Author Topic: SURPRISE & UNIQUE NEWS OF RELATED TO UTTARAKHAND- जरा हट के खबर उत्तराखंड की  (Read 21410 times)

Bhopal Singh Mehta

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भैंस के पेट से चम्मच व कील निकली

टनकपुर,: पशु चिकित्सालय में एक भैंस को मौत के मुंह से बचा लिया गया। आपरेशन से भैंस के पेट में फसी चम्मच व कील को बाहर निकाला गया। नगर से लगे गांव आमबाग स्थित सूबेदार लक्ष्मी दत्त पांडे की भैंस के पेट में सूजन की दिक्कत थी। काफी उपचार के बाद भी भैंस ठीक नहीं हो पा रही थी। इधर पशु चिकित्साधिकारी डा.एके अवस्थी, फार्मेसिस्ट केबी चंद व स्टाफ ने सफल आपरेशन कर भैंस के पेट में फसी चम्मच व तीन इंच की कील को बाहर निकाला। डा. अवस्थी ने बताया कि संभवत: चारा खाते समय भैंस के पेट में चम्मच व कील चली गई होगी।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6303393.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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महिला ने चलाया पालिथिन के खिलाफ अभियान

सोमेश्वर (अल्मोड़ा): तहसील कार्यालय से लगे ग्राम पंचायत बैंगनिया की महिलाओं व विभिन्न महिला समूहों के सदस्यों ने तहसील परिसर के अलावा बैंगनिया ग्राम में स्वच्छता, पर्यावरण की सुरक्षा, जंगलों तथा जलस्रोतों के संरक्षण व पालिथिन उन्मूलन कार्यक्रम का आयोजन किया।




इस अवसर पर तहसीलदार नंदन सिंह रौतेला ने महिलाओं द्वारा चलाए गए अभियान की सराहना करते हुए उनका उत्साहवर्धन किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक महत्व के कार्यो में महिलाओं की पहल संगठित व जागरूक समाज की संरचना में अहम भूमिका रखते हैं। उन्होंने नागरिकों से इन कार्यो में सहयोग की अपील की। इस अवसर पर अनेक समूहों, महिला मंगल दल सदस्यों, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों व ग्रामीणों ने गांव के सार्वजनिक स्थलों, गूलों, गधेरों, संपर्क मार्गो, जलस्रोतों आदि की सफाई की। जंगलों को दावाग्नि से बचाने के लिए सबसे सहयोग की अपील की गई।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6321338.html

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plants Uttarakhand scientists discover a new fungus for growth of plants
« Reply #22 on: April 15, 2010, 08:54:17 PM »
 
Uttarakhand scientists discover a new fungus for growth of plants

Pant Nagar (Uttarakhand), Apr 5 (ANI): Scientists of the College of Basic Science And Humanities in Uttarakhand have discovered a new fungus  that helps in increasing the growth of plants.

They have discovered this fungus after eight years of research.

“This work was initiated almost eight years back when we were in search of different microbes, which could enhance the plant growth in much better way then existing ones. We started this work and covered 1000 kilometres area to take out the samples and isolated the microbes and finally came up with this fungus fusarium pallidoroseum and this we tested on chilly and potato.” Said Anil Sharma, a scientist.

The scientists traveled around 1000 kilometers and collected around 800 samples for the research.

Experiments were first tested on tomato and chilly.

“Around 800 samples collected for the research of fungus and this experiment was done on chilly and tomato and we saw the difference in the growth of chilly and tomato and we found positive results,” said Rashmi Srivastav, a scientist.

The new fungus is expected to yield better crops. (ANI)

source :http://www.24worldnews.com/uttarakhand-scientists-discover-a-new-fungus-for-growth-of-plants/5429/

Devbhoomi,Uttarakhand

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                     कैलाश पर्वत को बचाएंगे भारत, चीन व नेपाल
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देहरादून। दक्षिणी एशिया में भगवान आशुतोष के निवास स्थल कैलाश पर्वत क्षेत्र को बचाने के लिए अनूठी पहल की गई है। भारत, चीन और नेपाल ने क्षेत्र के पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण को हाथ मिलाया है। सरहदों की बंदिशों को तोड़ने वाली इस परियोजना को इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के दिशा निर्देशन में चलाया जाएगा।

