरण में 70 प्रतिशत तक मतदान का आंकलन है। कुछ स्थानों पर देर रात तक मतदान चलने की की सूचना है। पहले चरण में राज्य में बारह जिलों के 29 विकास खंडों में मतदान प्रक्रिया संपन्न हुई। राज्य चुनाव आयोग के अनुसार पहले चरण में कुल मतदान 70 प्रतिशत तक होने का अनुमान है। ऊधमसिंह नगर में तो रात्रि साढ़े आठ बजे तक मतदाताओं की कतार लगी रही। राज्य में मतदान शांतिपूर्ण रहा। कहीं से भी पुनर्मतदान की सूचना नहीं मिली है। नैनीताल जिले में पहले चरण का मतदान धारी, ओखलकांडा और रामगढ़ ब्लाक क्षेत्र में सम्पन्न हुआ। रामगढ़ में लोगों ने बढ़ चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया। यहां 85 प्रतिशत तक वोट पड़ने की सूचना है। धारी और ओखलकांडा में 65 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। ऊधमसिंहनगर के खटीमा, सितारगंज और नानकमत्ता में भी छोटी-मोटी शिकवा-शिकायत को छोड़कर मतदान शांतिपूर्वक सम्पन्न हुआ। खटीमा में कुछ पोलिंग केंद्रो पर फर्जी मतदान की शिकायतें मिलीं। चकरपुर में डेढ़ घंटे विलंब से मतदान शुरू हो सका। खटीमा में 81, सितारगंज और नानकमत्ता में 83 फीसदी तक वोट डाले जाने की खबर है। इस क्षेत्र में मतदान के लिए शाम पांच बजे के बाद भी कई पोलिंग सेंटरों पर मतदाताओं की लंबी लाइनें लगी रहीं। पिथौरागढ़ जिले में प्रथम चरण के चुनाव को लेकर मतदाताओं में गजब का उत्साह नजर आया। यहां डीडीहाट ब्लाक क्षेत्र में सोमवार को सबसे अधिक 73 प्रतिशत तक वोट पड़े। जबकि मुनस्यारी और धारचूला में 71-71 प्रतिशत तक मतदान की खबर है। चंपावत जिले में अंतिम सूचना के मुताबिक यहां 70 प्रतिशत तक लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। अल्मोड़ा जिले में सोमवार को तीन ब्लाक क्षेत्रों में मतदान सम्पन्न हुआ। सल्ट, भिकियासैण और स्याल्दे ब्लाक क्षेत्र में 65 प्रतिशत तक मतदान हुआ। वहीं गढ़वाल में टिहरी जिले के तीन प्रखंडों में 65, रुद्रप्रयाग के ऊखीमठ ब्लाक में 75, चमोली के तीन ब्लाकों में 48, उत्तरकाशी के पुरोला में 69 व मोरी में 81 और पौड़ी जिले के रिखणीखाल ब्लाक में 75 फीसदी मतदान हुआ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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चुनाव आयोग को उत्तराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में चुनाव-चिन्ह आवंटित करने चाहिये, वैसे भी चुनाव चिन्ह वह होना चाहिये, जो हमारे आस-पास हो, जिससे हम और आम मतदाता परिचित हो।
अब दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रो में इन चुनाव चिन्हों को कौन पहचानेगा, दिक्कत तो प्रत्याशी को है कि वह अपने चुनाव चिन्ह को समझाये कैसे------

अन्नानास
ईंट
टोकरी
खजूर का पेड़
आईसक्रीम
कटहल
गैस सिलेंडर

In my opinion, this was a lapse on part of Election Commission of UK but they should now look into this next time.

 

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