Poll

क्या पंचायतों में चुनी गयी महिला प्रतिनिधि पुरुषों की अपेक्षा अधिक विकास करवा पायेंगी?

yes
10 (47.6%)
No
7 (33.3%)
Can't Say
4 (19%)

Total Members Voted: 21

Voting closes: February 07, 2106, 11:58:15 AM

Author Topic: Panchayat Elections In Uttarakhand - उत्तराखंड मे पंचायत चुनाव  (Read 23224 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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My next question... accordingly t u who can perform better men or women ???

Veer Vijay Singh Butola

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आज पहाड़ में समय बदल गया है | आज पहाड़ की नारी में वो नेतृत्व कि वह  क्षमता है जो शहर की नारी में देखि जाती है | अपितु  यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी की वे शहर कि महिलाओ से बेहतर और कुशलता से अपने परिवार और समाज की जिम्मेदारी निभाती हैं  |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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No doubt vijay bhai,

Illiteracy is one of the issues which is hampering their progress.

आज पहाड़ में समय बदल गया है | आज पहाड़ की नारी में वो नेतृत्व कि वह  क्षमता है जो शहर की नारी में देखि जाती है | अपितु  यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी की वे शहर कि महिलाओ से बेहतर और कुशलता से अपने परिवार और समाज की जिम्मेदारी निभाती हैं  |

पंकज सिंह महर

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आज पहाड़ में समय बदल गया है | आज पहाड़ की नारी में वो नेतृत्व कि वह  क्षमता है जो शहर की नारी में देखि जाती है | अपितु  यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी की वे शहर कि महिलाओ से बेहतर और कुशलता से अपने परिवार और समाज की जिम्मेदारी निभाती हैं  |

बुटोला जी, मैं आपसे सहमत तो हूं, लेकिन पूर्णतया नहीं, पहाड़ सड़्क के किनारे बसने वाले गांव नहीं है, पहाड़ वह है, जहां पहुंचने के लिये आज भी १२-१२, १४-१४ कि०मी० पैदल चलना होता है। मेरी पीड़ा उन गांवो की है, जहां प्राथमिक शिक्षा के लिये भी ५ मील पैदल जाना होता है, इस स्थानों में महिला की भूमिका चूल्हा चौका और उसकी हाबीज़ घास-लकड़ी लाना तक ही सीमित है। इन गांवों में भी महिला प्रधान और जिला पंचायत बनेंगी, तो क्या जिलाधिकारी के चपरासी को भी बहुत बड़ा सैप समझने वाली नारियां, उसी जिलाधिकारी के सामने प्लान और नान प्लान के बजट पर बहस कर पायेंगी?
         दूसरे गांव के मर्द से ना बोल पाने वाली ये महिलायें क्या नेतृत्व दे पायेंगी? अपना नाम तक ना लिख पाने वाली यह बेचारी महिलायें, जो अपने अधिकारों के लिये नहीं लड़ पाई, समाज से......वह समाज के अधिकारों के लिये कैसे लडॆ़ पायेंगी?

Risky Pathak

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In 2003, the sign of different candidates were confusing.

i remember how difficult was it for me to tell my amma about the different confusing sign.

Veer Vijay Singh Butola

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महर  जी आपका कहना सर्वथा उचित है | मैंने यह पर आज नै पीढी  की आधुनिक नारी का जिक्र किया है|
आपकी बात सही है की आज भी पहाड़ में शिक्षा के लिए प्रयाप्त विधालय व् साधन नही है किंतु यदि कुछ उदाहरानो  को छोड़ दिया जाए तो भी आज पहाड़ की महिलाये हर क्षेत्र में विकसित है .......

हालाकि मैं पूरा उत्तरांचल तो नही घुमा हूँ पर अपने थोड़े बहुत ज्ञान से मैं यह बात कह रहा हूँ |

आज पहाड़ में समय बदल गया है | आज पहाड़ की नारी में वो नेतृत्व कि वह  क्षमता है जो शहर की नारी में देखि जाती है | अपितु  यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी की वे शहर कि महिलाओ से बेहतर और कुशलता से अपने परिवार और समाज की जिम्मेदारी निभाती हैं  |