'माउंट कैलाश सेक्रेड लैंडस्केप कंजर्वेशन इनिशिएटिव' नामक इस परियोजना के तहत भारत, नेपाल और चीन के कैलाश क्षेत्र में 'ट्रांस बाउंड्री फ्रेमवर्क फॉर कंजर्वेशन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट' विकसित किया जाएगा। बता दें कि कैलाश पर्वत क्षेत्र चीन की तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र के दक्षिणी पश्चिमी हिस्से, उससे जुड़े भारत और नेपाल के हिमालयी क्षेत्र तक फैला हुआ है। पर्यावरण और जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील यह क्षेत्र मानसरोवर यात्रा के लिए प्रसिद्ध है। आईसीईमोड ने इसी माह 11 से लेकर 13 अप्रैल तक अल्मोड़ा के कोसी कटारमल स्थित गोविंद बल्लभ पंत हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान में इस बाबत कार्यशाला भी आयोजित की। इसमें परियोजना पर विस्तृत चर्चा हुई। शुरुआती चरण में 18 महीनों के भीतर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और भारत, चीन व नेपाल की संस्थाएं मिलकर एक सीमा रहित सांस्कृतिक व जैव विविधता क्षेत्र यानी माउंट कैलाश लैंड स्केप को स्पष्ट रूप से चिह्निंत करेंगे। परियोजना में भारत की ओर से दून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्लूआईआई), उत्तराखंड का वन विभाग, जीबी पंत इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन एन्वायरमेंट एंड डेवलपमेंट सक्रियता से हिस्सा लेंगे। पंत संस्थान इनमें नेतृत्वकारी भूमिका निभाएगा। परियोजना में नेपाल का वन मंत्रालय व चीन की अकेडमी आफ साइंसेज अपने-अपने देश की नोडल एजेंसी होंगी। इस पूरे क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधन अत्यधिक दबाव में हैं। डब्लूआईआई की ओर से परियोजना की देखरेख कर रहे वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.जीएस रावत के मुताबिक परियोजना की फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार की जा रही है। योजना की खास बात यह है कि इसमें स्थानीय लोगों की सहभागिता पर ज्यादा जोर दिया जाएगा। तीनों देशों की सरकारें इसमें केवल तकनीकी मदद देंगी। तीनों देश इस क्षेत्र में वन्य जंतुओं के अवैध व्यापार, शिकार पर जानकारी तो साझा करेंगे ही। एक दूसरे के अनुभवों से सीख भी लेंगे। साथ ही जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, पारिस्थतिकी के आंकड़े भी साझा करेंगे। इससे एक ओर नोलेज गैप कम होगा दूसरी ओर पर्यावरण पर जलवायु परिवर्तन के स्थानीय, क्षेत्रीय व वैश्विक प्रभाव का बेहतर अध्ययन किया जा सकेगा। डब्लूआईआई के निदेशक प्रिय रंजन सिन्हा का कहना है कि परियोजना के तहत भारत नेपाल व चीन में विस्तृत क्षेत्र में पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण के साथ टिकाऊ विकास की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6358191.html

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नंबर वन की दौड़ में उत्तराखंड सबसे आगे

देहरादून। यदि सब कुछ ठीकठाक रहा तो उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य होगा, जिसका अपना स्टेट रजिस्टर होगा। इस स्टेट रजिस्टर में 'सारथी' व 'वाहन' शामिल हैं। यह रजिस्टर सेंट्रल सर्वर से जुड़ा रहेगा। इसके जरिए कहीं भी बैठकर वाहन व चालक की पूरी जन्मकुंडली बांची जा सकेगी। उत्तराखंड का संपूर्ण डाटा नेशनल इंफारमेटिक सेंटर (एनआईसी) को भेजा जा रहा है। एनआईसी ही विधिवत रूप से इस बात की घोषणा करेगा कि कौन सा राज्य स्टेट रजिस्टर तैयार करने में नंबर वन है।

केंद्र में लंबे समय से एक नेशनल रजिस्टर तैयार करने की कवायद चल रही है। इसके तहत हर प्रदेश के वाहनों की जानकारी एक ही जगह से देखी जा सकेगी। इसी के तहत केंद्र ने हर प्रदेश को अपना स्टेट रजिस्टर तैयार करने के निर्देश दिए थे। पहले वाहनों का पंजीकरण कर उन्हें एक रजिस्टर में चढ़ाया जाता था। पहले अन्य प्रदेशों से किसी वाहन के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए पत्राचार के जरिए जानकारी हासिल की जाती थी। देश में आतंकी घटनाएं बढ़ने के बाद वाहनों के लिए एक नेशनल रजिस्टर बनाए जाने पर जोर दिया गया, जिससे ही कहीं भी वाहन व चालक पर मिले प्रपत्रों के हिसाब से उसकी सही जानकारी प्राप्त की जा सके। इसके तहत सबसे पहले 'वाहन' साफ्टवेयर तैयार किया गया, जिसमें वाहन के रजिस्ट्रेशन संबंधी जानकारी डाली जाती है। इसके बाद 'सारथी' साफ्टवेयर डेवलेप किया गया। इसमें लाइसेंस बनाते समय लाइसेंस धारक के विषय में सभी जानकारियां डालने के अलावा उसकी अंगुलियां के निशान तक अंकित होते हैं। ये उन्हीं कार्यालयों में लगा है जो पूर्णत कंप्यूटरीकृत हो चुके हैं। इन कार्यालयों में अब वाहनों का रजिस्ट्रेशन व लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया इसी साफ्टवेयर के तहत होती है। सूबे में संभागीय और उप संभागीय कार्यालय मिलाकर कुल 15 कार्यालय हैं। यह सभी कार्यालय कंप्यूटरीकृत हो चुके हैं। ऐसे में इन सभी कार्यालयों से 'वाहन' व 'सारथी' साफ्टवेयर का डाटा कलेक्ट कर एनआईसी को भेजा जा रहा है। अब सिर्फ पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा का डाटा एनआईसी तक पहुंचना शेष है। डाटा तैयार है और एक दो दिनों में एनआईसी को भेज दिया जाएगा। एनआईसी को यह संपूर्ण डाटा उपलब्ध कराने वाला उत्तराखंड पहला राज्य होगा। हिमाचल प्रदेश भी उत्तराखंड से ज्यादा पीछे नहीं है, लेकिन अभी तक हिमाचल एनआईसी को पूरा डाटा उपलब्ध कराने में सफल नहीं हो पाया है। ऐसे में उत्तराखंड का ऐसा पहला राज्य बनना तय है, जिसका अपना स्टेट रजिस्टर होगा

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6360384.html

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Uttarakhand Cabinet meets on Ganga ghat
« Reply #25 on: May 01, 2010, 01:10:44 PM »
Uttarakhand Cabinet meets on Ganga ghat

Uttarakhand Chief Minister Ramesh Pokhriyal Nishank (right) taking a dip in the Ganga before holding a meeting of his council of ministers on the banks of the river at Haridwar on Friday. Tribune photo: Rameshwar Gaur
 


 
Haridwar, April 30
This year’s Maha Kumbh in Haridwar will be known for many firsts like the bath of deities from all over Uttarakhand and the fourth shahi snan by all akhadas. In yet another first, the Uttarakhand Council of Ministers, led by Chief Minister Ramesh Pokhriyal Nishank, took a dip in the Ganga and then held a cabinet meeting at Har-ki-Pauri today. Held on the lines of the cabinet meeting of the Nepalese government at the Mount Everest base camp last December to highlight the effects of global warming on the Himalayas, this hill state’s cabinet meeting was held to champion the cause for saving the Ganga from pollution. A six-point resolution was passed with focus on cleaning the holy river, which has religious and mythological significance for Indians. The resolution will be forwarded to the Centre with the demand of according world heritage status to the Ganga. A Ganga Conservation Authority, which will be an autonomous body, will be formed. Its focus will be cleaning Ganga, maintaining its sanctity, flow and religious-mythological significance. It was quite a different experience for the 13-member Council of Ministers to first take a bath in the Ganga and then sat on the ghat for the meeting, far from the well-furnished air-conditioned secretariat rooms. A five-year limit has been set to monitor the cleaning of the Ganga from its origin in the Gangotri glacier till Haridwar under the project, “Ganga Nirmal Yojana”. “We held this meeting on the Ganga ghat to give the message of our government’s seriousness over making the holy river pollution-free. Besides, with the Kumbh just concluding a day earlier, we though what better occasion would it be than to convey the message of Ganga cleaning and take substantial steps towards it by holding a meeting on the Ganga ghat,” said Chief Minister Ramesh Pokhriyal Nishank while talking to The Tribune. He said the drive to stop discharge of effluents into the river would be stepped up. Apart from cabinet’s decision on the Ganga, the formation of a separate Kumbh authority was also taken with the aim of making the Maha Kumbh and Ardh Kumbh preparations more structured and round-the-year exercise, lessening the pressure on the mela administration, which is normally formed a year before the commencement of these twin mega fairs every 12 and six years respectively. The decision also envisages bringing the Kanwar mela and other yearly festive baths held in Haridwar under the Kumbh authority so that all religious events in the Kumbh city get well organised and coordinated and pressure on the district administration is lessened. Finally, the cabinet passed a resolution thanking the people of Haridwar, pilgrims, tourists, the mela administration, police personnel, the media and all those who contributed in making this century’s first Maha Kumbh a successful and peaceful event.
 