बुटोला जी, मैं आपसे सहमत तो हूं, लेकिन पूर्णतया नहीं, पहाड़ सड़्क के किनारे बसने वाले गांव नहीं है, पहाड़ वह है, जहां पहुंचने के लिये आज भी १२-१२, १४-१४ कि०मी० पैदल चलना होता है। मेरी पीड़ा उन गांवो की है, जहां प्राथमिक शिक्षा के लिये भी ५ मील पैदल जाना होता है, इस स्थानों में महिला की भूमिका चूल्हा चौका और उसकी हाबीज़ घास-लकड़ी लाना तक ही सीमित है। इन गांवों में भी महिला प्रधान और जिला पंचायत बनेंगी, तो क्या जिलाधिकारी के चपरासी को भी बहुत बड़ा सैप समझने वाली नारियां, उसी जिलाधिकारी के सामने प्लान और नान प्लान के बजट पर बहस कर पायेंगी?
         दूसरे गांव के मर्द से ना बोल पाने वाली ये महिलायें क्या नेतृत्व दे पायेंगी? अपना नाम तक ना लिख पाने वाली यह बेचारी महिलायें, जो अपने अधिकारों के लिये नहीं लड़ पाई, समाज से......वह समाज के अधिकारों के लिये कैसे लडॆ़ पायेंगी?

Risky Pathak

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Agree with u Pankaj Da.

i have seen this problem within my village.

The women sabhapati of my village is just for sake of name. For every administrative work her Husband is responsible.

If you ask any person "Who is the Sabhapati of our Village?". Then the reply will be the name of her Husband.

Govt reserved women candidacy for the welll fare of women, but there is no fruitful result.
आज पहाड़ में समय बदल गया है | आज पहाड़ की नारी में वो नेतृत्व कि वह  क्षमता है जो शहर की नारी में देखि जाती है | अपितु  यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी की वे शहर कि महिलाओ से बेहतर और कुशलता से अपने परिवार और समाज की जिम्मेदारी निभाती हैं  |

बुटोला जी, मैं आपसे सहमत तो हूं, लेकिन पूर्णतया नहीं, पहाड़ सड़्क के किनारे बसने वाले गांव नहीं है, पहाड़ वह है, जहां पहुंचने के लिये आज भी १२-१२, १४-१४ कि०मी० पैदल चलना होता है। मेरी पीड़ा उन गांवो की है, जहां प्राथमिक शिक्षा के लिये भी ५ मील पैदल जाना होता है, इस स्थानों में महिला की भूमिका चूल्हा चौका और उसकी हाबीज़ घास-लकड़ी लाना तक ही सीमित है। इन गांवों में भी महिला प्रधान और जिला पंचायत बनेंगी, तो क्या जिलाधिकारी के चपरासी को भी बहुत बड़ा सैप समझने वाली नारियां, उसी जिलाधिकारी के सामने प्लान और नान प्लान के बजट पर बहस कर पायेंगी?
         दूसरे गांव के मर्द से ना बोल पाने वाली ये महिलायें क्या नेतृत्व दे पायेंगी? अपना नाम तक ना लिख पाने वाली यह बेचारी महिलायें, जो अपने अधिकारों के लिये नहीं लड़ पाई, समाज से......वह समाज के अधिकारों के लिये कैसे लडॆ़ पायेंगी?

Risky Pathak

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My mother told me when Indira Gandhi was the prime minister of India, Village people used to say ""कसी हु देशक भल, सैणिनक राज जो छू""

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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As almost everybody are of the same opinion that the 50% resevation for women Uttarakhand in local election would be so benefical for ladies as they are merely a rubber stamp.

All their work will be looked after either by the husband or other relatives. But somewhere it is a start when educated women would be foward, this will definitly prove to be a good step.


हेम पन्त

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पंचायत चुनावों में पैसों का भारी खेल खेला जा रहा है. यह माना जा रहा है कि ब्लाक प्रमुख व जिला पंचायत प्रमुख चुनने के लिये प्रत्याशी करोङों रुपये खर्च करेंगे.

इसके अलावा महिला प्रत्याशी अभी भी "डमी" प्रत्याशी की तरह ही चुनाव मैदान में हैं, क्योकि सीट रिजर्व होने के कारण उनके पति चुनाव लङने से वंचित रह गये थे. यह भी सुनने को मिला है कि एक निवर्तमान महिला प्रधान के पति गाङी में लगे बोर्ड पर पति (ग्रामप्रधान) लिखा कर घूमते हैं.

 

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