http://mbilintra/shiftschedule/shiftsanction1.asp

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Uttarakhand's scientists use cow urine for improved apiculture
« Reply #26 on: May 06, 2010, 03:09:25 PM »
 
Uttarakhand's scientists use cow urine for improved apiculture
 
Nainital (Uttarakhand), May 6 (ANI): Apiculturists in Uttarakhand are making use of cow urine to prevent bees from contacting microbial diseases during the rearing process.

Researchers at the Govind Ballabh Pant University of Agriculture and Technology in Pantnagar have taken to using cow urine extensively while breeding honeybees.

"This is proving to be a sure-shot treatment for the honeybee rearing. Also, when one can get four percent increase in profits by the use of cow urine, what else does anyone want? Honeybee helps in the production and from the last two years, their population had decreased. Despite using medicines and pesticides, there was no increase in their population. The honeybee keepers are now totally depending upon cow urine," said Ruchira Tiwari, a researcher at the Govind Vallabh Agricultural University.

In the course of rearing, bees are kept in fixed-frame boxes for better commercial extraction of honey, which makes them susceptible to microbial diseases during the process.

The medicines used for killing the microbes have had a bad effect on the production of larvae but cow urine does not have such side-effects.

"Medicines used to cost us a lot. The expenditure of medicines and other pesticides was very high. Cow urine is free and further, there is an increase in profit by three to four percent," said Puran Chandra Joshi, a beekeeper.

An average bee colony yields about 10-15 kilograms of honey, which is produced by 20,000 to 60,000 bees.

Bees being fast breeders lay as many as 800 to 3,000 eggs daily, which help breeders multiply their flock and yield without any expenditure. They also get beeswax as an additional by-product.

Honey has numerous uses such as medicine, food and an ingredient in various compounds. It is also an excellent medium for vitamins. (ANI)
 
http://news.oneindia.in/2010/05/06/uttarakhandsscientists-use-cow-urine-for-improvedapicultu.html

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पूर्व सैनिक के खेत में पैदा हुआ बारह सौ ग्राम का प्याज   
   गंगोलीहाट(पिथौरागढ़): बागेश्वर जनपद के खातीगांव निवासी पूर्व सैनिक के खेत में एक किलो दो सौ ग्राम का प्याज पैदा हुआ है। यह प्याज लोगों के लिये विशेष आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।
हिमालयन ग्राम विकास समिति द्वारा इन दिनों पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों में आजीविका सुधार कार्यक्रम के तहत लोगों को बागवानी, खेती आदि के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें संस्था के जानकार ग्रामीणों को खेती बाड़ी की उन्नत किस्मों व उत्पादन की विधियों की जानकारी देते हैं। पिथौरागढ़ जिले की सीमा से लगे बागेश्वर जनपद के खातीगांव निवासी पूर्व सैनिक कृपाल सिंह रावल ने भी संस्था द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों की जानकारी ली और संस्था के सदस्य बनकर खेतीबाड़ी का काम शुरू कर दिया। उनके खेतों में इस वर्ष सब्जी की बम्पर पैदावार हुई। परंतु प्याज के उत्पादन ने उनको भी हैरत में डाल दिया। जब वह प्याज को खोदने लगे तो एक प्याज औसत से कहीं अधिक बड़ा निकला। इसका वजन करने पर प्याज एक किलो दो सौ ग्राम वजनी निकला। मंगलवार को गंगोलीहाट तहसील मुख्यालय पहुंचे कृपाल सिंह के खेत में उत्पादित बारह सौ ग्राम के प्याज को सैकड़ों लोगों ने देखा। कृपाल सिंह के खेत में उत्पादित प्रत्येक प्याज औसत से कई गुना बड़े आकार का है। प्याज के उत्पादन में उत्पादक द्वारा मात्र जैविक खाद का ही प्रयोग किया गया है।
 
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6458277.html

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  अल्मोड़ा। संस्कार सांस्कृतिक एवं पर्यावरण संरक्षण समिति का 15 सदस्यीय दल तमिलनाडु में उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक छटा बिखेर कर वापस लौट आया है। कलाकारों का यहां पहुंचने पर समिति के सदस्यों ने जोरदार स्वागत किया।
समिति के कलाकारों ने तमिलनाडु के तंजाबूर शहर में आयोजित 5 दिवसीय समर फेस्टेबल में भागीदारी की। तमिलनाडु से लौटकर दल लीडर प्रकाश बिष्ट ने बताया कि कलाकारों ने समर फेस्टेबल में उत्तराखण्ड का पारंपरिक नृत्य हारुल व छपेली नृत्य का शानदार प्रदर्शन किया। जिसे वहां की जनता द्वारा काफी सराहा गया। श्री बिष्ट ने बताया कि सांस्कृतिक दल की शानदार प्रस्तुतियों पर साउथ जोन कल्चरल सेंटर तमिलनाडु के निदेशक केवी गिरधर ने कलाकारों को स्मृति चिह्न व प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।
 
source
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6480949.html

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दुकान छोटी अहमियत बड़ी

                गोपेश्वर (चमोली)। समुद्रतल से साढ़े ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर   पहाड़ियों के बीच एक चाय की दुकान। हालांकि दुकान छोटी है, लेकिन अहमियत बड़ी   है। यहां चाय की चुस्की लेते ही हर आदमी देश के प्रति जज्बाती हो जाता है।   चाय के प्याले से निकलती वन तुलसी की महक ग्राहक के शरीर में ताजगी भर   देती है।
 बात हो रही है भारत-तिब्बत सरहद के निकट स्थित 'भारत की अंतिम चाय की   दुकान' की। यह दुकान चमोली जिले के सीमांत गांव माणा से आगे रमणीक पहाड़ियों   के बीच स्थित है। दुकान तक पहुंचने के लिए माणा से डेढ़ किलोमीटर का पैदल   सफर तय करना पड़ता है। माणा गांव निवासी चन्द्र सिंह बड़वाल पिछले 27 वर्ष से   इस दुकान को चला रहे हैं। आर्थिक तंगी की वजह से महज दस वर्ष की उम्र में   चन्द्र सिंह को यह दुकान खोलनी पड़ी। चूंकि, दुकान अंतर्राष्ट्रीय सीमा के   पास स्थित है इसलिए श्रीबदरीनाथ धाम आने वाले अधिकांश श्रृद्धालु इस दुकान   की ओर जरूर रुख करते हैं। दुकान तक पहुंचना भले ही कष्टकारक हो, लेकिन वहां   पहुंचने के बाद रमणीक लोकेशन क्षणभर में थकान दूर कर देती है। खास बात यह   है कि इस क्षेत्र में वन तुलसी की प्राकृतिक रूप से पैदावार होती है।   लिहाजा, वनतुलसी की एक पत्ती चाय की चुस्की को और मजेदार बना देती है।   कलकत्ता से आए पर्यटक मिश्रित कुमार का कहना है कि सीमांत दुकान में एक   प्याला चाय भले ही 8 रुपया में मिलती है, लेकिन उसकी अहमियत की तुलना पैसों   से नहीं की जा सकती। उनका कहना है कि दुकानदार चन्द्र सिंह बड़वाल एक तरह   से ऐसे दुर्गम स्थान पर देशवासियों को चाय पिलाकर देश की सेवा कर रहे हैं।   दुकान के आसपास माणा गांव के कई बुजुर्ग बैठे मिलते हैं। भोटिया जनजाति के   ये बुजुर्ग दुकान में आने वाले पर्यटकों को भारत-तिब्बत व्यापार  से जुड़े   यादगार लम्हों को सुनाना नहीं भूलते।  माणा निवासी सुरेन्द्र सिंह चौहान का   कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के बंद होने का प्रतिकूल असर दो देशों   के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान पर भी पड़ा है।
   
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6510002.html

 

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